भारतकोश
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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

४१४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- न्यायकन्दली अत्रोच्यते-किं यत्र तादात्म्यतदुत्पत्ती तत्राव्यभिचारः ? किं वा यत्राव्यभिचारस्तत्र तादात्म्यतदुत्पत्ती ? न तावदाद्यः कल्पः, सत्यपि तदुत्पादे धूमधर्मस्य पार्थिवत्वादेरग्निब्यभि- चारात् । सत्यपि तादात्म्ये वृक्षत्वस्य विशेषाद् व्यभिचारात् । अथ यत्राव्यभिचारस्तत्र तादात्म्यतदुत्पत्ती, तर्ह्यव्यभिचारस्तत्त्वे तयोर्गमकत्वम् । एवं चेत्, अव्यभिचार एवास्तु गमकः, किं तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्याम् ? कार्यमपि हि न कार्यमित्येव गमयतीति, नापि स्वभावः स्वभाव इति, किं तर्हि ? तदव्यभिचारीति, अव्यभिचार एव गमकत्वे कारणं न तादात्म्यतदुत्पत्ती, व्यभिचारात् । न चैवमुपपत्तिमारोहति धूमो वह्निना क्रियते न पार्थिवत्वादयस्तद्धर्मा इति, वस्तुनो निर्भागत्वात् । नान्ये तदुपलब्धं शिंशपा वृक्षात्मिका न वृक्षः शिंशपात्मकः, धवखदिरादिसाधारणत्वादिति, तयोर्भेदात् । इस प्रसङ्ग में हम (वैशेषिक) लोग पूछते हैं कि (१) क्या जिस साध्य का तादात्म्य जिस हेतु में रहता है, उसी हेतु में उस साध्य का अव्यभिचार (व्याप्ति) रहता है ? एवं जिस साध्य से जिस हेतु की उत्पत्ति होती है, उसी हेतु में उस साध्य का अव्यभिचार (व्याप्ति) रहता है ? (२) अथवा जिस हेतु में साध्य की व्याप्ति रहती है, उसी हेतु में उस साध्य का तादात्म्य या जन्यत्व रहता है ? इन दोनों में प्रथम कल्प इसलिए ठीक नहीं है कि वह्नि से धूम की उत्पत्ति होने पर भी धूम के पार्थिवत्वादि धर्मों के साथ वह्नि का व्यभिचार है (अतः पार्थिवत्वादि धर्म से अभिन्न धूम के साथ वह्नि का व्यभिचार भी है ही, क्योंकि धर्म और धर्मी आपके मत से एक हैं) । एवं ('वृक्षः शिंशपायाः' इत्यादि स्थलों में) शिंशपा में यद्यपि वृक्ष का तादात्म्य है, फिर भी वृक्षत्व में 'विशेष' का अर्थात् शिंशपा का व्यभिचार है (क्योंकि विल्वादि वृक्ष होने पर भी शिंशपा नहीं है ।) यदि उसका यह अर्थ करें कि जिस हेतु में साध्य का अव्यभिचार है, वहाँ साध्य निरूपित उत्पत्ति (साध्य रूप कारण जन्यत्व) या साध्य का तादात्म्य अवश्य है । तो फिर इसका अभिप्राय यह हुआ कि हेतु में साध्य के अव्यभिचार के रहने के कारण ही उस हेतु में रहनेवाले साध्य के तादात्म्य या साध्यरूप कारणजन्यत्व दोनों में साध्य की ज्ञापकता है । यदि यह स्थिति है तो फिर अव्यभिचार को ही साध्य का ज्ञापक मानिए ? साध्य के तादात्म्य या उत्पत्ति को इन सबों के बीच लाने का क्या प्रयोजन है ? क्योंकि हेतु साध्य से उत्पन्न होता है या साध्य से अभिन्न है, इन दोनों में से किसी भी कारण से हेतु में साध्य की ज्ञापकता नहीं है, किन्तु हेतु इसलिए साध्य का ज्ञापक है कि उसमें साध्य का अव्यभिचार है । (प्र.) धूम की उत्पत्ति तो वह्नि से होती है; किन्तु धूम के पार्थिवत्वादि धर्म तो वह्नि से उत्पन्न नहीं होते । (उ.) यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि वस्तु का एक ही स्वरूप होता है (अतः धूम को यदि

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४९५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४९५ न्यायकन्दली यदि धवादिसाधारणी वृक्षता न शिंशपात्वम्, तदा नानयोरेकत्वं स्वभावभेदस्य भेदसाधारणत्वात् । अभेदे तु यथा वृक्षत्वं सर्ववृक्षसाधारणं तथा शिंशपात्वमपि स्यात् । न च तादात्म्ये गम्यगमकभावे व्यवस्था युक्ता, तस्याभेदाश्रयत्वात् । यदि शिंशपात्वे गृह्यमाणे वृक्षत्वमगृहीतम्, क्व तादात्म्यम् ? गृहीतं चेत् ? (तत्) क्वानुमानम् ? अथोच्यते-यथावस्थितो धर्मी, शिंशपात्वं वृक्षत्वं च त्रयमेकात्मकमेव, तत्र धर्मिणि गृह्यमाणे शिंशपात्वं वृक्षत्वमपि गृहीतमेव । यथोक्तम्- तस्माद् दृष्टस्य भावस्य दृष्ट एवाखिलो गुणः । भागः कोऽन्यो न दृष्टः स्याद्यः प्रमाणैः परीक्ष्यते ॥ इति । वह्नि जन्य मानना है, तो उसमें रहनेवाले वस्तुतः तदभिन्न पार्थिवत्वादि को भी वह्नि जन्य मानना ही होगा) अतः कथित व्यभिचार है ही । यह भी निश्चय नहीं है कि शिंशपा तो वृक्ष रूप है, किन्तु (वृक्षत्व के आश्रय धवखदिरादि अन्यवृक्षों में भी) साधारण रूप से रहने के कारण वृक्षत्व शिंशपा- स्वरूप नहीं है; क्योंकि वृक्ष और शिंशपा दोनों अभिन्न हैं । यदि (प्र.) यह कहें कि वृक्षत्व (शिंशपा की तरह उससे भिन्न) धवादि में भी है; किन्तु शिंशपात्व तो केवल शिंशपा में ही है, धवादि में नहीं । (उ.) तो फिर वृक्षत्व और शिंशपात्व दोनों एक नहीं हो सकते, क्योंकि स्वभावों की विभिन्नता ही वस्तुओं की विभिन्नता है¹ । यदि शिंशपात्व और वृक्षत्व को अभिन्न मानें तो फिर जिस प्रकार वृक्षत्व सभी वृक्षों में रहता है,उसी प्रकार (वृक्षत्व से अभिन्न) शिंशपात्व की सत्ता भी सभी वृक्षों में माननी ही पड़ेगी । दूसरी बात यह है कि यदि वृक्षत्व और शिंशपात्व में अभेद मानें तो यह निर्धारण नहीं हो सकता कि शिंशपात्व ही वृक्षत्व का ज्ञापक है, वृक्षत्व शिंशपात्व का ज्ञापक नहीं । क्योंकि ज्ञाप्यज्ञापकभाव भेदों के अधीन है (अर्थात् ज्ञाप्य और ज्ञापक को परस्पर भिन्न ही होना चाहिए) । शिंशपात्व का ज्ञान हो जाने पर भी यदि वृक्षत्व अज्ञात ही रहता है, तो फिर शिंशपात्व और वृक्षत्व में तादात्म्य कहाँ ? यदि शिंशपात्व के गृहीत होने पर उसी ज्ञान से वृक्षत्व भी गृहीत हो जाता है, तो फिर वृक्षत्व के अनुमान की ही कौन-सी सम्भावना है ? यदि यह कहें कि (प्र.) अपने स्वरूप में अवस्थित शिंशपावृक्ष रूप धर्मी एवं वृक्षत्व और शिंशपात्व रूप दोनों धर्म, ये तीनों वस्तुतः एक ही हैं । अतः धर्मी के गृहीत होने पर वृक्षत्व और शिंशपात्व रूप उसके धर्म भी उसी ज्ञान से गृहीत हो जाते हैं । जैसा कहा गया है कि "तस्मात् किसी भी धर्मी के प्रत्यक्ष होने पर

  1. अर्थात् वृक्ष और शिंशपा इन दोनों में अगर अभेद है एवं इस कारण शिंशपा वृक्षात्मक है, तो फिर यह कैसे कह सकते हैं- वृक्ष शिंशपात्मक नहीं है ।

४१६ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- न्यायकन्दली यदेवं शिंशपाधिकल्पो जातो न वृक्षविकल्पः, स वृक्षशब्दस्मृत्यभावापराधात् शिंशपाशब्दसंस्कारप्रबोधजन्मना शिंशपाविकल्पेन चाशिंशपाव्यावृत्तिपर्यवसितेन नावृक्षव्यावृत्तिरूपनीयते, सर्वविकल्पानां पर्यायत्वप्रसङ्गात् । गम्यगमकभावश्च व्यावृत्त्योरेव नानयोर्न वस्तुनः, तस्यान्यथाभावात् । अवृक्षव्यावृत्तिशिंशपाव्यावृत्ती च परस्परं भिन्ने, व्यावत्र्त्यभेदात् ? अतो यथोक्तदोषानुपपत्तिरिति । अहो पूर्वापरानु- सन्धाने परं कौशलं पण्डितानाम् ? तादात्म्यमनुमानबीजम्, साध्यसाधनभूत- योर्व्यावृत्त्योः परस्परं भेद इति किमिदमिन्द्रजालम् ? वृक्षशिंशपयोस्तादात्म्यं उसी प्रत्यक्ष के द्वारा उसके सभी धर्मों का भी प्रत्यक्ष हो जाता है । अतः उसका कौन-सा अंश देखने से बच जाता है, जिसकी परीक्षा अन्य प्रमाणों से की जाय ।" तब यह बात रही कि (उस ज्ञान में शिंशपात्व की तरह वृक्षत्व भी यदि भासित होता है तो फिर) उस विकल्प (विशिष्ट ज्ञान) का अभिलाप 'यह शिंशपा है' इस शब्द के द्वारा क्यों होता है ? 'यह वृक्ष है' इस प्रकार के शब्दों के द्वारा क्यों नहीं ? इस प्रश्न का यह उत्तर है कि उस समय वृक्ष शब्द की स्मृति नहीं रहती है । इसी स्मृति के न रहने के 'अपराध' से ही वृक्ष शब्द से उसका अभिलाप नहीं हो पाता । शिंशपा शब्द की स्मृति से जिस शिंशपा विषयक विकल्प ज्ञान की उत्पत्ति होता है, उसका पर्यवसान 'अशिंशपाव्यावृत्ति' रूप 'अपोह' में ही होता है, उससे 'अवृक्षव्यावृत्ति' रूप 'अपोह' का ज्ञान नहीं होता । यदि ऐसा हो, तो सभी विशिष्ट ज्ञानों के बोधक शब्द एकार्थक हो जाएँगे (अर्थात् सभी ज्ञान एक विषयक हो जाएँगे) । एक ही व्यावृत्ति (अपोह) ही दूसरी व्यावृत्ति की ज्ञापिका हो सकती है (फलतः ज्ञाप्यज्ञापकभावसम्बन्ध दो अपोहों में ही हो सकता है) किन्तु व्यावृत्ति के आश्रयों में ज्ञाप्यज्ञापकभाव नहीं हो सकता, क्योंकि (क्षणिक होने के कारण उनमें परस्पर सामानाधिकरण्यरूप) अन्वय ही सम्भव नहीं है । (वृक्ष और शिंशपा इन दोनों के अभिन्न होने पर भी) अवृक्षव्यावृत्ति और अशिंशपाव्यावृत्ति ये दोनों अपोह तो भिन्न हैं, क्योंकि दोनों अपोहों के व्यवच्छेद्य भिन्न हैं ।¹ अतः कथित (सभी ज्ञानों में एक विषयत्व की) आपत्ति नहीं है । (उ.) यह तो आप जैसे पण्डितों का आगे और पीछे अनुसन्धान करने की अपूर्व ही चतुरता है, जिससे यह इन्द्रजाल सम्भव होता है कि तादात्म्य (अभेद) को तो अनुमान का प्रयोजक मानते हैं, और कहते हैं कि साध्य और साध्य से अभिन्न हेतु इन दोनों की व्यावृत्तियाँ (अपोह) भिन्न

