वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३४१
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३४१ न्यायकन्दली यच्छक्यं शक्तिविषयो योऽर्थः, तस्य करणात् प्रागपि शक्यं सदेव । इतोऽपि सत् कार्यम्, कारणभावात्, कारणस्वभावं कार्यमिति नान्योऽवयवी अवयवेभ्यस्तद्देशत्वात् । यत्तु यस्मादन्यन्न तत्तस्य देशो यथा गौरश्वस्येत्यादिभिः प्रमाणैः प्रतिपादितम्, कारणं च सत्, अतस्तदव्यतिरेकि कार्यमपि सदेवेति । तदेतदुक्तम्- असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात् । शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत् कार्यमिति ॥ अत्रोच्यते, यदि कारणव्यापारात् प्रागपि पटस्तन्तुषु सन्नेव, किमित्युपलब्धिकारणेषु सत्सु सत्यामपि जिज्ञासायां नोपलभ्यते ? अनभिव्यक्तत्वादिति चेत् ? केयमनभिव्यक्तिः ? यद्युप- लब्धेरभावस्तस्यैवानुपपत्तिश्चोदिता कथं तदेवोत्तरम् ? अथोपलब्धियोग्यस्यार्थक्रियानिर्वर्तन- क्षमस्य रूपस्य विरहोऽनभिव्यक्तिः ? तदानीमसत्कार्यवादः, तथाभूतस्य रूपस्य प्रागभावे पश्चाद्भावात् । अथ मतं पटस्य चक्षुरादिवत् कुविन्दादिकारणव्यापारोऽप्युपलब्धिकारणं तस्या- उस कारण से उत्पन्न होनेवाला एवं शक्ति का विषय वह कार्यरूप अर्थ अपने कारण में उत्पत्ति से पहले भी 'सत्' ही है । 'कारणभाव' हेतु से भी यह सिद्ध होता है कि कार्य अपनी उत्पत्ति से पहले भी 'सत्' है । अभिप्राय यह है कि कार्य अपने (उपादान) कारण के स्वभाव का होता है, अतः अवयवों से भिन्न अवयवी नाम की कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है; क्योंकि अपने अवयव ही उसकी उत्पत्ति के देश हैं । जो जिससे भिन्न होता है, वह उसकी उत्पत्ति का देश नहीं होता, जैसे कि गाय का भैंस उत्पत्ति देश नहीं होता । इन प्रमाणों से यह सिद्ध है कि कार्य अपने उपादानों से अभिन्न है । उपादान तो अवश्य ही सत् हैं, अतः उनसे अभिन्न कार्य भी 'सत्' है । (सत्कार्यवाद के साधक इन हेतुओं की ही सूचना 'असदकरणात्' इत्यादि (सां. का. ९) कारिका से दी गई है । (सत्कार्यवाद के साधक इन हेतुओं का खण्डन असत्कार्यवादी वैशेषिकादि) इस प्रकार करते हैं कि कारणों के व्याप्त होने के पहले भी अगर तन्तुओं में पट है तो फिर पट को जानने की इच्छा रहने पर भी एवं पटप्रत्यक्ष के कारणों के रहते हुए भी सूत में पट का प्रत्यक्ष क्यों नहीं होता ? (प्र.) उस समय पट अन- भिव्यक्त रहता है, अतः उस समय उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है । (उ.) यह 'अनभिव्यक्ति' क्या है ? अगर वह उपलब्धि का अभाव ही है, तो फिर पूर्वपक्ष और समाधान दोनों एक ही हो गये । अगर उपलब्ध हो सकनेवाली वस्तु में उस वस्तु से होनेवाले प्रयोजन के सम्पादक रूप का अभाव ही अनभिव्यक्ति है,तो उस समय 'असत्-कार्यंवाद' स्वीकार करना पड़ेगा; क्योंकि पट में पहले से अविद्यमान उसके प्रयोजन सम्पादक रूप की उत्पत्ति हुई है । अगर यह कहें कि (प्र.) जैसे कि चक्षुरादि इन्द्रियाँ पट प्रत्यक्ष के कारण हैं, वैसे ही पट के जुलाहे प्रभृति कारणों का व्यापार भी पट के प्रत्यक्ष का कारण है । इन कारणों के न
३४२ न्यायकदलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग- न्यायकदली भावात् सतोऽप्यनुपलब्धिरिति ? न, कारणव्यापारस्यापि सर्वदा तत्र सम्भवात्, व्यापारोऽपि पूर्वमनभिव्यक्तः सम्प्रति कारणैरभिव्यज्यमानो भावमुपलम्भयतीति चेत् ? अभिव्यक्तिरपि यद्यसती ? कथं तस्याः कारणम् ? सतीति चेद्भावोपलम्भप्रसङ्गस्तदवस्थ एवेति कस्यचिदपूर्वस्य विशेषस्योपजनन मन्तरेण प्रागनुपलब्धस्य पश्चादुपलम्भो दुर्घटः । यच्चोक्तम्- असदशक्यकरणं व्योमकुसुमवदिति, तत्र स्वभावभेदाद् असदेकस्वभावं गगनकुसुमम्, सदसत्स्वभावं तु घटादिकम् ? तत्पूर्वमसत् पश्चात्सद्भवति । कथं सदसतोरेकत्र न विरोध इति चेत् ? कालभेदेन समावेशात् । प्रागुत्पत्तेः पटस्य धर्मिणोऽभावात् कथमसत्त्वं तस्य धर्म इति चेत् ? यादृशो यक्षस्तादृशो बलिः, सत्त्वमसतो धर्मो न स्यादसत्त्वं त्वसत एव युक्तम् । यदसत् पूर्वमासीत् तस्य कथं सत्त्वमिति चेत् ? कारणसामर्थ्यात्, अस्ति स कोऽपि महिमा तुर्यादीनां रहने से ही उत्पत्ति से पहले तन्तुओं में विद्यमान रहने पर भी पट का प्रत्यक्ष नहीं होता है । (उ.) ऐसा आप नहीं कह सकते; क्योंकि आपके मत से सभी कार्य उत्पत्ति से पहले भी सत् हैं, अतः जुलाहे प्रभृति का व्यापार भी सत् है, अतः वे भी सर्वदा रहेंगे ही । (प्र.) कारणों का वह व्यापार भी पहले से अनभिव्यक्त ही रहता है, उन्हीं कारणों से अभिव्यक्त होकर पटादि कार्यों के प्रत्यक्ष में सहायक होता है । (उ.) कारणों की यह अभिव्यक्ति सत् है ? या असत् ? अगर असत् है तो फिर वह उस प्रत्यक्ष का कारण कैसे हो सकती है ? अगर सत् है तो पटादि प्रत्यक्ष की उक्त आपत्ति है ही । अतः किसी अपूर्व विशेष की उत्पत्ति के बिना पहले से अनुपलब्ध वस्तु की पीछे उपलब्धि सम्भव नहीं है । यह जो आपने कहा कि 'आकाशकुसुम' की तरह असत् वस्तु का उत्पादन असम्भव है, यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि वस्तु भिन्न-भिन्न स्वभाव की होती है । आकाश-कुसुम का केवल 'असत्त्व' ही स्वभाव है । घटादि वस्तुओं के सत्त्व और असत्त्व दोनों ही स्वभाव हैं । वे पहले असत् रहते हैं, पीछे से सत् हो जाते हैं । (प्र.) एक आश्रय में सत्त्व और असत्त्व दोनों में विरोध क्यों नहीं होता है ? (उ.) (यद्यपि वे दोनों एक ही समय एक आश्रय में नहीं रह सकते फिर भी) कालभेद से वे दोनों एक आश्रय में रह सकते हैं । (प्र.) उत्पत्ति से पहले तो पटरूप धर्मी ही नहीं है, फिर असत्त्व उसका धर्म किस प्रकार होगा ? (उ.) 'जैसा देवता वैसा ही उसका भोग' (इस न्याय से) असत् वस्तुओं का सत्त्व धर्म तो होगा नहीं, अतः यही ठीक है कि असत्त्व ही उसका धर्म है । (प्र.) जो पहले असत् रहा कभी भी सत्त्व उसका धर्म कैसे हो सकता है ? (उ.) कारणों के सामर्थ्य से (असत् वस्तुओं का भी सत्त्व धर्म हो सकता है) तुरीवेमादि कारणों की ही यह अपूर्व महिमा है कि जब ये मिलकर काम
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३४३
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३४३ न्यायकन्दली यदेतेषु सम्भूय व्याप्रियमाणेष्वसन्नेव पटः सम्भवति । असतोऽसम्बद्धस्य जन्यत्वेऽति- प्रसक्तिरिति चेन्नैतत्, तन्तुजातीयस्य पटजातीय एव सामर्थ्यात् । कुत एतत् ? त्वत्पक्षेऽपि कुत एतत् ? तन्तुष्वेव पटात्मता, न सर्वत्रेति ? वस्तुस्वभावादिति चेत् ? सैवात्रापि भविष्यति । अत एव चोपादाननियमः, अन्वयव्यतिरेकाभ्यां तज्जातीयनियमने तज्जा- तीयस्य शक्त्यवधारणात् । यत् पुनरेतत् कार्यकारणयोरव्यतिरेकात् कारणावस्थानादेव कार्यस्याप्यवस्थानमिति, तदसिद्धमसिद्धेन साधितम्, कार्यकारणयोः स्वरूपशक्तिसंस्थान- भेदस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात् । प्रधानात्मकविश्वस्यातीन्द्रियत्वप्रसङ्गाच्च । तद्देशत्वं तु तदाश्रितत्वमात्रनिबन्धनमेवेत्यलं बुद्धेस्थितिनिर्बन्धेन । एतत् तु विमृश्यतां केयं शक्तिरिति ? अतीन्द्रिया काचिदित्यार्याः । तदयुक्तम्, तस्याः सद्भावे प्रमाणाभावात् । अथ मन्यसे यथाभूतादेव करते हैं, तब पहले से असत् होने पर भी