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वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( ४२ )

हैं—सन्तोषके साथ विषय-सुखोंसे मुँह मोड़ लेते हैं—शिवका ही ध्यान करते हैं, उस तरह हमने नहीं किया ; इसीसे हम उन फलोंसे वञ्चित—महरूम—रहे, जिनको वे लोग प्राप्त करते हैं ।

जो लोग शक्ति-सामर्थ्य रहते विषयोंको छोड़ते हैं, वे ही प्रशंसा-भाजन होते हैं । सामर्थ्य न रहने या धातुओंके क्षीण होने पर जो लोग विषयोंको छोड़ते हैं, वे तो मनसे नहीं—लाचारसे छोड़ते हैं ; इसलिये वे प्रशंसा-भाजन नहीं हो सकते । घर-जञ्जालमें रहकर, सदी-गमी और शोक-ताप आदि के कष्ट उठाने ही पड़ते हैं ; फिर तप ही क्यों न किया जाय ? क्योंकि घर-जञ्जालोंके शोक-तापसे कोई लाभ नहीं, किन्तु तपसे स्वर्ग और मोक्ष-को प्राप्ति हो सकती है । धनका ध्यान करनेसे सच्चा सुख नहीं मिल सकता । धनसे जो सुख मिलता है, वह क्षणस्थायी और झूठा है । इस लिये धन-ध्यान छोड़कर, आशुतोष भगवान् शिवके चरणोंका ध्यान करना अच्छा ; जिससे सभी मनोरथ पूरे होते हैं और अन्तमें जन्म-मरणके ऋगड़ोंसे छुटकारा मिलकर परमपद—मोक्ष मिल जाती है । वह बड़े मूर्ख है, जो कष्ट तो उठाते हैं, पर वे कष्ट नहीं उठाते, जिनसे उभय लोक साधन हों ।

लुप्य ।

चमा चमा-बिन कीन, बिना सन्तोष तजे सुख ।

सहे सीत तप घाम, बिना तप पाय महा दुख ।

( ४३ )

धर्यो विषैकौ ध्यान, चन्द्रशेखर नहि ध्यायौ ।

तज्यौ सकल संसार, प्यार जब उन बिसरायौ ।

मुनि करत काज सोई करे, फल दीसत विपरीत अति ।

अब होत कहा चिन्ता किये ? अजहँ कर हरचरणरति ॥१३॥

13. We forgave, but not for the sake of forgiveness. We renounced the comforts of the home, but not for the sake of renunciation and contentment. We suffered the unbearable rigours of cold, heat and the winds, but it was through adversity that we did so and not for the sake of practising Tapa. We meditated day and night with regulated breath on Mammon and not on God. We practised the very deeds which the sages do, but devoid of the fruits which the latter reap of them.

वलभिर्मुखमाक्रान्तं पलितैरंकितं शिरः ।

गात्राणि शिथिलायन्ते तुष्यैका तरुणायते ॥१४॥

चेहेरे पर मुर्खियाँ पड़ गईं, सिरके बाल पककर सफेद हो गये, सारे अंग ढीले हो गये,—पर तुष्या तो तरुण होती जाती है ! ॥१४॥

बुढ़ापा आ गया है, क्योंकि चेहेरेका चमड़ा सुकड़ गया है, मुर्खियाँ पड़ गयीं हैं, रङ्ग-रूप हवा हो गया है, हाथ पैर आदि अङ्ग शिथिल या ढीले हो गये हैं, किसी कामकी सामर्थ्य नहीं रही है । शरीरकी तो यह दशा हो गयी ; पर तुष्याका न तो बुढ़ापा आया, न बल घटा ; वह तो उल्टी तेज हो रही है ।

( ४४ )

हमारे शरीरका बुढ़ापा आ गया, पर तृष्णाकी तो जवानी चढ़ रही है ! महात्मा सुन्दरदासजी कहते हैं—