  1. उक्त विवरण के अनुसार शिंशपात्व का यह स्वभाव निष्पन्न होता है कि वह केवल शिंशपा में ही रहे, और वृक्षत्व का यह स्वभाव निष्पन्न होता है कि वह शिंशपा में रहे और उससे भिन्न धवखदिरादि सभी वृक्षों में भी रहे, तो फिर विभिन्न स्वभाव की ये दोनों वस्तुएँ एक कैसे हो सकतीं हैं ?

प्रकरणम् ] भाषाानुवादसहितम् ४१७

प्रकरणम् ] भाषाानुवादसहितम् ४१७ न्यायकदली तदात्मतया च व्यवस्थितयोर्वृक्षव्यावृत्त्यशिशंपाव्यावृत्त्योः सत्यपि भेदे यथाध्यवसायं तादात्म्यमिति चेत् ? सिद्धे तादात्म्ये सत्यशिशंपाव्यावृत्त्या धर्मिण्यवृक्षव्यावृत्तिरध्यवसेया, तत्राध्यवसितायामवृक्षव्यावृत्तौ यथाध्यवसायं तादात्म्यसिद्धिरित्यन्योन्याश्रयदोषः । व्याप्तिग्रहणवेलायामेकात्मतयाध्यवसितयोर्व्यावृत्त्योस्तादात्म्यसिद्धिरिति चेत् ? तथाध्यव- सितयोर्भेदः काल्पनिकः । यद्यनुमानं कल्पनासमारोपेणापि प्रवर्तेत, न कश्चिद्धेतुर्नाम । प्रमेयत्वानित्यत्वयोरेकात्मतयाध्यवसितयोर्यथाध्यवसायं हैं । (प्र.) वृक्ष और शिंशपा इन दोनों में यद्यपि तादात्म्य है, किन्तु वृक्ष और शिंशपा इन दोनों से क्रमशः अभिन्नरूप से निश्चित अवृक्षव्यावृत्ति (वृक्षभिन्न- भिन्नत्व) और अशिशंपाव्यावृत्ति (शिंशपाभिन्नभिन्नत्व) ये दोनों व्यावृत्तियाँ परस्पर भिन्न हैं । अतः दोनों व्यावृत्तियों में वास्तविक भेद रहते हुए भी ज्ञानीय अभेद (अर्थात् 'दोनों अभिन्न हैं' इस आकार के भ्रमात्मक ज्ञान के द्वारा गृहीत अभेद) हैं, औप इसी अभेद के कारण अशिशंपाव्यावृत्ति रूप हेतु के द्वारा अवृक्षव्यावृत्ति का अनुमान होता है¹ । (उ.) यह कहना भी सम्भव नहीं है (क्योंकि इससे अन्योन्याश्रय दोष होगा) चूँकि तादात्म्य के रहने पर अशिशंपाव्यावृत्ति के द्वारा वृक्ष रूप धर्मी में अवृक्षव्यावृत्ति का अनुमान होगा, कथित साध्य साधनभूत दोनों व्यावृत्तियों में तादात्म्य तब होगा, जब कि पक्ष रूप शिंशपा में अनुमान के द्वारा अवृक्षव्यावृत्ति की प्रतीति हो जाएगी, अतः अन्योन्याश्रयदोष होगा । (प्र.) व्याप्ति ज्ञान के समय में ही जो दोनों व्यावृत्तियों का अभेद गृहीत होता है, उसी से तादा- त्म्य की सिद्धि होती है, अतः (अनुमितिमूलक उक्त अन्योन्याश्रय दोष नहीं है) । (उ.) तो फिर यह कहिए कि अभिन्नरूप से ज्ञायमान दोनों व्यावृत्तियों का अभेद काल्पनिक है, वास्तविक नहीं । यदि हेतु प्रभृति के काल्पनिक ज्ञान से भी अनुमान की प्रवृत्ति मानें, तो हेत्वाभास नाम की कोई वस्तु ही नहीं रह जाएगी । इस प्रकार तो प्रमेयत्व एवं अनित्यत्व इन दोनों में भी एकात्मता (अभेद) का विपर्यय हो ही सकता है, और इस विपर्यय रूप अध्यवसाय के द्वारा प्रमेयत्व और अनित्यत्व में भी काल्पनिक अभेद रहेगा ही । (प्र.) (जहाँ अनित्यत्व नहीं है, वहाँ भी प्रमेयत्व है, इस प्रकार) विपक्षव्यावृत्ति के न रहने के कारण प्रमेयत्व

  1. अवृक्षव्यावृत्त हैं वृक्ष से भिन्न सभी पदार्थों के भेदों का समूह एवं अशिशंपाव्यावृत्त है, शिंशपावृक्षमात्र को छोड़ और सभी पदार्थों के भेदों का समूह, इन दोनों भेदों के समूह भिन्न हैं, क्योंकि दोनों भेदों के प्रतियोगी समूह अलग-अलग हैं, पहले प्रतियोगीसमूह में शिंशपा नहीं है, क्योंकि शिंशपा भी वृक्ष ही है । दूसरे समूह में शिंशपा को छोड़कर और सभी वृक्ष भी हैं; क्योंकि सभी वृक्ष शिंशपा नहीं है ।

४१८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- न्यायकन्दली तादात्म्यासम्भवात् । विपक्षव्यावृत्त्यभावात् प्रमेयत्वस्यानित्यत्वेन सह तादात्म्याभाव इत चेत् ? सत्यम्, वास्तवं तादात्म्यं नास्ति, कल्पनासमारोपितं तावदस्त्येव, तदेवानुमानो- दयबान्धवं समर्थितवन्तो यूयमिति विपक्षव्यावृत्तिरतस्तथा । अपि च तादात्म्ये तदुत्पादे च यस्य प्रतीतिर्विपक्षे हेत्वभावप्रतीत्या, तदभावप्रतीतिरपि दृश्यानुपलब्धेः, अनुपलब्धि- श्चानुमानभूतत्यात् स्वसाध्येन विपक्षे हेत्वभावेन सह तादात्म्यप्रतीत्या तदुत्पादप्रतीत्या वा प्रवर्त्तते, तस्या अपि स्वसाध्येन तादात्म्यतदुत्पादनिश्चयो विपक्षे वृत्त्यभावप्रतीत्या, तदभाव- प्रतीतिश्चानुपलब्ध्यन्तरसापेक्षा, यावान् प्रतिषेधः स सर्वोऽप्यनुपलब्धिविषय इत्यभ्युपग- मात् । ततश्चानवस्थापाताद् व्यतिरेकासिद्धौ तादात्म्यतदुत्पादासिद्धेर्न स्वभावः कार्यं वा हेतुः । किञ्च तादात्म्यतदुत्पत्त्योरभावेऽपि कृत्तिकोदयरोहिण्यस्तङ्गमनयोर्गम्यगमकभावः प्रतीयते । तस्मात् कार्यकारणभावाद् वा नियमः स्वभावाद् वेत्यनालोचिताभिधानम् । के साथ अनित्यत्व का तादात्म्य नहीं है । (उ.) यह सत्य है कि उन दोनों में प्रामाणिक तादात्म्य नहीं है, किन्तु काल्पनिक तादात्म्य तो है, तुम लोगों ने काल्पनिक तादात्म्य को ही तो अनुमानोदय के परम सहायक रूप में समर्थन किया है ? अतः प्रकृत में विपक्षव्यावृत्ति का रहना और न रहना दोनों ही बराबर हैं । और भी बात है कि व्याप्ति के प्रयोजक तादात्म्य और उत्पत्ति के रहने पर विपक्ष में हेतु के जिस अभेद की प्रतीति से जिसकी प्रतीति होगी, उस हेत्वभाव की प्रतीति के लिए भी दृश्यानुपलब्धि की आवश्यकता होगी, क्योंकि अभाव विषयक सभी प्रतीतियों के लिए दृश्यानुपलब्धि को कारण माना गया है । दृश्यानुपलब्धि रूप अनुमान प्रमाण के लिए भी विपक्ष में हेत्वभाव के साथ-साथ हेतु में साध्य के तादात्म्य या उत्पत्ति की प्रतीति आवश्यक होगी । इस तादात्म्य और उत्पत्ति की प्रतीति के लिए भी विपक्ष में हेत्वभाव की प्रतीति आवश्यक होगी । एवं इस हेत्वभाव की प्रतीति के लिए फिर दूसरी दृश्यानुपलब्धि आवश्यक होगी, क्योंकि जितने भी प्रतिषेध हैं, सभी को अनुपलब्धि प्रमाण का विषय माना गया है । इस अनवस्था दोष के कारण विपक्ष में हेतुव्यतिरेक (हेत्वभाव) की सिद्धि सम्भव न होने के कारण कथित तादात्म्य एवं उत्पत्ति की सिद्धि ही सम्भव नहीं है, अतः हेतु में साध्य का तादात्म्य या हेतु का साध्य से उत्पन्न होना ही हेतु में साध्य की व्याप्ति का कारण नहीं हो सकता । दूसरी बात यह है कि कृत्तिका नक्षत्र का उदय एवं रोहिणी नक्षत्र का अस्त इन दोनों में ज्ञाप्यज्ञापकभाव की प्रतीति होती है, किन्तु इन दोनों में से न किसी का किसी में तादात्म्य है और न किसी की उत्पत्ति ही किसी से होती है । तस्मात् बिना पूर्ण आलोचन के ही यह कह दिया गया है कि 'नियम' अर्थात् व्याप्ति की प्रतीति हेतु में साध्य की जन्यता या तादात्म्य की प्रतीति से ही होती है ।