पट सत् हो जाता है । (प्र.) पहले से बिलकुल असत् एवं कारणों के साथ बिलकुल असम्बद्ध कार्य की अगर उत्पत्ति मानें तो 'अतिप्रसक्ति' (अर्थात् कपालादि कारणों से भी पट की उत्पत्ति) होगी । (उ.) (यह अतिप्रसङ्ग) नहीं होगा; क्योंकि तन्तुजातीय वस्तुओं में पट जाति की वस्तुओं के उत्पादन का ही सामर्थ्य है । (प्र.) यही क्यों है ? (उ.) (इसके उत्तर में हम भी पूछ सकते हैं कि) तन्तु ही पटस्वरूप क्यों हैं (कपालादि पटस्वरूप क्यों नहीं हैं), अगर इसका आप यह उत्तर दें कि (प्र.) यह इसका स्वभाव है ? (उ.) तो फिर यही उत्तर मेरे लिए भी होगा । अतएव यह नियम भी ठीक बैठता है कि 'अमुक वस्तु ही अमुक वस्तु का उपादान है'; क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक से तज्जातीय (पटादिजातीय) वस्तुओं के उत्पादन की शक्ति तज्जातीय (तन्त्वादिजातीय) वस्तुओं में ही निश्चित है । आपने जो यह कहा कि 'कार्य और कारण अभिन्न हैं, अतः कारण अगर सत् हो तो फिर उससे अभिन्न कार्य भी सत् ही है' यह तो असिद्ध (हेतु) से ही असिद्ध का साधन करना है (कारण और कार्य का अभेद ही सिद्ध नहीं है); क्योंकि कार्य और कारण दोनों के स्वरूप (आकार), शक्ति और विन्यास सभी में विभिन्नता देखी जाती है । अगर पूरा संसार ही प्रकृति से अभिन्न हो तो फिर पूरा संसार ही अतीन्द्रिय होगा । कार्य में जो उपादान का अन्वय देखा जाता है, उसका मूल तो इतना ही है कि वही कार्य का आश्रय है (और कारण नहीं) । यह विचारिये कि यह 'शक्ति' क्या वस्तु है ? आर्यों (मीमांसकों) का कहना है कि 'शक्ति एक अतीन्द्रिय स्वतन्त्र पदार्थ है'; किन्तु उनका यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि उसकी सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है । अगर आप (मीमांसक) यह मानते हों
३४४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग- न्यायकन्दली वन्हेर्दाहोत्पत्तिरवगता तथाभूतादेव मन्त्रौषधिसन्निधाने सति न दृश्यते, यदि दृष्टमेव रूपं दाहस्य कारणं स्यात् तस्य सम्भवाद् दाहानुत्पादो न स्यात् । अस्ति च तदनुत्पत्तिः, सेयमदृष्टरूपस्य वैगुण्यं गमयन्ती हुतभुजि शक्तेरतीन्द्रियायाः सत्त्वं कल्पयति, यस्या मन्त्रादिनाभिभवो विनाशो वा क्रियते । यत्र प्रतीकारवशेन पुनः कार्योदयस्तत्राभिभवः, यत्र तु सर्वथैवानुत्पत्तिः कार्यस्य तत्र विनाशः । न चैतद्वाच्यम्, न मन्त्रो वह्निसंयुक्तो नापि तत्समवेतः कथं व्यधिकरणां शक्तिं विनाशयेत्, विनाशयति चेदतिप्रसङ्गः स्यादिति, तद्देशेन प्राप्तत्वात् । यथैवासम्बद्धोऽप्यभिचारो यमुद्दिश्य क्रियते तमेव हिनस्ति, न पुरुषान्तरम्, एवं यामेव व्यक्तिमभिसन्धाय मन्त्रः प्रयुज्यते तस्या एव शक्तिं निरुणद्धि, न सर्वासाम् । नाप्येतदुद्घोषणीयम्-यदि शक्तिर्द्रव्यात्मिका ? कि (प्र.) जिस प्रकार की वह्नि से दाह देखा जाता है, उस प्रकार की ही वह्नि से (दाह के प्रतिरोधक) मन्त्र और औषध का सामीप्य रहने पर दाह की उत्पत्ति नहीं भी होती है, अगर केवल अपने दृष्टस्वरूप से ही वह्नि दाह का कारण हो तो फिर उस रूप से युक्त वह्नि तो मन्त्रादि संनिहित देशों में भी है ही, अतः उन स्थानों में दाह के अनुत्पाद का निर्वाह नहीं होगा । दाह की उक्त उत्पत्ति और अनुत्पत्ति इन दोनों से वह्नि में दाह के प्रयोजक किसी अतीन्द्रिय धर्म की कल्पना अनिवार्य हो जाती है, जो वह्नि में अतीन्द्रिय शक्ति की कल्पना को उत्पन्न करती है । जिस (शक्ति) का मन्त्रादि से अभिभव या विनाश होता है, (अर्थात्) जहाँ फिर से प्रतीकार करने पर दाहादि कार्यों की उत्पत्ति होती है, वहाँ शक्ति के अभिभव की कल्पना करते हैं और मन्त्रादि प्रयोग के बाद जहाँ दाहादि कार्यों की उत्पत्ति फिर कभी नहीं होती, वहाँ शक्ति के विनाश की कल्पना करते हैं । एवं यह भी कहना ठीक नहीं है कि (उ.) वह्नि का मन्त्र के साथ न संयोग सम्बन्ध है, न समवाय, तो फिर विभिन्न अधिकरणों में रहनेवाली शक्ति का नाश वह कैसे करेगा ? अगर मन्त्र से व्यधिकरण ही शक्ति का नाश मानें तो अतिप्रसङ्ग होगा (अर्थात् दाह के प्रतिरोधक मन्त्र से संसार के सभी काम रुक जाएँगे) । (प्र.) यह आक्षेप ठीक नहीं है; क्योंकि शक्ति को नष्ट करने या प्रतिरुद्ध करने के उद्देश्य से ही मन्त्र का प्रयोग किया जाता है । जैसे कि अभिचार (मारण प्रयोग) जिस व्यक्ति को उद्देश्य कर किया जाता है, उस व्यक्ति के साथ सम्बद्ध न रहने पर भी वह उसी व्यक्ति की हत्या करता है । वैसे ही जिस व्यक्ति को मन में रखकर मन्त्र प्रयुक्त होता है, उसी व्यक्ति की शक्ति को वह नष्ट करता है या अभिभूत करता है, सभी व्यक्तियों की शक्ति को नहीं । यह घोषणा भी न करनी चाहिए कि शक्ति अगर द्रव्यरूप है ? तो फिर अपने समवायिकारण या असमवायिकारण के नाश से ही नष्ट होगी (मन्त्रादि प्रयोग
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३४५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३४५ न्यायकन्दली समवाय्यसमवायिकारणयोरन्यतरविनाशाद्विनश्येत् ? अथ गुणानतिरेकिणी ? तदाश्रय- विनाशाद्विरोधिगुणप्रादुर्भावाद्वा विनश्येदिति, समवायस्यानभ्युपगमात् । यस्य यतो विनाशं प्रतीमस्तस्य तमेव विनाशहेतुं ब्रूमो न पुनरमुं त्वत्कृतं समयमभ्युपगच्छामः, प्रतीतिपराहतत्वात् । यदि चावश्यमभ्युपेयस्तदा द्रव्यगुणयोरेव विनाशं प्रत्यभ्युपगम्यतां यत्र परिदृष्टः, शक्तिः पुनरियं सादृश्यवत् पदार्थान्तरं प्रकारान्तरेणापि विनंक्ष्यति । कार्योत्पादानुत्पादाभ्यां यद्यावधिगता शक्तिः कुत एव सर्वभावेषु कल्प्यत इति चेत् ? एकत्र तस्याः कार्योत्पादानुगुणत्वेन कल्पितायाः सर्वत्र तदुत्पत्त्यैवात्रानुमानात् । अत्रोच्यते-न मन्त्रादिसन्निधौ कार्यानुत्पत्तिरदृष्टं रूपमाक्षिपति । यथान्वय- व्यतिरेकाभ्यामवधृतसामर्थ्यो वह्निर्दाहस्य कारणम्, तथा प्रतिबन्धकमन्त्रादि- प्रागभावोऽपि कारणम् । स च मन्त्रादिप्रयोगे सति निवृत्त इति सामग्रीवैगुण्यादेव दाहस्यानुत्पत्तिर्न तु शक्तिर्वैकल्यात् । भावस्य भावरूपकारणनियतत्व- से नहीं) अगर वह गुण स्वरूप है, तो फिर वह आश्रय के नाश से या विरोधी दूसरे गुण की उत्पत्ति से ही नष्ट होगी; क्योंकि हम समवाय नहीं मानते । जिससे जिसके नाश की हमको प्रतीति होती है, उसे ही हम उसके नाश का कारण मानते हैं । तुम्हारे बनाये हुए (द्रव्य का नाश उसके समवायिकारण के नाश से हो या असमवायिकारण के नाश से ही हो, एवं गुण का नाश आश्रय के नाश से या विरोधी गुण की उत्पत्ति से ही हो ) इस नियम को हम नहीं मानते; क्योंकि यह प्रतीति के विरुद्ध है । अगर उक्त सिद्धान्त को मानना आवश्यक ही हो तो द्रव्य और गुण के नाश के लिए ही उसे मानिए, जहाँ कि वह देखा गया है । शक्ति तो सादृश्यादि की तरह दूसरा ही पदार्थ है, अतः वह दूसरे ही प्रकार से नष्ट होगा । (उ.) दाहरूप कार्य की उत्पत्ति और अनुत्पत्ति से वह्नि में जिस प्रकार की शक्ति का निश्चय करते हैं, उस प्रकार की शक्ति की कल्पना सभी भाव पदार्थों में क्यों करते हैं ? (प्र.) एक जगह कार्य की अनुकूलता से जैसी शक्ति की कल्पना करते हैं, दूसरी जगह भी कार्य की उत्पत्ति से ही उसी प्रकार की शक्ति की कल्पना करते हैं । (उ.) इस पूर्वपक्ष के समाधान में कहना है कि मन्त्रादि का सामीप्य रहने पर दाह की अनुत्पत्ति से वह्नि में किसी अदृश्य शक्ति की कल्पना आवश्यक नहीं है; क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक से वह्नि में दाह की कारणता की कल्पना जिस प्रकार करते हैं, उसी प्रकार अन्वय और व्यतिरेक से ही दाह के प्रति मन्त्रादि प्रतिबन्धकों के प्रागभाव में भी कारणता की कल्पना करते हैं । मन्त्रादि का प्रागभावरूप यह कारण मन्त्रादि की सन्निधि रहने पर नहीं रहता है, अतः मन्त्रादि के प्रयोग के स्थल में दाह नहीं होता है । उक्त स्थल में दाह की अनुत्पत्ति शक्ति के
