वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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मतलब यह, कि लोग दुनियाको नहीं छोड़ते, दुनिया ही उन्हें निकम्मा करके छोड़ देती है ।
छप्पय ।
भोग रहे भरपूर, आयु यह सुगत गई सब । तप्यो नाहिं तप मूढ़, अवस्था तपत भई अब । काल न कितहूँ जात, वैस यह चली जात नित । वृद्ध भई नहिं आस, वृद्ध वय भई छाँड़ हित । अजहूँ अचेत चित ! चेतकर, देह-गोहसों नेह तज ।
दुख-दोषहरण मंगलकरन, श्रीहरिहरके चरण भज ॥१२॥
12. We did not exhaust the enjoyments of life, rather we ourselves were exhausted, We did not practise penances, but it was rather undergoing a life of extreme misery. It was not Time that passed, rather it was ourselves that passed away. It is not Avarice that has become monotonous and weak, rather we ourselves have become so.
ज्ञान्तं न क्षमया शृहोचितसुखं त्यक्तं न सन्तोषतः
सोढा दुःसहशीतवाततपनकृेशा न तसं तपः ॥
ध्यातं वित्तमहर्निशं नियमितपापैर्न शंभोः पदं
तत्तत्कर्म कृतं यदेव मुनिभिस्तैस्तैःफलैर्वचितम् ॥१३॥
क्षमा तो हमने की, परन्तु धर्मके ख्यालसे नहीं की । हमने