भारतकोश
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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

ऽप्रकरणम्] । भाषानुवादसहितम् ७६९ प्रशस्तपादभाष्यम् प्रत्याधारं विलक्षणोऽयं विलक्षणोऽयमिति प्रत्ययव्यावृत्तिः, देशकालविप्रकर्षे च परमाणौ स एवायमिति प्रत्यभिज्ञानं च भवति, तेऽन्त्या विशेषाः । यदि पुनरन्त्यविशेषमन्तरेण योगिनां योगजाद् धर्मात् प्रत्ययव्यावृत्तिः प्रत्यभिज्ञानं च साम्य के रहते हुए भी 'यह आत्मा उस आत्मा से भिन्न है' इस आकार की व्यावृत्ति प्रतीति जिस हेतु से होती है, वही 'विशेष' है। इसी प्रकार सभी मनों में परस्पर सादृश्य के रहते हुए भी योगियों को जिस कारण से 'यह मन उस मन से भिन्न है' इस आकार की व्यावृत्ति-बुद्धि उत्पन्न होती है, वही 'विशेष' है। इसी प्रकार विभिन्न समयों में या विभिन्न देशों में रहनेवाले परमाणुओं में भी 'यह वही है' इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा योगियों को जिन हेतुओं से होती है, वे अन्तों में रहने वाले 'विशेष' ही हैं। योग से उत्पन्न केवल विशेष प्रकार के धर्म से ही योगियों की व्यावृत्ति की उक्त प्रतीति न्यायकन्दली अत्र चोदयति- यदि पुनरिति । यथा योगजधर्मसामर्थ्याद् योगिनामतीन्द्रियार्थदर्शनं भवति, तथा विशेषमन्तरेणैव प्रत्ययव्यावृत्तिः प्रत्यभिज्ञानं च भविष्यतीति चोदनार्थः । समाधत्ते-नैवमिति । यथा योगिनामशुक्ले शुक्लप्रत्ययो न भवति, अत्यन्तादृष्टे च प्रत्यभिज्ञानं न स्यात् । यदि स्यात् ? मिथ्याप्रत्ययो भवेत् । 'यदि पुनः' इत्यादि से इसी प्रसङ्ग में पुनः आक्षेप करते हैं। आक्षेप करनेवालों का अभिप्राय है कि जिस प्रकार योग से उत्पन्न विशेष धर्मरूप विशेष सामर्थ्य के कारण योगियों को परमाण्वादि अतीन्द्रिय विषयों का भी प्रत्यक्ष होता है, उसी विशेष सामर्थ्य के द्वारा योगियों को उक्त व्यावृत्तिबुद्धि और उक्त प्रत्यभिज्ञान दोनों ही हो सकते हैं, इसके लिए विशेष पदार्थ की कल्पना अनावश्यक है। 'नैवम्' इत्यादि से इसी का समाधान करते हैं। अर्थात् जिस प्रकार योगियों को भी अशुक्ल द्रव्य में शुक्ल की प्रतीति नहीं होती है, उसी प्रकार पहले बिना देखी हुई वस्तु की प्रत्यभिज्ञा योगियों को भी नहीं हो सकती। यदि होगी (योगियों को शुक्ल में अशुक्ल की प्रतीति और अज्ञात वस्तु की प्रत्यभिज्ञा यदि होगी) तो वह मिथ्या ही होगी । अतः योगियों को कथित परमाण्वादि में उक्त परस्पर व्यावृत्ति की प्रतीति 'विशेष' पदार्थ को माने बिना केवल योगजनित विशेष धर्म से नहीं हो सकती। योगज धर्म से योगियों के अतीन्द्रिय अर्थों के ज्ञानों में भी योगज धर्म के अतिरिक्त विषयादि निमित्तों की अपेक्षा होती है।

७७० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ विशेषनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् स्यात् ? ततः किं स्यात् ? नैवं भवति । यथा न योगजाद् धर्मादशुक्ले शुक्लप्रत्ययः सञ्जायते, अत्यन्तादृष्टे च प्रत्यभिज्ञानम् । यदि स्यान्मिथ्या भवेत् । तथेहाप्यन्त्यविशेषमन्तरेण योगिनां न योगजाद् धर्मात् प्रत्ययव्यावृत्तिः प्रत्यभिज्ञानं वा भवितुमर्हति । अथान्त्यविशेषेष्विव परमाणुषु कस्मान्न स्वतः प्रत्ययव्यावृत्तिः कल्प्यत इति चेत् ? न, तादात्म्यात् । इहातादात्मकेष्वन्यनिमित्तः प्रत्ययो और प्रत्यभिज्ञा की उपपत्ति सम्भव नहीं है; क्योंकि जिस प्रकार शुक्ल रूप से शून्य द्रव्य में शुक्ल की प्रतीति एवं पहले से न देखी हुई वस्तुओं में प्रत्यभिज्ञा ये दोनों ही योगियों को भी नहीं होती हैं, यदि हों तो वे मिथ्या ही होंगी । इसी प्रकार कथित स्थलों में भी व्यावृत्ति-प्रतीतियाँ और प्रत्यभिज्ञा ये दोनों बिना अन्त्य-विशेष के केवल योगजनित उत्कृष्ट धर्म से योगियों को भी नहीं हो सकतीं । (प्र.) यह कल्पना क्यों नहीं करते कि अन्त्य-विशेषों की तरह उक्त परमाणुओं में भी व्यावृत्ति-प्रतीतियाँ स्वतः (बिना और किसी न्यायकन्दली तथा अन्त्यविशेषमन्तरेण प्रत्ययव्यावृत्तिः प्रत्यभिज्ञानं च न भवितुमर्हति । योगजाद् धर्मादतीन्द्रियार्थदर्शनं न पुनरसन्मात्रिनिमित्त एव प्रत्ययो भविष्यतीत्यभिप्रायः । पुनश्चोदयति- अथान्त्यविशेषेष्विति । न तावदन्त्यविशेषेष्वपि विशेषान्तरसम्भ- वोऽनवस्थानात् । यथा च तेषु विशेषान्तरमन्तरेण स्वत एव प्रत्ययव्यावृत्तिर्भवति योगिनां तथा परमाणुष्वपि भविष्यति ? किं विशेषकल्पनयेत्यत्रोत्तरमाह- नेति । यत्त्वयोक्तं तन्न, कुतस्तादात्म्यात् । एतदेव विवृणोति-इहेति । 'अथान्त्यविशेषेषु' इत्यादि ग्रन्थ से इसी प्रसङ्ग में पुनः आक्षेप करते हैं । अर्थात् कथित 'अन्त्यविशेषों' में दूसरे 'विशेष' की सम्भावना नहीं है; क्योंकि (ऐसी कल्पना करने पर) अनवस्थादोष होगा । यह जो आक्षेप किया गया है कि विशेषों में दूसरे विशेषों के न रहने पर भी जैसे कि स्वतः उनमें परस्पर व्यावृत्तिबुद्धि योगियों को होती है वैसे ही परमाणु प्रभृति में स्वतः ही व्यावृत्तिबुद्धि होगी । इसके लिए 'विशेष' नाम के स्वतन्त्र पदार्थ को मानने की क्या आवश्यकता है ? उसी (आक्षेप) के समाधान के लिए 'न' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् तुमने जो आक्षेप किया है वह ठीक नहीं है; क्योंकि परमाणु प्रभृति में 'परस्पर तादात्म्य' है । इसी 'तादात्म्य' हेतु का

