भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ३० )

नारीपीनपयोधरोस्त्युगलं स्वप्नेऽपि नारिर्गिर्गतं

मातुः केवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारा वयम् ॥११॥

हमने संसार-बन्धनके काटनेके लिये, यथाविधि, ईश्वरके चरणोंका ध्यान नहीं किया; हमने स्वर्गके दरवाज़े खुलवाने वाले धर्म का भी सन्ध्वय नहीं किया; और हमने स्वप्नमें भी झूठके कठोर कुर्चोंका आलिङ्गन नहीं किया। हम तो अपनी मौके यौवन रूपी बनके काटनेके लिये कुल्हाड़े ही डूए ॥११॥

हमने लोक-परलोक साधनके लिये, जन्म-मरणका फल्दा काटनेके लिये अथवा परमपदकी प्राप्तिके लिये, शास्त्रोंमें लिखी विधिसे, परमात्माके कमल-चरणोंका ध्यान नहीं किया, उसकी पूजा-उपासना नहीं की; सारी उम्र पेटकी चिन्तामें ही बिता दी। हमने पूर्वजन्म वा वर्तमान जन्मके पापोंके समूल नाश करनेके लिये प्रायश्चित्त नहीं किये, न जीवोंको अभय किया, न दानपुण्य किया; फिर हमारे लिये स्वर्गका द्वार कैसे खुल सकता है? क्योंकि धर्मका सञ्चय करनेसे ही स्वर्गका द्वार खुलता है। न हमने परमात्माके पदपङ्कजोंका ध्यान किया, न धर्म सञ्चय किया और न स्त्रीके पीनपयोधरोंका स्पर्शमें भी आलिङ्गन किया ! मतलब यह है, न हमने संसारके मिथ्या विषय-सुख ही भोगे और न हमने मोक्ष या स्वर्ग-प्राप्तिके उपाय ही किये। “दुविधामें दोनों गये, माया मिली न राम” अथवा “इधरके रहे न उधरके रहे,