वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
७३६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [कर्मनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
न्तरोपलब्धिदर्शनात् । सुप्तस्य प्रबोधकाले जीवनपूर्वकप्रयत्नापेक्षात् ।
अपसर्पणकर्मोपसर्पणकर्म चात्ममनःसंयोगाददृष्टापेक्षात् । कथम् ?
यदा जीवनसहकारिणोधर्माधर्मयोरुपभोगात् प्रक्षयोऽन्योन्याभिभवो
इच्छा के बाद ही इन्द्रियों से विषयों की उपलब्धि होती है । (किन्तु) सोते
हुए व्यक्ति के जागने के समय (उसके मन की क्रिया यद्यपि) आत्मा
और मन के संयोग से ही उत्पन्न होती है; किन्तु उसमें जीवनयोनियत्न का
साहाय्य भी अपेक्षित होता है (इच्छा-द्वेष या जनित प्रयत्न का नहीं) ।
मन की 'उपसर्पण' और 'अपसर्पण' नाम की दोनों क्रियायें
आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होती हैं । जिसमें अदृष्ट
का साहाय्य भी अपेक्षित होता है । (प्र.) किस प्रकार ? (उ.) जिस
समय भोग से जीवन के सहकारी धर्म और अधर्म का विनाश हो
जाता है अथवा परस्पर एक-दूसरे से ही दोनों की कार्योत्पादन
शक्ति अवरुद्ध हो जाती है, उस समय जीवन के दोनों सहायकों के
अभाव के कारण उनसे उत्पन्न होनेवाले प्रयत्न का भी विनाश
हो जाता है । प्रयत्न के इस अभाव से ही प्राण का नाश होता है ।
इसके बाद अपने कार्य के उत्पादन में उन्मुख दूसरे धर्म और अधर्म
से उस अपसर्पण नाम की क्रिया की उत्पत्ति होती है, जिससे (ऐहिक
न्यायकन्दली
मस्ति । तस्मादिच्छाद्वेषपूर्वकात् प्रयत्नान्मनसि क्रिया भूतेति गम्यते । सुप्तस्येति । सुप्तस्य
पुरुषस्येन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं प्रबोधकाले मनसि क्रिया जीवनपूर्वकप्रयत्नापेक्षादात्ममनसोः
संयोगात् ।
अपसर्पणेति । एतदपि कथमित्यादिना प्रश्नपूर्वकं कथयति । विशिष्टात्म-
मनःसंयोगो जीवनम्, तस्य स्वकार्यकरणे धर्माधर्मौ सहकारिणौ । यदा
जाती है । पुरुष जिस समय रूप को देखना चाहता है, उस समय रूप को ही
देखता है । एवं जिस समय रस का आस्वादन करना चाहता है, उस समय रस
का ही आस्वादन करता है । अन्तःकरण (मन) के सम्बन्ध के बिना बाह्य
इन्द्रियों में विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य नहीं है । अतः समझते हैं कि
इच्छा या द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न से ही मन में क्रिया उत्पन्न होती है । 'सुप्तस्येति'
अर्थात् सोते हुए पुरुष के मन में दूसरी इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध के लिए जागते
समय जो क्रिया उत्पन्न होती है, वह आत्मा और मन के संयोग से होती है, जिसे
जीवनयोनियत्न के साहाय्य की भी अपेक्षा रहती है ।
'अपसर्पणेति' मन में यह अपसर्पणादि क्रियायें किस प्रकार होती हैं ?
यह प्रश्न कर उसका उत्तर देते हैं । आत्मा और मन का एक विशेष प्रकार
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३७
प्रशस्तपादभाष्यम्
वा तदा जीवनसहाययोर्वैकल्यात् तत्पूर्वकप्रयत्नवैकल्यात्
प्राणनिरोधे सत्यन्याभ्यां लब्धवृत्तिभ्यां धर्माधर्माभ्यामात्म-
मनःसंयोगसहायाभ्यां मृतशरीराद् विभागकारणमपसर्पणकर्मोत्पद्यते ।
मृत) शरीर से मन का विभाग उत्पन्न होता है । इस विभाग के उत्पादन
में उन्हें आत्मा और मन के संयोग के साहाय्य की भी अपेक्षा होती है ।
इस विभाग से ही मन में 'अपसर्पण' नाम की क्रिया उत्पन्न होती है । उस
न्यायकन्दली
तयोरुपभोगात् प्रक्षयो विनाशोऽन्योन्याभिभवो वा परस्परप्रतिबन्धात् स्वकार्याकरणं वा,
ततो जीवनसहाययोः धर्माधर्मयोर्वैकल्येऽभावे सति तत्पूर्वकप्रयत्नवैकल्याद् जीवन-
पूर्वकस्य प्रयत्नस्य वैकल्यादभावात् प्राणवायोनिरोधे सति पतितेऽस्मिन् शरीरे याभ्यां
धर्माधर्माभ्यां देहान्तरे फलं भोजयितव्यं तौ लब्धवृत्ती भूतौ यैहिकशरीरोपभोग्यधर्माधर्म-
प्रतिबद्धत्वाद् देहान्तरोपभोग्याभ्यां धर्माधर्माभ्यां कार्यं न कृतम् । यदा त्वैहिकशरीरोपभोग्यौ
धर्माधर्मौ प्रक्षीणौ तदा देहान्तरोपभोग्यधर्माधर्मयोर्वृत्तिलाभः प्रतिबन्धाभावाज्जातः । ताभ्यां
लब्धवृत्तिभ्यामैहिकदेहोपभोग्यात् कर्मणोऽन्याभ्यामात्ममनःसंयोगसहायाभ्यां मृतशरीरा-
न्मनसो विभागकारणमपसर्पणकर्मोत्पद्यते ।
का संयोग ही 'जीवन' है । इस जीवन से जो कार्य उत्पन्न होंगे, धर्म और अधर्म
उनके सहकारिकारण हैं । जिस समय उपभोग से उनका 'प्रक्षय' अर्थात्
विनाश हो जाएगा या 'अन्योन्याभिभव' अर्थात् परस्पर एक-दूसरे के प्रतिरोध के
कारण दोनों अपने काम में अक्षम हो जाते हैं, उस समय जीवन (उक्त
आत्ममनःसंयोग) के सहायक धर्म और अधर्म के 'वैकल्य' से अर्थात् अभाव के
कारण 'तत्पूर्वकप्रयत्नवैकल्यात्' अर्थात् जीवन से उत्पन्न होने वाले प्रयत्न के
अभाव से प्राणवायु का निरोध हो जाता है । जिससे इस शरीर का पतन हो
जाता है । इस शरीर के पतन के बाद जिन धर्मों और अधर्मों से दूसरे शरीर के
द्वारा उपभोग करना है, उन धर्मों और अधर्मों में कार्य करने की क्षमता आ
जाती है । वर्तमान शरीर के द्वारा उपभोग के कारणीभूत धर्म और अधर्म से
प्रतिरुद्ध होने के कारण ही वे धर्म और अधर्म अपने उन उपभोगरूप कार्यों से
विरत रहते हैं, जिनका सम्पादन दूसरे शरीर से होना है । जिस समय ऐहिक
शरीर के धर्म और अधर्म नष्ट हो जाते हैं या असमर्थ हो जाते हैं, उस समय
दूसरे शरीर के द्वारा उपभुक्त होनेवाले धर्म और अधर्म अपना कार्य प्रारम्भ कर
देते हैं; क्योंकि उनका कोई प्रतिबन्धक नहीं रह जाता । ऐहिक शरीर से उपभोग्य
इन धर्म और अधर्म से भिन्न एवं जीवनरूप आत्ममनःसंयोग के सहायक अथ च
कार्यक्षम इन दूसरे धर्म और अधर्म से मन में अपसर्पण क्रिया उत्पन्न होती है,
जिससे मृत शरीर से मन का विभाग उत्पन्न होता है ।
७३८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
ततः शरीराद् बहिरपगतं ताभ्यामेव धर्माधर्माभ्यां समुत्पन्नेनातिवाहिकशरीरेण
सम्बध्यते, तत्संक्रान्तं च स्वर्गं नरकं वा गत्वा आशयानुरूपेण शरीरेण
सम्बद्ध्यते, तत्संयोगार्थं कर्मोपसर्पणमिति ।
शरीर से निकला हुआ मन उन्हीं धर्मों और अधर्मों से उत्पन्न आतिवाहिक
शरीर के साथ सम्बद्ध होता है । उस शरीर के साथ सम्बद्ध होकर ही
मन स्वर्ग या नरक को जाता है और वहाँ जाकर स्वर्ग या नरक के
भोगजनक धर्म और अधर्म के अनुरूप दूसरे शरीर के साथ सम्बद्ध
न्यायकन्दली
अपसर्पणकर्मोत्पत्तावात्ममनः संयोगोऽसमवायिकारणम्, मनः समवायिकारणम्, लब्ध-
वृत्ती धर्माधर्मौ निमित्तकारणम् । ततस्तदनन्तरं तन्मनो मृतशरीराद् बहिर्निर्गतं
ताभ्यामेव लब्धवृत्तिभ्यां धर्माधर्माभ्यां सकाशादुत्पन्नेनातिवाहिकशरीरेण सम्बद्ध्यत ।
तत्संक्रान्तं तदातिवाहिकशरीरसंक्रान्तं मनः स्वर्गं नरकं वा गच्छति । तत्र गत्वा
आशयानुरूपेण कर्मानुरूपेण शरीरेण सम्बद्ध्यते । स्वर्गे नरके वा यदुपजातं शरीरं तत्र
तावन्मनःसम्बन्धेन भवितव्यम्, अन्यथा तस्मिन् देशे भोगासम्भवात् । न चात्मवद्गत्यैव
मनसो देहान्तरसम्बन्धोऽस्ति, अव्यापकत्वात् । गमनं च तस्येतावद् दूरं केवलस्य न
सम्भवति, महाप्रलयानन्तरावस्थाव्यतिरेकेणाशरीरस्य मनसः कर्माभावात् । तस्मान्मृत-
शरीरप्रत्यासन्नमदृष्टवशादुपजातक्रियैरणुभिर्ह्यणुकादिप्रक्रमेणारब्धमतिसूक्ष्ममनुपलब्धियोग्यं
आत्मा और मन का संयोग मन की इस अपसर्पण क्रिया का असमवायिकारण
है एवं मन समवायिकारण है तथा कार्यक्षम धर्म और अधर्म उसके निमित्तकारण
हैं । 'ततः' अर्थात् इसके बाद मृत शरीर से निकला हुआ वही मन अपने कार्य के
उत्पादन में पूर्णक्षम उन्हीं धर्म और अधर्म से उत्पन्न आतिवाहिक शरीर के साथ
सम्बद्ध होता है । 'तत्संक्रान्तम्' अर्थात् आतिवाहिक शरीर के साथ सम्बद्ध मन
स्वर्ग या नरक में चला जाता है । वहाँ जाकर आशय के अनुरूप अर्थात् अपने
कर्मों के अनुसार फल-भोग के अनुरूप शरीर के साथ सम्बद्ध हो जाता है ।
शरीर की उत्पत्ति स्वर्ग में हो या नरक में, उसमें मन का सम्बन्ध रहना आवश्यक
है, उसके बिना स्वर्गादि देशों में भी भोग नहीं हो सकता । जिस प्रकार विभु होने
के कारण आत्मा स्वर्गादि देशों में न जाकर भी उन देशों में उत्पन्न शरीरों के