प्रकरणम् ] भाषाानुवादसहितम् ७७१

प्रकरणम् ] भाषाानुवादसहितम् ७७१ प्रशस्तपादभाष्यम् भवति यथा घटादिषु प्रदीपात्, न तु प्रदीपे प्रदीपान्तरात् । यथा गवाश्वमांसादीनां स्वत एवाशुचित्वं तद्योगादन्येषाम्, तथेहापि तादात्म्या- दन्त्यविशेषेषु स्वत एव प्रत्ययव्यावृत्तिः, तद्योगात् परमाण्वादिष्विति । ॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये विशेषपदार्थः समाप्तः ॥ ● कारण के ही) होंगी । (उ.) यह नहीं हो सकतीं; क्योंकि परमाणु में परमाणु का तादात्म्य है । जो वस्तु जिस स्वरूप का नहीं है, उस वस्तु में उक्त अन्य वस्तु की बुद्धि उस वस्तु से भिन्न वस्तु रूप कारण से ही उत्पन्न होती है, जैसे कि घटादि की प्रतीति प्रदीप से होती है; किन्तु प्रदीप की प्रतीति के लिए दूसरे प्रदीप की अपेक्षा नहीं होती । जिस प्रकार गो और अश्व के मांसों में अशुचित्व स्वतः (बिना किसी और सम्बन्ध के ही) है; किन्तु उनसे सम्बद्ध वस्तुओं में उसी के सम्बन्ध से अशुचित्व होता है, उसी प्रकार यहाँ भी अन्त्य-विशेषों में तादात्म्य से अर्थात् और किसी के सम्बन्ध के बिना ही व्यावृत्ति-प्रतीति होती है; किन्तु परमाणुओं में अन्त्यविशेष के सम्बन्ध से ही व्यावृत्ति-प्रतीति होती है । ॥ प्रशस्तपादभाष्य में विशेष का निरूपण समाप्त हुआ ॥ ● न्यायकन्दली अतदात्मकेष्वन्यनिमित्तः प्रत्ययो भवति, न तदात्मकेषु । यथा घटादिष्वप्रकाश- स्वभावेषु प्रदीपादेः प्रकाशस्वभावात् प्रकाशो भवति, न तु प्रदीपे प्रदीपान्तरात् प्रकाशः किन्तु स्वत एव । यथा गवाश्वमांसादीनां स्वत एवाशुचित्वम्, स्प्रष्टुः विवरण 'इह' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है । अभिप्राय यह है कि जिन दो वस्तुओं में तादात्म्य नहीं है, उनमें से एक में अन्य दूसरे के सम्बन्ध के लिए अन्य कारण की अपेक्षा होती है । जो अभिन्न हैं, उनमें से किसी में सम्बन्ध के लिए दूसरे की अपेक्षा नहीं होती है । जैसे कि घटादि प्रकाशस्वभाव के नहीं हैं (प्रकाश के साथ उनका तादात्म्य नहीं है), अतः घट में प्रकाश के लिए प्रकाशस्वभाव के प्रदीप रूप अन्य पदार्थ की अपेक्षा होती है; किन्तु प्रदीप के प्रकाश के लिए किसी दूसरे प्रदीप की अपेक्षा

७७२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् | विशेषनिरूपण- न्यायकन्दली प्रत्यवायकरत्वं तयोगात् । तत्सम्बन्धादन्येषामशुचित्वम् । तथेहापि तादात्म्याद- त्यन्तव्यावृत्तिस्वभावत्वादनन्यविशेषेषु स्वत एव स्वरूपादेव प्रत्ययव्यावृत्तिर्न विशेषान्तर- सम्भवात्¹ । अतदात्मकेषु तु परमाणुषु सामान्यधर्मकेषु विशेषयोगादेव प्रत्ययव्यावृत्तिरुक्ता न स्वरूपमात्रादिति । नित्यद्रव्येषु सर्वेषु परस्परसधर्मसु । प्रत्येकमनुवर्तन्ते विशेषा भेदहेतवः ॥ ॥ इति भट्टश्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां विशेषपदार्थः समाप्तः ॥ नहीं होती है; क्योंकि प्रदीप में स्वतः प्रकाश होता है । इसी प्रकार गौ, अश्व प्रभृति के मांस अपने तो वे स्वतः 'अशुचि' हैं; किन्तु निषिद्ध मांसों को छूनेवाले पुरुष में प्रत्यवाय की कारणता उन (मांसों) के स्पर्श से आती है । एवं उस पुरुष से सम्बन्ध रखनेवाली वस्तुओं में जो अशुचिता होगी, उसके कारण उन वस्तुओं के साथ उस पुरुष को सम्बन्ध है । इसी प्रकार प्रकृत में भी अत्यन्तव्यावृत्ति-स्वभाव के अन्य-विशेषों में व्यावृत्ति-प्रत्यय 'स्वतः' अर्थात् उनके अत्यन्तव्यावृत्ति-स्वभाव के कारण ही होता है । इसके लिए दूसरे 'विशेष' के सम्बन्ध की अपेक्षा नहीं है । 'अतदात्मक' अर्थात् एक सामान्य धर्मवाले परमाणुओं में जो व्यावृत्ति-बुद्धि होगी, उसके लिए उनमें 'विशेष' पदार्थ का सम्बन्ध ही कारण है । उसकी उत्पत्ति स्वतः नहीं हो सकती । एक साधारण धर्म से युक्त सभी नित्य द्रव्यों में से प्रत्येक में परस्पर भेद (व्यावृत्ति) के लिए उनमें से प्रत्येक में अलग विशेष का मानना आवश्यक है; क्योंकि वे ही उनमें व्यावृत्ति-बुद्धि के कारण हैं । ॥ भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रचित एवं पदार्थों के सम्यक् ज्ञान में समर्थ न्यायकन्दली नाम की टीका का विशेषनिरूपण समाप्त हुआ ॥

  1. यहाँ 'न विशेषान्तरसम्भवात्' इसके स्थान में 'न विशेषान्तरसम्बन्धात्' ऐसा पाठ उचित जान पड़ता है, अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।

॥ अथ समवायपदार्थनिरूपणम् ॥ प्रशस्तपादभाष्यम् अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां यः सम्बन्ध इह- प्रत्ययहेतुः स समवायः । द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषाणां कार्यकारणभूतानामकार्यकारणभूतानां वाऽयुतसिद्धानामाधार्याधार- एक आश्रय एवं दूसरा आश्रित इस प्रकार के दो अयुतसिद्धों का जो सम्बन्ध 'यह (आश्रित) यहाँ (आश्रय में) है' इस प्रकार के प्रत्यय का कारण हो, वही सम्बन्ध 'समवाय' है । (विशदार्थ यह है कि) द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य और विशेष इन सभी पदार्थों में से जो (दो वस्तु यथासम्भव) कार्यकारणभावापन्न हों अथवा स्वतन्त्र ही हों, किन्तु अयुतसिद्ध न्यायकन्दली अन्तर्व्याप्तमिदं विश्वंसंहारोत्पत्तिहेतवे । निर्मलज्ञानदेहाय नमः सोमाय शम्भवे ॥ समवायनिरूपणार्थमाह- अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां कार्यकारणभूतानाम- कार्यकारणभूतानां यः सम्बन्ध इहप्रत्ययहेतुः स समवायः । तदेतत्कृतव्याख्याने- मुद्देशावसरे । के ते अयुतसिद्धा येषां सम्बन्धः समवायो भवेत् ? अत आह- द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषाणामिति । कार्यकारणभूतानामकार्यकारणभूतानामिति नियमकथनम् । अवयवावयविनामनित्यद्रव्यतद्गुणानां नित्यद्रव्यतत्समवेतानाम्- नित्यगुणानां कर्मतद्वतां कार्यकारणभूतानां समवायः, नित्यद्रव्यतद्गुणानां सामान्य- अन्तःकरण के मालिन्य को समूल नाश करनेवाले एवं विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश के हेतु एवं विशुद्ध विज्ञानरूप शरीरवाले (क्षित्यादि आठ मूर्त्तिक शिवों में से) सोममूर्ति स्वरूप भगवान् शम्भु को मैं प्रणाम करता हूँ । "अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां यः सम्बन्ध इहप्रत्ययहेतुः स समवायः" यह सन्दर्भ समवाय के निरूपण के लिए लिखा गया है । इस पङ्क्ति की व्याख्या इसी ग्रन्थ के उद्देश प्रकारण में कर दी गयी है । "अयुतसिद्ध' कौन-कौन से पदार्थ हैं ? जिनका सम्बन्ध समवाय होगा ? इसी प्रश्न का उत्तर "द्रव्यगुणकर्म- सामान्यविशेषाणाम्" इत्यादि से दिया गया है । इस वाक्य में 'किन वस्तुओं में समवाय सम्बन्ध होता है' इस प्रसङ्ग में 'नियम' को दिखलाने के लिए "कार्यकारणभूतानामकार्यकारणभूतानाम्" यह वाक्य लिखा गया है । उस वाक्य के 'कार्यकारणभूतानाम्' इस पद के द्वारा यह नियम दिखलाया गया है कि कारणों में कार्य का समवाय होता है, अर्थात् कार्यकारणभावापन्न वस्तुओं में से अवयवरूप कारणों में से अवयवीरूप कार्य का एवं अनित्य द्रव्यरूप कारण और उनमें होनेवाले गुणों का एवं नित्य द्रव्य और उनमें उत्पन्न होनेवाले गुणों का एवं क्रियाश्रय और क्रिया का ही समवाय सम्बन्ध होता है । एक-