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४९९

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४९९ न्यायकन्दली स्वभावेन हि कस्यचित् सह सम्बन्धो नियतो निरूपाधिकत्वात्, उपाधिकृतो हि सम्बन्धः तदपगमार्थं निवर्तते, न स्वाभाविकः । यदि धूमस्योपाधिकृतो वह्निसम्बन्धः ? उपाधय उपलब्धाः स्युः, शिष्याचार्ययोरिव प्रत्यासत्तावध्ययनम् । नहि वह्निधूमयोर- सकृदुपलभ्यमानयोस्तदुपाधीनामनुपलम्भे किञ्चिद् बीजमस्ति । न चोपलभ्यमानस्य नियमेनानुपलब्ध्या भवन्त्युपाधयः, ते हि यदि स्वरूपमात्रानुबन्धिनस्तथाप्यव्य- भिचारसिद्धिः, तत्कृतस्यापि सम्बन्धस्य यावद्द्रव्यभावित्वात् । अथागन्तवः ? तत्कारणान्यपि प्रतीयेरन् । उपाधयस्तत्कारणानि च सर्वाण्यतीन्द्रियाणीति गुर्वीयं कल्पना । यस्य चोपाधयो न सन्ति, स धूमः कदाचित् स्वतन्त्रोऽप्युपलभ्येत, यथेन्धनोपाधिकृतधूमसम्बन्धो वह्नेः शुष्केन्धनकृताधिपत्यो विधूमः प्रत्यवमृश्यते । न च तथा संविद्यन्तरे धूमः कदाचिन्निरग्निराभाति । तस्मादुपलब्धिलक्षणप्राप्ताना- अभिप्राय यह है कि स्वभाव के द्वारा ही किसी भी वस्तु का किसी वस्तु के साथ जो सम्बन्ध स्थापित होता है, वही उपाधि से शून्य होने के कारण 'नियम' कहलाता है । उपाधिमूलक सम्बन्ध ही उपाधि के हटने पर टूटता है, स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं । यदि धूम में वह्नि का सम्बन्ध भी उपाधिमूलक ही हो, तो फिर उन उपाधियों की उपलब्धि उसी प्रकार होनी उचित है, जिस प्रकार कि शिष्य और आचार्य की उपलब्धि के बाद अध्ययन रूप उपाधि की उपलब्धि होती है । इसका कोई हेतु नहीं मालूम होता कि बार-बार उपलब्ध होनेवाले वह्नि और धूम के सम्बन्ध की उपलब्धि तो हो, किन्तु उसकी प्रयोजिका उपाधि की उपलब्धि न हो । इसमें भी कोई हेतु नहीं है कि उपलब्ध होनेवाली वस्तुओं के सम्बन्ध की उपाधियाँ नियमतः अनुपलब्ध ही हों । ये (उपाधियाँ) यदि अपनी स्वरूपसत्ता के कारण ही अपने उपधेयों (साध्य और हेतुओं) के सम्बन्ध के कारण हैं, फलतः नित्य हैं, तो भी व्याप्ति की सिद्धि हो ही जाती है, क्योंकि यह औपाधिक सम्बन्ध अपने उपधेय रूप सम्बन्धियों की सत्ता तक विद्यमान ही रहता है । यदि ये आगन्तुक हैं ? अर्थात् कारणों से उत्पन्न होते हैं, तो फिर उनके कारणों की भी प्रतीति होनी चाहिए । यह कल्पना तो बहुत गौरवपूर्ण होगी कि उपाधियाँ और उनके कारण सभी अतीन्द्रिय ही हैं । जिन हेतुओं के उपाधि नहीं होते, वे कदाचित् स्वतन्त्र रूप से (साध्यसम्बन्ध के बिना) भी उपलब्ध होते हैं । किन्तु उपाधि से रहित धूम हेतु कभी भी स्वतन्त्र रूप से (वह्नि को छोड़कर) उपलब्ध नहीं होता है, जैसे कि उपाधिमूलक सम्बन्ध के योग्य वह्नि ही जब सूखी हुई लकड़ियों से उत्पन्न होती है, तो बिना धूम सम्बन्ध के भी देखी जाती है, यद्यपि वह्नि ही जब गीली लकड़ी से उत्पन्न होती है,

५०० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- न्यायकन्दली मुपाधीनामनुपलम्भादभावप्रतीतौ (उपलब्धानामनुपलम्भादभावप्रतीतौ) उपलब्धानां शेषाका- लेन्धनावस्थाविशेषाणां पुनः पुनर्दर्शनेषु व्यभिचारादहेतुत्वनिश्चये सति निखिलदेश- कालादिविशेषाध्याहारेण न उपाध्यभावोपलब्धिदोषः । सहभावदर्शनजसंस्कारसहकारिणा निरस्तप्रतिपक्षशङ्केन चरमप्रत्यक्षेण धूमसामान्यस्याग्निसामान्येन स्वभावमात्राधीनं सहभावं निश्चित्य इदमनेन नियतमिति नियमं निश्चिनोति । यद्यपि प्रथमदर्शनेऽपि सहभावो गृहीतः, तथापि न नियमग्रहणम् । न हि सहभावमात्रान्नियमः, अपि तु निरुपाधिकसहभावात् । निरुपाधिकत्वं च तस्य भूयोदर्शनाभ्यासावशेषमित्यतो भूयः सहभावग्रहणबलभुवा सविकल्पकप्रत्यक्षेण सोऽध्यवसीयत इति । एतेन प्रत्यक्षे उपलभ्यीयमानविषयत्वाद- तीतानागतासु व्यक्तिषु कथं नियमग्रहणमिति प्रत्युक्तम् । न हि तब उसमें धूम के उपाधिमूलक सम्बन्ध की भी योग्यता है, किन्तु धूम की कोई भी प्रतीति वह्नि सम्बन्ध को छोड़कर नहीं होती है । तस्मात् जिन उपाधियों में उपलब्ध होने की योग्यता है (अर्थात् जिनकी उपलब्धि हो सकती है), उनकी अनुपलब्धि से ही उपाधियों के अभाव की सिद्धि होती है । इस प्रकार उपाधि के अभाव की प्रतीति हो जाने पर आर्द्वेन्धन संयोगरूप उपाधि से युक्त वह्नि हेतु में बार-बार धूम का व्यभिचार देखे जाने पर वह्नि हेतु में अहेतुत्व (हेत्वाभासत्व) का निश्चय हो जाता है । अतः 'सभी देशों में या सभी कालों में उपाधि के अभाव की उपलब्धि नहीं हो सकती' केवल इसी कारण सभी हेतुओं में उपाधि संशय की आपत्ति नहीं दी जा सकती । अतः धूम सामान्य में वह्नि सामान्य का जो स्वाभाविक सामानाधिकरण्य है, उसके निश्चय से ही 'यह (धूम) इससे (वह्नि से) नियत है' इस प्रकार से (व्याप्ति रूप) नियम का ज्ञान होता है । (व्याप्ति के कारणीभूत उक्त सामानाधिकरण्य का निश्चय) प्रतिपक्ष शङ्का से रहित उस अन्तिम प्रत्यक्ष से होता है, जिसमें उसे सहभाव विषयक प्रत्यक्ष से उत्पन्न संस्कार के साहाय्य की भी अपेक्षा होती है । यद्यपि प्रथमतः ही जब धूम और वह्नि साथ-साथ देखे जाते हैं, तब भी दोनों का सामानाधिकरण्य गृहीत ही रहता है, तथापि उससे नियम (व्याप्ति) का ग्रहण नहीं होता; किन्तु उपाधिरहित सहभाव से ही व्याप्ति का ग्रहण होता है । बार-बार साध्य और हेतु को साथ देखने से ही उपाधि के अभाव का निश्चय होता है । अतः बार-बार सामानाधिकरण्य के दर्शन के द्वारा बलप्राप्त (सामानाधिकरण्य विषयक) सविकल्पक प्रत्यक्ष से ही वह (नियम) गृहीत होता है । इससे नियम (व्याप्ति ग्रहण के प्रसङ्ग में इस आपत्ति का भी समाधान हो जाता है कि (प्र.) प्रत्यक्ष केवल वर्त्तमान काल की वस्तुओं का ही होता है, अतीत में बीते हुए एवं भविष्य काल में होनेवाले