साथ सम्बद्ध हो जाता है, उसी प्रकार से मन के बिना वहाँ गये, उन दूसरे शरीरों
के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता; क्योंकि मन विभु नहीं है । इतनी दूर (शरीर
से असम्बद्ध) केवल मन का जाना भी सम्भव नहीं है; क्योंकि महाप्रलय को
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३९
प्रशस्तपादभाष्यम्
योगिनां च बहिरुद्वेचितस्य मनसोऽभिप्रेतदेशगमनं प्रत्यागमनं च,
तथा सर्गकाले प्रत्यग्रेण शरीरेण सम्बन्धार्थं कर्मादृष्टकारितम्।
एवमन्यदपि महाभूतेषु यत् प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनुपलभ्यमानकारण-
होता है । इस शरीर के साथ मन के संयोग को उत्पन्न करनेवाली मन
की क्रिया का नाम 'अपसर्पण' क्रिया है ।
एवं बाहर (विषय ग्रहण के लिए) निकला हुआ योगियों का मन
जो उनके अभिप्रेत देश में ही जाता है और वहीं से लौट आता है, मन
की वह क्रिया अदृष्ट से उत्पन्न होती है । इसी प्रकार सृष्टि के आदि में
शरीर के साथ मन का संयोग जिस क्रिया से होता है, उसका कारण
न्यायकन्दली
शरीरं परिकल्प्यते । तच्च मृतशरीरमतिक्रम्य मनसः स्वर्गनरकादिदेशातिवाहनधर्म-
कत्यादातिवाहिकमित्युच्यते । मरणजन्मनोरन्तराले मनसः कर्म शरीरोपगृहीतस्यैवोपपद्यते,
महाप्रलयानन्तरावस्थाभाविनमनःकर्मव्यतिरिक्तत्वे सति मनःकर्मत्वाद् दृश्यमानशरीरवृत्ति-
मनःकर्मवत् । आगमश्चात्र संवादको दृश्यत इति । तत्संयोगार्थं च कर्मोपसर्पणमिति । तेन
स्वर्गे नरके वा प्रत्यग्रजातेन शरीरेण मनःसंयोगार्थं कर्मोपसर्पणमिति ।
छोड़कर और किसी भी समय शरीर से असम्बद्ध मन में क्रिया की उत्पत्ति नहीं
होती है । अतः स्थूल मृत शरीर के ही समीप में एक अतिसूक्ष्म, उपलब्धि के
सर्वथा अयोग्य, आतिवाहिक शरीर की कल्पना करते हैं, जिसकी उत्पत्ति
सक्रिय परमाणुओं के द्वारा द्व्यणुकादि क्रम से होती है । उन परमाणुओं में क्रिया
की उत्पत्ति अदृष्ट से होती है । उस सूक्ष्म शरीर का 'आतिवाहिक शरीर' यह
अन्वर्थ नाम इसलिए है कि मन को इस मृतशरीर से छुड़ाकर स्वर्गादि देशों तक
'अतिवहन' कर ले जाता है । इस वस्तुस्थिति के उपयुक्त यह अनुमान है कि
शरीर से सम्बद्ध मन में ही वर्त्तमान में क्रिया देखी जाती है (महाप्रलयरूप एक ही
ऐसा समय है, जिस समय शरीर से असम्बद्ध मन में क्रिया रहती है), अतः
अनुमान करते हैं कि मृत्यु के बाद और पुनः जन्म लेने से पहले इस बीच मन में
जो क्रिया उत्पन्न होती है, उस समय भी मन का किसी शरीर के साथ सम्बन्ध
अवश्य रहता है; क्योंकि मन की यह क्रिया भी महाप्रलयकालिक क्रिया से भिन्न
मन की ही क्रिया है । इस सिद्धान्त को शास्त्ररूप शब्दप्रमाण का समर्थन भी प्राप्त
है । "तत्संयोगार्थञ्च कर्मोपसर्पणमिति" सद्यः उत्पन्न उस स्वर्गीय या नारकीय शरीर
के साथ सम्बन्ध के लिए ही मन में 'उपसर्पण' नाम की क्रिया उत्पन्न होती है ।
७४०) न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
मुपकारापकारसमर्थं च भवति तदप्यदृष्टकारितम्, यथा सर्गादावणुकर्म, अग्नि
वाय्वोरूर्ध्वतिर्यग्गमने महाभूतानां प्रक्षोभणम् । अभिषिक्तानां मणीनां तस्करं
प्रतिगमनम्, अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं चेति ।
॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये कर्मपदार्थः समाप्तः ॥
भी अदृष्ट ही है । इसी प्रकार जीवों के उपकार या अपकार
करनेवाली महाभूतों की जिन क्रियाओं के कारणों का बोध प्रत्यक्ष या
अनुमान से नहीं होता है, वे सभी क्रियायें अदृष्ट से ही उत्पन्न होती हैं ।
जैसे कि सृष्टि के आदि में परमाणुओं की क्रियायें एवं अग्नि और वायु
की ऊर्ध्वतिर्यग्गतिरूप क्रियायें, भूगोलकों की चलन क्रियायें एवं
अभिमन्त्रित मणि जो चोर की ओर जाती है, या सामान्य लोह चुम्बक
की ओर जो जाता है, ये सभी क्रियायें भी अदृष्ट से ही उत्पन्न होती हैं ।
॥ प्रशस्तपादभाष्य में कर्मपदार्थ का निरूपण समाप्त हुआ ॥
न्यायकन्दली
योगिनां च बहिरुद्रेचितस्य बहिर्निःसारितस्य मनसोऽभिप्रेतदेशगमनं
प्रत्यागमनं च । तथा सर्गकाले प्रत्यग्रेण शरीरेण सम्बन्धार्थं मनःकर्मा-
दृष्टकारितम् । न केवलमेतावत् सर्वमन्यदपि महाभूतेषु यत् प्रत्यक्षानु-
मानाभ्यामनुपलभ्यमानकारणमुपकारापकारसमर्थं तदप्यदृष्टकारितम्, यथा
सर्गादावणुकर्म, अग्निवाय्वोर्यथासंख्यमूर्ध्वतिर्यग्गमने, महाभूतानां भूगोलकादीनां
'योगिनां च बहिरुद्रेचितस्य' अर्थात् योगी लोग जब अपने मन को पुनः
अपने शरीर में लौट आने के लिए अभिप्रेत देश में जाने के लिए भेजते हैं,
(उस समय) उनके मन की क्रियायें अदृष्ट से उत्पन्न होती हैं । मन की केवल वे
ही क्रियायें नहीं, "अन्यदपि महाभूतेषु यत्प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनुपलभ्यमानकारण-
मुपकारापकारसमर्थं तदप्यदृष्टकारितम्" (अर्थात् पृथिव्यादि महाभूतों की
ही) अन्य उन क्रियाओं की उत्पत्ति भी अदृष्ट से ही माननी पड़ेगी, जिनके
कारणों की उपलब्धि प्रत्यक्ष या अनुमान के द्वारा नहीं होती है एवं जिनसे
जिस किसी का कुछ उपकार या अपकार होता है । "यथा सर्गादावणुकर्म,
अग्निवाय्वोर्यथासंख्यमूर्ध्वतिर्यग्गमने" जैसे सृष्टि के प्रथम क्षण की परमाणु की
क्रिया एवं अग्नि की ऊपर की ओर जलने की क्रिया अथवा वायु की
टेढ़े-मेढ़े चलने की क्रिया (अदृष्ट से उत्पन्न होती हैं) । 'महाभूतानाम्' अर्थात्
भूगोल प्रभृति का 'प्रक्षोभण' अर्थात् चलन, चोरों की परीक्षा के समय 'अभि-
षिक्तानां मणीनां तस्करं प्रति गमनम्' अर्थात् उपयुक्त मन्त्र से अभिषिक्त
अथ सामान्यपदार्थनिरूपणम्
प्रशस्तपादभाष्यम्
सामान्यं द्विविधम्-परमपरं च। स्वविषयसर्वगत-
'पर' और 'अपर' भेद से सामान्य दो प्रकार का है । वह अपने
विषयों (आश्रयों) में रहता है । वह अभिन्न स्वभाव का है । एक, दो
या बहुत सी वस्तुओं में एक आकार की बुद्धि का कारण है अपने एक
न्यायकन्दली
च प्रक्षोभणं चलनम्, परीक्षाकालेऽभिषिक्तानां मणीनां तस्करं प्रति गमनम्,
अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं च सर्वमेतददृष्टकारितमिति ।
हिताहितफलोपायप्राप्तित्यागनिबन्धनम् ।
कर्मेति परमं तत्त्वं यत्नतः क्रियतां हृदि ॥
॥ इति भट्टश्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां कर्मपदार्थः समाप्तः ॥
मणियों का चोर की ओर जाना एवं "अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणम्" अर्थात् साधारण
लौह का चुम्बक की ओर जाना, ये भी सभी क्रियायें अदृष्ट से होती हैं ।
सुख और उसके उपाय की प्राप्ति एवं दुःख और उसके उपाय का परिहार,
ये दोनों ही क्रिया से होते हैं, अतः इस क्रियातत्त्व को यल से हृदय में धारण
करना चाहिए ।
॥ भट्ट श्री श्रीधर की रची हुई पदार्थों को समझानेवाली न्यायकन्दली टीका का
कर्मनिरूपण समाप्त हुआ ॥
न्यायकन्दली
जयन्ति जगदुत्पत्ति-स्थिति-संहति-हेतवः ।
विश्वस्य परमात्मानो ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥
सामान्यं व्याचष्टे-द्विविधं सामान्यं परमपरं चेति । कृतव्याख्यान-
मेतदुद्देशावसरे । सर्वसर्वगतं सामान्यमिति केचित् । तन्निषेधार्थमाह-
स्वविषयसर्वगतमिति । यत् सामान्यं यत्र पिण्डे प्रतीयते स तस्य स्वो विषयः ,
जगत् की उत्पत्ति के हेतु ब्रह्मा एवं स्थिति के हेतु विष्णु और संहार के हेतु
महेश्वर, विश्व के परमात्मस्वरूप इन तीनों की जय हो ।
'द्विविधं सामान्यं परमपरञ्च' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा सामान्य का निरूपण- करते
हैं । इस पङ्क्ति की व्याख्या पदार्थोद्देश प्रकरण में (पृ. २९ पं. ११) कर चुके हैं ।
किसी सम्प्रदाय का मत है कि 'सभी सामान्य सभी वस्तुओं में रहते हैं' इस मत के
खण्डन के लिए ही 'स्वविषयसर्वगतम्' यह वाक्य लिखा गया है । जिस सामान्य की
७४२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
मभिन्नात्मकमनेकवृत्ति एकाद्विबहुष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययकारि स्वरूपाभेदे-
नाधारेषु प्रबन्धेन वर्तमानमनुवृत्तिप्रत्ययकारणम् । कथम् ?