७७४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् भावेनावस्थितानामिहेदमिति बुद्धिर्यतो भवति, यतश्चा- सर्वगतानामधिगतान्त्यत्वानार्मावष्वग्भावः स समवायाख्यः सम्बन्धः । कथम् ? यथेह कुण्डे दधीति प्रत्ययः सम्बन्धे सति दृष्टः, तथेह तन्तुषु हों एवं आधार-आधेय रूप हों, उन दोनों में से एक (आधेय) का दूसरे (आधार में) 'यह यहाँ है' इस आकार का प्रत्यय जिससे हो वही (सम्बन्ध) 'समवाय' है । (एवं) नियमित देश में ही रहनेवाले एवं परस्पर भिन्न रूप में ज्ञात होनेवाले दो वस्तुओं की स्वतन्त्रता जिस सम्बन्ध से जाती रहे वही (सम्बन्ध) 'समवाय' है । (प्र.) इस सम्बन्ध की सत्ता में प्रमाण क्या है ? (उ.) (यह अनुमान ही प्रमाण है कि) जिस न्यायकन्दली तदतामन्त्यविशेषतद्वतां चाकार्यकारणभूतानां समवायोऽयुतसिद्धानामिति नियमः । एवमाधार्याधारभावेनावस्थितानामित्यपि नियम एव । इहेदमिति बुद्धिर्यतः कारणाद् भवति यतश्चासर्वगतानां नियतदेशावस्थितानामधिगतान्त्यत्वाना मधिगतस्वरूपभेदा- नामविष््वग्भावो ऽपृथग्भावोऽस्वातन्त्र्यं स समवायः, भिन्नयोः परस्परोपश्लेषस्य सम्बन्धकृतत्वोपलम्भात् । एतदेव कथमित्यादिना प्रश्नपूर्वकमुपपादयति- यथा इह कुण्डे दधीति प्रत्ययः कुण्डदध्नोः सम्बन्धे सति दृष्टः, दूसरे का कार्य या कारण न होते हुए भी जिन वस्तुओं में समवाय सम्बन्ध होता है, वे हैं सामान्य (जाति) और उनके आश्रय, एवं अन्त्यविशेष और उनके आश्रय (इनमें भी समवाय सम्बन्ध होता है) । समवाय के ये कार्यकारणभूत और अकार्यकारणभूत प्रतियोगी और अनुयोगी यतः 'अयुतसिद्ध' हैं, अतः यह 'नियम' उपपन्न होता है-समवाय अयुतसिद्धों का ही सम्बन्ध है । इसी प्रकार "आधार्याधारभावेनावस्थितानाम्" यह वाक्य भी नियमार्थक ही है । अर्थात् यतः विभिन्न दो वस्तुओं में विशेष्यविशेषणभाव की प्रतीति किसी सम्बन्ध से ही होती है, अतः 'इहेदम्' यह प्रतीति जिस कारण के द्वारा होती है (वही समवाय है) एवं जिसके द्वारा अव्यापक अथवा नियत आश्रय में रहनेवाले उन वस्तुओं में-जिनमें कि परस्पर भेद पहले से ज्ञात है, अर्थात् जिनके अलग-अलग स्वरूप ज्ञात हैं, उन्हें 'अविष््वग्भाव' अर्थात् अपृथग्भाव फलतः अस्वातन्त्र्य जिसके द्वारा हो, वही 'समवाय' है; क्योंकि वस्तुओं का उक्त 'अविष््वग्भाव' किसी सम्बन्ध से ही देखा जाता है । यही बात 'कथम्' इस वाक्य के द्वारा प्रश्न कर 'यथेह कुण्डे' इत्यादि वाक्य से उत्तर रूप में कहते हैं । अर्थात् जिस प्रकार 'इस मटके में दही है' इस आकार की प्रतीति मटका और दही के सम्बन्ध रहने पर ही देखी जाती है, उसी प्रकार 'इन तन्तुओं में पट है' इस आकार की प्रतीति भी होती है । इससे समझते हैं कि तन्तु और पट (प्रभृति अयुतसिद्धों) में भी कोई सम्बन्ध

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७७५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७७५ प्रशस्तपादभाष्यम् पटः, इह वीरणेषु कटः, इह द्रव्ये गुणकर्मणी, इह द्रव्यगुणकर्मसु सत्ता, इह द्रव्ये द्रव्यत्वम्, इह गुणे गुणत्वम्, इह कर्मणि कर्मत्वम्, इह नित्यद्रव्येष्वन्त्या विशेषा इति प्रत्ययदर्शनादस्तेषां सम्बन्ध इति ज्ञायते । न चासौ संयोगः, सम्बन्धिनामयुतसिद्धत्वाद् अन्यतर प्रकार 'इस मटके में दही है' यह प्रतीति (दधि और मटके में संयोग) सम्बन्ध के रहते ही होती है, उसी प्रकार 'इन तन्तुओं में पट है, इन वीरणों (तृणविशेषों) में चटाई है, इस द्रव्य में गुण और कर्म हैं, द्रव्य, गुण और कर्मों में सत्ता है, द्रव्य में द्रव्यत्व है, गुण में गुणत्व है, कर्म में कर्मत्व है, इन नित्यद्रव्यों में विशेष है' इत्यादि प्रतीतियाँ भी होती हैं, अतः समझते हैं कि (प्रतीति के विषय इन आधार और आधेय में भी) कोई सम्बन्ध अवश्य है । कथित प्रतीतियों की उपपत्ति संयोग से नहीं हो सकती; क्योंकि उन प्रतीतियों में विशेष्य और विशेषण रूप से भासित होनेवाले प्रतियोगी और अनुयोगी अयुतसिद्ध हैं एवं अन्यतर कर्म या उभयकर्म या विभाग उस सम्बन्ध के न्यायकन्दली तथैह तन्तुषु पट इत्यादिप्रत्ययानां दर्शनादस्त्येषां तन्तुपटादीनां सम्बन्ध इति ज्ञायते । इह तन्तुषु पट इत्यादिप्रत्ययाः सम्बन्धनिमित्तका अवधारितप्रत्ययत्वात्, इह कुण्डे दधीतिप्रत्ययवत् । नन्वयं संयोगो भविष्यतीत्यत आह-न चासौ संयोग इति । असौ तन्तुपटादीनां सम्बन्धो न संयोगो भवति, कुतः? इत्यत्राह-सम्बन्धिनाम- अवश्य है । इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार 'इस मटके में दही है' यह निश्चयात्मक प्रतीति दही और कुण्ड में संयोग सम्बन्ध के रहने पर ही होती है, उसी प्रकार 'इन तन्तुओं में पट है' इस प्रकार की निश्चयात्मक प्रतीति भी उन दोनों में किसी सम्बन्ध के कारण ही उत्पन्न होती है (वही सम्बन्ध समवाय है) । (मटके और दही के संयोग की तरह) 'तन्तुओं में पट है' इत्यादि प्रतीतियों का नियामक सम्बन्ध भी संयोग ही होगा ? इसी प्रश्न का उत्तर "न चासौ संयोगः" इत्यादि से दिया गया है । 'असौ' अर्थात् तन्तु और पट का सम्बन्ध, संयोग क्यों नहीं है? इसी प्रश्न का उत्तर "सम्बन्धिनामयुतसिद्धत्वात्" इस वाक्य के द्वारा दिया गया है । अर्थात् संयोगसम्बन्ध युतसिद्ध वस्तुओं में ही होता है और यह (समवाय) सम्बन्ध अयुतसिद्धों में होता है; क्योंकि संयोग अपने प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों में से एक के कर्म से होगा, या उक्त प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों

७७६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् कर्मादिनिमित्तासम्भवात्, विभागान्तात्वाददर्शनात्, अधिकरणाधिकर्तव्ययोरेव भावादिति । स च द्रव्यादिभ्यः पदार्थान्तरं भाववल्लक्षणभेदात् । यथा भावस्य द्रव्यादीनां स्वाधारेषु आत्मानुरूपप्रत्यय- कारण नहीं हो सकते । एवं विभाग से इस सम्बन्ध का नाश भी नहीं देखा जाता एवं यह (समवाय) अधिकरण एवं आधेय रूप दो वस्तुओं में ही देखा जाता है (अतः उन प्रतीतियों की उपपत्ति संयोग से नहीं हो सकती)। यह (समवाय) द्रव्यादि पाँचों पदार्थों से (सर्वथा भिन्न) स्वतन्त्र पदार्थ ही है; क्योंकि जिस प्रकार सत्तारूप सामान्य या द्रव्यत्वादिरूप सामान्य स्वसदृश (यह सद् है, यह द्रव्य है, यह गुण है इत्यादि) प्रतीतियों के उत्पादक होने के कारण द्रव्यादि अपने आश्रयों से भिन्न हैं, उसी प्रकार न्यायकन्दली युतसिद्धत्वादिति । संयोगो हि युतसिद्धानामेव भवति । अयं त्वयुतसिद्धानामिति । तथा संयोगोऽन्यतरकर्मज उभयकर्मजः संयोगजो वा स्यादिति । इह तु अन्यतरकर्मादीनां निमित्ता- नामभावो भावोत्पादककारणसामर्थ्याद्भवितव्यत् । संयोगस्य विभागान्तत्वं विभागविना- श्यत्वं दृश्यते न समवायस्य । संयोगः स्वतन्त्रयोरपि भवति, यथोर्ध्वावस्थितयोरङ्गुल्योः । अयं त्वधिकरणाधिकर्तव्ययोरेव भवति, तस्मान्नायं संयोगः किन्तु तस्मात् पृथगेव । एवं स्थिते समवाये तस्य द्रव्यादिभ्यो भेदं प्रतिपादयति—स च द्रव्यादिभ्यः पदार्थान्तरमिति । कुत इत्यत आह—भाववल्लक्षणभेदादिति । के कर्म से होगा, अथवा संयोग से ही होगा । तन्तु एवं पट के इस सम्बन्ध के लिए कथित अन्यतर कर्म प्रभृति कारणों में से किसी की भी अपेक्षा नहीं होती है । यह तो अपने आश्रयीभूत पदार्थों के उत्पादक कारणों की सत्ता से स्थिति का लाभ करता है । संयोग का अन्त अर्थात् विनाश विभाग से देखा जाता है; किन्तु समवाय का विनाश ही नहीं होता (अतः संयोग से समवाय गतार्थ नहीं हो सकता) एवं संयोग स्वतन्त्र (आधाराधेयभावानापन्न) वस्तुओं में भी होता है, जैसे कि ऊपर उठी हुई दो अङ्गुलियों में संयोग होता है । समवाय सम्बन्ध आधार और आधेयभूत दो वस्तुओं में ही होता है । तस्मात् समवाय संयोग नहीं है, उससे अलग ही वस्तु है । इस प्रकार संयोग से समवाय की स्वतन्त्र सत्ता के सिद्ध हो जाने पर "स द्रव्यादिभ्यः पदार्थान्तरम्" इस वाक्य के द्वारा समवाय में द्रव्यादि पदार्थों के भेद का उपपादन करते हैं । समवाय द्रव्यादि पदार्थों से भिन्न क्यों है ? इस