१४६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग- न्यायकन्दली दर्शनादभावकार्यत्वं नास्तीति चेत् ? न, नित्यानां कर्मणामकरणात् प्रत्यवायस्योत्पादात्, अन्यथा नित्यकरणे प्रायश्चित्तानुष्ठानं न स्याद्वैयर्थ्यात् । नित्यानामकरणेऽन्यकरणात् प्रत्यवायो न तु नित्याकरणस्य करणप्रागभावस्य हेतुत्वमिति चेत् ? नित्याकरणस्य तद्भावभावित्यनियतस्य सहायत्वेन व्यापारात् । ननु यदि प्रतिबन्धकस्य प्रयोगे तदभावो निवृत्त इति दाहस्यानुत्पत्तिस्तदा प्रतिबन्धकप्रतिबन्धकेऽपि दाहो न स्यात्, तत्कारणस्य प्रागभावस्य निवृत्तत्वात् । दृश्यते च प्रतिबन्धकस्यापरेण मन्त्रादिना प्रतिबन्धे सति दाहः, तेन नाभावः कारणमित्यवस्थितेयं शक्तिः कारणम् । सा च प्राक्तनेन प्रतिबद्धा द्वितीयेनोत्तम्भितेति कल्पना अवकाशं लभते । तदप्यपेशलम्, दृष्टे सम्भवत्यदृष्टकल्पनानवकाशात् । कदाचित् प्रतिबन्धकमन्त्राद्यभाव- विघटन से नहीं होती है । (प्र.) यह नियमित रूप से देखा जाता है कि भावरूप कारण से ही भावरूप कार्य की उत्पत्ति होती है (अभावरूप कारण से नहीं), अतः अभाव को दाहरूप भाव कार्य का कारण मानना सम्भव नहीं है । (उ.) (भावरूप कारण से ही भाव कार्य की उत्पत्ति) नहीं होती है; क्योंकि नित्य कर्मों के न करने से भी पापों की उत्पत्ति होती है । अगर ऐसी बात न हो तो फिर नित्य कर्म के न करने से प्रायश्चित्त का अनुष्ठान व्यर्थ हो जाएगा । (प्र.) नित्य कर्म के अनुष्ठान के समय उसे न कर दूसरा जो कर्म किया जाता है, उसी से पाप की उत्पत्ति नहीं होती है । (वहाँ) नित्य कर्म के अनुष्ठान के प्रागभाव से पाप की उत्पत्ति नहीं होती है । (उ.) जिस समय नित्य कर्म का अनुष्ठान नहीं होगा, उस समय अवश्य ही किसी दूसरे कर्म का अनुष्ठान होगा, अतः नियत रूप से पहले रहने के कारण दूसरे कर्म का अनुष्ठान उस पाप का केवल सहायक व्यापार ही हो सकता है, कारण नहीं । (प्र.) अगर प्रतिबन्धकीभूत मन्त्रादि के प्रयोग से उक्त मन्त्रादि के प्रागभाव नष्ट हो जाते हैं और इसलिए मन्त्र के प्रयोग के स्थलों में वह्नि से दाह नहीं होता है, तो फिर दाह के प्रतिबन्धक मन्त्र के प्रभाव के प्रतिरोधक दूसरे मन्त्र के रहने पर भी दाह की उत्पत्ति नहीं होगी; क्योंकि उसका कारण प्रतिबन्धक का प्रागभाव तो नष्ट हो गया है; किन्तु दाहादि के प्रतिबन्धक मन्त्र के प्रयोग के रहने पर भी उसके विरोधी मन्त्र के प्रयोग से दाह की उत्पत्ति देखी जाती है, अतः मन्त्र का प्रागभाव दाह का कारण नहीं हो सकता । तस्मात् वह्नि प्रभृति कारणों में दाहादि कार्यों के उत्पादन करने की (एक अतिरिक्त) शक्ति अवश्य है । इससे यह कल्पना भी सुलभ हो जाती है कि पहले (प्रतिरोधक) मन्त्र के प्रयोग से वह शक्ति प्रतिरुद्ध हो जाती है और दूसरे (प्रतिबन्धक के विरोधी) मन्त्र के प्रयोग से फिर से कार्योन्मुख हो जाती है । (उ.) दृष्ट कारणों से ही कार्यों की उत्पत्ति अच्छी प्रकार से हो सकती है, ऐसी स्थिति में अदृष्ट (शक्तिरूप) कारण की कल्पना व्यर्थ है । कभी
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३४७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३४७ प्रशस्तपादभाष्यम् अथ कथंलक्षणः ? कतिविधश्चेति । अप्राप्तयोः प्राप्तिः संयोगः । स च त्रिविधः - अन्यतरकर्मजः, उभयकर्मजः, संयोगजश्च । (प्र.) उसका स्वरूप (लक्षण) क्या है ? एवं वह कितने प्रकार का है ? (उ.) अप्राप्त (परस्पर न मिले हुए दो द्रव्यों की प्राप्ति) मिलन (ही) संयोग है । वह १. अन्यतरकर्मज, २. उभय- कर्मज और ३. संयोगज भेद से तीन प्रकार का है । इसमें (१) न्यायकन्दली सहिता सामग्री कारणम्, कदाचिदु द्वितीयमन्त्रादिसहिता कारणमित्यस्यां कल्पनायां को विरोधः ? यदनुरोधाददृष्टमाश्रीयते । दृष्टो ह्येकपरस्यापि कार्यस्य सामग्रीभेदः, यथा दारुनिर्मथनप्रभवो वह्निः सूर्यकान्तप्रभवश्चेति तर्कसिद्धान्तरहस्यम् । मीमांसासिद्धान्तरहस्यं तत्त्वप्रबोधे कथितमस्माभिः । संयोगः संयुक्तप्रत्ययनिमित्तमित्यवगतं तावत्; किन्त्वस्य स्वरूपं भेदश्च न ज्ञायते तदर्थं परिपृच्छति-अथ कथंलक्षणः कतिविधश्चेति । अथेति प्रश्नोपक्षेपे कथंशब्दः किंशब्दार्थे, यथा को धर्मः कथंलक्षण इति । लक्षणशब्दश्च स्वरूपवचन इति किंस्वरूपः संयोगः ? कतिविधश्चेति कतिप्रकार इत्यर्थः । लक्षणं कथयति-अप्राप्तयोः प्राप्तिः संयोगः । पूर्वमप्राप्तयोर्द्रव्ययोः पश्चाद्या प्रतिबन्धकीभूत मन्त्रादि सहित कारणों का समूह ही कार्य को उत्पन्न करता है एवं कभी द्वितीय (प्रतिबन्धक मन्त्रादि के विरोधी) मन्त्रादि सहित कारणों का समूह ही उसका कारण होता है, इन दोनों कल्पनाओं में कौन-सा विरोध है कि जिसके लिए आप (मीमांसक) अदृष्ट (शक्ति) का अवलम्बन करते हैं । एक तरह के कार्यों की उत्पत्ति अनेक प्रकार के कारणों से देखी जाती है । जैसे कि काठ की रगड़ से भी अग्नि की उत्पत्ति होती है एवं सूर्यकान्तमणि से भी । (शक्ति के विषय में) यही तार्किकों के सिद्धान्त का रहस्य है । (शक्ति पदार्थ की सत्ता के प्रसङ्ग में) मीमांसकों के अभिमत सिद्धान्त के रहस्य का निरूपण मैंने 'तत्त्वप्रबोध' नाम के ग्रन्थ में किया है । यह तो समझा कि 'ये परस्पर संयुक्त हैं' इस आकार की प्रतीति का कारण ही संयोग है ; किन्तु यह तो नहीं समझ सके कि इसका स्वरूप क्या है ? इसके कितने भेद हैं ? यही समझाने के लिए 'अथ कथं लक्षणः ? कतिविधश्च ?' इत्यादि प्रश्न करते हैं । यहाँ 'अथ' शब्द का अर्थ है 'प्रश्न का आरम्भ करना' एवं 'कथम्' शब्द 'किम्' शब्द के स्थान में आया है । जैसे कि (शाबरभाष्य अ.१.पा.१. सू.१ के) 'को धर्मः ? कथं लक्षणः ?' इत्यादि स्थलों में (ये शब्द) प्रयुक्त हुए हैं । प्रकृत में