प्रतिपिण्डं सामान्यापेक्षं प्रबन्धेन ज्ञानोत्पत्तावभ्यासप्रत्यय-
ही स्वरूप से अपने सभी आश्रयों में बराबर (बिना विराम के) रहता हुआ
'अनुवृत्तिप्रत्यय' का, अर्थात् अपने आश्रयरूप विभिन्न व्यक्तियों में एक
न्यायकन्दली
तत्र सर्वस्मिन् गतं समवेतम्, सर्वत्र तत्प्रत्ययात् । सर्वसर्वगतत्वाभावे त्वनुपलब्धिरेव
प्रमाणम् । अभिन्नात्मकम्, अभिन्नस्वभावम् । येन स्वभावेनैकत्र पिण्डे वर्तते सामान्यं
तेनैव स्वभावेन पिण्डान्तरेऽपि वर्तते, तत्प्रत्ययाविशेषादित्यर्थः । अनेकेषु पिण्डेषु
वृत्तिर्यस्य तदनेकवृत्ति । अभिन्नस्वभावमनेकत्र वर्तत इति च प्रतीतिसामर्थ्यात् समर्थनीयम् ।
न हि प्रमाणावगतेऽर्थे काचिदनुपपत्तिर्नाम । द्वित्वादिकमप्यभिन्नस्वभावमनेकत्र वर्तते,
तस्मात् सामान्यस्य विशेषो न लभ्यते तत्राह-एकद्विबहुष्विति । सामान्यमेकस्मिन्
पिण्डे द्वयोः पिण्डयोर्बहुषु वा पिण्डेष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययं करोति । एकस्य
पिण्डस्य द्वयोर्बहूनां वोपलम्भे सति गौरिति प्रत्ययस्य भावात्, द्वित्वादिकं त्वेवं न
प्रतीति जिस आश्रय में हो, वही उसका 'स्वविषय' है । वह सभी विषयों में
'गत' अर्थात् समवाय सम्बन्ध से रहता है; क्योंकि उन सभी विषयों में उस
(सामान्य) की प्रतीति होती है । 'सामान्यं सर्वसर्वगत' (अर्थात् सभी सामान्य सभी
सामान्य के विषयों में) क्यों नहीं हैं ? इस प्रश्न का यही उत्तर है कि सर्वत्र सभी
सामान्यों की प्रतीति नहीं होती है । 'अभिन्नात्मकम्' शब्द का अर्थ है
'अभिन्नस्वभाव', अर्थात् जिस स्वरूप से वह अपने एक आश्रय में रहता है, उसी
स्वरूप से वह अपने और आश्रयों में भी रहता है; क्योंकि एक आश्रय में सामान्य
की प्रतीति में एवं दूसरे आश्रयों में उसी सामान्य की प्रतीति में कोई अन्तर
उपलब्ध नहीं होता । 'अनेकवृत्ति' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है 'अनेकेषु
वृत्तिर्यस्य' अर्थात् अनेक आश्रयों में जो रहे, वही 'अनेकवृत्ति' है । सामान्य
'अभिन्नस्वभाव' का है और 'अनेक आश्रयों में रहता है' इन दोनों बातों का
समर्थन तदनुकूल प्रामाणिक प्रतीतियों से करना चाहिए; क्योंकि प्रमाण के द्वारा
निर्णीत अर्थ में किसी प्रकार की अनुपपत्ति की शङ्का नहीं की जा सकती ।
द्वित्वादि (व्यासज्यवृत्ति गुण) भी अनेकवृत्ति हैं और अभिन्न स्वभाव के भी हैं,
अतः द्वित्वादि में सामान्य लक्षण की अतिव्याप्ति का निवारण उन दोनों विशेषणों
से नहीं हो सकता, अतः 'एकद्विबहुषु' इत्यादि वाक्य लिखा गया है । अर्थात्
(द्वित्वादि से सामान्य में यही अन्तर है कि) 'सामान्य' अपने एक आश्रय में, दो
आश्रयों में अथवा बहुत से आश्रयों में प्रतीत होता है । अभिप्राय यह है कि जिस
प्रकार एक ही गोपिण्ड में 'अयं गौः' इस प्रकार से 'सामान्य' की प्रतीति होती है,
प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ७४३
प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ७४३
प्रशस्तपादभाष्यम्
जनिताच्च संस्कारादतीतज्ञानप्रबन्धप्रत्यवेक्षणाद् यदनुगतमस्ति तत् सामान्यमिति ।
तत्र सत्तासामान्यं परमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यथा
परस्परविशिष्टेषु चर्मवस्त्रकम्बलादिष्वेकस्मान्नीलद्रव्याभिसम्बन्धानीलं
आकार की बुद्धि का कारण है । (प्र.) यह किस प्रकार समझते हैं
(कि अनेक वस्तुओं में एक ही सामान्य रहता है ) । (उ. ) प्रथमतः
अनेक पिण्डों में से प्रत्येक में सामान्य का ज्ञान होता है । यही ज्ञान
जब बार-बार होता है (जिसे अभ्यासप्रत्यय कहते हैं), तब उससे
(दृढ़तर) संस्कार उत्पन्न होता है । इस संस्कार से उन ज्ञान-समूहों का
स्मरण होता है । इस स्मरण से ही समझते हैं कि इस स्मरण के
विषयीभूत सभी पिण्डों में अनुगत जो धर्म है, वही 'सामान्य' है ।
इन (पर और अपर सामान्यों) में सत्ता नाम का सामान्य केवल
न्यायकन्दली
भवतीति विशेषः । अनेकवृत्तित्वे सति यदेकद्विबहुलक्ष्यात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययकारणं तत् सामान्य-
मिति लक्षणार्थः । एतदेव विवृणोति-स्वरूपाभेदेनेति । एकस्मिन् पिण्डे यत् स्वरूपं तत् पिण्डा-
न्तरेऽपि । तस्माद्भेदेनाधारेषु प्रबन्धेनानुपरमेण पूर्वपूर्वपिण्डपरित्यागेन वर्तमानं सदनुवृत्ति-
प्रत्ययकारणं स्वरूपानुगमप्रतीतिकारणं सामान्यम् । कथमिति परस्य प्रश्नः । कथमनेकेषु
पिण्डेषु सामान्यस्य वृत्तिरवगम्यत इत्यर्थः । उत्तरमाह-प्रतिपिण्डमिति । पिण्डं पिण्डं
उसी प्रकार दो गोपिण्डों में भी 'इमौ गावौ' या बहुत से गोपिण्डों में भी 'इमे
गावः' इत्यादि आकार से 'सामान्य' की प्रतीतियाँ होती हैं । द्वित्वादि (व्यासज्यवृत्ति
गुणों) में ऐसी बात नहीं है (उनकी प्रतीति उनके सभी आश्रयों में ही हो सकती
है, तद्घटक किसी एक आश्रय में नहीं) । द्वित्वादि से सामान्य में यही अन्तर है ।
(सामान्य के लक्षणवाक्य का सार या मर्म यह है कि) जो स्वयं एक होकर भी
अनेक वस्तुओं में विद्यमान रहे एवं (अपने आश्रयीभूत) एक व्यक्ति में, दो
व्यक्तियों में अथवा बहुत से व्यक्तियों में अपने स्वरूप के द्वारा समान एवं अनुगत
एक आकार के प्रत्यय का कारण हो, वही 'सामान्य' है । यही बात 'एतदेव'
इत्यादि से कही गयी है । एक वस्तु का जो स्वरूप है, उस जाति की दूसरी वस्तु
का भी वही स्वरूप है, सभी आश्रयों में अनुगत वह एक ही स्वरूप से अपने
सभी आश्रयों में 'प्रबन्ध से' अर्थात् बिना विराम के फलतः पहले-पहले के अपने
आश्रयरूप पिण्डों को बिना छोड़े हुए ही जो 'अनुवृत्तिप्रत्यय' का अर्थात् अनेक वस्तुओं
में एक आकार की प्रतीति का कारण हो, वही 'सामान्य' है । 'कथम्' इत्यादि से
प्रतिवादी का प्रश्न सूचित किया गया है । जिसका अभिप्राय है कि यह कैसे समझते
हैं कि समान रूप के सभी पिण्डों में एक ही जाति है ? 'प्रतिपिण्डम्' इत्यादि से
७४४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
नीलमिति प्रत्ययानुवृत्तिः, तथा परस्परविशिष्टेषु
द्रव्यगुणकर्मस्वविशिष्टा सत्तादिति प्रत्ययानुवृत्तिः । सा
'अनुवृत्तिप्रत्यय' रूप कारण है । सत्ता नाम के परसामान्य की सिद्धि इस
रीति से होती है कि जिस प्रकार नील चर्म, नील वस्त्र और नील कम्बलों में
परस्पर विभिन्नता रहते हुए भी नील रङ्ग के सम्बन्ध से उनमें से प्रत्येक में
'यह नील है' इस एक आकार की प्रतीति होती है, उसी प्रकार परस्पर
विभिन्न द्रव्यों, गुणों और कर्मों में से प्रत्येक में 'यह सत् है' इस एक
न्यायकन्दली
प्रति सामान्यापेक्षं यथा भवति, तथा ज्ञानोत्पत्तौ सत्यां योऽभ्यासप्रत्ययस्तेन यः संस्कारो
जनितः, तस्मादतीतस्य ज्ञानप्रबन्धस्य ज्ञानप्रवाहस्य प्रत्यवेक्षणात् स्मरणाद् यदनुगतमस्ति