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ७७७

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ७७७ प्रशस्तपादभाष्यम् कर्तृत्वात् स्वाश्रयादिभ्यः परस्परतश्चार्थान्तरभावः, तथा समवायस्यापि पञ्चसु पदार्थेष्विहेतिप्रत्ययदर्शनात् तेभ्यः पदार्थान्तरत्वमिति । न च संयोग- वन्नानात्वम्, भाववल्लिङ्गाविशेषाद् विशेषाल्लिङ्गाभावाच्च । तस्माद् भाववत् सर्वत्रैकः समवाय इति । समवाय के अनुयोगी द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य और विशेष इन पाँचों पदार्थों में यथासम्भव 'यह यहाँ है' इस आकार की प्रतीतियाँ होती हैं, अतः समवाय भी द्रव्यादि पाँचों पदार्थों से भिन्न स्वतन्त्र पदार्थ ही है । संयोग की तरह यह (समवाय) अनेक भी नहीं है; क्योंकि जिस प्रकार द्रव्य, गुण और कर्म सभी में 'यह सत् है यह सत् है' इस साधारण आकार की प्रतीति होती है और इसी कारण द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में रहनेवाला 'सत्ता' नाम का सामान्य एक ही है; उसी प्रकार द्रव्यादि अपने अनुयोगियों में अपने प्रतियोगियों का 'यह यहाँ है' इस एक प्रकार की न्यायकन्दली एतद् विवृणोति-यथेति । भाव इति सत्तासामान्यमुच्यते । द्रव्यादीत्यादि- पदेन गुणत्वादिपरिग्रहः । यथा भावस्य स्वाधारेषु द्रव्यगुणकर्मसु आत्मानुरूपः प्रत्ययः सत्स्रदिति प्रत्ययः, द्रव्यत्वस्य स्वाश्रयेषु द्रव्येष्वात्मानुरूपः प्रत्ययः, द्रव्यं द्रव्यमिति प्रत्ययः, गुणत्वस्य स्वाश्रयेषु गुणेष्वत्मानुरूपः प्रत्ययो गुण इति प्रत्ययः, कर्मत्वस्य स्वाश्रयेषु कर्मसु आत्मानुरूपः प्रत्ययः कर्मेति प्रश्न का उत्तर "भाववल्लक्षणभेदात्" इस सन्दर्भ के द्वारा दिया गया है । इस सन्दर्भ के 'भावस्य' इस पद का 'भाव' शब्द सत्तारूप जाति का बोधक है । एवं 'द्रव्यत्वादि' पद में प्रयुक्त 'आदि' शब्द से गुणत्वादि जातियों का संग्रह समझना चाहिए । (तदनुसार उक्त सन्दर्भ का यह अभिप्राय है कि) सत्तारूप जाति का स्वाधार में अर्थात् द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में आत्मानुरूप प्रत्यय अर्थात् द्रव्य सत् है, गुण सत् है, कर्म सत् है इत्यादि आकार के ज्ञान होते हैं, एवं द्रव्यत्व का अपने आश्रय में अर्थात् सभी द्रव्यों में 'इदं द्रव्यम्' इस आकार की प्रतीति होती है, एवं गुणत्व जाति की 'आत्मानुरूप' प्रतीति अर्थात् सभी गुणों में 'यह गुण है' इस आकार की प्रतीति होती है। एवं कर्मत्व जाति का अपने आश्रय सभी कर्मों में 'आत्मानुरूप- प्रत्यय' अर्थात् 'यह कर्म है' इस आकार की प्रतीति होती है । इन आत्मानुरूप

७७८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् ननु यद्येकः समवायः ? द्रव्यगुणकर्मणां द्रव्यत्वगुण- त्वकर्मत्वादिविशेषणैः सह सम्बन्धैकत्वात् पदार्थसङ्करप्रसङ्ग प्रतीति का कारण होने से समवाय भी एक ही है । एवं समवाय में अवान्तर भेद का ज्ञापक कोई प्रमाण भी उपलब्ध नहीं होता है । अतः अपने सभी अनुयोगियों में रहनेवाला समवाय एक ही है । (प्र.) (यदि अपने सभी अनुयोगियों में रहनेवाला) समवाय एक ही है, तो फिर द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में से प्रत्येक का द्रव्यत्वादि सभी विशेषों के साथ समवाय सम्बन्ध एक ही है, अतः द्रव्यादि में भी 'यह गुण है या कर्म है' इस प्रकार के अनियमित व्यवहार होने लगेंगे । न्यायकन्दली प्रत्ययः, तस्य कर्तृत्वाद् भावद्रव्यत्वादीनां स्वाश्रयादिभ्यः परस्परतश्चार्थान्तर- भावः, तथा समवायस्यापि पञ्चसु पदार्थेष्विहेति प्रत्ययदर्शनात्, तेभ्यः पञ्चभ्यः पदार्थान्तरत्वम् । किमथमेक आहोस्विदनेक इत्याह-न च संयोगवन्नानात्वमिति । यथा संयोगो नाना नैवं समवायः । कुत इत्याह-भाववल्लिङ्गाविशेषाद् विशेषलिङ्गाभावाच्च । यथा सत्सदिति ज्ञानस्य लक्षणस्य सर्वत्राविशेषाद्वैल- क्षण्याद् विशेषे भेदे लक्षणस्य प्रमाणस्याभावाच्च सर्वत्रैको भावः, तद्वदिहेति- प्रत्ययों का कर्त्तारूप कारण होने से जिस प्रकार सत्ता और द्रव्यत्वादि जातियों में से प्रत्येक में परस्पर एक-दूसरे से भेद की सिद्धि होती है एवं उनके द्रव्यादि आश्रय से भी उन जातियों में भेद की प्रतीति होती है, उसी प्रकार समवाय भी द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य और विशेष इन पाँच पदार्थों में 'इह प्रत्यय' का कर्त्ता- रूप कारण है, अतः समवाय इन पाँचों पदार्थों से भिन्न पदार्थ है । इस प्रकार से सिद्ध समवायरूप स्वतन्त्र पदार्थ एक है ? या अनेक ? इसी प्रश्न का उत्तर "न च संयोगवन्नानात्वम्" इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् संयोग की तरह समवाय अनेक नहीं है । क्यों अनेक नहीं है ? इस प्रश्न का उत्तर "भाववल्लिङ्गाविशेषाल्लिङ्गाभावाच्च" इन दोनों वाक्यों से दिया गया है । अर्थात् द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में 'सत्' इस आकार का ज्ञानरूप लिङ्ग अर्थात् लक्षण समान रहने से जिस प्रकार तीनों में रहनेवाली एक ही सत्ता जाति की सिद्धि होती है । एवं उन तीनों में रहनेवाली सत्ता जाति में परस्पर भेद के साधक किसी प्रमाण के उपलब्ध न होने से समझते हैं कि सत्ता जाति सर्वत्र एक ही है । उसी प्रकार द्रव्यादि पाँचों पदार्थों में कथित 'इह प्रत्यय' रूप लक्षण समान रूप से है एवं प्रत्येक में रहनेवाले समवाय में परस्पर भेद का साधक कोई प्रमाण भी उपलब्ध नहीं है । अतः समझते हैं कि अपने