३४८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग- प्रशस्तपादभाष्यम् तत्रान्यतरकर्मजः क्रियावता निष्क्रियस्य, यथा स्थाणोः श्येनेन, विभूनां च मूर्त्तः। उभयकर्मजो विरुद्धदिक्क्रिययोः सन्निपातः, क्रिया से युक्त द्रव्य के साथ निष्क्रिय द्रव्य का संयोग अन्यतर कर्मज संयोग है, जैसे कि सूखे वृक्ष के साथ बाज पक्षी का संयोग एवं विभु द्रव्यों के साथ मूर्त्त द्रव्यों का संयोग । २. दो विरुद्ध दिशाओं में रहनेवाले क्रियायुक्त दो द्रव्यों का संयोग उभयकर्मज है । जैसे (कि लड़ते हुए) दो पहलवानों का न्यायकन्दली प्राप्तिः परस्परसंश्लेषः स संयोगः । अप्राप्तयोरिति समवायव्यवच्छेदार्थम् । इदानीं तस्य भेदं प्रतिपादयति-स च त्रिविध इति । चशब्दोऽवधारणे-संयोगस्त्रिविध एव । त्रैविध्यमेव दर्शयति-अन्यतरकर्मज इत्या- दिना । द्वयोः संयोगिनोर्मध्ये यदन्यतरद् द्रव्यं तत्र यत्कर्म तस्माज्जातोऽन्यतरकर्मजः । उभयो- र्द्रव्ययोः कर्मणी उभयकर्मणी ताभ्यां जात उभयकर्मजः । संयोगादपि संयोगो जायते । तत्रान्य- तरकर्मजः । तत्र तेषां त्रयाणां मध्ये क्रियावता द्रव्येण निष्क्रियस्य द्रव्यस्य संयोगोऽन्यतर- कर्मजः । अस्योदाहरणम्--यथा स्थाणोः श्येनेन विभूनां च मूर्त्तः । निष्क्रियस्य स्थाणोः 'लक्षण' शब्द का अर्थ है 'स्वरूप', तदनुसार उक्त वाक्यों का यह अभिप्राय है कि संयोग का स्वरूप क्या है ? एवं उसके कितने भेद हैं ? 'अप्राप्तयोः प्राप्तिः संयोगः' इस वाक्य से संयोग का लक्षण (स्वरूप) कहा गया है । पहले से अप्राप्त दो द्रव्यों की बाद में जो 'प्राप्ति' अर्थात् सम्बन्ध (होता है), वही (सम्बन्ध) संयोग है । (इस लक्षण वाक्य में) 'अप्राप्तयोः' यह पद समवाय में अतिव्याप्ति को हटाने के लिए है । 'स च त्रिविधः' इत्यादि से अब इसके भेदों को समझाते हैं । (प्रकृत वाक्य में) 'च' शब्द अवधारण के लिए है । तदनुसार प्रकृत वाक्य का यह अर्थ है कि संयोग तीन ही प्रकार के हैं । 'अन्यतरकर्मजः' इत्यादि से वे तीनों भेद दिखलाये गये हैं । संयोग के दोनों सम्बन्धियों में जो 'अन्यतर' अर्थात् एक द्रव्य है. केवल उसी द्रव्य की क्रिया से उत्पन्न होनेवाले संयोग को अन्यतरकर्मज कहते हैं । 'उभयोः द्रव्ययोः' इत्यादि व्युत्पत्ति के अनुसार 'उभयकर्मज' शब्द का वह संयोग अर्थ है-जिसकी उत्पत्ति संयोग के सम्बन्धी रूप दोनों द्रव्यों की दोनों क्रियाओं से होती है । उसी को 'उभयकर्मज' संयोग कहते हैं । संयोग से भी संयोग की उत्पत्ति होती है (अर्थात् संयोग से उत्पन्न संयोग को ही संयोगज संयोग कहते हैं)। 'तत्रान्यतरकर्मजः' अर्थात् 'तेषां त्रयाणां मध्ये' अर्थात् उन तीनों संयोगों में से क्रिया से युक्त एक द्रव्य के साथ तथा क्रिया से रहित दूसरे द्रव्य के साथ के संयोग को 'अन्यतरकर्मज संयोग' कहते हैं । 'यथा स्थाणोः' इत्यादि वाक्य से अन्यतर-
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३४९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३४९ न्यायकन्दली क्रियावता श्येनेन सह संयोगः श्येनकर्मजः । एवमाकाशादीनां विभूनां निष्क्रियाणां क्रियावद्भिर्मूर्तेस्सर्वगतद्रव्यपरिमाणैर्मूर्तद्रव्यकर्मजः । नन्वेकस्य मन्दं गच्छतोऽपरेण तत्पृष्ठमनुधावतान्तरत्कर्मजः संयोगो दृष्टः कथमुक्तं क्रियावता निष्क्रियस्येति ? सत्यम् । निष्क्रियत्ववाचोयुक्तिस्तु विवक्षितसंयोगहेतुभूतकर्माभिप्रायेणेति मन्तव्यम् । प्रथमं श्येनचरणस्थाणुशिरसोः संयोगः, तदनु स्थाणुश्येनावयविनोः । तत्रावयवयोः संयोगः कर्मजः, अवयविनोस्तु संयोगजः संयोग इति केचित् तदप्यसारम्, सक्रियस्याप्यवयविनः क्रियावत एवायवयवान्तरेण संयोगात् । यदि चैवं नेष्यते, अवयवानामपि स्वावयवापेक्षयावयवित्वेन सर्वत्रावयविषु कर्मजस्य संयोगस्योच्छेदः स्यादिति । तथा सति चावयविनि कर्माभावो कर्मज संयोग का ही उदाहरण कहा गया है, अर्थात् जैसे कि 'स्थाणु' अर्थात् सूखे हुए वृक्ष और श्येन (बाज) पक्षी इन दोनों का संयोग केवल बाज पक्षी की क्रिया से उत्पन्न होने के कारण 'अन्यतरकर्मज' संयोग है, उसी प्रकार विभु अर्थात् क्रिया से रहित आकाशादि द्रव्यों का मूर्त द्रव्यों के साथ अर्थात् क्रिया से युक्त द्रव्यों के साथ जितने भी संयोग उत्पन्न होते हैं, वे सभी मूर्त द्रव्य रूप केवल एक द्रव्य की क्रिया से ही उत्पन्न होने के कारण 'अन्यतरकर्मज' ही हैं । (प्र.) एक आदमी अगर मन्दगति से जा रहा है, दूसरा तीव्र गति से चलकर उससे टकरा जाता है, इन दोनों आदमियों का संयोग भी तो अन्यतरकर्मज ही है, फिर क्रिया से युक्त एक द्रव्य के क्रिया से शून्य दूसरे द्रव्य के साथ होनेवाले संयोग को ही अन्यतरकर्मज कैसे कहते हैं ? (उ.) यह ठीक है (कि अन्यतरकर्मज सभी संयोगों का एक सम्बन्धी नियमतः निष्क्रिय नहीं होता) फिर भी अन्यतरकर्मज संयोग के प्रकृत लक्षण में 'निष्क्रियत्व' का उपादान अन्यतरकर्मज संयोग के कहे हुए दोनों उदाहरणों को ही दृष्टि में रखकर किया गया है (क्योंकि स्थाणु और श्येन का संयोग एवं विभु द्रव्यों का मूर्त द्रव्यों के साथ संयोग इन दोनों उदाहृत संयोगों का एक सम्बन्धी अवश्य ही निष्क्रिय है ) । कोई कहते हैं कि (प्र.) पहले श्येन के पैर और स्थाणु के आगे का भाग इन दोनों अवयवों में संयोग उत्पन्न होता है । उसके बाद श्येनरूप अवयवी और स्थाणु- रूप अवयव इन दोनों अवयवियों में दूसरा संयोग उत्पन्न होता है । इन दोनों में से पहला संयोग ही कर्मज है और दूसरा संयोग संयोगज है । (उ.) किन्तु इस कथन में कुछ सार नहीं है; क्योंकि संयोग के क्रियाशील सम्बन्धी एक अवयवी में क्रिया के रहने से ही दूसरे (निष्क्रिय या सक्रिय) अवयवी के साथ संयोग हो जाता है । अगर ऐसा न मानें तो वे (श्येन के पैर या स्थाणु के अग्रभागादि) अवयव भी तो अपने-अपने अवयवों की अपेक्षा अवयवी हैं ही । इस प्रकार सभी अवयवियों से कर्मज
३५० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग- प्रशस्तपादभाष्यम् यथा मल्लयोर्मेषयोर्वा । संयोगजस्तूत्पन्नमात्रस्य चिरोत्पन्नस्य वा निष्क्रियस्य कारणसंयोगिभिरकारणैः कारणाकारणसंयोगपूर्वकः संयोग, अथवा (लड़ते हुए दो) भेड़ों का संयोग । ३. उत्पन्न होते ही या उत्पन्न होने के बहुत बाद किसी निष्क्रिय द्रव्य का अपने अवयवों के संयोग से युक्त अपने अकारणीभूत द्रव्यों के साथ जो संयोग होता है,वह 'संयोगज- संयोग' है । इस (संयोगजसंयोग) की उत्पत्ति कारण और अकारण के न्यायकन्दली वक्तव्यः, त्यक्तव्यं वावयविकर्मणः संयोगविभागयोरनपेक्षकारणं कर्मेति कर्मलक्षणमिति । दुरक्षरदुर्विदग्धानां युक्तिमाचार्यवचनं चोत्सृजतामन्धानामिव पदे पदे कियत् स्खलितं दर्शयिष्यामः । उभयकर्मजो विरुद्धदिक्क्रिययोः सन्निपातः । याभ्यां दिग्भ्यां द्वयोः परस्पर- मागच्छतोरन्योन्यप्रतीघातो भवति ते विरुद्धे दिशौ, यथा प्राचीप्रतीच्यौ दक्षिणोदीच्याविति । विरुद्धयोर्दिशोः क्रिया ययोर्द्रव्ययोस्ते विरुद्धदिक्क्रिये, तयोः सन्निपात उभयकर्मजः संयोगः, प्रत्येकमन्यत्र द्वयोरपि सामर्थ्यावधारणात् । यथा मल्लयोर्मेषयोर्वेत्युदाहरणम् । संयोगजस्तु संयोग उत्पन्नमात्रस्य चिरोत्पन्नस्य वा निष्क्रियस्य कारणसंयोगिभिरकारणैः कारणाकारणसंयोगपूर्वकः कार्याकार्यगतः । संयोग का ही लोप हो जाएगा । (अन्त में) इससे यही कहना पड़ेगा कि अवयवियों में क्रिया होती ही नहीं है । या फिर अवयवियों में रहनेवाले कर्म के लिए कर्म सामान्य के इस लक्षण को ही छोड़िए कि 'संयोग और विभाग का निरपेक्ष कारण ही कर्म है ।' (फलतः अवयवी में रहनेवाले कर्म के लिए दूसरा लक्षण करिए ।) इस प्रकार आचार्य के वचनों को छोड़नेवाले मूर्खों के पद-पद पर गिरनेवाले अन्धों की तरह कितने स्खलनों को हम दिखलावें ? 'उभयकर्मजो विरुद्धदिक्क्रिययोः सन्निपातः' जिन दो दिशाओं से आते हुए दो व्यक्तियों में संघर्ष हो सके वे दोनों दिशाएँ परस्पर विरुद्ध हैं, जैसे कि पूर्व और पश्चिम एवं दक्षिण और उत्तर । 'विरुद्धयोर्दिशोः क्रिया ययोर्द्रव्ययोस्ते विरुद्ध- दिक्क्रिये,, तयोः सन्निपात उभयकर्मजः संयोगः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार विरुद्ध दो दिशाओं में रहनेवाली क्रियाओं से युक्त दो द्रव्य ही द्विवचनान्त प्रकृत 'विरुद्धदिक्क्रिये' शब्द के अर्थ हैं । इन दोनों द्रव्यों का संयोग ही 'उभयकर्मज' संयोग है; क्योंकि दोनों क्रियाओं में से प्रत्येक में संयोग के उत्पादन का सामर्थ्य और स्थलों में देखा जाता है । 'यथा मल्लयोर्मेषयोर्वा' यह वाक्य उभयकर्मज संयोग के उदाहरण को समझाने के लिए है । 'संयोगजस्तु संयोग उत्पन्नमात्रस्य' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त 'कारण' शब्द से समवायिकारण और 'अकारण'