तत् सामान्यम् । किमुक्तं स्यात् ? एकस्मिन् पिण्डे सामान्यमुपलभ्य पिण्डान्तरे तस्य
प्रत्यभिज्ञानादेकस्यानेकवृत्तित्वमवगम्यते । अत एव तत्र बाधकहेतवः प्रत्यक्ष-
विरोधादपास्यन्ते ।
यत् पूर्वमुक्तं परमपरं च द्विविधं सामान्यमिति तदिदानीं विविच्य
कथयति-तत्र परं सत्तासामान्यमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यद्यपि प्रत्यक्षेण
प्रतीयते सत्ता, तथापि विप्रतिपन्नं प्रत्यनुमानमाह-यथा परस्परविशिष्टे-
इसी प्रश्न का समाधान किया गया है । 'पिण्डं पिण्डं यथा स्यात्' इस व्युत्पत्ति के
अनुसार प्रकृत 'प्रतिपिण्ड' शब्द प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् प्रत्येक पिण्ड में जिस
रीति से सामान्य का ज्ञान होता है,उसी रीति से जब सामान्य की 'अभ्यासप्रतीति'
अर्थात् बार-बार प्रतीति होती है, तब उससे सामान्यविषयक दृढ़ संस्कार की
उत्पत्ति होती है । इस दृढ़ संस्कार से अतीत 'ज्ञानप्रबन्ध' का अर्थात् ज्ञानसमूह
का 'प्रत्यवेक्षण' अर्थात् स्मृति होती है, इस स्मृति के द्वारा (विभिन्न व्यक्तियों में)
जो अनुगत अर्थात् एक रूप से प्रतीत होता है, वही 'सामान्य' है । इससे निष्कर्ष
क्या निकला ? (यही कि) एक वस्तु में सामान्य के प्रतीत होने पर दूसरी वस्तु में
उसकी प्रत्यभिज्ञा होती है । इस प्रत्यभिज्ञा से ही समझते हैं कि एक ही सामान्य
अनेक वस्तुओं में रहता है । अतएव सामान्य के इस स्वरूप को बाधित करनेवाले
सभी हेतु प्रत्यक्षविरोधी होने के कारण स्वयं निरस्त हो जाते हैं ।
पहले कह चुके हैं कि पर और अपर भेद से सामान्य दो प्रकार का
है । 'तत्र परं सत्ता' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब उसी को विचार-
पूर्वक और विस्तारपूर्वक समझाते हैं कि उनमें 'सत्ता' पर सामान्य
(ही) है । अर्थात् केवल 'अनुवृत्तिप्रत्यय' अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों में
एकाकार प्रतीति का ही प्रयोजक है । सत्ता यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाण से ही सिद्ध है,
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४३
प्रशस्तपादभाष्यम्
जनिताच्च संस्कारादतीतज्ञानप्रबन्धप्रत्यवेक्षणाद् यदनुगतमस्ति तत् सामान्यमिति ।
तत्र सत्तासामान्यं परमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यथा
परस्परविशिष्टेषु चर्मवस्त्रकम्बलादिष्वेकस्मान्नीलद्रव्याभिसम्बन्धानीलं
आकार की बुद्धि का कारण है । (प्र.) यह किस प्रकार समझते हैं
(कि अनेक वस्तुओं में एक ही सामान्य रहता है ) । (उ. ) प्रथमतः
अनेक पिण्डों में से प्रत्येक में सामान्य का ज्ञान होता है । यही ज्ञान
जब बार-बार होता है (जिसे अभ्यासप्रत्यय कहते हैं), तब उससे
(दृढ़तर) संस्कार उत्पन्न होता है । इस संस्कार से उन ज्ञान-समूहों का
स्मरण होता है । इस स्मरण से ही समझते हैं कि इस स्मरण के
विषयीभूत सभी पिण्डों में अनुगत जो धर्म है, वही 'सामान्य' है ।
इन (पर और अपर सामान्यों) में सत्ता नाम का सामान्य केवल
न्यायकन्दली
भवतीति विशेषः । अनेकवृत्तित्वे सति यदेकद्विबहुष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययकारणं तत् सामान्य-
मिति लक्षणार्थः । एतदेव विवृणोति-स्वरूपाभेदेनेति । एकस्मिन् पिण्डे यत् स्वरूपं तत् पिण्डा-
न्तरेऽपि । तस्मादभेदेनाधारेषु प्रबन्धेनानुपरमेण पूर्वपूर्वपिण्डापरित्यागेन वर्तमानं सदनुवृत्ति-
प्रत्ययकारणं स्वरूपानुगमप्रतीतिकारणं सामान्यम् । कथमिति परस्य प्रश्नः । कथमनेकेषु
पिण्डेषु सामान्यस्य वृत्तिरवगम्यत इत्यर्थः । उत्तरमाह-प्रतिपिण्डमिति । पिण्डं पिण्डं
उसी प्रकार दो गोपिण्डों में भी 'इमौ गावौ' या बहुत से गोपिण्डों में भी 'इमे
गावः' इत्यादि आकार से 'सामान्य' की प्रतीतियाँ होती हैं । द्वित्वादि (व्यासज्यवृत्ति
गुणों) में ऐसी बात नहीं है (उनकी प्रतीति उनके सभी आश्रयों में ही हो सकती
है, तद्घटक किसी एक आश्रय में नहीं) । द्वित्वादि से सामान्य में यही अन्तर है ।
(सामान्य के लक्षणवाक्य का सार या मर्म यह है कि) जो स्वयं एक होकर भी
अनेक वस्तुओं में विद्यमान रहे एवं (अपने आश्रयीभूत) एक व्यक्ति में, दो
व्यक्तियों में अथवा बहुत से व्यक्तियों में अपने स्वरूप के द्वारा समान एवं अनुगत
एक आकार के प्रत्यय का कारण हो, वही 'सामान्य' है । यही बात 'एतदेव'
इत्यादि से कही गयी है । एक वस्तु का जो स्वरूप है, उस जाति की दूसरी वस्तु
का भी वही स्वरूप है, सभी आश्रयों में अनुगत वह एक ही स्वरूप से अपने
सभी आश्रयों में 'प्रबन्ध से' अर्थात् बिना विराम के फलतः पहले-पहले के अपने
आश्रयरूप पिण्डों को बिना छोड़े हुए ही जो 'अनुवृत्तिप्रत्यय' का अर्थात् अनेक वस्तुओं
में एक आकार की प्रतीति का कारण हो, वही 'सामान्य' है । 'कथम्' इत्यादि से
प्रतिवादी का प्रश्न सूचित किया गया है । जिसका अभिप्राय है कि यह कैसे समझते
हैं कि समान रूप के सभी पिण्डों में एक ही जाति है ? 'प्रतिपिण्डम्' इत्यादि से
७४४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
नीलमिति प्रत्ययानुवृत्तिः, तथा परस्परविशिष्टेषु
द्रव्यगुणकर्मस्वविशिष्टा सत्सदिति प्रत्ययानुवृत्तिः । सा
'अनुवृत्तिप्रत्यय' रूप कारण है । सत्ता नाम के परसामान्य की सिद्धि इस
रीति से होती है कि जिस प्रकार नील चर्म, नील वस्त्र और नील कम्बलों में
परस्पर विभिन्नता रहते हुए भी नील रङ्ग के सम्बन्ध से उनमें से प्रत्येक में
'यह नील है' इस एक आकार की प्रतीति होती है, उसी प्रकार परस्पर
विभिन्न द्रव्यों, गुणों और कर्मों में से प्रत्येक में 'यह सत् है' इस एक
न्यायकन्दली
प्रति सामान्यापेक्षं यथा भवति, तथा ज्ञानोत्पत्तौ सत्यां योऽभ्यासप्रत्ययस्तेन यः संस्कारो
जनितः, तस्मादतीतस्य ज्ञानप्रबन्धस्य ज्ञानप्रवाहस्य प्रत्यवेक्षणात् स्मरणाद् यदनुगतमस्ति
तत् सामान्यम् । किमुक्तं स्यात् ? एकस्मिन् पिण्डे सामान्यमुपलभ्य पिण्डान्तरे तस्य
प्रत्यभिज्ञानादेकस्यानेकवृत्तित्वमवगम्यते । अत एव तत्र बाधकहेतवः प्रत्यक्ष-
विरोधादपास्यन्ते ।
यत् पूर्वमुक्तं परमपरं च द्विविधं सामान्यमिति तदिदानीं विविच्य
कथयति-तत्र परं सत्तासामान्यमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यद्यपि प्रत्यक्षेण
प्रतीयते सत्ता, तथापि विप्रतिपन्नं प्रत्यनुमानमाह-यथा परस्परविशिष्टे-
इसी प्रश्न का समाधान किया गया है । 'पिण्डं पिण्डं यथा स्यात्' इस व्युत्पत्ति के
अनुसार प्रकृत 'प्रतिपिण्ड' शब्द प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् प्रत्येक पिण्ड में जिस
रीति से सामान्य का ज्ञान होता है,उसी रीति से जब सामान्य की 'अभ्यासप्रतीति'
अर्थात् बार-बार प्रतीति होती है, तब उससे सामान्यविषयक दृढ़ संस्कार की
