वैराग्य शतक

वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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वैराग्यशतक
सुखेश्वर्य में वैराग्य ।
आपका अन्तःकरण शुद्ध होगा है ; अतः आप धनेश्वर्य और पुत्रकुलव्रादि को त्यागकर वन को जा रहे हैं । आप कहते हैं, “अब मुझे विषय सुख अच्छे नहीं लगते । मैं वन में जाकर जगदीश का भजन करूँगा ।” यही वैराग्य उत्तम वैराग्य है और ऐसे नरन प्रशंसा के पात्र हैं । पृष्ठ ४१
Popular Press, Calcutta.