नैननकी पलही पलमें, क्षण आधि घरी घरी घटिका जु गई है । जाम गयो जुग जाम गयो, पुनि सैक गई तब रात भई है । आज गई अरु काल गई, परसों तरसों कलु और ठई है । सुन्दर ऐसे ही आयु गई, तृष्णा दिन ही दिन होता नई है ।

आज सारा संसार तृष्णाके फेरमें पड़ा हुआ है। अमीर और गरीब सभी इसके बन्धनमें बँधे हैं। गरीबीकी अपेक्षा धनियोंको तृष्णा बहुत है। धनी हमेशा निन्ध्यानवै के फेरमें लगे रहते हैं। ६६ होने पर १०० पूरे करनेकी फिक रहती है। हजार होनेपर दस हजारकी, दस हजार होनेपर लाखकी, लाख होनेपर करोड़की और करोड़ होनेपर अरब-खरबकी तृष्णा लगी रहती है। इसी फेरमें मनुष्य रोगी और बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा न रोगिणी होती है और न बूढ़ी। “सुभाषितावलि”में लिखा है :—

यौवनं जया प्रस्तमोराम्यं व्याधिभिर्हतम् ।

जीवितम् मृत्युरन्येति तृष्णैका निरुपद्रवा ॥

जवानी बुढ़ापेसे, आरोग्यता व्याधियोंसे और जीवन मृत्यु से प्रसित है ; पर तृष्णाको किसी उपद्रवका डर नहीं ।

बुढ़ापे में तुष्णा ।

आप बूढ़े हो गये हैं, पर आपकी तुष्णा बूढ़ी नहीं हुई है । आप रात-दिन निस्संनय के फेर में लगे रहते हैं ! पूछ लूँ

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पेट पसार दिये जितही तित

तैं यह भूख कितो इक थापी ।

और न छोर कछूँ नहि आवत ।

मैं बहु माँति भली विधि मापी ।

देखत देह भये सब जीरन ।

तू नित नूतन आहि अद्यापि ।

मुन्दर तोहि सदा समुभावत,

हे तुष्णा ! अजहूँ नहि धापी ॥

और भी :—

जीव्यन्ते जीव्यंतः केशा दन्ता जीव्यन्ति जीव्यंतः,

जीव्यंते चक्षुषी श्रोत्रे तुष्योका तक्ष्यायते ॥

जीर्ण होनेसे बाल जीर्ण हो जाते हैं, जीर्ण होनेसे दाँत जीर्ण हो जाते हैं, जीर्ण होनेसे आँख और कान भी जीर्ण हो जाते हैं ; पर एक तुष्णा तरुण होती जाती है ।

सारांश यह कि, मनुष्य नितान्त निकम्मा और जज्जर शरीर होनेपर भी तुष्णाको नहीं त्यागता, यही बड़े आश्चर्यकी बात है । शङ्कराचार्य महाराजने “मोहमुद्गर”में ठीक ही कहा है :—

अंगं गलितं पलितं मुबडं

दन्तविहीनम् यातं तुण्डम् ।

करधृतकम्पितशोभितदण्डम् ।

तदपि न मुञ्चत्याशाभण्डम् ॥

अंग शिथिल हो गये हैं, बुढ़ापेसे सिर सन हो गया है, मुहमें दाँत नहीं रहे हैं, हाथमें लौ लकड़ीकी तरह शरीर काँपता है ; तोभी मनुष्य आशा रूपी पात्रको नहीं त्यागता !

संसार आशा और तृष्णाके बन्धनमें बँधा है । तृष्णा न होती तो मनुष्यको स्वर्ग या मोक्ष पानेमें कुछ भी दिकत न होती ; क्योंकि तृष्णाका नाश ही तो मोक्ष या स्वर्ग है । शंकराचार्यरुक्त “प्रश्नोत्तरमाला”में लिखा है :—

बन्धो हि केो यो विषयानुरागी ।

का वा विमुक्तिर्विषयेविरक्तिः ॥

केो वास्ति घेरो नरकस्वदेह—

स्तृष्णाद्वायस्स्वर्गपदं किमस्ति ?