उत्पत्ति होती है । इस दृढ़ संस्कार से अतीत 'ज्ञानप्रबन्ध' का अर्थात् ज्ञानसमूह
का 'प्रत्यवेक्षण' अर्थात् स्मृति होती है, इस स्मृति के द्वारा (विभिन्न व्यक्तियों में)
जो अनुगत अर्थात् एक रूप से प्रतीत होता है, वही 'सामान्य' है । इससे निष्कर्ष
क्या निकला ? (यही कि) एक वस्तु में सामान्य के प्रतीत होने पर दूसरी वस्तु में
उसकी प्रत्यभिज्ञा होती है । इस प्रत्यभिज्ञा से ही समझते हैं कि एक ही सामान्य
अनेक वस्तुओं में रहता है । अतएव सामान्य के इस स्वरूप को बाधित करनेवाले
सभी हेतु प्रत्यक्षविरोधी होने के कारण स्वयं निरस्त हो जाते हैं ।
पहले कह चुके हैं कि पर और अपर भेद से सामान्य दो प्रकार का
है । 'तत्र परं सत्ता' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब उसी को विचार-
पूर्वक और विस्तारपूर्वक समझाते हैं कि उनमें 'सत्ता' पर सामान्य
(ही) है । अर्थात् केवल 'अनुवृत्तिप्रत्यय' अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों में
एकाकार प्रतीति का ही प्रयोजक है । सत्ता यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाण से ही सिद्ध है,
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४५
प्रशस्तपादभाष्यम्
चार्थान्तराद् भवितुमर्हतीति यत् तदर्थान्तरं सा सत्तेति सिद्धा। सत्तानुसम्बन्धात्
सत्सदिति प्रत्ययानुवृत्तिः, तस्मात् सा सामान्यमेव ।
आकार की प्रतीति होती है। यह प्रतीति द्रव्य, गुण और कर्म इनसे
भिन्न किसी वस्तु से ही होनी चाहिए। वही वस्तु है 'सत्ता'। इस सत्ता
जाति के सम्बन्ध से 'यह सत् है यह सत् है' इत्यादि आकारों के
अनुवृत्तिप्रत्यय ही हो सकते हैं (कोई भी व्यावृत्तिप्रत्यय नहीं), अतः
सत्ता सामान्य ही है, विशेष नहीं ।
न्यायकन्दली
ष्यिति। तद् व्यक्तम् । द्रव्यादिषु सत्सदिति प्रत्ययानुवृत्तिः व्यतिरिक्तप्रत्ययनिबन्धना, भिन्नेषु
प्रत्ययानुवृत्तित्वात्, चर्मवस्त्रादिषु नीलप्रत्ययानुवृत्तिवत् । यस्मात् सत्ता त्रिषु द्रव्यादिषु
प्रत्ययानुवृत्तिं करोति न व्यावृत्तिम्, तस्मात् सामान्यमेव, न विशेष इत्युपसंहारार्थः ।
अपरं द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादि अनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यं विशेषश्च भवति । द्रव्यत्वं
द्रव्येष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यम्, गुणकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । गुणत्वं
गुणेष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यम्, द्रव्यकर्मभ्यो व्यावृत्तिप्रत्ययहेतुत्वाद् विशेषः । तथा
फिर भी जो कोई उसे प्रत्यक्षवेद्य नहीं मानते, उनके सन्तोष के लिए 'परस्पर- विशिष्टेषु'
इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अनुमान भी उपस्थित करते हैं। इस अनुमान प्रयोग का
अर्थ स्पष्ट है । जिस प्रकार नीलवस्त्र के नीलधर्म प्रभृति में एक नीलवर्ण के ही
कारण 'यह नील' है, इस एक आकार की प्रतीतियाँ 'अनुवृत्तिप्रत्यय' रूप होती
हैं, उसी प्रकार द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में 'यह सत् है' इस एक आकार की
प्रतीति भी होती है, इन तीनों से भिन्न किसी वस्तु का ज्ञान उक्त प्रतीतियों का
कारण है; क्योंकि उक्त सदाकारक प्रतीतियाँ भी अनुवृत्तिप्रत्यय हैं । (जिसका ज्ञान
उक्त अनुवृत्तिप्रत्ययों का कारण है वही 'सत्ता' है) प्रकृत उपसंहार ग्रन्थ का यह
अभिप्राय है कि यतः सत्ता द्रव्यादि तीनों पदार्थों में 'यह सत् है' इस आकार के
अनुवृत्तिप्रत्यय का ही कारण है, किसी भी व्यावृत्ति (प्रत्यय) का नहीं, अतः
'सत्ता' सामान्य ही है, विशेष नहीं । द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्वादि जातियाँ अनुवृत्तिप्रत्यय
और व्यावृत्तिप्रत्यय दोनों की ही कारण हैं, अतः वे 'सामान्य' और 'विशेष' दोनों
ही हैं । जैसे कि द्रव्यत्व जाति सभी द्रव्यों में 'यह द्रव्य है' इस अनुवृत्तिप्रत्यय का
कारण है, अतः 'सामान्य' है । उसी प्रकार द्रव्य में ही 'यह गुण और कर्म से
भिन्न है' (क्योंकि इसमें द्रव्यत्व है) इस व्यावृत्तिप्रत्यय का भी कारण है,
अतः 'विशेष' भी है । एवं गुणत्व जाति सभी गुणों में 'यह गुण है' इस प्रकार की
३४६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
अपरं द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादि अनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यं विशेषश्च
भवति । तत्र द्रव्यत्वं परस्परविशिष्टेषु पृथिव्यादिष्वनुवृत्तिहेतुत्वात् सामान्यम्,
गुणकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । तथा गुणत्वं परस्परविशिष्टेषु रूपादि-
ष्ष्वनुवृत्तिहेतुत्वात् सामान्यम्, द्रव्यकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । तथा
कर्मत्वं परस्परविशिष्टेषूत्क्षेपणादिष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यम्, द्रव्यगुणेभ्यो
द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्वादि जातियाँ अपर हैं । ये अनुवृत्तिप्रत्यय के
कारण होने से 'सामान्य' और व्यावृत्तिप्रत्यय के कारण होने से
'विशेष' दोनों ही हैं । इनमें द्रव्यत्व परस्पर विभिन्न पृथिवी प्रभृति
नौ द्रव्यों में से प्रत्येक में 'यह द्रव्य है' इस एक आकार की प्रतीति
के हेतु होने से 'सामान्य' है एवं उन्हीं नौ द्रव्यों में से प्रत्येक में 'यह
गुण और कर्म से भिन्न है' इस व्यावृत्तिबुद्धि के हेतु होने से 'विशेष'
भी है । इसी प्रकार गुणत्व भी रूपादि चौबीस गुणों में से प्रत्येक में
'यह गुण है' इस एक आकार के प्रत्ययों का हेतु होने से 'सामान्य' है
एवं 'ये रूपादि द्रव्य और कर्म से भिन्न हैं' इस व्यावृत्तिबुद्धि का कारण
होने से 'विशेष' भी है । इसी प्रकार कर्मत्व जाति भी उत्क्षेपणादि
विभिन्न क्रियाओं में से प्रत्येक में 'यह क्रिया है' इस अनुवृत्तिप्रत्यय
का कारण होने से सामान्य है एवं उत्क्षेपणादि क्रियाओं में से
प्रत्येक में 'यह द्रव्य और गुण से भिन्न है' इस व्यावृत्तिबुद्धि का कारण
न्यायकन्दली
कर्मत्वं परस्परविशिष्टेषूत्क्षेपणादिष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यं द्रव्यगुणेभ्यो
व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । द्रव्यत्वादिवत् पृथिवीत्वादीनामप्यनुवृत्तिव्यावृत्तिप्रत्यय-
हेतुत्वात् सामान्यविशेषभावोऽस्तीत्याह—एवमिति । प्राणिगतानि सामान्यानि
गोत्वाश्वत्वादीनि, अप्राणिगतानि घटत्वपटत्वादीनि । किं द्रव्यत्वादीनां सामान्य-
अनुवृत्तिप्रतीति का कारण है, अतः सामान्य है । एवं द्रव्य और कर्म इन दोनों से 'गुण
भिन्न है' (क्योंकि वह गुण है) इस व्यावृत्तिबुद्धि का भी कारण है, अतः 'विशेष'
भी है । इसी प्रकार परस्पर विभिन्न उत्क्षेपणादि क्रियाओं में 'ये कर्म हैं' इस समान