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५१ प्रशस्तपादभाष्यम् कार्याकार्यगतः संयोगः । स चैकस्माद्द्वाभ्यां बहुभ्यश्च भवति । एकस्मात्तावत् तन्तुवीरणसंयोगाद् द्वितन्तुकवीरणसंयोगः । द्वाभ्यां संयोग से होती है एवं इसकी स्थिति (उस कारण के) कार्य और (उसी कारण के अकार्य) द्रव्यों में रहती है । यह (संयोगजसंयोग) एक संयोग से, दो संयोगों से एवं बहुत से संयोगों से भी उत्पन्न होता है । १. (एक संयोग से इस प्रकार उत्पन्न होता है कि) तन्तु और वीरण (तृणविशेष) के एक ही संयोग से दो तन्तुओं वाले एक पट और वीरण के संयोग की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली कारणशब्देनात्र समवायिकारणमभिमतम्, अकारणशब्देन समवायिकारणादन्यदुच्यते । शेषमुदाहरणे व्यक्तीकरिष्यामः । स चैकस्माद् द्वाभ्यां बहुभ्यश्च भवति । एकस्मात् तन्तुवीरणसंयोगाद् द्वितन्तुक- वीरणसंयोगः । वीरणसंयुक्तस्य तन्तोस्तन्त्वन्तरेण संयोगादुत्पन्नमात्रस्य द्वितन्तुकद्रव्यस्य निष्क्रियस्य समवायिकारणभूतैकतन्तुसंयोगिना वीरणेन संयोगः प्राक्तनात् तन्तुवीरणसंयोगा- देकस्माद्भवति, स चायं कारणाकारणपूर्वसंयोगपूर्वकः कथ्यते, द्वितन्तुकस्य समवायिकारणं तन्तुरकारणं वीरणं तयोः संयोगेन जनितत्वात् । कार्याकार्यगतश्चायं तन्तुकार्ये द्वितन्तुके शब्द से 'समवायिकारण से भिन्न' अभिप्रेत हैं । संयोगजसंयोग की और बातें हम इसके उदाहरण में कहेंगे । "स चैकस्माद् द्वाभ्यां बहुभ्यश्च भवति, एकस्मात्तन्तुवीरणसंयोगाद् द्वितन्तुक- वीरणसंयोगः" अभिप्राय यह है कि जहाँ वीरण (तृणविशेष) के साथ संयुक्त एक तन्तु के दूसरे तन्तु के साथ संयोग से (द्वितन्तुक) पट की उत्पत्ति होती है । इस (द्वितन्तुक) पट का उस वीरण के साथ भी संयोग होता है जो क्रिया से सर्वथा रहित है एवं इस पट के समवायिकारणीभूत तन्तु के साथ संयुक्त है । पट एवं (तन्तुसंयुक्त) वीरण का यह संयोग (कथित) तन्तु और वीरण के संयोग से ही उत्पन्न होता है । इसी प्रकार का संयोगजसंयोग 'कारणाकारणसंयोगपूर्वक' कहलाता है; क्योंकि उक्त द्वितन्तुक पट का समवायिकारण है तन्तु एवं अकारण है वीरण, इन दोनों के संयोग से वह उत्पन्न होता है । यह (संयोगजसंयोग) 'कार्याकार्यगत' भी है; क्योंकि (असमवायिकारणीभूत तन्तु और वीरण के संयोग का एक सम्बन्धी)' तन्तु के कार्य द्वितन्तुक पट एवं उस तन्तु के अकार्य वीरण इन दोनों में वह संयोग समवाय सम्बन्ध से है । उक्त (पट और वीरण के) संयोग का (असमवायि) कारण (तन्तु और वीरण का) संयोग ही है; क्योंकि यहाँ दूसरा कोई असमवायिकारण नहीं हो सकता । अतः संयोग में संयोग की कारणता परिशेषा-
सूत्र में कोई शब्द नहीं है । कुछ लोग उक्त सूत्र का यह अर्थ करते हैं कि कारणों
३५२ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग- प्रशस्तपादभाष्यम् तन्त्वाकाशसंयोगाभ्यामेको द्वितन्तुकः संयोगः । बहुभ्यश्च तन्तु- २. दो संयोगों से संयोगजसंयोग की उत्पत्ति इस प्रकार होती है कि दो तन्तुओं के साथ आकाश के दो संयोगों से उन दोनों तन्तुओं से बने न्यायकन्दली तदकार्यं च वीरणे समवेतत्वात् संयोगस्य संयोगहेतुत्वमन्यस्यासम्भवात् परिशेषसिद्धम् । प्रत्यासत्तिश्चात्र कार्यैकार्थसमवायः, तन्तुवीरणसंयोगस्य द्वितन्तुकवीरणसंयोगेन कार्येण सहैकस्मिन्नर्थे वीरणे समवायात् । संयोगस्यैकस्य संयोगजनकत्वे गुणाश्च गुणान्तर- मारभन्त इति सूत्रविरोधः ? न, सूत्रार्थापरिज्ञानात् । गुणानामपि गुणं प्रति कारण- त्वमित्यनेन कथ्यते, न पुनरस्यायमर्थो बहव एव गुणा आरभन्ते, नैको न द्वावित्य- वधारणस्याश्रवणात् । यत् पुनरत्र गुणाश्च गुणान्तरमारभन्त इति, कारणवृत्तीनां समानजात्यारम्भकारणानामयं नियमो न सर्वेषामिति समाधानम्, तदश्रुतव्याख्यातृणां प्रकृष्टधियामेव निर्वहति नास्माकम् । द्वाभ्यां तन्त्वाकाशसंयोगाभ्यां द्वितन्तुकाकाशसंयोग इति । आकाशं तावदुत्पन्नमात्रेण द्वितन्तुकेन समं संयुज्यते, तत्कारणसंयोगित्वाद् नुमान से सिद्ध है । यहाँ कारणता का सम्पादक (अवच्छेदक) सम्बन्ध 'कार्यैकार्थ- समवाय' है; क्योंकि तन्तु और वीरण का संयोगरूप कारण, द्वितन्तुक पट और वीरण के संयोगरूप कार्य के साथ वीरणरूप एक वस्तु (अर्थ) में समवाय सम्बन्ध से है । (प्र.) अगर एक भी संयोग दूसरे संयोग का कारण हो तो फिर 'गुणाश्च गुणान्तरम्' सूत्रकार की यह उक्ति विरुद्ध हो जाएगी ? क्योंकि उन्होंने (उक्त सूत्र के द्वारा) कहा है कि बहुत से गुण (मिलकर) दूसरे गुण को उत्पन्न करते हैं । (उ.) यहाँ उक्तविरोध नहीं है; क्योंकि आपने उक्त सूत्र का अर्थ ही नहीं समझा है । इस सूत्र का इतना ही अर्थ है कि गुण दूसरे गुण के (भी) कारण हैं । इसका यह अर्थ नहीं है कि बहुत से गुण मिलकर ही किसी दूसरे गुण को उत्पन्न करते हैं, एक या दो गुण नहीं; क्योंकि इस प्रकार के 'अवधारण' को समझाने के लिए सूत्र में कोई शब्द नहीं है । कुछ लोग उक्त सूत्र का यह अर्थ करते हैं कि कारणों में रहनेवाले गुण से जहाँ समानजातीय गुण की उत्पत्ति होती है वहीं के लिए यह नियम है कि बहुत से गुण मिलकर ही किसी दूसरे गुण को उत्पन्न करते हैं ; किन्तु इस प्रकार की अश्रुतपूर्व व्याख्या से उनके जैसे उत्कृष्ट बुद्धिवाले का ही निर्वाह हो सकता है, मुझ जैसे साधारण बुद्धिवालों का नहीं । 'द्वाभ्यां तन्त्वाकाशसंयोगाभ्यां द्वितन्तुकाकाशसंयोगः' द्वितन्तुक पट के उत्पन्न होते ही उसके साथ आकाश संयुक्त हो जाता है; क्योंकि उस (द्वितन्तुक) पट के कारण के साथ वह (आकाश) संयुक्त है। जैसे कि तन्तु के साथ संयुक्त वीरण उस तन्तु के द्वारा पट के
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५३ प्रशस्तपादभाष्यम् तुरीसंयोगेभ्य एकः पटतुरीसंयोगः । एकस्माच्च द्वयोरुत्पत्तिः कथम् ? हुए पट और आकाश के (एक ही संयोगज) संयोग की उत्पत्ति होती है । ३. (बहुत से संयोगों से एक संयोगजसंयोग की उत्पत्ति इस प्रकार होती है कि) तुरी और तन्तुओं के बहुत से संयोगों से तुरी और पट के एक ही (संयोगज) संयोग की उत्पत्ति होती है । (प्र.) (किन्तु) एक (संयोग) न्यायकन्दली द्वितन्तुककारणसंयुक्तवीरणवत् । न च तस्य संयोगस्य कारणान्तरमस्ति, अतो द्वितन्तुक- कारणयोस्तन्त्वोराकाशसंयोगाभ्यामेव तस्योत्पत्तिः । बहुभ्यश्च तन्तुतुरीसंयोगेभ्य एकः पटतुरीसंयोगः, पटकारणानां तन्तूनां प्रत्येकं तुर्या सह संयोगः, तेभ्यो बहुभ्य एकः पटतुर्योः संयोगो जायते । पटारम्भकत्वं तु तन्तूनां खण्डावयविद्रव्यारम्भपरम्परया । न च मूर्तानां समानदेशतादोषः, यावत्सु तन्तुष्वे- कोऽवयवी वर्त्तते, तावत्स्वेवान्यूनानतिरिक्तेषु परस्य समवायान्नभ्युपगमात् । द्वितन्तुके द्वयोस्तन्त्वोः समवैति, त्रितन्तुकं तु तयोस्तन्त्वन्तरे चेत्युत्तरोत्तरेषु कल्पनायां कुतः समानदेशत्वम् ? अत एव च पटे पाटिते तिष्ठति चाल्पतरतमादिभावभेदेन खण्डावयवि- ग्रहणम् । तेषु विनष्टेषु तु यथारम्भते पटो दुर्घटमिदम् । उत्पन्न होते ही उस पट के साथ संयुक्त हो जाता है; क्योंकि आकाश और द्वितन्तुक पट के संयोग का कोई दूसरा कारण नहीं है । अतः द्वितन्तुक पट के कारणीभूत दोनों तन्तुओं के साथ आकाश के दोनों संयोगों से ही उसकी उत्पत्ति होती है । 