बन्धनमें कौन है ? विषयानुरागी ।

विमुक्ति क्या है ? विषयोंका त्याग ।

घेरो नरक क्या है ? अपना शरीर ।

स्वर्ग क्या है ? तृष्णाका नाश ।

और भी किसी ने कहा है :—

कामानां हृदये वासः संसार इति कीर्त्तितः ।

तेषां सर्वात्मना नाशेो मोक्ष उक्तेो मनीषिभिः ॥

हृदयमें जो कामनाओंका निवास है, उसीको “संसार” कहते हैं और उनके सब तरहसे नाश हो जानेको “मोक्ष” कहते हैं।

संसारमें बारम्बार आना और यहाँसे जाना ; यानी जन्म लेना और मरना ये बहुत ही दुःखदायी हैं ; अतः जिन्हें अपने तर्ह जन्म-मरणसे मुक्त करना हो, वे कभी भूल कर भी तृष्णा-राक्षसीके भुलावेमें न आवें ; क्योंकि इसके चक्रमें पड़नेसे इस लोकमें नीच-से-नीच कर्म करने होंगे और इतने पर भी तृष्णा शान्त न होगी और उधर परलोक भी न बनेगा । जो निस्सृह हैं, जिन्हें कामना या तृष्णा नहीं, वे मनुष्यरूपमें ही देवता हैं । मरने पर वे स्वर्ग या मोक्षके अधिकारी होंगे, इसमें ज़रा भी सन्देह नहीं ।

दोहा ।

सेत चिकुर तन दशन विन, वदन भयो ज्यों कूप ।

गात सबै शिथिलित भये, तृष्णा तरुण स्वरूप ॥१४॥

14. In old age, the face is marked with wrinkles, the head is lined with grey hair and the limbs all grow loose, but Desire alone becomes rejuvenated and predominant.

येनैवाम्वरसृण्डेन संवीतो निशि चन्द्रमाः ।

तेनैव च दिवा भातुरहो दौर्गत्यमेतयोः ॥१५॥

आकाशके जिस टुकड़ेको ओढ़कर चन्द्रमा रात बिताता है, उसी को ओढ़कर सूर्य दिन बिताता है। इन दोनोंकी कैसी दुर्गति होती है! ॥ १५ ॥

आकाशके जिस हिस्सेको, रातके समय, चन्द्रमा तय करता है, उसीको दिनमें सूर्य तय करता है। सूरज और चाँद—ज्योतिष्योंमें सर्वश्रेष्ठ और सबसे बड़े हैं। जब ऐसे-ऐसोंकी ऐसी दुर्गति होती है, कि बेवारोंको रात-दिन इधर-से-उधर और उधर-से-इधर चकर लगाने पड़ते हैं और परिणाममें कोई फल भी नहीं मिलता; तब हमारी आपकी कौन गिन्ती है? जब ये पराधीनताकी बेड़ियोंमें जकड़े हुए हैं, इन्हें ज़रासी भी आज़ादी नहीं है, एक दिन क्या—एक क्षण भी ये अपनी इच्छानुसार आराम नहीं कर सकते, तब इतर छोटे प्राणियोंकी क्या बात है?

शिक्षा—बड़ोंकी दुर्दशा देखकर छोड़ोंको अपनी विपत्ति पर रोना-कलपना नहीं, बल्कि सन्तोष करना चाहिये। संसारमें कोई भी खुशी नहीं है।

दोहा।

इक अम्बरके टूककों, निशिमें ओढ़त चन्द।

दिनमें ओढ़त ताहि रवि, तू कत करत खण्ड ? ॥ १५ ॥

15. The Sun has to move during the day through the same parts of the heavens as the Moon does at night. Being the two-

जब ये सूरज और चाँद पराधीनता की वैडियों में जकड़े हुए लड़े। इन्हें जरा भी आज़ादी और सुख नहीं—तब और प्राणियों की क्या बात है? पृष्ठ ४७

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greatest Luminaries, mark how wonderful is their dependent career ! Can a tiny mortal hope to be more free ?

