वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३५ )
खोजमें उनको सारी कोशिशों बेकार हो जायें, पर जीविकाका टिकाना न हो। यह क्या कुछ कम दुःखकी बात है? यदि विद्याता मनुष्योंको भी साँपों और पशुओंकी सी ही जीविका बताता, तो कैसा अच्छा होता? मनुष्य, जीविकाकी फिक न होनेसे, सहजमें ही अपनी बुद्धिकी ज़ोरसे मोक्ष पा जाते।
उत्ताद ज़ौक भी कुछ इसी तरहकी शिकायत करते हैं,—
बनाया ज्ञैक जो इन्सां को उसने जुज्व जईफ।
तो उस जईफसे कुल काम दो जहाँके लिए ॥
ये ज़ौक! ईश्वरको देखो, कि उसने मनुष्यको कितना कमज़ोर बनाया, पर काम उससे दोनों लोकोंके लिये। उसे इस लोक और परलोक दोनोंकी फिक लगादी।
किसीने ठीक ही कहा है :—
घृतलवणतैलतगदुल शकेन्धनचिन्तयाऽनुदिनम्।
विपुल मतेरपि पुंसां नश्यति धीर्मेन्दविभवत्वात् ॥
घो, नोन, तेल, चाँवल, साग और ईंधनकी चिन्तामें बड़े-बड़े मतिमानोंको उग्र भी पूरी हो जाती है; पर इस चिन्ताका ओर-छोर नहीं आता। इसीसे मनुष्यको ईश्वर-भजन या परमात्माकी भक्ति-उपासनाको समय नहीं मिलता। अगर मनुष्य इतनी आपदाओंके होते हुए भी परलोक बनाना चाहे, तो उसे चाहिये कि, अपनी ज़िन्दगीकी ज़रूरियातोंको कम करे,