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५०१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५०१ न्यायकन्दली विशेषनिष्ठं व्याप्तिग्रहणमाचक्ष्महे । विशेषहान्या सामान्येन व्याप्तिग्रहणे तु सर्वत्रैव निर्वि- शङ्कः प्रत्ययः, तस्य सर्वत्रैकरूपत्वात् । किं व्यक्तयो व्याप्तावप्रविष्टा एव ? को वै ब्रूते न प्रविष्टा इति । किन्तु सामान्यरूपतया, न विशेषरूपेण । अत एव धूमसंविन्त्या वह्निमात्र- मेवानुसन्दधानस्तमनुधावति, न विशेषमाद्रियते । यदि तु सामान्येन सर्वत्र निश्चितेऽपि नियमे निष्प्रामाणिकैराशङ्का क्रियते, तदा त्वत्पक्षेऽपि प्रत्यक्षेण दृष्टासु वह्निधूमव्यक्तिषु गृही- तेऽपि कार्यकारणभावे देशकालव्यवहितात् तद्भावसन्देहादत्रानुमानाप्रवृत्तिं को निवारयति ? अथोच्यते-भूयोदर्शनेन कार्यकारणभावो निर्धार्यते सकृद्दर्शनेन तदुपाधिजत्य- शङ्काया अनिवर्तनात् । भूयोदर्शनं च सामान्यविषयम्, क्षणिकानां व्यक्तीनां पुनः पुनर्दर्शनाभावात् । तेनानग्निब्यावृत्तस्याधूमव्यावृत्तस्य च सामान्य- अनन्त हेतु (धूमादि) व्यक्तियों में (वह्नि आदि) साध्य के नियम (व्याप्ति) का (प्रत्यक्ष रूप) ग्रहण कैसे होगा ? (उ.) हम लोग विशेष व्यक्तियों में अलग-अलग व्याप्तिग्रहण नहीं मानते, किन्तु विशेष को छोड़कर केवल हेतुसामान्य में साध्यसामान्य की व्याप्ति का ग्रहण मानने से ही सभी हेतुओं में व्याप्ति का शङ्का से सर्वथा रहित निश्चय हो जाएगा । क्योंकि सामान्यमुखी व्याप्ति सभी व्यक्तियों में समान है । (प्र.) तो क्या व्याप्तिग्रहण में विशेष्य रूप से (हेतु) व्यक्तियों का प्रवेश नहीं होता ? (उ.) कौन कहता है कि व्याप्ति के ग्रहण में व्यक्तियों का प्रवेश नहीं होता है । 'व्याप्ति सामान्य विषयक ही है, विशेष विषयक नहीं' इसका इतना ही अभिप्राय है कि व्याप्तिबुद्धि में विशेष भी सामान्य रूप से ही भासित होते हैं, अपने असाधारण तत्तद्व्यक्तित्वादि रूपों से नहीं । अत एव धूम के ज्ञान से वह्नि सामान्य की अनुमिति के द्वारा प्रमाता वह्नि सामान्य का ही अनुधावन करता है, किसी विशेष प्रकार के वह्नि का आदर वह नहीं करता । यदि हेतु सामान्य में साध्य सामान्य की व्याप्ति के निश्चित हो जाने पर भी अप्रामाणिक लोग यह शङ्का करें कि तुम्हारे मत में भी यह कहा जा सकता है कि प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत धूम और प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत वह्नि इन दोनों में कार्यकारणभाव के गृहीत होने पर भी विभिन्न देशों के धूमों और वह्नियों में एवं विभिन्न काल के धूमों और वह्नियों में कार्यकारणभाव का सन्देह बना ही रहेगा तो फिर इस सन्देह के कारण सभी अनुमानों के उच्छेद का निवारण कौन कर सकेगा ? यदि यह कहें कि (प्र.) हेतु और साध्य को बार-बार एक स्थान में देखने (भूयो- दर्शन) से दोनों में कार्यकारणभाव का निश्चय होता है । कहीं एक बार हेतु और साध्य दोनों में सामानाधिकरण्य के देखने पर भी यह संशय रह ही जाता है कि इन दोनों का सम्बन्ध स्वाभाविक है, या औपाधिक ? बार-बार का यह देखना (भूयो- दर्शन) साध्य सामान्य का हेतु सामान्य के साथ ही हो सकता है, एक साध्य व्यक्ति

५०२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- न्यायकन्दली विषयः कार्यकारणभाव एकत्र निश्चीयमानः सर्वत्र विनिश्चितो भवति, सामान्यस्यैक- त्यादिति चेत् ? अस्माभिरपीत्थमेव सर्वत्र निश्चीयमानो नियमः किं भवद्भ्यो न रोचते ? किञ्च, भवतां प्रत्यक्षागोचरः सामान्येन कार्यकारणभावः, अनुभवतोऽवस्तुत्वात्, व्यक्तय- स्तादृश्यः । तासु सर्वाणि प्रत्यक्षेण गृह्यन्ते । न चातीतानागतानां व्यक्तीनां मनसा संकलनमिति न्याय्यम्, मनसो बहिरर्थे स्वातन्त्र्येऽन्धबधिराद्यभावप्रसङ्गात् । दृष्टासु व्यक्तिषु कार्यकारणभावोऽध्यवसायश्चादृष्टासु नानुमानोदयस्तदन्वयत्वात् । नापि व्यक्तीनां साध्य- साधनभावो युक्तः, परस्परमनन्वितत्वात् । न च तासामेकेन सामान्येनोपग्रहः, वस्त्व- वस्तुनोः सम्बन्धाभावात्, असम्बद्धस्योपग्राहकत्वे चातिप्रसङ्गात् । तत्किंविषयः प्रत्यक्ष- साधनस्तदुत्पादविनिश्चयः, यस्मादनुमानप्रवृत्तिरिति न विद्मः । का एक हेतु व्यक्ति के साथ नहीं, क्योंकि व्यक्ति क्षणिक हैं । अतः उनको बार बार साथ देखना सम्भव नहीं है । तस्मात् अनग्निनाव्यावृत्त (अपोह या अग्नित्व जाति) अधूम व्यावृत्त (अपोह या धूमत्व जाति) इन दोनों का सामान्य विषयक कार्यकारणभाव ही गृहीत होता है । 'धूम सामान्य की उत्पत्ति वह्निसामान्य से होती है' यह निश्चित हो जाने पर सभी धूमों और सभी वह्नियों में कार्यकारणभाव गृहीत हो जाता है, क्योंकि सामान्य (अपोह) एक ही है । (उ.) इसी प्रकार जब हम हेतु सामान्य में साध्य सामान्य के नियम (व्याप्ति) का उपपादन करते हैं, तो आप लोगों को क्यों पसन्द नहीं आता ? आप लोगों का सामान्य (अपोह) चूँकि अभाव रूप है, अतः सामान्यों में आप लोग (बौद्धगण) कार्यकारणभाव का अनुभव नहीं कर सकते । व्यक्ति सभी प्रत्यक्ष के विषय हैं अतः उनमें कार्यकारणभाव का ग्रहण होता है । यह कहना भी उचित नहीं है कि (प्र.) भूत और भविष्य व्यक्तियों का (चक्षुरादि से ज्ञान सम्भव न होने पर भी) मन से ग्रहण हो सकता है (अतः अतीत और अनागत व्यक्तियों में भी कार्यकारणभाव का ग्रहण असम्भव नहीं है) । (उ.) (यह सम्भव इसलिए नहीं है कि) मन को यदि बाह्य अर्थों के ग्रहण में स्वतन्त्र (अर्थात् चक्षुरादि निरपेक्ष) मान लिया जाय तो जगत् में कोई गूँगा या बहरा न रह जाएगा । इस प्रकार भी बौद्धों के मत से उपपत्ति नहीं की जा सकती कि प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत व्यक्तियों में ही कार्यकारण भाव गृहीत हो सकता है, किन्तु (व्याप्ति) का निश्चय अदृष्ट व्यक्तियों में भी होता है, चूँकि व्यक्ति भिन्न भिन्न हैं । व्यक्तियों में परस्पर कार्यकारणभाव भी सम्भव नहीं है, क्योंकि वे परस्पर असम्बद्ध हैं । उन सभी व्यक्तियों का एक सामान्य धर्म (अपोह) के द्वारा संग्रह भी सम्भव नहीं है, क्योंकि वस्तु (भाव) और अवस्तु (अभाव) इन दोनों में सम्बन्ध हो ही नहीं सकता, यदि सम्बन्ध के न रहने पर भी संग्रह मानें तो (अघटव्यावृत्ति रूप अपोह से पट व्यक्तियों का संग्रह रूप) अतिप्रसङ्ग होगा । अतः यह

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५०३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५०३ प्रशस्तपादभाष्यम् एवं सर्वत्र देशकालाविनाभूतमितरस्य लिङ्गम् । शास्त्रे च कार्यादिग्रहणं निदर्शनार्थं कृतं नाव- इसी प्रकार और सभी स्थानों में एक वस्तु में जिस किसी दूसरी वस्तु की दैशिक और कालिक व्याप्ति रहती है, वह एक वस्तु उस दूसरे की ज्ञापक हेतु होती है। वैशेषिक सूत्र में जो व्याप्ति के लिए कार्यादि सम्बन्धों का उल्लेख है, वह न्यायकन्दली एवं देशकालाविनाभूतमितरस्य लिङ्गम्, यथा धूमो वह्नेर्लिङ्गम् । एवं देशाविनाभूतं कालाविनाभूतं चेतरस्य साध्यधर्मस्य लिङ्गम् । यथा काश्मीरेषु सुवर्णभाण्डागारिकपुरुषैर्यव- वाटिकासंरक्षणं यवनालेषु हेमाङ्कुरोद्भेदस्य लिङ्गम् । कालाविनाभूतं यथा प्राग्ज्योतिषाधिपते- र्वेश्मनि प्रातर्गायन्यादीनि नृपतिप्रबोधस्य लिङ्गम् । यदि देशकालाविनाभावमात्रेण गमकत्वं ननु सूत्रविरोधः ? अस्येदं कार्यं कारणं संयोगि विरोधि समवायि चेति लैङ्गिकमिति, समझ में नहीं आता कि प्रत्यक्ष के द्वारा किसमें उत्पत्ति का निश्चय होगा ? जिससे कि अनुमान की प्रवृत्ति होगी । इसी प्रकार (साध्य की) दैशिक या कालिक व्याप्ति से युक्त एक पदार्थ (हेतु) दूसरे (साध्य) का ज्ञापक हो जाता है । जैसे कि धूम वह्नि का ज्ञापक हेतु है । (अभिप्राय यह है कि) दैशिक और कालिक व्याप्ति से युक्त 'एक' (हेतु) पदार्थ 'इतर' का अर्थात् साध्य रूप धर्म का ज्ञापक हेतु होता है । (दैशिक व्याप्ति से युक्त हेतु का उदाहरण यह है) जैसे कि काश्मीर देश में जब यह देखा जाता है कि यव की क्यारियों का संरक्षण सोने के खजाने के अधिकारी लोग कर रहे हैं, तब यह समझा जाता है कि यव की क्यारियों में केसर के अङ्कुर उग आये हैं, अतः काश्मीर देश की यव की क्यारियों का सोने के खजाने के अधिकारियों द्वारा संरक्षण (रूप क्रिया) यव की क्यारियों में केसर के अङ्कुर का ज्ञापक हेतु है । (एवं कालिक व्याप्ति से युक्त हेतु का उदाहरण यह है) जैसे कि प्राग्ज्योतिषपुर (आसाम) के राजगृह में प्रातःकालिक गाना-बजाना वहाँ के राजा के जागरण का ज्ञापक हेतु है । (प्र.) यदि दैशिक व्याप्ति और कालिक व्याप्ति केवल इन दोनों सम्बन्धों में से किसी के रहने से ही हेतु में साध्य को समझाने का सामर्थ्य माना जाय