आकार की प्रतीति (अनुवृत्तिप्रत्यय) कर्मत्व से होती है, अतः वह सामान्य है और
उन्हीं कर्मों में 'ये द्रव्य और गुण से भिन्न हैं' इस व्यावृत्ति बुद्धि की हेतु होने से
'विशेष' भी है । 'एवम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा द्रव्यत्वादि जातियों की तरह पृथिवीत्वादि
जातियों में भी कथित सामान्य-विशेषभाव का अतिदेश करते हैं । गोत्व, अश्वत्व प्रभृति
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४७
प्रशस्तपादभाष्यम्
व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । एवं पृथिवीत्वरूपत्वोत्क्षेपणत्वगोत्वघटत्वपटत्वादीना-
मपि प्राण्यप्राणिगतानामनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यविशेषभावः सिद्धः ।
एतानि तु द्रव्यत्वादीनि प्रभूतविषयत्वात् प्राधान्येन सामान्यानि, स्वाश्रय-
विशेषकत्वाद् भक्त्या विशेषाख्यानीति ।
होने से 'विशेष' भी है । इसी प्रकार प्राणियों में रहनेवाले और
अप्राणियों में रहनेवाले पृथिवीत्व, रूपत्व, उत्क्षेपणत्व, गोत्व, घटत्व, पटत्व
प्रभृति जातियों में भी अनुवृत्तिप्रत्ययजनकत्व हेतु से सामान्यत्व और
व्यावृत्तिप्रत्ययजनकत्व हेतु से विशेषत्व की सिद्धि समझनी चाहिए ।
द्रव्यत्वादि जातियाँ सामान्य के पूर्णलक्षण से युक्त होने के कारण वस्तुतः
सामान्य ही हैं; किन्तु अपने आश्रयों को अपने से भिन्न वस्तुओं से
पृथक् रूप में समझाने की योग्यता भी उनमें किसी अंश में संघटित
होती है, अतः उनमें 'विशेष' शब्द का भी गौणप्रयोग होता है ।
न्यायकन्दली
स्वरूपं वास्तवम् ? किं वा विशेषस्वरूपता ? आहोस्विदुभयस्वरूपता ? अत्राह-
एतानीति । समानानां भावः सामान्यमिति सामान्यलक्षणं द्रव्यत्वादिषु विद्यते, स्वाश्रयं
सर्वतो विशिनष्टीति विशेष इति तु लक्षणं नास्ति । अत एतानि मुख्यया वृत्त्या
सामान्यान्येव न विशेषाः, विशेषसंज्ञां तूपचारेण लभन्ते । विशेषो हि स्वाश्रयं सर्वतो
विशिनष्टि, द्रव्यत्वादिकमपि विजातीयेभ्यः स्वाश्रयस्य विशेषणमित्येतावता साधर्म्येणोप-
चारप्रवृत्तिः ।
प्राणियों में रहनेवाली जातियाँ हैं एवं घटत्व, पटत्व प्रभृति अप्राणियों में रहनेवाली
जातियाँ हैं । (प्र.) (द्रव्यत्वादि सामान्य और विशेष दोनों कहे गये हैं) इस प्रसङ्ग में
प्रश्न उठता है कि वे वास्तव में 'सामान्य' रूप हैं ? या वास्तव में वे 'विशेष' रूप
ही हैं ? अथवा उनके दोनों ही स्वरूप वास्तव हैं ? इन्हीं विकल्पों का समाधान
'एतानि' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है । अर्थात् 'समानानां भावः सामान्यम्'
सामान्य का यह लक्षण द्रव्यत्वादि में पूर्ण रूप से है; किन्तु 'स्वाश्रयं सर्वतो
विशिनष्टीति विशेषः' (जो अपने आश्रय को इतर सभी पदार्थों से अलग करे,
वहीं 'विशेष' है) विशेष का यह लक्षण द्रव्यत्वादि में नहीं है (क्योंकि द्रव्यत्वादि
अपने आश्रयीभूत एक द्रव्य व्यक्ति से अपने आश्रयीभूत दूसरे द्रव्य व्यक्ति को
अलग नहीं समझा सकता), अतः द्रव्यत्वादि जातियाँ 'सामान्य' शब्द के ही
मुख्यर्थ हैं । उनमें 'विशेष' शब्द का लक्षणावृत्ति से ही प्रयोग होता है । अभिप्राय
यह है कि जिस प्रकार 'विशेष' पदार्थ अपने आश्रय को इतर सभी पदार्थों से
अलग रूप में रखता है, उसी प्रकार द्रव्यत्वादि सामान्य भी अन्ततः अपने आश्रय
७४८ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
लक्षणभेदादेषां द्रव्यगुणकर्मभ्यः पदार्थान्तरत्वं सिद्धम् । अत एव च नित्यत्वम् ।
द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों से इसका स्वरूप (लक्षण) भिन्न है,
अतः सिद्ध होता है कि यह सामान्य (द्रव्यादि की तरह) दूसरा ही
(स्वतन्त्र) पदार्थ है । यतः लक्षणभेद के कारण द्रव्यादि से यह भिन्न है,
अतः यह सिद्ध होता है कि सामान्य नित्य है ।
न्यायकन्दली
द्रव्यत्वादीनि द्रव्यादिव्यतिरिक्तानि न भवन्ति, अतस्तेषां पृथक् कार्यनिरूपण-
मन्याय्यमित्याह-लक्षणभेदादिति । अनुगताकारबुद्धिवेद्यानि द्रव्यत्वादीनि, व्यावृत्तिबुद्धि-
वेद्याश्च द्रव्यादिव्यक्तयः, तस्मादेषां द्रव्यत्वादीनां लक्षणभेदात् प्रतीतिभेदाद् द्रव्य-
गुणकर्मभ्यः पदार्थान्तरत्वम् । अत एव च नित्यत्वम् । यत एव सामान्यस्य द्रव्यादिभ्यो
भेदः, अत एव नित्यत्वम् । द्रव्याद्यभेदे सामान्यस्य द्रव्यादिविनाशे विनाशास्तदुत्पादे
चोत्पादः स्यात्, भेदे तु नायं विधिरवतिष्ठत इति ।
अत्रैके वदन्ति । भिन्नेष्वनुगता बुद्धिः सामान्यं व्यवस्थापयति ।
सा च प्रतिपिण्डं दण्डपुरुषादिव न स्वातन्त्र्येण सामान्यविशेषलक्षणे
को दूसरी जाति के आश्रयीभूत पदार्थों से तो अलग करते ही हैं, केवल इतने ही
सादृश्य के कारण द्रव्यत्वादि सामान्यों में भी 'विशेष' शब्द का लाक्षणिक प्रयोग होता है ।
किसी सम्प्रदाय का मत है कि द्रव्यत्वादि जातियाँ आश्रयीभूत द्रव्यादि व्यक्तियों
से भिन्न नहीं हैं, अतः उनका अलग से निरूपण करना उचित नहीं है । इसी
आक्षेप का समाधान 'लक्षणभेदात्' इत्यादि से किया गया है । अनुगत आकार की
प्रतीति के द्वारा ही द्रव्यत्वादि सामान्य समझे जाते हैं । द्रव्यादि व्यक्तियों का बोध
व्यावृत्तिबुद्धि से होता है । तस्मात् 'एषाम्' अर्थात् द्रव्यत्वादि सामान्यों के लक्षण
(द्रव्यादि व्यक्तियों के लक्षण से) भिन्न हैं, अतएव द्रव्यत्वादि सामान्य द्रव्यादि
व्यक्तियों से अलग स्वतन्त्र पदार्थ हैं । "अत एव च नित्यत्वम्" अर्थात् द्रव्यत्वादि
सामान्य यदि द्रव्यादि व्यक्तियों से अभिन्न होते, तो फिर द्रव्यादि के विनाश से उनका
भी विनाश होता एवं उनकी उत्पत्ति से उनकी भी उत्पत्ति होती । यदि द्रव्यत्वादि
सामान्य और द्रव्यादि व्यक्ति इन दोनों को भिन्न पदार्थ मान लेते हैं, तो यह स्थिति
नहीं उत्पन्न होती (अतः उनको नित्य मानते हैं) ।
इसी प्रसङ्ग में किसी सम्प्रदाय के लोगों का कहना है कि (प्र.) विभिन्न व्यक्तियों
में एक आकार की बुद्धि (अनुवृत्तिप्रत्यय) से ही सामान्य की सिद्धि की जाती है; किन्तु
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४९
न्यायकन्दली
द्वे वस्तुनी प्रतिभासयति । नापि तयोर्विशेषण-विशेष्यभावः ,गोत्वा 1गोत्ववानित्येयमनुदयात्;
किन्तु तादात्म्यग्राहिणी प्रतीतिरियम्, गौरयमित्येकात्मतापरामर्शात्, उभयोरन्योन्यप्रहाणेन
स्वरूपान्तराभावाच्च । अनुवृत्तता हि गोत्वस्यैव सामान्यान्तरस्यापि स्वरूपम्, व्यावृत्ततापि
गोव्यक्तेर्व्यक्त्यन्तराणामपि स्वभावः । सामान्यान्तरव्यावृत्तं तु गोत्वस्य स्वरूपम्,
व्यक्त्यन्तरव्यावृत्तिश्च गोव्यक्तेः स्वभावः परस्परान्यतामन्तरेणान्यो न शक्यते निर्देष्टुम् ।
जिस प्रकार 'दण्डी पुरुषः' इत्यादि विशिष्टबुद्धियों में दण्ड और पुरुष दोनों में
