भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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हैं—सन्तोषके साथ विषय-सुखोंसे मुँह मोड़ लेते हैं—शिवका ही ध्यान करते हैं, उस तरह हमने नहीं किया ; इसीसे हम उन फलोंसे वञ्चित—महरूम—रहे, जिनको वे लोग प्राप्त करते हैं ।

जो लोग शक्ति-सामर्थ्य रहते विषयोंको छोड़ते हैं, वे ही प्रशंसा-भाजन होते हैं । सामर्थ्य न रहने या धातुओंके क्षीण होने पर जो लोग विषयोंको छोड़ते हैं, वे तो मनसे नहीं—लाचारसे छोड़ते हैं ; इसलिये वे प्रशंसा-भाजन नहीं हो सकते । घर-जञ्जालमें रहकर, सदी-गमी और शोक-ताप आदि के कष्ट उठाने ही पड़ते हैं ; फिर तप ही क्यों न किया जाय ? क्योंकि घर-जञ्जालोंके शोक-तापसे कोई लाभ नहीं, किन्तु तपसे स्वर्ग और मोक्ष-को प्राप्ति हो सकती है । धनका ध्यान करनेसे सच्चा सुख नहीं मिल सकता । धनसे जो सुख मिलता है, वह क्षणस्थायी और झूठा है । इस लिये धन-ध्यान छोड़कर, आशुतोष भगवान् शिवके चरणोंका ध्यान करना अच्छा ; जिससे सभी मनोरथ पूरे होते हैं और अन्तमें जन्म-मरणके ऋगड़ोंसे छुटकारा मिलकर परमपद—मोक्ष मिल जाती है । वह बड़े मूर्ख है, जो कष्ट तो उठाते हैं, पर वे कष्ट नहीं उठाते, जिनसे उभय लोक साधन हों ।

लुप्य ।

चमा चमा-बिन कीन, बिना सन्तोष तजे सुख ।

सहे सीत तप घाम, बिना तप पाय महा दुख ।

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