'बहुभ्यश्च तन्तुतुरीसंयोगेभ्यः, एकः पटतुरीसंयोगः' पट के कारणीभूत तन्तुओं में से प्रत्येक तन्तु के तुरी के साथ भिन्न-भिन्न संयोग हैं । तुरी और तन्तु के उन बहुत से संयोगों से तुरी के साथ पट के एक संयोग की उत्पत्ति होती है । तन्तुओं से खण्डपटों की और खण्डपटों से महापट की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार तन्तुओं में भी परम्परा से महापट की जनकता है । (प्र.) इससे तो मूर्तों के समान- देशत्व की आपत्ति होगी ? (उ.) समानदेशत्व की आपत्ति नहीं है; क्योंकि जितने तन्तुओं में एक खण्डपट रूप अवयवी की वृत्तिता मानते हैं, ठीक उतने ही तन्तुओं में- न उनसे अधिक में न उनसे कम अवयवों में-दूसरे खण्ड पटरूप अवयवी की वृत्तिता नहीं मानते । द्वितन्तुक पट दो ही तन्तुओं में समवाय सम्बन्ध से रहता है और त्रितन्तुक पट उन दोनों तन्तुओं में और एक तीसरे तन्तु में भी समवाय सम्बन्ध से रहता है । इस प्रकार के उत्तरोत्तर खण्डपटों की कल्पना में उक्त समानदेशत्व की आपत्ति क्यों कर होगी ? इसलिए कपड़े के किसी बड़े थान को टुकड़े-टुकड़े कर देने पर किन्तु बिलकुल नष्ट न कर देने पर छोटे-बड़े
३५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग- न्यायकन्दली नन्वेवं बालशरीरावयवा अविनष्ट एव तस्मिन्नाहारावयवसहिताः शरीरान्तरमार- भेरन् ? आरभन्ताम् ? यदि पट इव खण्डावयविनां वृद्धशरीरे तिष्ठति विनाशिते वा पूर्वशरीराणामुपलम्भः सम्भवति ? अथ नास्ति, न तत्रायं विधिः, यथादर्शनं व्यवस्था- पनात् । एतेनारम्भारम्भकवादपक्षे परमाण्ववस्थितस्य जगतो ग्रहणं न स्यादित्यपि प्रत्युक्तम्, परमाणूनां त्र्यणुकादिकारणत्वाभावस्य पृथिव्यधिकारे दर्शितत्वात् । अथवा यदि परमाणवो द्व्यणुकमारभ्य तत्सहितास्त्र्यणुकमारभन्ते, त्र्यणुकसहितास्तु द्रव्यान्तरम्, तथापि कुतो विश्वस्याग्रहणम् ? महत्त्वानकद्रव्यवत्त्वरूपविशेषाणामुपलब्धिकारणानां सम्भवात् । अथ सत्यपि तेष्वतीन्द्रियाश्रयत्वादतीन्द्रियत्वमेव, एवं द्व्यणुकारब्धस्य त्र्यणुकस्यातीन्द्रियत्वे तत्पूर्वकस्य विश्वस्यातीन्द्रियत्वं त्वत्पक्षेऽपि दुर्निवारम् । तस्मान्नेयमत्रानुपपत्तिः । परमा- णूनां त्र्यणुकारम्भकत्वे पृथिव्यधिकारोक्तैव युक्तिरनुगन्तव्या । कपड़े के टुकड़ों की उपलब्धि होती है । अगर उस महापट के बिलकुल नष्ट होने पर ही उन (उपलब्ध छोटे-बड़े) पटों की उत्पत्ति हो, तो फिर कथित उपलब्धि की उपपत्ति नहीं हो सकेगी । (प्र.) तो फिर बालक के शरीर के अवयव भी उसी शरीर में बिना उसके विनष्ट हुए ही भोजन-द्रव्यों के अवयवों की सहायता से दूसरे शरीर को उत्पन्न कर सकते हैं ? (उ.) कर ही सकते हैं, अगर वृद्ध शरीर के नष्ट होने पर या रहते हुए ही पट की तरह उसके खण्ड अवयवियों की भी उपलब्धि सम्भव हो । अगर यहाँ खण्ड अवयवियों की उपलब्धि नहीं होती है तो फिर दूसरे शरीर की उत्पत्ति का वह प्रकार भी यहाँ नहीं है । जहाँ जैसी स्थिति रहती है, वहाँ वैसी व्यवस्था की जाती है । उक्त निरूपण से किसी सम्प्रदाय की यह आपत्ति भी मिट जाती है कि 'आरभ्य-आरम्भकवाद' पक्ष में परमाणुओं में विद्यमान संसार की उपलब्धि नहीं होगी; क्योंकि परमाणुओं में त्र्यणुकादि द्रव्यों की कारणता किस प्रकार से है ? सो पृथिवी निरूपण में दिखला चुके हैं । अथवा यह मान भी लें कि यदि परमाणु ही द्व्यणुकों को उत्पन्न कर उन्हीं द्व्यणुकों से मिलकर त्र्यसरेणु को भी उत्पन्न करते हैं एवं त्र्यसरेणु से मिलकर और द्रव्यों को भी, तब भी विश्व का अप्रत्यक्ष क्यों होगा ? चूँकि प्रत्यक्ष के जितने भी महत्त्व अनेकद्रव्यवत्त्वादि विशेष कारण हैं, सभी विद्यमान हैं । अगर विशेष कारणों के रहते हुए भी केवल अतीन्द्रियों (परमाणुओं) में आश्रित होने के कारण ही द्व्यणुक अतीन्द्रिय हो तो फिर अतीन्द्रिय द्व्यणुकों से आरब्ध होने के कारण त्र्यसरेणु भी अतीन्द्रिय होंगे और त्र्यसरेणु से आरब्ध सम्पूर्ण विश्व में ही अतीन्द्रिय में आश्रित होने के कारण अतीन्द्रियत्व की आपत्ति तुम्हारे पक्ष में भी समानरूप से होगी । अतः यह दोष यहाँ नहीं है । परमाणु साक्षात् ही त्र्यसरेणुओं का उत्पादन नहीं करते, इस प्रसङ्ग में पृथिवी निरूपण में कही गयी युक्तियों का ही अनुसन्धान करना चाहिए । (देखिये पृ० ८०, पं० ३)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५५ प्रशस्तपादभाष्यम् यदा पार्थिवाप्ययोरण्वोः संयोगे सत्यन्येन पार्थिवेन पार्थिवस्य, अन्येन चाप्येन चाप्यस्य युगपत्संयोगौ भवतस्तदा ताभ्यां संयोगाभ्यां पार्थिवाप्ये द्व्यणुके युगपदारभ्येते । ततो यस्मिन् काले द्व्यणुकयोः कारणगुणपूर्वक्रमेण रूपाद्युत्पत्तिस्तस्मिन्नेव काले इतरेतरकारणा- से दोनों संयोगों की उत्पत्ति कैसे होती है ? (उ.) जब पृथिवी का एक परमाणु जल के एक परमाणु के साथ संयुक्त होता है, फिर वही पार्थिव परमाणु दूसरे पार्थिव परमाणु के साथ एवं वही जलीय परमाणु दूसरे जलीय परमाणु के साथ एक ही समय संयुक्त होता है, (इसके बाद दोनों पार्थिव परमाणुओं के एवं दोनों जलीय परमाणुओं के) दोनों संयोगों से एक ही समय पार्थिव द्व्यणुक और जलीय द्व्यणुक दोनों की उत्पत्ति होती है । इसके बाद जिस समय कारणगुणक्रम से दोनों द्व्यणुकों में न्यायकन्दली एकस्माच्च संयोगाद् द्वयोरुत्पत्तिः कथमित्यज्ञेन पृष्टः सन्नाह-यदेति । पार्थिवाप्ययोः परमाण्वोः संयोगे सत्यन्येन पार्थिवेन परमाणुना पार्थिवस्य परमाणोरन्येनाप्येन चाप्यस्य परमाणोर्युगपत्संयोगौ भवतस्तदा ताभ्यां संयोगाभ्यां पार्थिवाप्ये द्व्यणुके युगपदारभ्येते । समानजातीयसंयोगस्य द्रव्यान्तरोत्पत्तिहेतुत्वात् । ततो यस्मिन्नेव काले पार्थिवाप्यद्व्यणुकयोः कारणगुणपूर्वक्रमेण रूपाद्युत्पत्तिः, तस्मिन्नेव काले इतरेतरकारणाकारणगतात् संयोगा- किसी अज्ञपुरुष के द्वारा 'एक ही संयोग से दो संयोगों की उत्पत्ति कैसे होती है ?' यह पूछे जाने पर 'यदा' इत्यादि से इसका उत्तर कहते हैं । (जहाँ) एक पार्थिव परमाणु और एक जलीय परमाणु दोनों परस्पर संयुक्त रहते हैं (वहाँ) उक्त पार्थिव परमाणु का दूसरे पार्थिव परमाणु के साथ एवं उक्त जलीय परमाणु का दूसरे जलीय परमाणु के साथ, एक ही समय दो संयोगों की उत्पत्ति होती है । वहाँ इन दोनों संयोगों में से दोनों पार्थिव परमाणुओं के संयोग से पार्थिव द्व्यणुक की एवं दोनों जलीय परमाणुओं के संयोग से जलीय द्व्यणुक की उत्पत्ति अवश्य ही होगी; क्योंकि एक जाति के दो द्रव्यों का संयोग (उसकी जाति के) दूसरे द्रव्य की उत्पत्ति का कारण है । इसके बाद जिस समय कथित पार्थिव और जलीय दोनों द्व्यणुकों में 'कारणगुणपूर्वक्रम' से रूपादि (गुणों) की उत्पत्ति होती है, उसी समय दोनों द्व्यणुकों के समवायिकारण पार्थिव और जलीय परमाणु और (पार्थिव द्व्यणुक के) अकारण जलीय परमाणु और (जलीय द्व्यणुक के अकारण) पार्थिव परमाणु इन दोनों (कारणाकारण) के एक ही संयोग