अवर्यं यातारश्चिरतस्मुचित्वाऽपि विषया

वियोगे को भेदस्त्यजति न जना यत्सव्यभ्रमन् ॥

त्रजन्तः स्वातंन्यादुलुलपरितापाय मनसः

स्वयं त्यक्त्वा धेति शमसुसमनन्तं विदधति ॥१॥

विषयोंको हम चाहे जितने दिनोंतक क्यों न भोगें, एक दिन वे निश्चय ही हमसे अलग हो जायेंगे ; तब मनुष्य उन्हें स्वयम् अपनी इच्छासे ही क्यों न छोड़ दे ? इस जुदाईमें क्या फर्क है ? अगर वह न छोड़ेगा, तो वे छोड़ देंगे। जब वे स्वयं मनुष्यको छोड़ेंगे, तब उसे बड़ा दुःख और मनःकेश होगा। अगर मनुष्य उन्हें स्वयं छोड़ देगा, तो उसे अनन्त सुख और शान्ति प्राप्त होगी ॥१॥

जिन विषय-मुखाँको हम चिरकालसे भोगते आ रहे हैं, वे सदा हमारे साथ न रहेंगे ; निश्चय ही वे एक दिन हमारा साथ छोड़ देंगे। इससे, यदि हम ही उन्हें पहलेसे ही छोड़ दें, तो हमें महासुख और शान्ति मिलेगी। यदि हम न छोड़ेंगे और वे हमें छोड़ेंगे, तो हमें महादुःख और मनस्ताप होगा।

जो लोग विषयोंको पहले ही त्याग देते हैं, उन्हें उनके न होनेपर दुःख नहीं होता ; किन्तु जो उन्हें नहीं छोड़ते, उन्हें

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उनके न होनेपर महाकष्ट होता है। जो बुद्धिमान पहलेसे ही धन-दौलत खी-पुत्र आदिसे मोह हटा लेते हैं, उन्हें मरते समय कष्ट नहीं होता। जो अपना मन उनमें लगाये रहते हैं, वे मरते समय रोते हैं, पर ज़बान बन्द हो जानेसे अपने मनकी बात जता नहीं सकते। इसलिये जो सुखसे मरना चाहें, उन्हें पहले सेही विषयोंसे मुँह मोड़ लेना चाहिये। इसी तरह जो आज नाना प्रकारके सुख भोग रहा है, यदि कल उसे वे सुख न मिलें, तो वह बड़ा दुःखी होता है; किन्तु जो विषयोंको भोगते तो हैं, किन्तु उनमें आसक्ति नहीं रखते, उन्हें विषय-सुखोंके न मिलने वा उनसे बिछुड़ने पर ज़रा भी कष्ट नहीं होता।

शिक्षा—जो विषय एक दिन तुम्हें निश्चय हो छोड़ देंगे, उन्हें तुम स्वयं ही क्यों न छोड़ दो? तुम्हारे छोड़नेसे तुम्हें अनन्त ख़ुब मिलेगा और उनके छोड़नेसे तुम्हें बोर मनस्ताप वा मनोवेदना होगी।

16. The objects of the sensual pleasure are sure to part from us, even if we enjoy them for a considerable length of time. A man can part with them of his own accord. What is the difference in parting if he does not follow the latter course? They generate great agony and distress in our mind if they themselves leave us; but if we renounce them ourselves, they are sure to give us unbounded peace of mind and happiness.

