वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३६ )
कालो न यातो वयमेव याता-
स्तुष्या न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥ १२ ॥
विषयोंको हमने नहीं भोगा, किन्तु विषयोंने हमारा ही भुगतान कर दिया ; हमने तपको नहीं तपा, किन्तु तपने हमें ही तपा डाला ; कालका खात्मा न हुआ, किन्तु हमारा ही खात्मा हो चला । तुष्याका बुढ़ापा न आया, किन्तु हमारा ही बुढ़ापा आ गया ॥ १२ ॥
हमने बहुत कुछ भोग भोगे, पर भोगोंका अन्त न आया ; हाँ हमारा अन्त आ गया । काल या समयका अन्त न आया, किन्तु हमारा अन्त आ गया—हमारी उम्र पूरी हो चली । हमें जो अर्ध-कार्य करने थे, वह हम न कर सके । हमने तप तो नहीं तपा, किन्तु संसारी तापोंने हमारे तर्ह तपा डाला—संसारके जञ्जालोंमें फँसकर हम हो शोक-तापोंसे तप गये । हमारा अन्त आ पहुँचा, हम निर्बल और बुद्ध हो गये ; पर तुष्या बूढ़ी और कमज़ोर न हुई—हमें संसारसे विरक्ति न हुई ।
येसी ही बात उस्ताद ज़ौकने कही है—
दुनियासे जैक ! रिश्तये उल्फ़तको तोड़ दे ।
जिस सरका है यह बाल, उसी सरमें जोड़ दे ॥१॥
पर जैक न छोड़ेगा, इस पीरा जालको ।
यह पीरा जाल, गर तुम्हें चाहे तो छोड़ दे ॥२॥