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७७९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७७९ प्रशस्तपादभाष्यम् इति । न, आधाराधेयनियमात् । यद्यप्येकः समवायः सर्वत्र स्वतन्त्रः, तथाप्याधाराधेयनियमोऽस्ति । कथं द्रव्येष्वेव द्रव्यत्वम्, गुणेष्वेव (उ.) समवाय को एक मान लेने पर भी पदार्थों का उक्त साङ्कर्य नहीं होगा (क्योंकि एक ही समवाय सम्बन्ध से) कौन किसका आधार है और कौन किसका आधेय है ? ये दोनों नियमित हैं । विशदार्थ यह है कि द्रव्यादि सभी अनुयोगियों में यद्यपि एक ही समवाय स्वतन्त्र रूप से है, फिर भी इस सम्बन्ध से आधेय और आधार नियमित हैं । (प्र.) सभी में न्यायकन्दली प्रत्ययस्य लक्षणस्य सर्वत्रावैलक्षण्याद् भेदे प्रमाणाभावाच्च सर्वत्रैकः समवाय इति । उपसंहरति-तस्मादिति । चोदयति-यद्येक इति । समवायस्यैकत्वे य एव द्रव्यत्वस्य पृथिव्यादिषु योगः, स एव गुणत्वस्य गुणेषु, कर्मत्वस्य च कर्मसु । तत्र यथा द्रव्यत्वस्य योगः पृथिव्यादिष्वस्तीति तेषां द्रव्यत्वम्, तथा तद्योगस्य गुणादिष्वपि सम्भवात् तेषामपि द्रव्यत्वम् । यथा च गुणत्वस्य योगो रूपादिष्वस्तीति रूपादीनां तथा, तद्योगस्य द्रव्यकर्मणोरपि भावात् तयोरपि गुणत्वं स्यात् । एवं च कर्मस्वपि पदार्थानां सङ्कीर्णता दर्शयितव्या । समाधत्ते-नेति । न च पदार्थानां सङ्कीर्णता, कुतः ? आधाराधेयनियमात् । न समवायसद्भावमात्रेण द्रव्यत्वम्, सभी अनुयोगियों में रहनेवाला समवाय एक ही है । 'तस्मात्' इत्यादि वाक्य के द्वारा इसी प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । 'यद्येकः' इत्यादि वाक्यों के द्वारा एक ही समवाय के मानने पर यह आक्षेप किया गया है कि यदि समवाय एक ही है तो यह मानना पड़ेगा कि पृथिवी प्रभृति द्रव्यों में द्रव्यत्व का जो समवाय है, वही समवाय गुणों में गुणत्व का भी है । एवं कर्मों में कर्मत्व का भी है । ऐसी स्थिति में जिस प्रकार पृथिव्यादि में द्रव्यत्व के समवायरूप सम्बन्ध (योग) के कारण (पृथिव्यादि में) द्रव्यत्व की सत्ता रहती है, उसी प्रकार गुणादि में भी द्रव्यत्व का समवायरूप योग के कारण गुणादि में भी द्रव्यत्व की सत्ता माननी पड़ेगी । एवं जैसे कि रूपादि में गुणत्व के समवायरूप योग के कारण गुणत्व की सत्ता रहती है, उसी प्रकार द्रव्य में और कर्म में भी गुणत्व की सत्ता माननी पड़ेगी; क्योंकि उनमें भी गुणत्व का समवाय है । इसी प्रकार कर्मादि पदार्थों में भी द्रव्यत्व, कर्मत्वादि का साङ्कर्य दिखलाया जा सकता है । 'न' इत्यादि से इसी आक्षेप का समाधान करते हैं । अर्थात् समवाय को एक मानने पर भी पदार्थों का उक्त साङ्कर्य दोष नहीं है, क्योंकि (समवाय एक होने पर भी) उसका आधाराधेयभाव नियमित है ।

७८० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् गुणत्वम्, कर्मस्वेव कर्मत्वमिति । एवमादि कस्मात् ? अन्वयव्यतिरेक- दर्शनात् । इहेति समवायनिमित्तस्य ज्ञानस्यानन्यदर्शनात् सर्वत्रैकः समवाय इति गम्यते । द्रव्यादिनिमित्तानां व्यतिरेकदर्शनात् समवाय के एक होने पर नियम (क्यों कर है?) यतः द्रव्यों में ही द्रव्यत्व है (गुणादि में नहीं), गुणों में ही गुणत्व है एवं कर्मों में ही कर्मत्व है । (प्र.) इस प्रकार का अवधारण किस हेतु से सिद्ध होता है? (उ.) प्रतीतियों के अन्वय और व्यतिरेक से ही उसकी सिद्धि होती है । (विशदार्थ यह है कि) 'द्रव्यादि सभी अनुयोगियों में एक ही समवाय है' इसका हेतु है सभी अनुयोगियों में 'यह यहाँ है' इस एक प्रकार की आकार की प्रतीतियों की सत्ता या अन्वय, इस अन्वय से ही समझते हैं कि समवाय अपने सभी आश्रयों में एक ही है । एवं 'गुणादि में द्रव्यत्व है' इस प्रकार की प्रतीतियों के अभावरूप व्यतिरेक से भी समझते हैं कि द्रव्यादि न्यायकन्दली किन्तु द्रव्यसमवायाद् द्रव्यत्वम्, समवायश्च द्रव्य एव न गुणकर्मसु, अतो न तेषां द्रव्यत्वम् । एवं गुणकर्मस्वपि व्याख्येयम् । एतत्संग्रहवाक्यं विवृणोति-यद्यप्येकः समवाय इत्यादिना । स्वतन्त्रः संयोगवत् सम्बन्धान्तरेण न वर्तत इत्यर्थः । व्यक्तमपरम् । पुनश्चोदयति-एवमादि कस्मादिति । द्रव्येष्वेव द्रव्यत्वं वर्तते, गुणेष्वेव गुणत्वम्, कर्मस्वेव कर्मत्वमित्येवमादि कस्मात् त्वया ज्ञातमित्यर्थः । गुणादि में द्रव्यत्व के समवाय के रहने से ही द्रव्यत्व की सत्ता नहीं मानी जा सकती; क्योंकि (द्रव्यत्व की सत्ता का नियामक) द्रव्यानुयोगिक समवाय है, केवल समवाय नहीं । (अतः गुणादि में केवल समवाय के रहने पर भी द्रव्यानुयोगिकत्व- विशिष्ट समवाय के न रहने के कारण गुणादि में द्रव्यत्व की आपत्ति नहीं दी जा सकती) इसी प्रकार द्रव्य में गुणकर्मादि के और कर्म में गुणद्रव्यादि के दिये गये साङ्कर्य दोष का भी परिहार करना चाहिए । "यद्यप्येकः समवायः" इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा उक्त अर्थ के बोधक (यद्येकः समवाय इत्यादि) संक्षिप्त वाक्य का ही विवरण दिया गया है । समवाय 'स्वतन्त्र' है अर्थात् संयोग की तरह किसी दूसरे सम्बन्ध के द्वारा अपने आश्रय में नहीं रहता है (वह अपने स्वरूप से ही द्रव्यादि आश्रयों में रहता है) । (उक्त त्र्यपद वर्णनारूप भाष्य के) और अंश स्पष्ट हैं । 'एवमादि कस्मात्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी प्रसङ्ग में पुनः आक्षेप करते हैं । अर्थात् किस हेतु से तुमने ये सब बातें समझीं कि द्रव्यत्व द्रव्यों में ही रहता है, गुणत्व गुणों में ही रहता है एवं