५०४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- प्रशस्तपादभाष्यम् धारणार्थम्, कस्मात् ? व्यतिरेकदर्शनात् । तद्यथा अध्वर्यु्रों श्रावयन् व्यवहितस्य होतुलिङ्गम्, चन्द्रोदयः समुद्रवृद्धेः कुमुदविकासस्य च केवल उदाहरण के लिए ही है, अवधारण के लिए नहीं। क्योंकि (कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों में से किसी के न रहने पर भी अनुमान होता है) जैसे कि ओंकार को सुनाते हुए अध्वर्यु समूह अपने से व्यवहित भी होता (हवन करने वाले) के अनुमापक होते हैं । अथवा चन्द्र का उदय समुद्र की वृद्धि और कुमुद के विकास का अनुमापक होता है । अथवा शरद् ऋतु में जल की न्यायकन्दली तत्राह-शास्त्रे च कार्यादिग्रहणं निदर्शनार्थं कृतं नावधारणार्थमिति । अस्येदमिति सूत्रे कार्यादीनामुपादानं लिङ्गनिदर्शनार्थं कृतम्, न त्वेतावन्त्येव लिङ्गानीत्यवधारणार्थम् । कथ- मेतदित्याह-कस्मादिति । उत्तरमाह-व्यतिरेकदर्शनादिति । कार्यादिव्यतिरेकेणाप्यनुमानदर्श- नाद् नावधारणार्थम् । (तत्र) यत्र कार्यादीनां व्यतिरेकस्तद्दर्शयति- यथाध्वर्यु्रों श्रावयन् व्यवहितस्य होतुलिङ्गमिवित । अध्वर्युर्होतारमोम् इत्येवं श्रावयति नान्यमित्येवं यस्य पूर्वमवगति- तो फिर 'अस्येदं कार्यम्' इस सूत्र का विरोध होगा (क्योंकि इस सूत्र के द्वारा कार्यत्व, कारणत्व, संयोग, विरोध एवं समवाय इतने सम्बन्धों को ही हेतु में साध्य के ज्ञापन के सामर्थ्य का प्रयोजक माना गया है, दैशिक और कालिक व्याप्ति को नहीं) । इसी प्रश्न का समाधान "शास्त्रे कार्यादिग्रहणं निदर्शनार्थं कृतम्, नावधारणार्थम्" इस वाक्य के द्वारा किया गया है । अर्थात् वैशेषिक सूत्र रूप शास्त्र में जो 'कार्यत्वादि' सम्बन्ध का उपादान किया गया है, उसका यह अवधारण रूप अर्थ अभिप्रेत नहीं है कि कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों में से ही किसी के रहने से हेतु साध्य का ज्ञापक होता है । किन्तु साध्य के 'व्याप्ति रूप सम्बन्ध से युक्त हेतु ही ज्ञापक होता है' इस नियम के उदाहरण रूप में ही कार्यत्वादि सम्बन्धों का उल्लेख किया गया है कि साध्य के इन कार्यत्वादि सम्बन्धों से युक्त हेतु में साध्य की व्याप्ति रहती है । 'कस्मात्' इस वाक्य के द्वारा प्रश्न किया गया है कि कैसे समझते हैं कि उक्त सूत्र में 'कार्यादि' का उपादान अवधारण के लिए नहीं है ? 'व्यतिरेकदर्शनात्' इस वाक्य से उक्त प्रश्न का उत्तर दिया गया है । अर्थात् कथित कार्यत्वादि सम्बन्ध के न रहने पर भी हेतु से साध्य का बोध होते देखा जाता है, अतः समझते हैं कि कार्यत्वादि सम्बन्धों का उल्लेख 'अवधारणा' के लिए नहीं है । इन कार्यत्वादि सम्बन्धों के रहने पर भी जहाँ अनुमिति होती है, उसका प्रदर्शन 'यथाऽध्वर्यु्रों श्रावयन् व्यवहितस्य होतुलिङ्गम्' इस वाक्य के द्वारा किया गया है । जिस पुरुष को यह नियम पहले से अवगत है कि होता को ही अध्वर्यु ओंकार सुनाते हैं किसी दूसरे को नहीं, वही पुरुष अध्वर्यु को ओंकार का उच्चारण करते हुए

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५०५

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५०५ प्रशस्तपादभाष्यम् शरदि जलप्रसादोऽगस्त्योदयस्येति । एवमादि तत् सर्वमस्येदमिति सम्बन्धमात्र- वचनात् सिद्धम् । स्वच्छता अगस्त्य नाम के नक्षत्र के उदय का ज्ञापक होती है । (व्याप्ति के प्रयोजक) कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों से भिन्न इन वस्तुओं में व्याप्ति के प्रयोजक अवशिष्ट सभी सम्बन्धों का संग्रह सूत्रकार ने उक्त सूत्र के 'अस्येदम्' इस वाक्य के द्वारा किया है । न्यायकन्दली भूतस्य औं इति श्रावयन्तमध्वर्युं प्रतीत्य कुड्यादिव्यवहिते होतरि अनुमानं होताप्यत्रास्तीति । न चाध्वर्युः होतुः कार्यं न कारणं न संयोगे (गी) न च विरोधे (धी) न समवाये (यी) चेति व्यतिरेकः । उदाहरणान्तरमाह- चन्द्रोदयः समुद्रवृद्धेरित्यादि । यदा चन्द्र उदेति तदा समुद्रो वर्द्धते कुमुदानि च विकसन्तीति नियमो येनावगतः, तस्य चन्द्रोदयः समुद्रवृद्धेः कुमुदविकासस्य च लिङ्गं स्यात् । न च चन्द्रोदयः समुद्रवृद्धि- कुमुदविकासयोः कार्यम् । उदयो हि चन्द्रस्य विशिष्टदेशसंयोगः, स च चन्द्रक्रियाकार्यः, न समुद्रवृद्ध्यादिनिमित्तः । न चायं समुद्रवृद्धेः कारणं नापि कुमुदविकासस्य, उत्कल्लोललक्षणत्वाद् वृद्धेः, पत्राणां परस्परविभागलक्षणस्य देखता है और दीवाल से छिपे रहने के कारण होता को नहीं देखता, तब भी 'होता' का यह अनुमान उसे होता है कि यहाँ होता भी अवश्य है । किन्तु अध्वर्युंरूप हेतु होतारूप साध्य का न कार्य है, न कारण, न संयोगी है, न विरोधी और न समवायी । (अतः सूत्र में कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों में से अध्वर्यु में होता का कोई भी सम्बन्ध नहीं है, किन्तु उक्त अध्वर्यु से होता का अनुमान होता है, अतः 'कथित कार्यत्वादि सम्बन्ध के कारण ही हेतु ज्ञापक होता है' इस नियम में यही व्यतिरेक व्यभिचार है) । 'चन्द्रोदयः समुद्रवृद्धेः' इस वाक्य के द्वारा भाष्यकार ने उक्त व्यतिरेक व्यभि- चार का दूसरा उदाहरण कहा है । 'जिस समय चन्द्रमा का उदय होता है, उस समय समुद्र बढ़ जाता है और कुमुद के पुष्प प्रफुल्लित हो जाते हैं । यह नियम जिस पुरुष को ज्ञात है, उसके लिए चन्द्रमा का उदय समुद्रवृद्धि और कुमुदिनी के विकास का अवश्य ही ज्ञापक लिङ्ग होगा, किन्तु चन्द्रमा का उदय न समुद्र की वृद्धि से उत्पन्न होता है, न कुमुद के विकास से, क्योंकि चन्द्रमा का किसी विशेष देश के साथ संयोग ही चन्द्रमा का उदय है, चन्द्रमा का यह संयोग चन्द्रमा में रहनेवाली क्रिया से ही उत्पन्न होगा, समुद्र की वृद्धि प्रभृति कारणों से नहीं, (अतः चन्द्रमा का उदय समुद्रवृद्धि का या कुमुद के विकास का कार्य नहीं है) एवं चन्द्रमा का उदय न समुद्र की वृद्धि का कारण है, न कुमुद के विकास का, क्योंकि समुद्र की वृद्धि है उसका उफान, एवं कुमुद का विकास है

सूत्रकार की न्यूनता होती है) इसी प्रश्न का समाधान भाष्यकार ने 'एवमादि'

५०६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- न्यायकन्दली च विकासस्य तत्कालसन्निहितकारणाधीनकर्मजन्यत्वादित्यादि वाच्यम् । शरदि जलप्रसादोऽगस्त्योदयस्य प्रसादो वैशद्यम्, तच्चरदि प्रतीयमानमगस्त्योदयस्य लिङ्गम्, न कालान्तरे, व्यभिचारात् । कार्यादिव्यतिरिक्तमपि यदि लिङ्गमस्ति तर्हि नूनं तत्र सर्वलिङ्गानामनवरोधादत आह- एवमादि तत् सर्वमस्येदमिति सम्बन्धमात्रवचनात् सिद्धमिति । अध्वर्युरीं श्रावयतीत्येव- मादिपदाविनाभूतं लिङ्गं तत् सर्वमस्येदमितिflu पदेन सम्बन्धमात्रवचनात् सिद्धं परिगृहीतम् । अर्थान्तरमर्थान्तरस्य लिङ्गमिति न युज्यते (इति) प्रसक्तिः स्यादिति पर्यनुयोगमाशङ्क्येदमुक्तं सूत्रकारेणास्येदमिति । लिङ्गमित्यन्वयविशिष्टेऽप्यस्य साध्यस्येदं सम्बन्धीति कृत्य अस्येदं लिङ्गं न सर्वस्येति सामान्येन सम्बन्धमात्रस्य लिङ्गत्वप्रतिपादनात् । यद् यस्य उसके पत्रों का एक दूसरे से विभाग, ये दोनों ही उस समय अपने कारणों से उत्पन्न होनेवाले कर्मों से ही उत्पन्न होंगे (चन्द्रमा की वृद्धि से नहीं, अतः चन्द्रमा का उदय समुद्रवृद्धि का कार्य भी नहीं है) 'शरदि जलप्रसादोऽगस्त्योदयस्य लिङ्गम्' (इस वाक्य में प्रयुक्त) 'प्रसाद' शब्द का अर्थ है वैशद्य (स्वच्छता), यह वैशद्य शरद् ऋतु में (ही) ज्ञात होकर अगस्त्य नाम के नक्षत्र के उदय का ज्ञापक लिङ्ग होता है, अन्य ऋतु में ज्ञात होने पर भी नहीं, क्योंकि व्यभिचार देखा जाता है (अर्थात् ग्रीष्मादि ऋतुओं में जल में स्वच्छता का भान होने पर भी अगस्त्योदय की प्रतीति नहीं होती) । (प्र.) (यदि साध्य के) कार्यादि न होने पर भी कोई हेतु साध्य का ज्ञापक हो सकता है, तो फिर 'अस्येदं कार्यम्' इत्यादि सूत्र के द्वारा लिङ्ग के जिन प्रकारों का उल्लेख किया गया है, उनसे सभी हेतुओं का संग्रह नहीं होता है ? (जिससे सूत्रकार की न्यूनता होती है) इसी प्रश्न का समाधान भाष्यकार ने 'एवमादि' इत्यादि भाष्यसन्दर्भ के द्वारा दिया है । 'एवमादि' अर्थात् साध्य के कार्यादि से भिन्न और सभी हेतु उक्त सूत्र के 'अस्येदम्' इस सम्बन्धबोधक वाक्य के द्वारा संगृहीत होते हैं । अभिप्राय यह है कि 'अध्वर्युरीं श्रावयति' इत्यादि वाक्यों के द्वारा जिन हेतुओं का उल्लेख किया गया है वे सभी हेतु उक्त सूत्र के ही 'अस्येदम्' इस सम्बन्धबोधक वाक्य के द्वारा 'सिद्ध' हैं, अर्थात् संगृहीत हैं । किन्तु "अर्थान्तर (साध्य के कार्यत्वादि सम्बन्धों से रहित कोई भी अर्थ) अर्थान्तर का (अर्थात् हेतु के कारणत्वादि सम्बन्धों से शून्य किसी दूसरे अर्थ का) साधक हेतु नहीं हो सकता" उक्त सूत्र में कार्यत्वादि सम्बन्धों के उल्लेख से इस अवधारण की स्थिति हो जायगी । इस अभियोग की सम्भावना को हटाने के लिए ही सूत्रकार ने उक्त सूत्र में (कार्यत्वादि सम्बन्धों के बोधक वाक्यों के अतिरिक्त) 'अस्येदम्' इस वाक्य का भी प्रयोग किया है । 'इतरस्य लिङ्गम्' इत्यादि भाष्य के द्वारा लिङ्ग का भेद और सभी पदार्थों (साध्यों) में समान रूप से रहने पर भी 'इस साध्य का सम्बन्ध इसी हेतु में है' इस नियम के अनुसार यह नियम भी उपपन्न होता है