विवेकन्याकोशे विदधति शमे शाम्यति तृषा- परिषद्ग्रे तुगे प्रसरतितर्षा सा परिणतिः ॥

जराजीर्णैश्चर्यप्रसनाहनात्तेष्वप्यस्तुपापान्

यस्यां भवति मरुतामप्यधिपतिः ॥१७॥

जब ज्ञानका उदय होता है, तब शान्तिकी प्राप्ति होती है। शान्तिकी प्राप्तिसे तृष्णा शान्त हो जाती है, किन्तु वही तृष्णा विषयोंके संसर्गसे बेहद बढ़ती है। मतलब यह है, कि विषयोंसे तृष्णा कभी शान्त नहीं हो सकती। सुन्दरीके कठोर कुवोंपर हाथ लगानेसे काम-मद बढ़ता है, घटता नहीं। जराजीर्ण ऐश्वर्य्य के देवराज इन्द्र भी नहीं त्याग सकते ॥ १७ ॥

ज्ञानसेही तृष्णाका नाश और शान्ति की प्राप्ति होती है। विषयोंके भोगनेसे तृष्णा घटती नहीं, उल्टी बढ़ती है। जो तृष्णाको त्यागते हैं, तृष्णासे नफ़रत करते हैं, उसे पास नहीं आने देते, उनसे तृष्णा भी दूर भागती है। हम जब किसी स्त्रीको प्यार करते हैं, उसका आदर-मान करते हैं, तब वह हमारे बैठती है; किन्तु जब हम उससे मुँह फेर लेते हैं, उसे मुँह नहीं लगाते, उसे प्यार नहीं करते, उसे नफ़रत की नज़र से देखते हैं; तब वह भी हमसे अलग रहती है,—हमारे पास आनेको उसे हिम्मत नहीं होती। इसलिये जो तृष्णा से पीड़ा छुड़ाना चाहें, उन्हें विषयोंसे मुँह मोड़ लेना चाहिये। देखिये, यद्यपि स्वर्गके राज्यको भोगते लाखों-करोड़ों वर्ष बीत गये, तोभी इन्द्र उस स्वर्ग-राज्यको छोड़ नहीं सकता। जब इन्द्रकी भी तृष्णा लाखों-करोड़ों वर्ष राज्य भोगनेसे शान्त

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नहीं होती, तब मनुष्य बेचारे किस खेतकी मूली हैं? तृष्णा पुरानी होनेसे बढ़ती है, घटती नहीं। हम ज्यों-ज्यों विषय भोगते हैं, त्यों-त्यों वे पुराने होते हैं और हमारी तृष्णा बढ़ती है। पुराने होने पर, उन्हें छोड़नेमें हमें बड़ा कष्ट होता है।

शिक्षा-तृष्णाको शीघ्र छोड़ो। पुरानी होनेसे वह पापीयसी औरसी बलवती हो जायगी; फिर उसे त्यागना आपकी शक्तिके बाहर हो जायगा। उसके नाशके लिये “ज्ञान” का पैदा होना जरूरी है; क्योंकि उसका सच्चा मार “ज्ञान” ही है।

छ्पय ।

तृष्णा-मूल नसाय, होय जब ज्ञान उदय मन ।

भये विषयमें लीन, बढ़ै दिन-पर-दिन चौगुन ।

जैसे सुग्धा नार-कठिन कुच, हाथ लगावत ।

बढ़त कामसद अधिक, अधिक तनमें सरसावत ।

जराजीर्ण ऐश्वर्यको, त्यागत लागत दुःख अति ।

तोहि तजिवेको असमर्थ यह, वासव जो है वायुपति॥१७॥

17 Desire cools down when peace of mind is attained through the advent of knowledge. The same expands to an unlimited extent when its connection is established with its highest objects. Hence Desire can never be satisfied by enjoyment or Desire is only insatiable in its fulfilment. The proof of this lies in the person of Indra, the great king of the gods, who is totally unable to give up his king-

एकान्त वन में योगी का ध्यान

(चित्र: एकान्त वन में योगी का ध्यान)

the wh Des

dom of Swarga, although it is worn out by long, long ages having passed over it.

