वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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क्योंकि जिसकी आवश्यकतायें जितनी ही कम हैं, वह उतनाही सुखी है। इसीलिये महात्मा लोग महलोंमें न रहकर वृक्षोंके नीचे उग्र काट देते हैं। बनमें जो फल-फूल मिलते हैं, उन्हें खाकर और भरनोंका शीतल जल पीकर पेट भर लेते हैं। आवश्यकताओंको कम करना ही सुख-शान्तिका सच्चा उपाय है।
वृष्यय ।
बिन उद्यम बिन पाप, पवन सर्पनको दीन्हीं ।
तैसेही सब ठौर, घास पशुवनको कीन्हीं ।
जिनकी निर्मल बुद्धि, तरन भवसागर समरथ ।
तिनकी दूर वृत्ति, हरत गुण ज्ञान ग्रन्थ गथ ।
विधि ! अविधि करी तें अति अधिक, यातें नर पर घर फिरत ।
निशि-दिवस पचत तनमन नचत, लचत रचत उरभत गिरत ॥१०॥
10. The Creator has designed the harmless and easily obtainable air to be the food of serpents. The quadrupeds have been made to eat the green grass and to sleep on the flat earth. But the tendency of human beings, who have been endowed with sufficient reason to enable them to attain a life of everlasting bliss, has been created such as to baffle all the faculties of an observer in his attempt to explain its working.
न भ्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत्संसारविच्छिन्नये
स्वर्गद्वारकपाटपाटनपटुधर्मोऽपि नोपाजितः ॥