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७८१

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७८१ प्रशस्तपादभाष्यम् प्रतिनियमो ज्ञायते । यथा कुण्डदध्नोः संयोगैकत्वे भवत्याश्रयाश्रयिभाव- नियमः । तथा द्रव्यादीनामपि समवायैकत्वेऽपि व्यङ्ग्यव्यञ्जकशक्तिभेदादाधा- राधेयनियम इति । समवाय सम्बन्ध से अपने द्रव्यादि आश्रयों में ही हैं, गुणादि में नहीं । जिस प्रकार कुण्ड और दधि दोनों में एक ही संयोग के रहते हुए भी आधार कुण्ड ही होता है दधि नहीं एवं आधेय दधि ही होता है कुण्ड नहीं, उसी प्रकार द्रव्यत्वादि सभी (समवेत) वस्तुओं का समवाय एक होने पर भी कथित संयोग की तरह अभिव्यक्त करनेवाले एवं अभिव्यक्त होनेवाले की विभिन्न शक्ति के कारण प्रत्येक समवेत वस्तुओं का आधार-आधेय भाव नियमित होता है । न्यायकन्दली उत्तरमाह-अन्वयव्यतिरेकदर्शनादिति । द्रव्यत्वनिमित्तस्य प्रत्ययस्य द्रव्येष्वन्वयो गुणकर्मभ्य- श्च व्यतिरेकः, गुणत्वनिमित्तस्य प्रत्ययस्य गुणेष्वन्वयो द्रव्यकर्मभ्यश्च व्यतिरेकः, तथा कर्मत्वनिमित्तस्य प्रत्ययस्य कर्मस्वन्वयो द्रव्यगुणेष्वञ्च व्यतिरेको दृश्यते, तस्मादन्वयव्यतिरेक- दर्शनाद् द्रव्यत्वादिनां नियमो ज्ञायते । अस्य विवरणं सुगमम् । समवायाविशेषे कुत एवायं नियमो द्रव्यत्वस्य पृथिव्यादिष्वेव समवायो गुणत्वस्य रूपादिष्वेव कर्मत्वस्योत्क्षेपणा- दिष्वेव, नान्यत्र ? इत्यत आह-यथेति । संयोगैकत्वेऽपि कुण्डदध्नोराश्रयाश्रयि- कर्मत्व क्रियाओं में ही रहता है । 'अन्वयव्यतिरेकदर्शनात्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी प्रश्न का उत्तर दिया गया है । अभिप्राय यह है कि द्रव्यत्व के द्वारा उत्पन्न (द्रव्यत्वविषयक) प्रत्यय का 'अन्वय' (विशेष्यता सम्बन्ध से) द्रव्यों में ही देखा जाता है एवं द्रव्यत्व के उक्त प्रत्यय का 'व्यतिरेक' भी गुणकर्मादि में देखा जाता है । इसी प्रकार गुणत्वजनित (गुणत्वविषयक) प्रतीति का अन्वय गुणों में ही देखा जाता है और द्रव्यकर्मादि में गुणत्वविषयक उक्त प्रतीति का व्यतिरेक भी देखा जाता है एवं कर्मत्व से होनेवाली (कर्मत्वविषयक) प्रतीति का अन्वय कर्मों में ही देखा जाता है और उक्त प्रतीति का व्यतिरेक भी द्रव्यगुणादि में देखा जाता है । इन अन्वयों और व्यतिरेकों के दर्शन से समझते हैं कि द्रव्यादि तत्तत् आश्रयों में ही समवाय सम्बन्ध से द्रव्यत्वादि नियमित हैं । इसका ('इहेति समवायनिमित्तस्य' इत्यादि स्वपदवर्णन रूप भाष्य का) अभिप्राय समझना सुगम है । द्रव्यत्वादि सभी जातियों में यदि समवाय एक ही है तो फिर यह नियम किस प्रकार उपपन्न होगा कि द्रव्यत्व का समवाय पृथिव्यादि द्रव्यों में ही रहे एवं गुणत्व का समवाय रूपादि गुणों में ही रहे एवं कर्मत्व का समवाय उत्क्षेपणादि कर्मों में ही रहे, पृथिव्यादि से अन्यत्र द्रव्यत्व का समवाय न रहे एवं गुणत्व

७८२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् सम्बन्ध्यनित्यत्वेऽपि न संयोगवदनित्यत्वं भाववद- कारणत्वात् । यथा प्रमाणतः कारणानुपलब्धेर्नित्यो भाव इत्युक्तं तथा समवायोऽपीति । न ह्यस्य किञ्चित् कारणं प्रमाणत उप- प्रतियोगियों और अनुयोगियों के अनित्य होने पर भी संयोग की तरह समवाय अनित्य नहीं है; क्योंकि सत्ता जाति की तरह उसके भी कारण नहीं दीखते हैं । (विशदार्थ यह है कि) जिस प्रकार किसी भी प्रमाण से कारणों की उपलब्धि न होने से सत्ता जाति में नित्यत्व का व्यवहार न्यायकन्दली भावस्य नियमो दृष्टः, शक्तिनियमात् । कुण्डमेवाश्रयो दध्येवाश्रयि । एवं समवायैकत्वेऽपि द्रव्यादीनामाधाराधेयनियमो व्यङ्ग्यव्यञ्जकशक्तिभेदात् । किमुक्तं स्यात् ? द्रव्याभिव्यञ्जिका शक्तिर्द्रव्याणामेव, तेन द्रव्येष्वेव द्रव्यत्वं समवैति, नान्यत्रेति । एवं गुणकर्मस्वपि व्याख्येयम् । किं पुनरयमनित्य आहोस्विन्नित्यः ? इति संशये सत्याह-सम्बन्ध्यनित्यत्वेऽपीति । यथा सम्बन्धिनोरनित्यत्वे संयोगस्यानित्यत्वम्, न तथा समवायिनोरनित्यत्वे समवायस्या- नित्यत्वं भाववदकारणत्वादिति । एतद् विवृणोति- यथेत्यादिना । का समवाय रूपादि से अन्यत्र न रहे और कर्मत्व का समवाय उत्क्षेपणादि से भिन्न वस्तुओं में न रहे । इन्हीं प्रश्नों का समाधान 'यथा' इत्यादि से किया गया है । अर्थात् मटका और दही दोनों में संयोग बराबर है, फिर भी मटका ही दही का आश्रय कहलाता है एवं दही आधेय ही कहलाता है । इस सार्वजनिक प्रतीति से जिस प्रकार उक्त एक ही संयोग से मटके में आश्रयत्व व्यवहार को उत्पन्न करने की एक शक्ति और दही में आधेयत्व व्यवहार की उससे भिन्न शक्ति की कल्पना की जाती है । उसी प्रकार द्रव्यत्वादि सभी जातियों में यद्यपि एक ही समवाय है, फिर भी पृथिव्यादि में ही द्रव्यत्व की अभिव्यक्ति होती है, अन्यत्र नहीं । अतः पृथिव्यादि में ही द्रव्यत्व को अभिव्यक्त करने की शक्ति माननी पड़ती है एवं पृथिव्यादि में द्रव्यत्व ही अभिव्यक्त होता है, अतः पृथिव्यादि में ही अभिव्यक्त होने की शक्ति की कल्पना द्रव्यत्व में ही करनी पड़ती है । एवं गुणत्व की अभिव्यक्ति रूपादि में ही होती है, अतः गुणत्व को अभिव्यक्त करने की शक्ति रूपादि में ही माननी पड़ती है, अन्यत्र नहीं । एवं रूपादि में ही गुणत्व अभिव्यक्त होता है, अतः रूपादि में अभिव्यक्ति होने की शक्ति की कल्पना गुणत्व में करनी पड़ती है, अन्य जातियों में नहीं । उपर्युक्त भाष्य की इस प्रकार से व्याख्या करनी चाहिए ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७८३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७८३ प्रशस्तपादभाष्यम् लभ्यत इति । कया पुनर्वृत्त्या द्रव्यादिषु समवायो वर्तते ? न संयोगः सम्भवति, तस्य गुणत्वेन द्रव्याश्रितत्वात् । नापि समवायः, तस्यैकत्वात् । न चान्या वृत्तिरस्तीति ? न, तादात्म्यात् । होता है, उसी प्रकार समवाय में भी समझना चाहिए । (प्र.) समवाय कौन से सम्बन्ध से अपने अनुयोगी में रहता है ? अपने आश्रय के साथ संयोग सम्बन्ध तो उसका हो नहीं सकता; क्योंकि संयोग गुण है, अतः संयोग केवल द्रव्यों में ही रह सकता है । समवाय सम्बन्ध से भी समवाय नहीं रह सकता; क्योंकि समवाय एक है, संयोग और समवाय को छोड़कर कोई तीसरा सम्बन्ध नहीं है (अतः समवाय है ही नहीं) । (उ.) ऐसी बात नहीं है; क्योंकि समवाय स्वरूप (तादात्म्य) सम्बन्ध से ही न्यायकन्दली युक्तो हि सम्बन्धिविनाशे संयोगस्य विनाशः, तदुत्पादे सम्बन्धिनोः समवायि- कारणत्वात् । समवायस्य तु सम्बन्धिनौ न कारणम्, सम्बन्धिमात्रत्वात् । यथा न कारणं तथोपपादितम् । तस्मादेतस्य सम्बन्धिविनाशेऽप्यविनाशः, सत्तावदाश्रयान्तरेऽपि प्रत्यभिज्ञेय- मानत्वात् । किमसम्बद्ध एव समवायः सम्बन्धिनौ सम्बन्धयति ? सम्बद्धो वा ? यह समवाय नित्य है ? अथवा अनित्य ? इस संशय के उपस्थित होने पर (उसकी निवृत्ति के लिए) 'सम्बन्धिनित्यत्वेऽपि' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् जिस प्रकार संयोग के सम्बन्धियों (अनुयोगी और प्रतियोगी) के अनित्य होने पर संयोग भी अनित्य होता है, उसी प्रकार सम्बन्धियों के अनित्य होने पर समवाय अनित्य नहीं होता; क्योंकि भाव (सत्ता जाति) की तरह समवाय का भी कोई उत्पादक कारण नहीं है । 'यथा' इत्यादि सन्दर्भ से उक्त भाष्य सन्दर्भ की (स्वपदवर्णन रूप) व्याख्या की गयी है । यह ठीक है कि सम्बन्धियों के विनाश से संयोग का विनाश हो; क्योंकि वे ही संयोग के समवायिकारण हैं । समवाय के अनुयोगी और प्रतियोगी तो उसके केवल सम्बन्धी हैं, उसके कारण नहीं (अतः उनके विनाश से समवाय का विनाश संभव नहीं है) । ये समवाय के कारण क्यों नहीं हैं ? इस प्रश्न का उत्तर दे चुके हैं । अतः समवाय के सम्बन्धियों के विनष्ट होने पर भी समवाय का विनाश नहीं होता; क्योंकि जिस प्रकार सत्ता जाति के आश्रय के विनष्ट होने पर भी दूसरे आश्रयों में प्रतीति के कारण सत्ता जाति को अविनाशी मानना पड़ता है, उसी प्रकार समवाय के एक या दोनों आश्रयों के विनष्ट होने पर भी दूसरे सम्बन्धियों में समवाय की प्रतीति होती है, अतः उसे भी अविनाशी मानना आवश्यक है ।