कृशः काणः स्वज्जः श्रवणरहितः पुच्छविकलो

वर्णी प्रयुक्लिः कृमिकुलशतैरावृतततः ॥

चुथात्तामो जीर्णः पिठरजकपालार्पितभलः

शुनीमन्वेति श्वा हतमपि च हन्त्येव मदनः ॥१८॥

दुबला काना और लँगड़ा कुत्ता, जिसके कान और पूँछ नहीं हैं, जिसके ज़ख्मोंसे राध बह रही है, जिसके शरीरमें कीड़े किल-बिला रहे हैं, जो भूखा और बुढ़ा है, जिसके गलेमें हँडीका घेरा पड़ा है—कुतियाके पीछे-पीछे दौड़ता है। कामदेव मेरे हुस्के भी मारता है ॥१८॥

जिस कुत्तेकी ऐसी बुरी हालत है, वह कुत्ता भी मेशुन करनेके लिये कुतियाके पीछे-पीछे दौड़ता है; तब मोटे-ताज़े मावा-मलाई और मिष्ठान्न खाने वाले अपनी कामवासनाको कैसे रोक सकते हैं? इसीसे बचनेके लिये, ज्ञानी लोग अपनी देहको एकदम गला देते हैं, तरह-तरहके व्रत और उपवास करते हैं, धुनी तपते हैं और शीत-घास सहते हैं। कामदेव बड़ा बलवान् है। जो उसके क़ाबूमें नहीं आते, वे सबसे बलवान् और सच्चे योद्धा हैं। वे भीष्म और अर्जुन हैं।

18. The lean, blind and lame dog, without either ears or tail, with blood oozing out of its wounds, hundreds and thousands of

worms sticking to his body, hungry and old, with the upper portion of a broken earthen vessel hanging round his neck, is pursuing the bitch. How cruel is Cupid to shoot his arrows at those who are already dead.

भिन्नाशनं तदपि नीरसमेकवारं शय्या च सः परिजो निजदेहमात्रम् ॥ कर्त्तुं च जीर्णशतखण्डमलीनकन्या हा हा तथाऽपि विषया नपरित्यजन्ति ॥१६॥

वह मनुष्य जो भीख माँगकर दिनमें एक समय ही नीरस अलौना अन्न खाता है, धरती पर सो रहता है, जिसका शरीर ही उसका कुटुम्बी है, जो सौ थेगलियोंकी गुदड़ी आदता है, आश्चर्य्य है कि, ऐसे मनुष्यको भी विषय नहीं छोड़ते ! ॥१६॥

जो दिन-भरमें एक बार अलौना—फीका अन्न खाते हैं और वह भी माँग-ताँग कर ; जिनके पास सोनेके लिये पलँग और गह-तकिये नहीं, बेचारे पेड़ोंके नीचे या खुले मैदानमें घास-पात पर सो रहते हैं ; जिनके नाते-रिश्तेदार कोई नहीं, उनका अपना शरीर ही उनका नातेदार है ; जिनके पास पहनने को कपड़े नहीं, बेचारे ऐसी गुदड़ी ओढ़ते हैं, जिसमें सैकड़ों वीथड़े लटकते हैं—ऐसे लोगोंका भी विषय पीछा नहीं छोड़ते, तब धनियोंका पीछा तो वे कैसे छोड़ने लगे, जहाँ उन्हें सब तरहके पेशो-आराम मिलते हैं ? कहा है :—

वैराग्यशतक

स्त्रीका दर्शन ही ऐसा है कि जिससे देवता भी धैर्य्य त्याग देते हैं । ब्रह्माजी शान्तनु ऋषि की स्त्री अमोघा का रूप देखकर मुग्ध हो गये । पृष्ठ ५४

Popular Press, Calcutta.