से एक सामान्यविधया और दूसरा व्यक्तिविधया स्पष्ट रूप से प्रतिभासित होता है,
उस प्रकार से 'अयं गौः, अयं गौः' इत्यादि आकार के अनुवृत्तिप्रत्ययों में गोत्वादि
सामान्य रूप से और गोप्रभृति विशेष (व्यक्ति) रूप से प्रतिभासित नहीं होते ।
एवं उक्त प्रतीतियों में गो विशेष्य रूप से और गोत्व विशेषण रूप से भी
प्रतिभासित नहीं होते; क्योंकि ऐसी बात होती तो प्रतीति का अभिलाप 'गौः1
गोत्वन्' इस आकार का होता ('अयं गौः' इस आकार का नहीं) । तस्मात् 'अयं
गौः' यह प्रतीति तादात्म्यविषयक है; क्योंकि 'अयम्' पदार्थ और 'गौः' पदार्थ
दोनों के एकरूपत्व का ही उससे परामर्श होता है । दूसरी युक्ति यह भी है कि गो
को छोड़कर गोत्व का कोई अपना स्वरूप नहीं है एवं गोत्व को छोड़कर गो
का भी कोई स्वरूप नहीं है; क्योंकि केवल अनुवृत्तत्व जैसे गोत्व जाति में है,
वैस ही अश्वत्वादि जातियों में भी है । एवं केवल व्यावृत्तत्व (अर्थात् स्वभिन्न-
भिन्नत्व) जैसे गो व्यक्ति में है, वैसे ही अश्वादि व्यक्तियों में भी है, अतः गोत्व
का ऐसा ही स्वरूप मानना पड़ेगा जो दूसरे सामान्यों में न रहे एवं गोव्यक्ति
- मुद्रित न्यायकन्दली में 'गोत्वा गोत्ववान्' ऐसा पाठ है । यह तो स्पष्ट है कि इसमें एक 'ए'
का चिह्न छूट गया है । अतः 'गोत्वो गोत्ववान्' ऐसा पाठ संशोधक को अभिप्रेत मालूम
होता है । किन्तु सो भी ठीक नहीं जँचता; क्योंकि प्रथम विकल्प में कहा गया है कि 'अयं
गौः' इस आकार की प्रतीति में गो का व्यक्तिविधया और गोत्व का जातिविधया भान नहीं
होता है । इसके बाद 'नापि तयोः' इत्यादि से जो विकल्प किया गया है, उसमें द्विवचनान्त
'तयोः' पद से गो और गोत्व इन्हीं दोनों का ग्रहण समुचित जान पड़ता है । 'किन्तु
तादात्म्यग्राहिणी' इत्यादि से इस विकल्प का खण्डन किया गया है कि 'अयं गौः' यह
प्रतीति 'इदम्' पदार्थ में गो के तादात्म्यविषयक ही है । इससे भी इसी प्रतिषेध का आक्षेप
होता है कि 'अयं गौः' यह प्रतीति गोविशेष्यक एवं गोत्वविशेषणक नहीं है । यदि ऐसी
बात है तो फिर 'गौः गोत्ववान्' ऐसा ही पाठ उचित है । अतः तदनुसार ही अनुवाद
किया गया है ।
७५० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
न्यायकन्दली
न च तस्य स एव स्वभावः सं एव च सम्बन्धीत्युपपद्यते, निःस्वभावस्य सम्बन्धाभावात् ।
तस्माज्जातिव्यक्त्योः परस्परात्मकतैव तत्त्वम् । एवं सति भेदाभेदवादोऽपि सिद्धयति । यथा
हि शाबलेयो गौरित्येवं प्रतीयते तथा बाहुलेयोऽपि । न चास्ति कस्यचिद् बाधः शाबलेय
एव गौर्न बाहुलेय इति; किन्तु सर्वेषामेकमतित्त्वमेव 'स गौरयमपि गौरिति' । तत्र
प्रतीतिबलेन शाबलेयात्मकस्य गोत्वस्य बाहुलेयात्मकत्वे सिद्धे शाबलेयाद् भेदोऽपि
सिद्धयति । अयमेव हि सामान्यस्य पूर्वपिण्डाद् भेदो यत् पिण्डान्तरात्मकत्वम् । इदमेव
च सामान्यरूपत्वं यदुभयात्मकत्वम् । भेदाभेदावेकस्य विरुद्धाविति चेत् ? न, युक्तिज्ञस्य
भवतः साम्प्रतमेतदभिधातुम् । तद्विरुद्धं यत्र बुद्धिर्विपर्य्येति । यत्तु सर्वदा प्रमाणेन तथैव
प्रतीयते, तत्र विरोधाभिधानमेव विरुद्धम् ।
अन्यत्रैवं न दृष्टमिति चेत् ? किं वै प्रत्यक्षमपि अनुमानमिव दृष्टमनु-
का स्वरूप भी ऐसा ही मानना पड़ेगा जो अश्वादि व्यक्तियों में न रहे । अतः इन
दोनों स्वरूपों का उपयुक्त निर्णय तभी हो पायेगा, जब कि गोव्यक्ति और गोत्व
जाति दोनों में तादात्म्य मान लें । अर्थात् ऐसा मान लें कि गोत्वाभिन्नत्व ही
गोव्यक्ति का स्वभाव है एवं गोव्यक्तियों से अभिन्न रहना ही गोत्व जाति का स्वभाव
है । ऐसा तो हो नहीं सकता कि वही उसका स्वभाव भी हो और वही उसका सम्बन्धी
भी हो; क्योंकि किसी स्वभाव से युक्त वस्तु में ही किसी का सम्बन्ध होता है । बिना
स्वभाव के वस्तु में किसी का सम्बन्ध सम्भव नहीं है । तस्मात् 'जाति व्यक्तिस्वरूप है
और व्यक्ति भी जातिस्वरूप ही है' यही सिद्धान्त ठीक है । ऐसा मान लेने पर जाति
और व्यक्ति में परस्पर भेद और अभेद दोनों की ही सिद्धि (प्रतीतियों के भेद से) हो
सकती है । जिस प्रकार शाबलेय गो में 'यह गो है' इस आकार की प्रतीति होती है,
उसी प्रकार बाहुलेय नाम के गो में भी 'यह गो है' इस प्रकार की प्रतीति होती है ।
ऐसी कोई बाधबुद्धि भी नहीं है कि शाबलेय ही गो है बाहुलेय नहीं; किन्तु यही सबों
का अनुभव है कि 'शाबलेय' भी गो है एवं 'बाहुलेय' भी गो है । इस स्थिति में
शाबलेय गो के स्वरूप गोत्व में बाहुलेय गो की स्वरूपता जिस प्रकार सिद्ध होती है,
उसी प्रकार गोत्व में शाबलेय गो के भेद की भी सिद्धि होती है । (गोत्व रूप)
सामान्य में पूर्वपिण्ड (शाबलेय गोरूप पिण्ड) का भेद इसीलिए है कि सामान्य
(गोत्व) पिण्डान्तर (बाहुलेय गोरूप दूसरा पिण्ड) स्वरूप है । सामान्यरूपता
इसलिए है कि वह उभयात्मक है । (उ.) एक ही वस्तु में एक ही वस्तु का भेद
और अभेद दोनों का रहना परस्पर 'विरुद्ध' है ? (प्र) युक्तियों से अभिज्ञ
आप जैसे व्यक्ति का ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि 'विरुद्ध' वही कहलाता
है जिसमें कि बुद्धि का विपर्यास हो । जो बराबर प्रमाण के द्वारा उसी प्रकार
का प्रतीत होता है, उसको विरुद्ध कहना ही 'विरुद्ध' है । यदि यह
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५१
न्यायकदली
सरति ? हतं तर्हीदमनवस्थया । अथेयं स्वसामर्थ्यात् प्रवर्तते ? तदा यथा यद् वस्तु यद्
दर्शयति तथैव तत्, न त्येतदन्यत्रादर्शनेन प्रत्याख्यानमर्हति सर्वभावप्रत्याख्यानप्रसङ्गात् ।
तस्मात् सामान्यं व्यक्त्युत्पादविनाशयोरुत्पादविनाशवत्त्वाद् व्यक्त्यन्तरावस्थाने चावस्थाना-
न्नित्यमनित्यं च, न पुनर्नित्यमेव ।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते किं जातिव्यक्त्योर्विलक्षणमाकारं गृह्णाति तत्प्रतीतिः ? उत
तयोरभेदं गृह्णाति ? आहोस्वित् परस्परविलक्षणावाकारौ ? आद्ये कल्पे तावदेकमेव वस्तु
स्यात्, नोभयोरेकात्मकत्वम्, अविलक्षणाकारबुद्धिर्वेद्यत्वस्याभेदलक्षणत्वात् । द्वितीये तु
कल्पे व्याहतिरेव, विलक्षणाकारसंवित्तिरेव हि भेदसंवितिः । तस्याः सम्भवे सति
तयोरभेदप्रतिपत्तिरेव नास्ति, कथं भिन्नयोरभेदो व्यवस्थाप्यते ? कथं तर्हि तादात्म्य-
प्रतीतिः ? न कथञ्चिदिति वदामः ।
यदि तावदेक आकारोऽनुभूयते, एकस्यैव वस्तुनः प्रतीतिरियं नोभयोः ।
अथ द्वावाकारावनुभूयेते तदास्याः प्रतीतेरसम्भव एव । यत् पुनर्गौरित्यय-
कहें कि (उ.) एक ही वस्तु के भेद और अभेद इन दोनों की अवस्थिति एक ही
वस्तु में कहीं नहीं देखी जाती है । अतः उक्त भेदाभेद पक्ष अयुक्त है । (प्र.) तो
इसके उत्तर के लिए यह पूछना है कि क्या अनुमान की तरह प्रत्यक्ष प्रमाण को
भी अपने विषय की सिद्धि के लिए उसका अन्यत्र देखा जाना आवश्यक है ?
