वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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घरके सुख-चैन तो छोड़े, परन्तु सन्तोषसे नहीं छोड़े । हमने सदी-गर्मी और हवाके न सह सकने योग्य दुःख तो सहे ; किन्तु हमने ये सब दुःख तपकी गरजेसे नहीं, किन्तु दरिद्रताके कारण सहे । हम दिन-रात ध्यानमें लगे तो रहे, पर धनके ध्यानमें लगे रहे—हमने प्राणायाम-क्रिया द्वारा शस्त्रके चरणोंका ध्यान नहीं किया । हमने काम तो सब मुनियोंकेसे किये, परन्तु उनकी तरह फल हमें नहीं मिले ! ॥ १३ ॥
हमने क्षमा तो की, परन्तु दयाधर्म-वश नहीं की, हमारी क्षमा असमर्थताके कारणसे हुई ; हममें सामर्थ्य नहीं थी, इसीसे हम शान्त हो गये । हमने अच्छा खाना-पीना ऐश-आराम छोड़े, पर मजबूरीसे छोड़े ; अपनी भीतरी इच्छासे नहीं छोड़े । हमने उन्हें रोग प्रभृतिके कारण या और किसी घटनाके कारण त्यागा, पर सन्तोषसे नहीं त्यागा । हमने गर्म-सर्द हवाके भोके सहे ; हमने सदी-गर्मी सही ज़रूर, पर तपकी गरजेसे नहीं ; किन्तु घरमें पैसा न होनेकी वजहसे । हम सोते-जागते आठ पहर वॉसठ घड़ी ध्यान तो करते रहे, पर पैसे या स्त्री-पुत्रोंका अथवा संसारके और भगड़ोंका । हमने भोठानाथके कमल-चरणोंका ध्यान नहीं किया ! सारांश यह, हमने मुनियोंकी तरह विषय-सुख भी त्यागे, उनकी तरह सदी-गर्मीके दुस्सह कष्ट भी उठाये, उनकी तरह हम ध्यान-मग्न भी रहे—पर वे जिस तरह सामर्थ्य होते भी शान्त होते