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५०७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५०७ प्रशस्तपादभाष्यम् तत्तु द्विविधम्-दृष्टं सामान्यतोदृष्टं च । तत्र दृष्टं प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजात्यभेदेऽनुमानम् । यथा गव्येव १. दृष्ट और २. सामान्यतोदृष्ट भेद से अनुमान दो प्रकार का है । जिस हेतु के साथ पूर्व में ज्ञात साध्य और वर्तमान में उसी हेतु के ज्ञाप्य साध्य दोनों अभिन्न हों, उस हेतु से उत्पन्न अनुमान ही 'दृष्ट' अनुमान है । जैसे कि पहले एक स्थान में गाय में ही केवल सास्नारूप हेतु न्यायकन्दली देशकालाद्यविनाभूतं तत् तस्य लिङ्गमित्युक्तम्, तदेव हि तस्य यद् यस्याव्यभिचारि (त्वेन) (यद्यस्य) व्यभिचारि न तत् तस्य, अन्यत्रापि भावात् । अपि भोः ! किमस्येदं कार्यमिति न सम्बन्धातीति ब्रूमहे, कार्यादिग्रहणं तर्हि किमर्थम् ? निदर्शनार्थमित्युक्तम् । अवश्यं हि शिष्यस्योदाहरणनिष्ठं कृत्वा किमप्यव्यभिचारि लिङ्गं दर्शनीयमिति सूत्रे कार्यादिकमुदाहृतम् । न तावन्त्येव लिङ्गानीत्यर्थः । भेदं कथयति- तत्तु द्विविधं दृष्टं सामान्यतोदृष्टं चेति । चशब्दोऽवधारणार्थः । तदनुमानं द्विविधमेव दृष्टमेकमपरं सामान्यतोदृष्टम् । तत्र तयोर्मध्ये दृष्टं प्रसिद्ध- कि 'इस साध्य का यही लिङ्ग है' । इस प्रकार सामान्य रूप से साध्य के सभी सम्बन्धियों में लिङ्गत्व का प्रतिपादन 'एवं सर्वत्र देशकालाविनाभूतमितरस्य लिङ्गम्' इस भाष्य के द्वारा किया गया है । अर्थात् जिसमें जिस दूसरे वस्तु की दैशिकी या कालिकी व्याप्ति है, वही उसका हेतु है । जिसमें जिसका व्यभिचार है, वह उसका हेतु नहीं है, क्योंकि उसके न रहने के स्थान में भी वह रहता है । (प्र.) तो क्या उक्त सूत्र में 'किमस्येदं कार्यम्' इस वाक्य के द्वारा यह कहते हैं कि 'साध्य का सम्बन्ध हेतु में नहीं है' ? यदि ऐसी बात है तो फिर 'कार्यादि' का उपादान ही उक्त सूत्र में व्यर्थ है ? इसी प्रश्न का उत्तर 'निदर्शनार्थम्' इस वाक्य से दिया गया है । अभिप्राय यह है कि शिष्यों को उदाहरण के द्वारा पूर्ण अभिज्ञ बनाकर ही यह समझना होगा कि 'साध्य का अव्यभिचारी ही उसका लिङ्ग है' । अतः सूत्र में कार्यादि सम्बन्धों का उल्लेख केवल उदाहरण के लिए है । इसका यह अभिप्राय नहीं है कि सूत्र में कथित कार्यादि सम्बन्धों से युक्त ही हेतु है, साध्य के और सम्बन्धों से युक्त भी हेतु हो सकते हैं, यदि वह सम्बन्ध अव्यभिचरित हो । 'तत्तु द्विविधम्-दृष्टम्, सामान्यतोदृष्टञ्च' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अनुमान के अवान्तर प्रकारों का निरूपण किया गया है । उक्त वाक्य में प्रयुक्त 'च' शब्द 'अवधारण' अर्थ का है । (तदनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि) कथित अनुमान दो ही प्रकार का है, एक है 'दृष्ट' और दूसरा है 'सामान्यतोदृष्ट' । 'तत्र' अर्थात् उन दोनों अनुमानों में से 'दृष्टं प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजात्यभेदेऽनुमानम्' 'प्रसिद्ध' अर्थात् हेतु के साथ पहले

५०८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- प्रशस्तपादभाष्यम् सास्नामात्रमुपलभ्य देशोन्तरेऽपि सास्नामात्रदर्शनाद् गवि प्रतिपत्तिः । प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजातिभेदे लिङ्गानुमेयधर्म- को देखकर, दूसरे स्थान में सास्ना को देखने के बाद गोविषयक प्रतिपत्ति (अनुमिति) होती है । जिस हेतु के साथ पूर्व में ज्ञात साध्य और उसी हेतु के द्वारा वर्त्तमान में ज्ञाप्य साध्य, दोनों विभिन्न जाति के हों, उस हेतु सामान्य और (वर्तमान में अनुमेय) साध्यसामान्य की व्याप्ति से जो अनुमान उत्पन्न होता है, उसे 'सामान्यतोदृष्ट' अनुमान कहते हैं । जैसे कि कृषक, न्यायकन्दली साध्ययोर्जात्यभेदेऽनुमानम् । प्रसिद्धं यत् पूर्वं लिङ्गेन सह दृष्टं साध्यं यत् सम्प्रत्यनुमेयं तयोरत्यन्तजात्यभेदे सति यदनुमानं तद् दृष्टम् । यथा गव्येव सास्नामात्रमुपलभ्य देशान्तरे गवि प्रतिपत्तिः । पूर्वं गोत्वजातिविशिष्टायामेव गोव्यक्तौ सास्नोपलब्ध्या सम्प्रत्यपि गोत्वजातिविशिष्टायामेव गोव्यक्तेरनुमानमत्यन्तजात्यभेदे । इदं च दृष्टमित्याख्यायते । सास्नामात्रदर्शनाद् वनान्तरे यदनुमीयते गोत्वसामान्यं तस्य स्वलक्षणं पूर्वं नगरे दृष्टमिति कृत्वा प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजातिभेदे लिङ्गानुमेयधर्म- सामान्यानुवृत्तितोऽनुमानं सामान्यतोदृष्टम् । प्रसिद्धं लिङ्गेन सह प्रतीतं जो साध्य ज्ञात है और जो साध्य अभी अनुमेय है, इन दोनों के जातितः अत्यन्त अभिन्न होने पर जो अनुमान होता है, वह 'दृष्ट' अनुमान है । जैसे कि पहले किसी गाय में ही सास्ना को देखकर दूसरे देश में गो का अनुमान होता है । पहले गोत्व जाति से युक्त गो व्यक्ति में ही सास्ना की उपलब्धि हुई, अभी भी सास्ना से जो गो की अनुमिति होती है, वह गोत्व जाति से युक्त गो व्यक्ति में ही होती है, अतः गो विषयक इन दोनों ज्ञानों में विषय होनेवाला गोत्व अत्यन्त अभिन्न (एक ही) है, तस्मात् यह 'दृष्ट' अनुमान कहलाता है । इसे दृष्ट अनुमान होने की युक्ति यह है कि वन में केवल सास्ना के देखने से जिस गोत्व जाति का अनुमान होता है, वह उसस्वरूप सेनगर में पहले से ही गो में देखा जा चुका है । "प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजातिभेदे लिङ्गानुमेयधर्मसामान्यानुवृत्तितोऽनुमानं सामान्य- तोदृष्टम्" (इस भाष्यवाक्य के) 'प्रसिद्धसाध्ययोः' इस पद से 'प्रसिद्धं लिङ्गेन सह प्रतीतं साध्यमनुमेयं ययोः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार अनुमान का साध्य एवं हेतु के साथ पहले गृहीत होनेवाला साध्य ये दोनों साध्य अभिप्रेत हैं । इन दोनों साध्यों में परस्पर अत्यन्त भेद के रहने पर भी हेतु सामान्य में साध्यसामान्य की व्याप्ति से जो अनुमान उत्पन्न होता है, वही 'सामान्यतोदृष्ट' अनुमान है । (इस अर्थ के बोधक