यदि ऐसी बात मानें तो अनवस्थादोष के कारण प्रत्यक्ष प्रमाण का ही लोप हो
जायगा । यदि प्रत्यक्ष (अन्यत्र दर्शन की अपेक्षा न करके) केवल अपने बल से ही
अपने विषय को दिखाने के लिए प्रवृत्त होता है, तो फिर यही मानना पड़ेगा कि
अपने जिस वस्तु को वह जिस रूप में दिखलाता है, वह वस्तु उसी रूप का है ।
इस वस्तुस्थिति का केवल इस हेतु से निरादर नहीं किया जा सकता कि 'अन्यत्र
इस प्रकार से देखा नहीं जाता' । प्रत्यक्ष का यदि यह स्वभाव न मानें तो संसार से
सभी वस्तुओं की सत्ता ही उठ जाएगी । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि सामान्य
यतः अपने आश्रयरूप व्यक्तियों के उत्पन्न होने पर ही उत्पन्न होता है और उनके
विनष्ट होने पर विनष्ट भी होता है, अतः 'अनित्य' है । एवं उस व्यक्ति के नाश
के बाद भी उसी जाति की दूसरी व्यक्ति में रहता है, अतः वह 'नित्य' भी है ।
तस्मात् सामान्य नित्य एवं अनित्य दोनों ही है, केवल नित्य ही नहीं है।
(उ.) ऐसी स्थिति में हम (तार्किक) लोग पूछते हैं कि (१) 'अयं गौः' यह
प्रतीति जाति और व्यक्ति दोनों को एक ही आकार में ग्रहण करती है । (२)
अथवा दोनों के अभेद का ग्रहण करती है ? (३) अथवा जाति और व्यक्ति दोनों
को परस्पर विभिन्न आकारों में ग्रहण करती है ? इनमें यदि पहला पक्ष मानें तो
७५२ न्यायकन्दलीसंतलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
न्यायकन्दली
मविभागेन संवेदनं तत् समवायसामर्थ्यात् । संयोगे हि द्वयोः संसर्गावभासः, समवायस्य
पुनरेष महिमा यदत्र सम्बन्धिनावयःपिण्डवह्नियत् पिण्डीभूतावेव प्रतीयेते जातिरेव न च
व्यक्तेः स्वरूपम् । तेन सत्यपि भेदे बदरादिवत् कुण्डस्य जातितो व्यक्तेः स्वरूपं पृथग् न
निष्कृष्यते । परस्परपरिहारेण तूपलम्भोऽस्त्येव, दूरे गोत्वाग्रहणेऽपि पिण्डस्य ग्रहणात् ।
पूर्वपिण्डाग्रहणेऽपि पिण्डान्तरे गोत्वग्रहणात् । तस्माद् व्यक्तेरत्यन्तं भिन्नमेव सामान्यमिति
तार्किकाणां प्रक्रिया ।
द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात् प्रत्ययभेदाच्च परस्परतश्चान्यत्वम्, द्रव्यत्वादयः
फिर जाती या व्यक्ति इन दोनों में से किसी एक का मानना ही सम्भव होगा, दूसरे
का नहीं, जाति और व्यक्ति एतदुभयात्मक किसी वस्तु की कल्पना सम्भव नहीं होगी;
क्योंकि अभिन्नता का यही लक्षण है कि जो अविलक्षण आकार की बुद्धि के द्वारा
ज्ञात हो । यदि दूसरा पक्ष मानें तो परस्पर विरोध ही उपस्थित होगा; क्योंकि
किन्हीं दो वस्तुओं का परस्पर विभिन्न आकारों से गृहीत होना ही उन दोनों के
भेद का ज्ञान है । भेद का यह ज्ञान यदि सम्भव है, तो फिर उन दोनों में
तादात्म्य की प्रतीति कैसी ? अतः हम लोग कहते हैं कि जाति और व्यक्ति इन
दोनों के तादात्म्य की प्रतीति किसी भी प्रकार से नहीं होती; क्योंकि यदि एक ही
आकार का अनुभव होता है तो फिर वह अनुभव एक ही वस्तु की प्रतीति होगी,
दो वस्तुओं की नहीं । यदि दो आकारों का अनुभव होता है, तो फिर उस एक
आकार की प्रतीति की सम्भावना ही मिट जाती है । 'गौरयम्' इत्यादि प्रतीतियों
में जो गोत्वजाति और गोव्यक्ति विना अलग हुए से प्रतीत होते हैं, वह तो दोनों
के समवाय का सामर्थ्य है । संयोग की प्रतीति में उसके प्रतियोगी और अनुयोगी
दोनों के सम्बन्धियों का भान होता है । समवाय की ही यह विशेष महत्ता है कि
इसमें उसके दोनों सम्बन्धी (प्रतियोगी और अनुयोगी) परस्पर एक होकर ही
प्रतीत होते हैं । जैसे कि वह्नि और अयःपिण्ड वस्तुतः पृथक् होते हुए भी एक
होकर ही ज्ञान में भासित होते हैं । सुतराम् (व्यक्ति-सम्बद्ध) जाति की ही प्रतीति
होती है, केवल व्यक्ति के स्वरूप की नहीं । अतः जाति और व्यक्ति में वस्तुतः
भेद रहते हुए भी जैसे कि (संयोगयुक्त) कुण्ड और बेर को अलग कर दिखलाया
जा सकता है, उस प्रकार जाति से व्यक्ति के स्वरूप को अलग नहीं किया जा
सकता । कुछ स्थानों में जाति और व्यक्ति की प्रतीति एक-दूसरे को छोड़कर भी
होती है । जैसे दूर में गोपिण्ड (व्यक्ति) की प्रतीति तो होती है, (किन्तु 'यह गो है'
इस प्रकार से) गोत्व की प्रतीति वहाँ नहीं होती । एवं पूर्वपिण्ड का ग्रहण न रहने पर भी
दूसरे पिण्ड में गोत्व का ग्रहण होता है । तस्मात् तार्किकों की रीति के अनुसार
जाति और व्यक्ति अत्यन्त भिन्न हैं । (किसी भी प्रकार वास्तव में अभिन्न नहीं हैं) ।
द्रव्यादि सामान्य यतः नियमित रूप से द्रव्यादि तत्तत् आश्रयों में ही रहते हैं,
एवं प्रत्येक सामान्य की प्रतीति भिन्न-भिन्न आकार की होती है, अतः समझते हैं कि
द्रव्यत्व व गुणत्वादि सामान्य परस्पर भिन्न हैं । अभिप्राय यह है कि द्रव्यादि सामान्यों
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५३
प्रशस्तपादभाष्यम्
द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात् प्रत्ययभेदाच्च परस्परतश्चान्यत्वम् ।
प्रत्येकं स्वाश्रयेषु लक्षणाविशेषाद् विशेषलक्षणाभावाच्चैकत्वम् । यद्यप्य-
परिच्छिन्नदेशानि सामान्यानि भवन्ति, तथाप्युपलक्षणनियमात्
द्रव्यत्वादि कोई भी सामान्य द्रव्यादि कुछ आश्रयों में ही नियत रूप
से रहते हैं एवं भिन्न रूप से प्रतीत भी होते हैं, अतः (द्रव्यत्व-
गुणत्वादि) सामान्य परस्पर विभिन्न हैं । एवं प्रत्येक सामान्य अपने
आश्रयों में समान रूप से प्रतीत होता है एवं उसको अनेक मानने में
कोई प्रमाण भी नहीं है इससे सिद्ध होता है कि द्रव्यादि नियत आश्रयों
में रहनेवाले द्रव्यत्वादि सामान्यों में से प्रत्येक सामान्य एक-एक ही हैं ।
यद्यपि सामान्य अनन्त (प्रकार के) आश्रयों में रहता है, फिर भी
उसकी अभिव्यक्ति के कारणों की एकरूपता और उसके आश्रयों का
न्यायकन्दली
प्रत्येकं द्रव्यादिव्येव नियताः । प्रत्ययभेदश्चैतेषु दृश्यते, तस्माद् द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात्
प्रत्ययभेदाच्च द्रव्यत्वादीनां परस्परतो भेदः ।
अभेदात्मकं सामान्यमिति पूर्वं प्रतिज्ञामात्रेणोक्तं तदिदानीं प्रमाणसिद्धं
तस्य करोति-प्रत्येकं स्वाश्रयेष्विति । लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षणमनुगताकारज्ञानम् ।
प्रत्येकं प्रतिपिण्डमविशेषाद् वैलक्षण्याभावाद् विशेषे भेदे लक्षणस्य प्रमाणस्याभावाच्च
सामान्यस्य स्वाश्रयेष्वेकत्वमभिन्नस्वभावमित्यर्थः । स्वविषये सर्वत्र सामान्यं
समवैति नान्यत्रेति यत् पूर्वमुक्तं तस्य कारणमाह-यद्यपीति । यद्यपि
सामान्यानि यत्र तत्रोत्पद्यमानेन पिण्डेन सम्बन्धादपरिच्छिन्नदेशान्यनियतदेशानि,
में से प्रत्येक सामान्य यतः द्रव्यादि व्यक्तियों में ही नियमित रूप से रहता है एवं
इनमें इनकी प्रतीतियाँ भी विभिन्न आकार की होती हैं । तस्मात् द्रव्यादि में ही
नियमित रूप से रहने के कारण और उक्त प्रतीति भेद के कारण समझते हैं कि
द्रव्यत्वादि जातियाँ परस्पर भिन्न हैं ।
'प्रत्येकं स्वाश्रयेषु' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा पहले केवल प्रतिज्ञावाक्य के द्वारा
सिद्धवत् कही हुई सामान्य की अभिन्नता को प्रमाण के द्वारा 'प्रत्येकं स्वाश्रयेषु'
इत्यादि वाक्य से सिद्ध करते हैं । 'लक्ष्यते अनेन' इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृत
में 'लक्षण' शब्द का अर्थ है, अनुगत एक आकार का ज्ञान । उसका 'प्रत्येक में'
अर्थात् गोप्रभृति प्रत्येक व्यक्ति में 'अविशेष से' अर्थात् विभिन्नता के न रहने से,
एवं 'विशेष में' अर्थात् द्रव्यत्वादि प्रत्येक जाति के भेद में अर्थात् अनेकत्व में 'लक्षण'
अर्थात् किसी प्रमाण के न रहने से समझते हैं कि एक सामान्य अपने सभी आश्रयों
में एक ही है, अर्थात् अभिन्न स्वभाव का है । पहले जो यह कहा गया है कि
"सामान्य अपने विषयों अर्थात् आश्रयों में ही समवाय सम्बन्ध से रहता है, अन्यत्र
नहीं" उसी के हेतु का प्रतिपादन 'यद्यपि' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा किया गया है ।