३५६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग- प्रशस्तपादभाष्यम् कारणगतात् संयोगादितरेतरकार्याकार्यगतौ संयोगौ युगपदुत्पद्येते । रूपादि की उत्पत्ति होती है, उसी समय दोनों द्व्यणुकों के कारण और अकारण (अर्थात् जलीय द्व्यणुक के कारण जलीय परमाणु और अकारण पार्थिव परमाणु एवं पार्थिव द्व्यणुक के कारण पार्थिव परमाणु एवं अकारण जलीय परमाणु इन) दोनों में रहनेवाले एक ही संयोग से एक ही समय कार्य और अकार्य (अर्थात् पार्थिव परमाणु के कार्य पार्थिव द्व्यणुक और पार्थिव परमाणु के अकार्य जलीय द्व्यणुक इन दोनों के) संयोग एवं जलीय परमाणु के कार्य जलीय द्व्यणुक एवं अकार्य पार्थिव परमाणु, इन दोनों के संयोग, इन दोनों संयोगों की उत्पत्ति होती है । (इस प्रकार एक संयोग से दो संयोगों न्यायकन्दली दितरेतरकार्याकार्यगतौ संयोगौ युगपदुत्पद्येते । इतरेतरे पार्थिवाप्ये द्व्यणुके, तयोः कारणाकारणे परस्परसंयुक्तौ पार्थिवाप्यपरमाणू, पार्थिवः परमाणुरितरस्य पार्थिवद्व्यणु- कस्य कारणमितरस्याप्यस्य द्व्यणुकस्याकारणम् । एवमाप्यपरमाणुरितरस्याप्यद्व्यणुकस्य कारणमितरस्य पार्थिवद्व्यणुकस्याकारणम् । तयोः संयोगाद् इतरस्य पार्थिवपरमाणोर्यत् कार्यं पार्थिवं द्व्यणुकमकार्यञ्चाप्यः परमाणुः, तयोः संयोगो भवति । एवमितरस्याप्यपर- माणोर्यत् कार्यमाप्यं द्व्यणुकमकार्यस्तु पार्थिवः परमाणुस्तयोरपि संयोगो भवतीत्येकस्माद् द्वयोरुत्पत्तिः । से दोनों के कार्य (अर्थात्) पार्थिव परमाणु के कार्य पार्थिव द्व्यणुक और जलीय परमाणु के कार्य (जलीय द्व्यणुक) एवं दोनों परमाणुओं के अकार्य (अर्थात् पार्थिव परमाणु के अकार्य जलीय द्व्यणुक एवं जलीय परमाणु के अकार्य पार्थिव द्व्यणुक) इन दोनों के एक ही संयोग की उत्पत्ति होती है । 'इतरेतर' शब्द से परस्पर सम्बद्ध पार्थिव द्व्यणुक और जलीय द्व्यणुक, ये ही दोनों अभिप्रेत हैं । इन दोनों के कारण और अकारण अर्थात् पार्थिव द्व्यणुक के कारण पार्थिव परमाणु और अकारण जलीय परमाणु एवं जलीय द्व्यणुक के कारण जलीय परमाणु और अकारण पार्थिव परमाणु, कथित कारण और अकारण इन दोनों के संयोग से 'इतर' अर्थात् पार्थिव परमाणु के कार्य पार्थिव द्व्यणुक और अकार्य जो जलीय परमाणु, इन दोनों के संयोग की उत्पत्ति होती है । एवं 'इतर' जो जलीय परमाणु के कार्य जलीय द्व्यणुक एवं अकार्य जो पार्थिव परमाणु, इन दोनों के संयोग की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार एक ही संयोग से (संयोगज) संयोगों की उत्पत्ति होती है ।
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३५७ प्रशस्तपादभाष्यम् किं कारणम् ? कारणसंयोगिना ह्यकारणेन कार्यमवश्यं संयुज्यत इति न्यायः । अतः पार्थिवं द्व्यणुकं कारणसंयोगिनाप्येनाणुना सम्बद्ध्यते । आप्यमपि द्व्यणुकं कारणसंयोगिना पार्थिवेनेति । अथ द्व्यणुकयोरितरेतरकारणाकारणसम्बद्धयोः कथं परस्परतः की एक ही समय उत्पत्ति होती है ।) (प्र.) (एक कारण से दो कार्यों की उत्पत्ति) क्यों होती है ? (उ.) चूँकि यह नियम है कि समवायिकारण के संयोग से युक्त अकारण (द्रव्य) के साथ (उस समवायिकारण का) कार्य भी अवश्य ही संयुक्त होता है, अतः पार्थिव द्व्यणुक उस जलीय परमाणु के साथ भी संयुक्त होता है, जिसका संयोग उक्त पार्थिव परमाणु के साथ है । (प्र.) एक-दूसरे के कारण और अकारण के साथ सम्बद्ध इन दोनों द्व्यणुकों में परस्पर संयोग न्यायकन्दली किं कारणम् ? पार्थिवाप्ययोर्द्व्यणुकयोर्विजातीयपरमाणुसंयोगे किं प्रमाणम् ? इति पृष्टः सन् प्रमाणमाह-कारणसंयोगिनेति । पार्थिवपरमाणुराप्यद्व्यणुकेन सह सम्बद्ध्यते, तत्कारणसंयोगित्वात् पटसंयुक्ततुरीवत् । एवमाप्यं परमाणुमपि पक्षीकृत्य वक्तव्यम् । यतः कारणसंयोगिना कार्यं संयुज्यते, अतः पार्थिवं द्व्यणुकं कारणसंयोगिनाप्येन परमाणुना सम्बध्यते, आप्यं च द्व्यणुकं तस्य कारणसंयोगिना पार्थिवपरमाणुनेत्युपसंहारः । अथ पार्थिवाप्यद्व्यणुकयोरितरेतरकारणाकारणसम्बद्धयोः कथं सम्बन्धः ? पार्थिवद्व्यणुकस्य स्वकीयाकारणेनाप्यद्व्यणुककारणेनाप्यपरमाणुना 'किं कारणम् ?' इत्यादि से प्रश्न करते हैं कि क्या कारण है ? अर्थात् पार्थिव द्व्यणुक और जलीय द्व्यणुक इन दोनों का अपने से भिन्न जाति के परमाणुओं के (पार्थिव द्व्यणुक का जलीय परमाणु के साथ एवं जलीय द्व्यणुक का पार्थिव परमाणु के साथ) जो संयोग की उत्पत्ति होती है, इसमें क्या कारण है ? इसी प्रश्न का उत्तर 'कारणसंयोगिना' इत्यादि सन्दर्भ से देते हैं । अर्थात् जिस प्रकार तन्तु में संयुक्त तुरी के साथ पट भी संयुक्त होता है, उसी प्रकार पार्थिव परमाणु भी जलीय द्व्यणुक के साथ संयुक्त होता है; क्योंकि जलीय द्व्यणुक के कारणीभूत जलीय परमाणु के साथ वह (पार्थिव परमाणु) संयुक्त है । इसी प्रकार जलीय परमाणु को भी पक्ष बनाकर अनुमान करना चाहिए । (अर्थात् जिस प्रकार कपाल में संयुक्त दण्ड के साथ घट भी संयुक्त होता है, उसी प्रकार जलीय परमाणु भी पार्थिव द्व्यणुक के साथ संयुक्त होता है; क्योंकि पार्थिव द्व्यणुक के कारणीभूत पार्थिव परमाणु के साथ उसका संयोग है) इस प्रसङ्ग का सार मर्म यह है कि जिस द्रव्य के साथ कारण का संयोग रहता है, उस द्रव्य के साथ कार्य भी अवश्य ही संयुक्त होता है । अतः प्रकृत में पार्थिव द्व्यणुक जलीय परमाणु के साथ
सूत्रकार ने जिस प्रकार उत्पत्तिशील चार परमाणुओं के उल्लेख के बाद
३५८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग- प्रशस्तपादभाष्यम् सम्बन्धः ? तयोरपि संयोगजाभ्यां संयोगाभ्यां सम्बन्ध इति। नास्त्यजः संयोगो नित्यपरिमण्डलवत्, पृथगनभिधानात् । यथा चतुर्विधं परिमाणमुत्पाद्यमुक्त्वाह नित्यं परिमण्डलमित्येवमन्यतरकर्मजादि- किसी कारण से उत्पन्न होता है ? (उ.) इन दोनों द्वयणुक़ों में भी दोनों संयोगज 1 संयोगों से ही उक्त संयोग की उत्पत्ति होती है । अनुत्पत्तिशील संयोग कोई है ही नहीं; क्योंकि सूत्रकार ने नित्य परिमण्डल (नित्य अणुपरिमाण) की तरह नित्य संयोग का उल्लेख नहीं किया है, अर्थात् सूत्रकार ने जिस प्रकार उत्पत्तिशील चार परमाणुओं के उल्लेख के बाद 'नित्यं परिमण्डलम्' इत्यादि से नित्य अणुपरिमाण का उल्लेख किया है, न्यायकन्दली सम्बद्धस्याप्यद्व्यणुकस्यापि स्वकीयाकारणेन पार्थिवद्व्यणुककारणेन पार्थिवपरमाणुना सम्बद्धस्य कथं सम्बन्धः ? इति पृच्छति । उत्तरमाह - तयोरपीति । पार्थिवद्व्यणुकस्याप्येन परमाणुना यः संयोगजः संयोगो यश्चाप्यद्व्यणुकस्य पार्थिवपरमाणुना संयोगजः संयोगास्ताभ्यां पार्थिवाप्यपरमाणुसंयोगाभ्यां द्व्यणुकयोः परस्परसंयोगः । अत्रापि पूर्वोक्त एव न्यायः, कारणसंयोगिना अकारणेन संयोगि कार्यमिति । संयुक्त होता है; क्योंकि उसके कारणीभूत पार्थिव परमाणु के साथ जलीय परमाणु संयुक्त है । इसी तरह जलीय द्वयणुक भी अपने कारणीभूत जलीय परमाणु से संयुक्त पार्थिव परमाणु के साथ संयुक्त होता है । (प्र.) इतरेतर कारणों और अकारणों में परस्पर असम्बद्ध पार्थिव द्वयणुक और जलीय द्वयणुक़ों में परस्पर संयोग कैसे होता है ? अर्थात् यह पूछते हैं कि पार्थिव द्वयणुक अपने अकारणीभूत और जलीय द्वयणुक के कारणीभूत जलीय परमाणु के साथ संयुक्त है एवं जलीय द्वयणुक अपने अकारणीभूत और पार्थिव द्वयणुक के कारणीभूत पार्थिव परमाणु के साथ संयुक्त है, फिर इससे पार्थिव और जलीय दोनों द्वयणुक़ों में परस्पर संयोग कैसे होता है ? 'तयोः' इत्यादि से इसी प्रश्न का उत्तर देते हैं । अभिप्राय यह है कि पार्थिव द्वयणुक का जलीय परमाणु के साथ जो संयोगज संयोग है एवं जलीय द्वयणुक का पार्थिव परमाणु के साथ जो संयोगज संयोग है, इन दोनों संयोगज संयोगों से ही कथित पार्थिव द्वयणुक और जलीय द्वयणुक इन दोनों में परस्पर संयोग की उत्पत्ति होती है । इस संयोग के प्रसङ्ग में भी पूर्वकथित वही न्याय लागू होता है कि जिस कार्य के कारण का जिस अकारण के साथ संयोग होगा, उस अकारण के साथ उस कार्य का भी संयोग अवश्य ही होगा ।