७८४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् यथा द्रव्यगुणकर्मणां सदात्मकस्य भावस्य नान्यः सत्तायोगोऽस्ति । एवमविभागिनो वृत्त्यात्मकस्य समवायस्य नान्या वृत्तिरस्ति, तस्मात् स्वात्मवृत्तिः । अत एवातीन्द्रियः सत्ता- अपने सम्बन्धियों में रहता है । जैसे कि द्रव्य, गुण और कर्म में सत्ता जाति के लिए दूसरे सत्तासम्बन्ध की आवश्यकता नहीं होती है, इसी प्रकार एक ही स्वरूप के एवं सम्बन्धाभिन्न समवाय की सत्ता के लिए दूसरे सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं होती है । अतः यह स्वरूप सम्बन्ध से ही रहता है । यतः प्रत्यक्ष होनेवाले पदार्थों में सत्तादि सामान्यों की तरह कोई अलग सम्बन्ध नहीं है, अतः समवाय का प्रत्यक्ष नहीं होता है । न्यायकन्दली न तावदसम्बद्धस्य सम्बन्धकत्वं युक्तम्, अतिप्रसङ्गात् । सम्बन्धश्चास्य न संयोगरूपः सम्भवति, तस्य द्रव्याश्रितत्वात् । नापि समवायः, एकत्वात् । न च संयोगसमवायाभ्यां वृत्त्यन्तरमस्ति । तत् कथमस्य वृत्तिरित्यत आह- कया पुनर्वृत्त्या द्रव्यादिषु समवायो वर्तत इति । वृत्त्यभावान्न वर्तत इत्य- भिप्रायः । समाधत्ते-नेति । वृत्त्यभावान्न वर्तत इत्येतन्न, तादात्म्याद् वृत्त्यात्मकत्वात् 'कया पुनर्वृत्त्या' इत्यादि ग्रन्थ से आक्षेप करते हैं कि क्या समवाय अपने सम्बन्धियों में किसी दूसरे सम्बन्ध से न रहकर ही अपने दोनों सम्बन्धियों को परस्पर सम्बद्ध करता है ? अथवा अपने सम्बन्धियों में किसी अन्य सम्बन्ध से रहकर ही (संयोग की तरह) अपने सम्बन्धियों को सम्बद्ध करता है ? इन दोनों में 'सम्बन्धियों में न रहकर ही उन्हें परस्पर सम्बद्ध करता है' यह पहला पक्ष अति प्रसङ्ग के कारण (अर्थात् पट और तन्तु की तरह कपास और पट एवं तन्तु और पट भी परस्पर सम्बद्ध हों, इस आपत्ति के कारण असङ्गत है) क्योंकि सर्वत्र समवाय की असत्ता समान है । समवाय का अपने सम्बन्धियों में रहने के लिए संयोग सम्बन्ध उपयोगी नहीं हो सकता; क्योंकि संयोग द्रव्यों में ही हो सकता है । समवाय भी उसके लिए पर्याप्त नहीं है; क्योंकि समवाय एक ही है । सम्बन्ध को (सम्बन्धियों से भिन्न होना चाहिए, अतः एक ही समवाय सम्बन्ध और उसका प्रतियोगी दोनों नहीं हो सकता)संयोग और समवाय को छोड़कर दूसरी कोई 'वृत्ति' (सम्बन्ध)नहीं है, तो फिर कौन-सी 'वृत्ति' से समवाय की सत्ता द्रव्यादि में रहती है ? अर्थात् समवाय को रहने के लिए जब किसी सम्बन्ध की सम्भावना नहीं है, तो समवाय है ही नहीं । (पूर्वपक्षी से) 'पर' अर्थात् सिद्धान्ती उक्त आक्षेप का समाधान 'न' इत्यादि सन्दर्भ से करते हैं । अर्थात् द्रव्यादि में समवाय के रहने के लिए किसी सम्बन्ध की सम्भावना

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७८५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७८५ प्रशस्तपादभाष्यम् दीनामिव प्रत्यशेषु वृत्त्यभावात्, स्वात्मगतसंवेदनाभावाच्च । तस्मादिह बुद्धयनुमेयः समवाय इति । ॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये समवायपदार्थः समाप्तः ॥ ● इसके प्रत्यक्ष न होने का यह हेतु भी है कि (संयोगादि की तरह अनुयोगी और प्रतियोगी से भिन्न रूप में इसका) भान नहीं होता है । तस्मात् 'यह यहीं है' इस कथित प्रतीति से समवाय का अनुमान ही होता है । ॥ प्रशस्तपादभाष्य में समवाय पदार्थ का निरूपण समाप्त हुआ ॥ ● न्यायकन्दली स्वत एवायं वृत्तिरिति। कृतको हि संयोगस्तस्य वृत्त्यात्मकस्यापि वृत्त्यन्तरमस्ति, कारणसमवा- यस्य कार्यलक्षणत्वात्। समवायस्य वृत्त्यन्तरं नास्ति । तस्मादस्य स्वात्मना स्वरूपेणैव वृत्तिर्न वृत्त्यन्तरेणेत्यर्थः। अत एवातीन्द्रियः सत्तादीनामिव प्रत्यशेषु वृत्त्यभावात् । यथा सत्तादीनां प्रत्यक्षेष्वर्थेषु वृत्तिरस्ति तेन ते संयुक्तसमवायादिन्द्रियेषु गृह्यन्ते, नैवं समवायस्य वृत्तिसम्भवः। अतोऽतीन्द्रियोऽयम्, संयोगसमवायापेक्षस्यैवेन्द्रियस्य भावग्रहणसामर्थ्योपलम्भात् । नहीं है, इससे समवाय द्रव्यादि में नहीं है सो बात नहीं; क्योंकि समवाय में 'सम्बन्ध' का 'तादात्म्य' है, अर्थात् वह स्वयं 'वृत्त्यात्मक' है , फलतः समवाय स्वयं ही सम्बन्ध स्वरूप है । संयोग यतः उत्पत्तिशील वस्तु है, अतः सम्बन्धात्मक होने पर भी उसके रहने के लिए दूसरा सम्बन्ध आवश्यक है; क्योंकि उपादान में समवाय ही कार्य का स्वरूप है, अतः समवायिकारणरूप सम्बन्धियों में संयोग का समवायरूप दूसरा सम्बन्ध न मानें तो संयोग समवाय सम्बन्ध से उत्पन्न होनेवाला कार्य ही नहीं रह जाएगा । समवाय तो नित्य है, उसके लिए दूसरे सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं है । अतः समवाय स्वात्मक सम्बन्ध से ही फलतः स्वरूपसम्बन्ध से ही अपने सम्बन्धियों में रहता है, किसी दूसरे सम्बन्ध से नहीं । "अत एवातीन्द्रियः सत्तादीनामिव प्रत्यशेषु वृत्त्यभावात्" अर्थात् प्रत्यक्ष दीखनेवाले घटादि विषयों के साथ सत्तादि पदार्थों की (स्वभिन्न समवाय नाम की) वृत्ति (सम्बन्ध) है, अतः संयुक्तसमवाय सन्निकर्ष से उनका प्रत्यक्ष होता है । इस प्रकार समवाय का कोई भी स्वभिन्न एवं प्रत्यक्षप्रयोजक सम्बन्ध अपने सम्बन्धियों के साथ नहीं है, अतः समवाय अतीन्द्रिय है; क्योंकि संयोग और समवाय इन दोनों में से किसी एक की सहायता से ही इन्द्रियों में किसी भावपदार्थ को ग्रहण करने का सामर्थ्य है । ( प्र.) यदि समवाय का इन्द्रियों से