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५०९

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५०९ प्रशस्तपादभाष्यम् सामान्यानुवृत्तितोऽनुमानं सामान्यतोदृष्टम् । यथा कर्षकवणिग्राज- पुरुषाणां च प्रवृत्तेः फलवत्त्वमुपलभ्य वर्णाश्रमिणामपि दृष्टं प्रयोजन- मनुद्दिश्य प्रवर्तमानानां फलानुमानमिति । तत्र लिङ्गदर्शनं प्रमाणं वणिक् और राजपुरुषों की सभी सफल प्रवृत्तियों को देखकर वर्णाश्रमियों की उन धार्मिक प्रवृत्तियों से भी फल का अनुमान होता है, जिन प्रवृत्तियों के कोई प्रत्यक्ष फल नहीं दीख पड़ते । न्यायकन्दली साध्यमनुमेयं तयोरत्यन्तजातिभेदे सति, लिङ्गं चानुमेयधर्मश्च लिङ्गानुमेयधर्मौ, तयोः सामान्ये लिङ्गानुमेयधर्मसामान्ये, तयोरनुवृत्तिः लिङ्गानुमेयधर्मसामान्यानुवृत्तिः, ततो लिङ्गसामान्यस्य साध्यसामान्येन सहाविनाभावाद् यदनुमानं तत् सामान्यतोदृष्टम् । यथा कर्षक्वणिग्राजपुरुषाणां प्रवृत्तेः फलत्वमुपलभ्य वर्णाश्रमिणामपि दृष्टं प्रयोजन- मनुद्दिश्य प्रवर्तमानानां फलानुमानम् । कर्षकादिप्रवृत्तेः फलं दृष्ट्वा वर्णाश्रमिणां प्रवृत्तेरपि फलानुमानम्, कर्षकस्य प्रवृत्तेः फलं शस्यादिकम्, वणिग्राजपुरुषस्य च प्रवृत्तेः फलं काञ्चनमणिमुक्तावाजिधारणादिकम्, वर्णाश्रमिणां च प्रवृत्तेः फलं स्वर्गादिक- मित्यनयोरत्यन्तजातिभेदः । अनुमानोदयस्तु प्रवृत्तिसामान्यस्य फलवत्त्व- सामान्येनाविनाभावात् । अत एव चेदं सामान्यतोदृष्टमुच्यते, सामान्येन नियमदर्शनात् । 'लिङ्गानुमेयधर्मसामान्यानुवृत्तितोऽनुमानं सामान्यतोदृष्टम्' इस भाष्यवाक्य का विग्रह इस प्रकार है कि) लिङ्गं चानुमेयधर्मश्च लिङ्गानुमेयधर्मौ, तयोः सामान्ये लिङ्गानुमेयधर्म- सामान्ये, तयोरनुवृत्तिः लिङ्गानुमेयसामान्यानुवृत्तिः, ततो लिङ्गसामान्यस्य साध्यसामान्येन सहाविनाभावाद् यदनुमानं तत् 'सामान्यतोदृष्टम्' । 'यथा कर्षकवणिग्राजपुरुषाणां प्रवृत्तेः फलवत्त्वमुपलभ्य वर्णाश्रमिणामपि दृष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्य प्रवर्तमानानां फलानु- मानम्' । अर्थात् कृषकादि की प्रवृत्तियों की सफलता को देखकर वर्णाश्रमियों की उन प्रवृत्तियों में भी सफलता का अनुमान होता है, जिन प्रवृत्तियों की उत्पत्ति के लिए वे दृष्ट (सांसारिक) फलों का अनुसन्धान नहीं करते । अभिप्राय यह है कि भूमि जोतने की किसानों की प्रवृत्ति के फल हैं अन्न प्रभृति एवं बनियों तथा राजसेवा में लगे व्यक्तियों की प्रवृत्तियों के फल हैं, सुवर्ण, मणि, मुक्ता, हाथी, घोड़े प्रभृति; किन्तु वर्णाश्रमियों के (सन्ध्यावन्दनादि) प्रवृत्तियों के फल हैं स्वर्गादि । इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि साध्य और दृष्टान्त दोनों अत्यन्त विभिन्न जाति के हैं । फिर भी उक्त दृष्टान्त के द्वारा अनुमान की उत्पत्ति उस सामान्यमुखी व्याप्ति से होती है, जो प्रवृत्तिसामान्य का फलसामान्य के साथ है¹ । इसीलिए इस अनुमान को १. अभिप्राय यह है कि 'शिष्ट जनों की सभी प्रवृत्तियाँ सफल ही होती हैं' इस सामान्य व्याप्ति के बल से ही उक्त अनुमान होता है । किन्तु इस व्याप्ति के अवधारण के लिए

५१० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- प्रशस्तपादभाष्यम् प्रमितिरग्निज्ञानम् । अथवाऽग्निज्ञानमेव प्रमाणं प्रमितिरग्नौ गुणदोषमाध्यस्थ्यदर्शनमित्येतत् स्वनिश्चितार्थमनुमानम् । इनमें लिङ्ग (हेतु) का ज्ञान ही (अनुमान प्रमाण है) एवं (उससे उत्पन्न) अग्नि का ज्ञान ही (फलरूपा) प्रमिति है । अथवा (कथित) अग्नि का ज्ञान ही (अनुमान) प्रमाण है । अग्नि में उपादेयत्व, हेयत्व या उपेक्षा की बुद्धि ही प्रमिति (अनुमिति) है । ये सभी अनुमान करनेवाले पुरुष में ही निश्चय (अनुमिति) के उत्पादक (स्वार्थानुमान) हैं । न्यायकन्दली यः पुनरत्रानुमेयः स्वर्गादिलक्षणः फलविशेषो नैतज्जातीयस्य फलस्य नियमो दृष्टो वर्णाश्रमिणां प्रवृत्तेरपि जीविकामात्रमेव प्रयोजनमिति बार्हस्पत्याः, तदर्थमाह-दृष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्येति । सन्त्येव तथाविधाः पुरुषा ये खलु दृष्टनिस्पृहा वानप्रस्थादिकं व्रत- माचरन्ति; तेषां प्रवृत्तेरिदं फलानुमानमिति न सिद्धः साध्यत इत्यर्थः । 'सामान्यतोदृष्ट' कहा जाता है । चूँकि सामान्यमुखी व्याप्ति के दर्शन से ही इसकी उत्पत्ति होती है । बार्हस्पत्य¹ (चार्वाक) लोग (इस अनुमान में सिद्धसाधन दोष का उद्भावन इस प्रकार करते हैं कि) वर्णाश्रमियों की प्रवृत्ति से स्वर्गादि जिस प्रकार के अलौकिक फलों का यहाँ अनुमान किया जाता है, उस प्रकार के फलों का नियम नहीं देखा जाता है (क्योंकि वे अतीन्द्रिय हैं) अतः वर्णाश्रमियों की उन प्रवृत्तियों का अपनी जीविका चलाना ही फल है, वह तो दृष्ट ही है । अतः इसमें अनुमान की प्रवृत्ति नहीं हो सकती; क्योंकि इसका विषय पहले से ही सिद्ध है । इसी सिद्धसाधन दोष को मिटाने के लिए प्रकृत भाष्यसन्दर्भ में 'दृष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्य' यह वाक्य लिखा गया है । इस वाक्य से यह कहना अभिप्रेत है कि इस प्रकार के भी महापुरुष हैं जो वर्णाश्रमियों के लिये निर्दिष्ट वानप्रस्थादि व्रतों का आचरण करते हैं, जिनका जीविकादि दृष्ट फलों के प्रति स्नेह नहीं है । वर्णाश्रमियों की इस प्रकार की प्रवृत्तियों से फल का अनुमान ही प्रकृत में सामान्यतोदृष्ट अनुमान के उदाहरण के लिए उपस्थित किया गया है, अतः सिद्धसाधन दोष नहीं है । प्रकृत में साध्यभूत वर्णाश्रमियों की सफलता को उपस्थित नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह सिद्ध नहीं है एवं प्रत्यक्ष के द्वारा उसका सिद्ध होना भी सम्भव नहीं है; क्योंकि उसके स्वर्गादि फल अतीन्द्रिय हैं । अतः प्रकृत फल से सर्वथा विपरीत अर्थात् कृषकादि के प्रत्यक्ष फलों को दृष्टान्त रूप से उपस्थित किया गया है ।

  1. इसी प्रसङ्ग में बार्हस्पत्यों का यह श्लोक सर्वदर्शनसंग्रहादि ग्रन्थों में उल्लिखित है-

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५११

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५११ न्यायकन्दली प्रमाणशब्दः करणव्युत्पत्तिसिद्धो न फलं विना पर्यवस्यति, अतः प्रमाणफलविभागं दर्शयति- तत्र लिङ्गदर्शनं प्रमाणमिति । तत्रानुमाने लिङ्गज्ञानं प्रमाणं प्रमीयतेऽनेनेति व्युत्पत्त्या, प्रमितिः प्रमाणस्य फलमग्निज्ञानम् । यद्यपि लिङ्गलिङ्गिज्ञानयोरुत्पत्त्यपेक्षया विषयभेदस्तथापि लिङ्गज्ञानस्यापि लिङ्गिनि ज्ञानोत्पत्तौ व्यापाराल्लिङ्गिविषयत्वम्, ततश्च प्रमाणफलयोर्न व्यधिकरणत्वम् । प्रकारान्तरमाह- अथवेति । अग्निज्ञानं प्रमाणम्, प्रमितिः प्रमाणस्य फलम् । अग्नौ गुणदोषमाध्यस्थ्यदर्शनम्- गुणदर्शनं सुखसाधन- मेतदिति ज्ञानम्, दोषदर्शनं दुःखसाधनत्वज्ञानम्, माध्यस्थ्यदर्शनं सुखदुःखसाधनत्वाभाव- ज्ञानम्, अग्निज्ञाने सति तथाप्रतीत्युत्पादात् । 'प्रमीयतेऽनेन' इस करणव्युत्पत्ति के द्वारा प्रकृत में 'प्रमाण' शब्द का प्रयोग किया गया है । प्रमाणकरणरूप इसका निरूपण प्रमारूप फल के निर्देश के बिना अधूरा ही रहेगा । अतः 'तत्र लिङ्गदर्शनं प्रमाणम्' इस वाक्य के द्वारा प्रमाण और फल का विभाग दिखलाया गया है । 'तत्र' अर्थात् अनुमान स्थल में 'लिङ्ग- ज्ञान' ही 'प्रमाण' है चूँकि यहाँ 'प्रमाण' शब्द 'प्रमीयतेऽनेन' इस व्युत्पत्ति के द्वारा सिद्ध है । 'प्रमिति' अर्थात् प्रमाण का फल है 'अग्नि' का ज्ञान । यद्यपि यह ठीक है कि (प्र०) लिङ्गज्ञान और लिङ्गी (साध्य) का ज्ञान दोनों की उत्पत्ति भिन्न विषयक होती है, (अतः दोनों व्यधिकरण हैं, किन्तु कार्य और कारण को समान अधिकरण का होना चाहिए) । (उ०) फिर भी लिङ्गी (साध्य) में जो (विधेयता सम्बन्ध से) ज्ञान की उत्पत्ति होती है, उसमें लिङ्गज्ञान व्यापार (रूप कारण) है, अतः लिङ्गज्ञान भी लिङ्गिरूप विषय से सर्वथा असम्बद्ध नहीं है । अतः लिङ्गज्ञानरूप प्रमाण और लिङ्गि (साध्य) ज्ञानरूप फल इन दोनों में सर्वथा विपरीतविषयत्व रूप वैयधिकरण्य की आपत्ति नहीं है । 'अथवा' इत्यादि सन्दर्भ से (प्रमाण फल विभाग का) दूसरा प्रकार दिखलाया गया है । अग्नि (साध्य) का ज्ञान ही 'प्रमाण' है और 'प्रमिति' अर्थात् उस प्रमाण का फल है-'अग्नि में गुण, दोष और माध्यस्थ्य का ज्ञान' । (अग्नि में) 'यह सुख का साधन है' इस प्रकार का ज्ञान है 'गुणदर्शन' । एवं 'यह दुःख का साधन है' इस आकार की बुद्धि ही 'दोषदर्शन' है । और 'न यह सुख का साधन है न दुःख का' इस प्रकार का ज्ञान ही 'माध्यस्थ्यदर्शन' है । चूँकि अग्नि-ज्ञान के बाद ही उक्त गुणदर्शनादि उत्पन्न होते हैं (अतः ये गुणदर्शनादि अग्निज्ञान रूप प्रमाण के फल हैं) । अग्निहोत्रं त्रयो वेदास्त्रिदण्डं भस्मगुण्ठनम् । बुद्धिपौरुष हीनानां जीविकेति बृहस्पतिः ॥