- अर्थात् पार्थिव परमाणु और जलीय परमाणु के संयोग से उत्पन्न पार्थिव द्वयणुक का जलीय परमाणु के साथ संयोग और जलीय द्वयणुक का पार्थिव परमाणु के साथ संयोग, इन दोनों संयोगज संयोगों से पार्थिव द्वयणुक और जलीय द्वयणुक इन दोनों में संयोग की उत्पत्ति होती है ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५९ प्रशस्तपादभाष्यम् संयोगमुत्पाद्यमुक्त्वा पृथङ् नित्यं ब्रूयात्, न त्वेवमब्रवीत्, तस्मान्नास्त्यजः संयोगः । परमाणुभिराकाशादीनां प्रदेशवृत्तिरन्यतरकर्मजः संयोगः । उसी प्रकार (अगर नित्य संयोग भी होता तो) उत्पत्तिशील अन्यतर कर्मजादि संयोगों को कहने के बाद नित्य संयोग का भी अलग से उल्लेख अवश्य ही करते, सो नहीं किया है, अतः संयोग नित्य नहीं है। परमाणुओं के साथ आकाशादि के संयोग न्यायकन्दली त्रिविध एव संयोग इत्युक्तम् । नित्यस्यापि संयोगस्य सम्भवादिति केचित्, तद्व्यतिषेधार्थमाह-नास्त्यजः संयोगः, परिमण्डलवत् पृथगनभिधानात् । सर्वज्ञेन महर्षिणा सर्वार्थोपदेशाय प्रवृत्तेन पृथगनभिधानात्, अजः संयोगो नास्ति, खपुष्पवत् । एतदेव विवृणोति-यथेत्यादिना । संयोगोऽजो न भवतीति प्रतिज्ञार्थो न पुनरजः संयोगो नास्तीति, आश्रयासिद्धत्वात् । ननु परमाण्वाकाशयोः संयोगो नित्य एव, तयोर्नित्यत्वाद- प्राप्त्यभावाच्च । यत् पुनरयं कणादेन नोक्तः, तद् भ्रान्तेः पुरुषधर्मत्वात्, अत आह- परमाणुभिराकाशादीनामिति । यथा महतो न्यग्रोधस्य मूलाग्रावयवव्यापिन एकस्य मूलादग्रमग्रान्मूलं गच्छता पुरुषेण संयोगविभागान्यतरकर्मजौ युगपत्प्रतीयेते, तथा व्यापि- 'संयोग तीन ही प्रकार के हैं' इस अवधारण के प्रसङ्ग में किसी की आपत्ति है कि उक्त अवधारण ठीक नहीं है; क्योंकि नित्य भी संयोग हो सकता है । इसी पूर्वपक्ष का खण्डन 'नास्त्यजः संयोगः' इत्यादि से किया गया है । अर्थात् सभी विषयों के ज्ञाता महर्षि कणाद सभी वस्तुओं के उपदेश देने के लिए प्रवृत्त हुए थे । अतः अगर नित्य परिमण्डल की तरह नित्य संयोग की भी सत्ता रहती, तो नित्य परिमण्डल की तरह उसका भी उल्लेख अवश्य ही करते; किन्तु गगनकुसुम की तरह नित्यसंयोग का भी उल्लेख महर्षि ने नहीं किया है, अतः नित्यसंयोग नहीं है । 'यथा' इत्यादि से इसी का विवरण देते हैं । 'संयोग नित्य नहीं है' प्रकृत में इसी आकार की प्रतिज्ञा है, 'नित्यसंयोग नहीं है' इस प्रकार की नहीं; क्योंकि इस (दूसरी) प्रतिज्ञा का आश्रय (पक्ष) नित्यसंयोग (आकाशकुसुम की तरह अप्रसिद्ध) है, अतः इसके लिए प्रयुक्त हेतु आश्रयासिद्ध हेत्वाभास होगा । (प्र.) परमाणु और आकाश का संयोग तो नित्य है; क्योंकि वे दोनों ही नित्य हैं और वे दोनों कभी अप्राप्त (असम्बद्ध) भी नहीं रहते । (इस वस्तुस्थिति के अनुसार यह कहना ही पड़ेगा कि) कणाद ने जो नित्य संयोग का निरूपण नहीं किया है, इसका कारण उनकी भ्रान्ति है, चूँकि भ्रान्ति पुरुष का धर्म है । इसी पूर्वपक्ष के समाधान के लिए 'परमाणुभिराकाशादीनाम्' इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं । जैसे कि एक महान् वटवृक्ष के मूल से ऊपर की तरफ जाते हुए पुरुष का एवं अग्रभाग से मूल की तरफ आते हुए पुरुष का एक ही समय उस वृक्ष के साथ अन्यतरकर्मज संयोग और अन्यतरकर्मज विभाग दोनों ही प्रतीत होते हैं; क्योंकि वे दोनों अव्याप्यवृत्ति हैं, उसी प्रकार परमाणु और आकाश का भी अन्यतरकर्मजसंयोग (आकाश के
३६० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग- प्रशस्तपादभाष्यम् विभूनां तु परस्परतः संयोगो नास्ति, युतसिद्धयभावात् । सा पुनर्द्वयोरन्य- तरस्य वा पृथग्गतिमत्त्वं पृथगाश्रयाश्रयित्वं चेति । अव्याप्यवृत्ति एवं अन्यतरकर्मज ही हैं । आकाशादि विभु द्रव्यों में परस्पर संयोग है ही नहीं; क्योंकि उन सबों की युतसिद्धि नहीं है । दोनों (प्रतियोगी और अनुयोगी) में एक की स्वतन्त्र गतिशीलता और दोनों में से प्रत्येक में स्वतन्त्र रूप से किसी के आश्रय होने की या कहीं आश्रित होने की योग्यता ही 'युतसिद्धि' है । न्यायकन्दली नोऽप्याकाशस्य परमाणुना सह संयोगविभागौ परमाणुकर्मजौ भवतः, तयोरव्याप्यवृत्तित्वादिति न परमाण्वाकाशसंयोगस्य नित्यत्वम् । इदं तावदित्थं परिहृतम्, विभूनां परस्परतः संयोगे का प्रतिक्रिया ? न ह्यसावन्यतरकर्मजः, नाप्युभयकर्मजः, तेषां निष्क्रियत्वात् । नापि संयोगजः कार्यस्य हि कारणसंयोगिना अकारणेन संयोगजः संयोगो भवति । न चायं विभूनामुपपद्यते, नित्यत्वात् । अस्ति च तेषां संयोग आकाशममूर्तेनापि द्रव्येण समं संयुज्यते मूर्तद्रव्यसंयोगित्वात् पटवदित्यनुमानात् प्रतीतः । स चाकारणवन्नित्यं तस्मादनुपपन्नमिदम्, अजः संयोगो नास्तीति । तत्राह-विभूनामिति । निष्क्रिय होने पर भी, परमाणु के क्रियाशील होने के कारण) हो सकता है; क्योंकि संयोग और विभाग दोनों ही अव्याप्यवृत्ति हैं । अतः परमाणु और आकाश का संयोग (दोनों के नित्य होने पर भी परमाणुगत क्रिया के अनित्य होने के कारण) नित्य नहीं है । संयोग के नित्यत्व के पक्ष में आयी हुई आपत्ति का उद्धार उसके समर्थक इस प्रकार करते हैं कि (परमाणु और आकाश के संयोग में नित्यत्व अनिवार्य न होने पर भी) विभु द्रव्यों के परस्पर संयोग में (नित्यत्व मानने के सिवाय) क्या समाधान करेंगे ? क्योंकि विभु द्रव्यों के संयोग न अन्यतरकर्मज हो सकते हैं, न उभयकर्मज; क्योंकि वे सभी क्रिया से रहित हैं । संयोग से भी (विभु द्रव्य का दूसरे विभु द्रव्य के साथ संयोग) नहीं उत्पन्न हो सकता; क्योंकि संयोगजसंयोग किसी कार्य द्रव्य का उसके अकारणीभूत द्रव्य के ही साथ होता है, जिसमें उस कार्य द्रव्य के कारणीभूत द्रव्य का संयोग रहता है । विभु द्रव्य तो नित्य ही होते हैं, अतः उनका कोई कारण ही नहीं है, तस्मात् उनका परस्पर संयोगजसंयोग नहीं हो सकता; किन्तु विभु द्रव्यों में परस्पर संयोग अवश्य ही होता है; क्योंकि इस प्रसङ्ग में यह अनुमान प्रमाण है कि जिस प्रकार पटादि द्रव्य घटादि मूर्त द्रव्यों के साथ संयुक्त होने पर आकाशादि अमूर्त द्रव्यों के साथ भी संयुक्त होते हैं, उसी प्रकार आकाशादि विभु द्रव्य भी दिगादि अमूर्त (विभु) द्रव्यों के साथ भी अवश्य ही संयुक्त होते हैं; क्योंकि उनमें घटादि मूर्त द्रव्यों का संयोग है (जो मूर्त द्रव्यों के साथ संयुक्त होगा, वह अमूर्त द्रव्यों के साथ भी संयुक्त होगा ही); किन्तु (इस प्रकार से