७८६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् योगाचारविभूत्या यस्तोषयित्वा महेश्वरम् । चक्रे वैशेषिकं शास्त्रं तस्मै कणभुजे नमः ॥ ॥ इति प्रशस्तपादविरचितं द्रव्यादिषट्पदार्थभाष्यं समाप्तम् ॥ • योग के अभ्यास से उत्पन्न अपनी विभूति के द्वारा उन्होंने महेश्वर को प्रसन्न कर वैशेषिकशास्त्र का निर्माण किया, उन कणाद ऋषि को मैं प्रणाम करता हूँ । ॥ प्रशस्तपाद के द्वारा रचित छः पदार्थों के प्रतिपादक वैशेषिक सूत्रों का यह भाष्य समाप्त हुआ ॥ • न्यायकन्दली यदि समवायविषयमैन्द्रियकं संवेदनमस्ति ? सम्बन्धाभावाभिधानं प्रलापः । अथ नास्ति, तदेव वाच्यमित्याह - स्वात्मगतसंवेदनाभावाच्चेति । यथेन्द्रियेण संयोगप्रतिभासो नैवं समवाय- प्रतिभासः, सम्बन्धिनोः पिण्डीभावोपलम्भात्, अतोऽयमप्रत्यक्षः । उपसंहरति - तस्मादिति । परस्परोपसंश्लेषो भिन्नानां यत्कृतो भवेत् । समवायः स विज्ञेयः स्वातन्त्र्यप्रतिरोधकः ॥ ॥ इति भट्टश्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां समवायपदार्थः समाप्तः ॥ • ज्ञान होता है ? तो फिर यह कहना प्रलाप-सा ही है कि अपने सम्बन्धियों के साथ उसका (प्रत्यक्ष के उपयुक्त) सम्बन्ध नहीं है । (ङ) यदि इन्द्रियों से उसका ज्ञान नहीं होता है, तो फिर यही कहिए कि समवाय अतीन्द्रिय है । (ङ) इसी प्रश्न के उत्तर में "स्वात्मगतसंवेदनाभावाच्च" यह वाक्य लिखा गया है । अर्थात् जिस प्रकार इन्द्रियों से संयोग का ग्रहण होता है, उस प्रकार इन्द्रियों से समवाय का ग्रहण नहीं होता है; क्योंकि उसके दोनों सम्बन्धियों की उपलब्धि ऐक्यबद्ध होकर ही होती है (अर्थात् सम्बन्धियों में समवाय की सत्त्व दशा में सम्बन्धियों की पृथक् से उपलब्धि नहीं होती है; किन्तु सम्बन्ध के प्रत्यक्ष के लिए उसके दोनों सम्बन्धियों का स्वतन्त्र रूप से प्रत्यक्ष होना आवश्यक है, सो प्रकृत में नहीं होता है), अतः समवाय अतीन्द्रिय है । 'तस्मात्' इत्यादि से इसी प्रसङ्ग का उपसंहार किया गया है । अपने सम्बन्धियों के स्वातन्त्र्य को अपहरण करनेवाला वही सम्बन्ध 'समवाय' कहलाता है, जिससे परस्पर भिन्न दो वस्तुओं का परस्पर अतिनैकट्य का सम्पादन हो । ॥ भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रचित और पदार्थ को समझानेवाली न्यायकन्दली टीका का समवायनिरूपण समाप्त हुआ ॥

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७८७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७८७ न्यायकन्दली सुवर्णमयसंस्थानरम्या सर्वोत्तरस्थितिः । सुमेरोः शृङ्गवीथीव टीकेयं न्यायकन्दली ॥ १ ॥ अक्षीणनिजपक्षेषु ख्यापयन्ती गुणानसौ । परप्रसिद्धसिद्धान्तान् दलति न्यायकन्दली ॥ २ ॥ आसीद् दक्षिणराढायां द्विजानां भूरिकर्मणाम् । भूरिसृष्टिरिति ग्रामो भूरिश्रेष्ठिजनाश्रयः ॥ ३ ॥ अम्भोरराशेरिवैतस्माद् बभूव क्षितिचन्द्रमाः । जगदानन्दनाद् वन्द्यो बृहस्पतिरिव द्विजः ॥ ४ ॥ तस्माद् विशुद्धगुणरत्नमहासमुद्रो विद्यालतासमवलम्बनभूरुहोऽभूत् । स्वच्छाययो विविधकीर्तिनदीप्रवाहप्रस्यन्दिनोत्तमबलो बलदेवनामा ॥ ५ ॥ तस्याभूद् भूरियशसो विशुद्धकुलसम्भवा । अब्बोकेत्यर्चितगुणा गुणिनी गृहमेधिनी ॥ ६ ॥ (१) यह 'न्यायकन्दली' टीका सुमेरु के शृङ्गों की पङ्क्तियों की तरह मनोरम है; क्योंकि सुमेरु के शृङ्ग भी सुवर्ण (हिरण्य) के संस्थानों से रचित होने के कारण रमणीय हैं और यह टीका भी सुवर्णों अर्थात् सुन्दर अक्षरों के विन्यास से रचित होने के कारण अतिरमणीय है । सुमेरु का शृङ्ग भी सभी वस्तुओं की अपेक्षा उत्तर दिशा में रहने के कारण 'सर्वोत्तरस्थित' है । यह टीका भी (प्रशस्तपाद- भाष्य की) अन्य टीकाओं से उत्कृष्ट होने के कारण 'सर्वोत्तरस्थित' अर्थात् सर्वातिशायिनी है । (२) इस टीका का नाम 'न्यायकन्दली' इसलिए है कि इसमें कथित न्याय अपने सिद्धान्तों की पूर्ण रक्षा और विरोधी सिद्धान्तों का सम्यक् रूप से 'दलन' करते हैं । (३) राढ़ देश के दक्षिण भाग में 'भूरिसृष्टि' नाम का एक गाँव था, जिसमें अनेक सत्कर्मों के अनुष्ठान करनेवाले ब्राह्मणों का एवं अनेक सेठों का निवास था । (४) इसी गाँव में पृथ्वीतल के चन्द्रमा स्वरूप एवं बृहस्पति के समान (बुद्धिमान्) एक द्विज उत्पन्न हुए, जो समुद्र से उत्पन्न आकाश के चन्द्रमा की तरह विश्व के सभी प्राणियों को सुख देने के कारण सभी के वन्दनीय थे । (५) उन्हीं से अनेक प्रकार के यशों की नदी के सतत गतिशील प्रवाह से प्राप्त उत्कृष्ट बल से युक्त (होने के कारण) अन्वर्थ नाम के निर्मल अन्तःकरणवाले 'बलदेव' उत्पन्न हुए, जो विद्यारूपी लता के आश्रयीभूत वृक्ष के समान एवं विशुद्ध अनेक सद्गुणरूपी रत्नों के (आकर) महासमुद्र के समान थे । (६) अत्यन्त यशस्वी और गुणी उन्हीं (बलदेव) की अत्यन्त कुलीना, गुणानुरागिणी एवं गृहकार्यदक्षा 'अब्बोका' नाम की पत्नी थीं ।

७८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उपसंहार- न्यायकन्दली सच्छायः स्थूलफलदो बहुशाखो द्विजाश्रयः । तस्यां श्रीधर इत्युच्चैरर्थिकल्पद्रुमोऽभवत् ॥ ७ ॥ असौ विद्याविदन्धानामसूत श्रवणोचिताम् । षट्पदार्थहितामेतां रुचिरां न्यायकन्दलीम् ॥ ८ ॥ त्र्यधिकदशोत्तरनवशतशाकाब्दे न्यायकन्दली रचिता । श्रीपाण्डुदासयाचितभट्टश्रीश्रीधरेणेयम् ॥ ९ ॥ ॥ समाप्तेयं पदार्थप्रवेशन्यायकन्दली टीका ॥ ॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥


(७) उन्हीं से 'श्रीधर' उत्पन्न हुए, जो (इन सादृश्यों के कारण) अर्थियों के लिए कल्पवृक्ष के समान थे; क्योंकि कल्पवृक्ष भी अपनी घनी छाया से अर्थियों के ताप को दूर करता है । इनसे भी अर्थियों के अनेक विघ्न-ताप दूर होते थे । कल्पवृक्ष भी बहुत बड़े फल का दाता है, इनसे भी मोक्षरूप महान् (उपदेशादि के द्वारा) फल प्राप्त होता था । कल्पवृक्ष की भी अनेक शाखायें हैं । उनके भी शिष्यप्रशिष्य की अनेक शाखायें थीं । कल्पवृक्ष भी अनेक द्विजों (पक्षियों) का आश्रय है, ये भी अनेक द्विजातियों के आश्रय थे । (८) उन्हीं के द्वारा तत्त्वज्ञान को उत्पन्न करनेवाली और विद्याप्रेमियों के सुनने योग्य यह अतिरमणीय 'न्यायकन्दली' टीका रची गयी । (९) श्रीपाण्डुदास कायस्थ की प्रार्थना (से प्रेरित होकर) भट्ट श्री श्रीधर ने ९१३ शाकाब्द में 'न्यायकन्दली' की रचना की । ॥ षट् पदार्थों के तत्त्वज्ञान को उत्पन्न करनेवाली न्यायकन्दली टीका समाप्त हुई ॥