५१२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- प्रशस्तपादभाष्यम् शब्दादीनामप्यनुमानेऽन्तर्भावः, समानविधित्वात् । यथा प्रसिद्धसमयस्या- सन्दिग्धलिङ्गदर्शनप्रसिद्धस्मरणाम्यामतीन्द्रियेऽर्थे भवत्यनुमानमेवं शब्दादि- भ्योऽपीति । शब्दादि प्रमाण भी इसी (अनुमान) के अन्तर्गत हैं (वे स्वतन्त्र अलग प्रमाण नहीं हैं), क्योंकि शब्दादि प्रमाणों से भी उसी रीति से (व्याप्ति के बल पर) प्रमिति की उत्पत्ति होती है, जिस प्रकार अनुमान प्रमाण से प्रमिति की उत्पत्ति होती है । जैसे कि जिस पुरुष को पूर्व में व्याप्ति गृहीत है, उसी पुरुष को हेतु के निश्चय और व्याप्ति के स्मरण इन दोनों से अप्रत्यक्ष अर्थ की अनुमिति होती है, उसी प्रकार शब्दादि प्रमाणों से भी अतीन्द्रिय अर्थ का ज्ञान होता है । न्यायकन्दली एतत् स्वनिश्चितार्थमनुमानम् । निश्चितमिति भावे निष्ठा, स्वनिश्चितार्थं स्वनिश्चयार्थमेतदनुमानमित्यर्थः । शब्दादीन्यपि प्रमाणान्तराणि सङ्गिरन्ते वादिनः, तानि कस्मादिह नोक्तानि ? इति पर्यनुयोगमाशङ्क्य तेषामत्रैवान्तर्भावात्र पृथगभिधानमित्याह-शब्दादीनामपीति । शब्दादीनाम- नुमानेऽन्तर्भावोऽनुमानाव्यतिरेकित्वम्, समानविधित्वात् समानप्रवृत्तिप्रकारत्वात् । यथा व्याप्तिग्रहणबलेनानुमानं प्रर्वतते, तथा शब्दादयोऽपीत्यर्थः । शब्दोऽनुमानं व्याप्तिबलेनार्थप्रति- पादकत्वाद् धूमवत् । समानविधित्वमेव दर्शयति- यथेति । प्रसिद्धः समयोऽविनाभावो यस्य 'एतत् स्वनिश्चितार्थमनुमानम्' इस भाष्यवाक्य का 'निश्चित' शब्द 'भाव' अर्थ में निष्ठा प्रत्यय से निष्पन्न है । तदनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि यह कथित अनुमान अपने आश्रय पुरुष में ही निश्चयात्मक ज्ञान को उत्पन्न करने के लिए है (दूसरों को समझाने के लिए नहीं) । (प्रत्यक्ष और अनुमान के अतिरिक्त) शब्दादि प्रमाणों को भी अन्य दार्शनिक गण स्वीकार करते हैं कि वे शब्दादि प्रमाण इस भाष्य में क्यों नहीं कहे गये ? अपने ऊपर इस अभियोग की आशङ्का से भाष्यकार ने 'शब्दादीनामपि' इत्यादि ग्रन्थ से यह कहा है कि 'उन शब्दादि प्रमाणों का भी अनुमान में ही अन्तर्भाव हो जाता है' । शब्दादि प्रमाणों का अनुमान में ही अन्तर्भाव होता है, अर्थात् शब्दादि प्रमाण अनुमान से अभिन्न हैं (अनुमान ही हैं), क्योंकि (अनुमान और शब्दादि) 'समानविधि' के हैं, अर्थात् अनुमान और शब्दादि की सभी प्रवृत्तियाँ समान हैं । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार अनुमान की प्रवृत्ति व्याप्ति के बल से होती है, उसी प्रकार शब्दादि प्रमाणों की प्रवृत्ति भी व्याप्ति के बल से ही होती है, (इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि) जिस प्रकार व्याप्ति के बल से धूम वह्नि का ज्ञापक है, उसी प्रकार शब्द भी व्याप्ति के बल से ही अर्थ का ज्ञापन करता है, अतः (धूम की तरह) शब्द भी

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५१३

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५१३ न्यायकन्दली पुरुषस्य तस्य लिङ्गदर्शनप्रसिद्धयनुस्मरणाभ्यां लिङ्गदर्शनम्, यत्र धूमस्तत्राग्निरित्ये- वंभूतायाः प्रसिद्धेरनुस्मरणं च । ताभ्यां यथाऽतीन्द्रियेऽर्थे भवत्यनुमानं तथा शब्दा- दिभ्योऽपीति । नावद्धि शब्दो नार्थं प्रतिपादयति यावदयमस्याव्यभिचारीत्येवं नावगम्यते, ज्ञाते त्वव्यभिचारे प्रतिपादयन् धूम इव लिङ्गं स्यात् । अत्राह कश्चित्— अनुमाने साध्यधर्मविशिष्टो धर्मी प्रतीयते, शब्दार्थानुमाने को धर्मी ? न तावदर्थः, तस्य तदानीमप्रतीयमानत्वात् । शब्दो धर्मीति चेत् ? किमस्य साध्यम् ? अर्थवत्त्वं चेत् ? न पर्वतादेरिव वह्न्यादिना शब्दस्यार्थेन सह संयोगसम- वायादिलक्षणः कश्चित् सम्बन्धो निरूप्यते, येनायमर्थविशिष्टः साधनीयः । प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव एव हि तयोः सम्बन्धः, सोऽर्थप्रतीत्युत्तर- अनुमान रूप से ही प्रमाण है । 'यथा' इत्यादि से कथित 'समानविधि' का प्रदर्शन करते हैं । 'प्रसिद्धः समयो यस्य' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस पुरुष को समय (व्याप्ति) पूर्व से ज्ञात है, वही पुरुष 'प्रसिद्धसमय' शब्द का अर्थ है । 'लिङ्गदर्शनप्रसिद्धयनुस्मरणाभ्याम्' इस वाक्य के द्वारा यह कहा गया है कि लिङ्गदर्शन (अर्थात् पक्षधर्मताज्ञान) और 'जहाँ धूम है वहाँ वह्नि भी अवश्य ही है' इस प्रकार की 'प्रसिद्धि' अर्थात् व्याप्ति का स्मरण, इन दोनों से उक्त 'प्रसिद्धसमय' पुरुष को जिस प्रकार इन्द्रियों के द्वारा अज्ञेय वस्तु का ज्ञान होता है, उसी प्रकार शब्दादि प्रमाणों से भी कथित पुरुष को ही ज्ञान होता है (अतः शब्दादि प्रमाण भी वस्तुतः अनुमान ही है) । शब्द तब तक अर्थ के बोध का उत्पादन नहीं कर सकता, जब तक कि अर्थ के साथ उसका अव्यभिचार (व्याप्ति) गृहीत न हो जाय, ज्ञात अव्यभिचार (व्याप्ति) के द्वारा ही जब (धूम की तरह) शब्द भी अर्थ का ज्ञापक है, तो फिर धूम की तरह वह भी ज्ञापक लिङ्ग (अनुमान) ही होगा । यहाँ कोई (शब्द को अलग स्वतन्त्र प्रमाण माननेवाले) यह विचार उठाते हैं कि अनुमान में तो साध्य रूप धर्म से युक्त धर्मी की प्रतीति होती है, किन्तु शब्द से जो अर्थ का अनुमान होगा उसमें धर्मी रूप से किसका भान होगा ? अर्थ तो उस अनुमान का धर्मी (पक्ष) हो नहीं सकता, क्योंकि वह तब तक अज्ञात है (पक्ष.को पहले से निश्चित रहना चाहिए) । शब्द को ही यदि उस अनुमान का पक्ष मानें, तो फिर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि इस अनुमान का साध्य कौन होगा ? अर्थवत्त्व को साध्य मानना सम्भव नहीं है; क्योंकि पर्वतादि पक्षों का वह्नि प्रभृति साध्यों के साथ जिस प्रकार का संयोगसमवायादि सम्बन्ध है, शब्द के साथ अर्थ का उस प्रकार के किसी सम्बन्ध का निर्वचन सम्भव नहीं है, जिस सम्बन्ध के द्वारा अर्थ से युक्त शब्द रूप धर्मी का साधन किया जा सके । शब्द और अर्थ में प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव सम्बन्ध ही केवल हो सकता है, किन्तु इस सम्बन्ध का ज्ञान तो शब्द से अर्थ-प्रतीति के बाद ही होगा, अर्थ-प्रतीति के पहले नहीं । एवं वह्नि और धूम की तरह