वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
६८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे मोक्ष- न्यायकन्दली बाह्येन्द्रियव्यापारोपरमात् । तत्र कः सम्भवः कर्मणाम् ? तथा च श्रुतिः-"न शृणोतीत्याहुरेकीभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवतीत्यादि" । तदा चाकरणनिमित्तः प्रत्यवायोऽपि नास्ति सन्ध्येयमुपस्थितेत्यादिकमजानतो ब्राह्मणोऽस्मीति प्रतीतिरहितस्य कर्माधिकारपरिभ्रंशात् । यथोक्तम्- ब्राह्मण्यानहंमानी कथं कर्माणि संसृजेत् ॥ इति । न चास्योपरतसमस्तव्यापारस्य काष्ठवदवस्थितस्यापि प्राणिहिंसापि सम्भवति । यत् पुनरस्य दृष्टद्रष्टव्यस्य क्षीणक्षेतव्यस्य वशीकृतमनसो विषयावबोधस्मरणसङ्कल्पसुखदुःख- बहिष्कृतस्य ब्रह्मलग्नसमाधेरपि शरीरं कियन्तञ्चित् (कालमनुवर्तते) तच्छरीरस्थितिमात्र- हेतोरायुर्विपाकस्य कर्मग्रन्थेरनुच्छेदात् । यदा तु यावन्तं कालमायुर्विपाकेन कर्मणा शरीरं धारयितव्यं तावत्कालप्राप्तिरभूत्, तदा स्वकार्यकरणात् कर्मसमुच्छेदे तत्कार्यस्य शरीरस्य निवृत्तिः । विनाश हो गया है । जिस आत्मज्ञान की उत्पत्ति एकाग्र अन्तःकरण से होती है, ऐसे आत्मज्ञानवाले पुरुष को केवल आत्मा का ही ज्ञान उस समय होता है । बाह्य किसी विषय का भान उन्हें नहीं रह जाता; क्योंकि बाह्य विषयों के साथ उनकी इन्द्रियों का सम्बन्ध ही नहीं रह जाता है । ऐसी स्थिति में उनसे कर्म सम्पादन की कौन-सी आशा की जा सकती है ? इसी स्थिति को श्रुति ने 'न शृणोतीत्या- हुरेकीभवति' इत्यादि वाक्यों से कहा है । उस समय उनसे विहित कर्मों का अनुष्ठान न होने पर भी उन्हें प्रत्यवाय नहीं होता; क्योंकि जिन्हें कर्माधिकार का सूचक 'अभी सन्ध्या उपस्थित हो गयी, मैं ब्राह्मण हूँ' इत्यादि ज्ञान नहीं है, उनका कर्म करने का अधिकार भी छूट जाता है । जैसा कहा गया है कि- 'मैं ब्राह्मण हूँ' जिनको इस प्रकार का अहङ्कार नहीं है, वे ब्राह्मणोचित कर्म के साथ कैसे सम्बद्ध हो सकते हैं ? इस प्रकार सभी कर्म छूट जाने के कारण जो काठ की तरह हो गये हैं, उनसे किसी भी प्राणी की हिंसा सम्भव नहीं है । जिन्होंने जानने योग्य सभी विषयों को जान लिया है, छोड़ने योग्य सभी विषयों को छोड़ दिया है । जिन्होंने मन को वशीभूत कर विषयों के अनुभव, स्मरण, संकल्प, सुख एवं दुःख सभी से छुटकारा पा लिया है, वे यदि ब्रह्म के ध्यान में समाधिस्थ भी हैं, तथापि उनकी शरीर की अनुवृत्ति जो थोड़े समय के लिए भी चलती है, उसका कारण वह कर्मग्रन्थिरूप विपाक है जो केवल शरीर स्थिति का ही कारण है । जितने समय के आयु तक उक्त कर्मविपाक से शरीर की स्थिति आवश्यक है, वह समय जब समाप्त हो जाता है, तब अपना कर्त्तव्य होने के कारण कर्म भी समाप्त हो जाता है । कर्म की समाप्ति से शरीर की समाप्ति और शरीर की समाप्ति से तत्त्वज्ञान की भी समाप्ति हो जाती है, जिससे आत्मा को कैवल्य प्राप्त होता है ।
भाषानुवादसहितम् ६८९ न्यायकन्दली तन्निवृत्तौ तत्कार्यस्य तत्त्वज्ञानस्यापि विनाशादात्मा कैवल्यमापद्यते । तत्रात्मतत्त्व- ज्ञानस्य विहितानां च कर्मणां बन्धहेतुकर्मप्रतिबन्धव्यापारदस्ति सम्भूयकारिता । शरीरादि- विविक्तमात्मानं जानतश्च तदुपकारापकारावात्मन्यप्रतिसन्दधानस्याहङ्कारममकारयोरु- परमे सत्युपकारिण्यपकारिणि च रागद्वेषयोरभावादुदासीनस्याप्रवृत्तावनागतयोः कुशलेतर- कर्मणोरसञ्चयात्, सञ्चितयोश्चोपभोगेन कर्मभिश्च परिक्षयाद् विहिताकरणनिमित्तस्य प्रत्यवायस्य च विहितानुष्ठानेनैव प्रतिबन्धात् । क्षीणे कर्मण्यैहिकस्य देहस्य निवृत्तौ कारणान्तराभावादानुष्मिकस्य देहस्य पुनरुत्पत्त्यभावे सत्यात्मनः स्वरूपेणावस्थानम् । यथोक्तम्- नित्यनैमित्तिकैरेव कुर्वाणो दुरितक्षयम् । ज्ञानं च विमलीकुर्वन्नभ्यासेन तु पाचयेत् ॥ अभ्यासात् पक्वविज्ञानः केवल्यं लभते नरः ॥ इति । तथा परैरप्ययं गृहीतो मार्गः- कर्मणा सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानेनात्मविनिश्चयः । भवेद् विमुक्तिरभ्यासात् तयोरेव समुच्चयात् ॥ इति । इस प्रकार आत्मतत्त्वज्ञान और विहित कर्मों का अनुष्ठान ये दोनों मिलकर (ज्ञानकर्मसमुच्चय) ही बन्ध के कारणीभूत कर्मों का प्रतिरोध करने की क्षमता रखते हैं । जिस पुरुष को 'शरीरादि से आत्मा भिन्न है' इस प्रकार का ज्ञान और शरीरादि में किये गये उपकार और अपकार को आत्मा का उपकार और अपकार न समझने की बुद्धि है, उस पुरुष के अहङ्कार और ममकार का विलोप हो जाता है । फिर उपकारी के प्रति राग और अपकारी के प्रति द्वेष ये दोनों भी स्वतः निवृत्त हो जाते हैं । जिससे आत्मा की प्रवृत्ति रुक जाती है और वह उदासीन हो जाता है । जिससे आगे पाप और पुण्य का प्रवाह रुक जाता है और पहले किये गये (सञ्चित) पाप-पुण्य का भोग और दूसरे कर्मों से विनाश हो जाता है । एवं विहित कर्मों के न करने से जो प्रत्यवाय होगा, उसका प्रतिरोध विहित कर्मों के अनुष्ठान से ही हो जाएगा । इस प्रकार सभी कर्मों का विनाश हो जाने पर इहलोक का शरीर तो नष्ट हो ही जायेगा और कारणों के न रहने पर पारलौकिक शरीर भी उत्पन्न नहीं होगा । ऐसी स्थिति में आत्मा अपने स्वरूप में स्थित हो जाएगा । जैसा कहा गया है कि- नित्य और नैमित्तिक कर्म के अनुष्ठान से सभी पापों को नष्ट करते हुए ज्ञान को स्वच्छ कर लेना चाहिए । इसके बाद अभ्यास के द्वारा उक्त स्वच्छ ज्ञान को परिपक्व कर लेना चाहिए । इस प्रकार अभ्यास से परिपक्व ज्ञान वाले पुरुष को ही कैवल्य प्राप्त होता है । अन्य सम्प्रदाय के लोगों ने भी इस मार्ग को अपनाया है, जैसा कि इस श्लोक से स्पष्ट है- कर्म से अन्तःकरण की शुद्धि होती है और ज्ञान से आत्मा का (साक्षात्कारत्मक) विनिश्चय होता है । इस प्रकार ज्ञान और कर्म दोनों के ही अभ्यास से मुक्ति प्राप्त होती है ।
६१० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे मोक्ष- न्यायकन्दली किं पुनरात्मनः स्वरूपं येनावस्थितिर्मुक्तिरुच्यते? आनन्दात्मतेति केचित् । तदयुक्तम् । विकल्पासहत्वात् । स किमानन्दो मुक्तावनुभूयते वा ? न वा ? यदि नानुभूयते ? स्थितोऽप्यस्थितान्न विशिष्यते, अनुपभोग्यत्वात् । अनुभूयते चेत् ? अनुभवस्य कारणं वाच्यम् । न च कायकरणाद्विगमे तदुत्पत्तिकारणतां पश्यामः । अन्तःकरणसंयोगः कारणमिति चेत् ? न, धर्माधर्मोपगृहीतस्य हि मनसः सहायत्वात्, तदखिल- शुभाशुभबीजनाशोपगतं नात्मानुकूल्येन वर्त्तते । योगजधर्मानुग्रहादात्मानमनुकूलयति चेत् ? योगजोऽपि धर्मः कृतकत्वादवश्यं विनाशीति तत्क्षये मनसः कोऽनुग्रहीता ? अथ मतम्- अचेतनस्यात्मनो मुक्तस्यापि पाषाणादविशेषः, सोऽपि हि न सुखायते न दुःखायते । मुक्तोऽपि यदि तथैव, कोऽनयोर्विशेषः ? तस्मादस्यात्मनः स्वाभाविकी चितिः, सा यदेन्द्रियैर्बहिराकृष्यते, तदा बहिर्मुखीभवति । यदा त्विन्द्रियाण्युपरतानि भवन्ति, तदा स्वात्मन्येवानन्दस्वभावे निमज्जति । आत्मा का वह कौन-सा स्वरूप है जिस स्वरूप से आत्मा की स्थिति मुक्ति कहलाती है? (इस प्रश्न का उत्तर) कुछ लोग इस प्रकार देते हैं कि वह स्थिति आत्मा की आनन्दस्वरूपता ही है; किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि इस पक्ष के सम्भावित कोई भी विकल्प युक्त नहीं ठहरते । (पहला विकल्प यह है कि) मुक्तावस्था में इस आनन्द का अनुभव होता है? अथवा नहीं? यदि अनुभव नहीं होता है, तो फिर उस आनन्द का रहना और न रहना दोनों बराबर हैं; क्योंकि उस आनन्द का उपभोग नहीं किया जा सकता । यदि कहें कि उस आनन्द का अनु- भव होता है? तो फिर उस अनुभव का कारण कौन है- यह कहना पड़ेगा । शरीर एवं इन्द्रियादि के नष्ट हो जाने पर और किसी को उस अनुभव का कारण मानना सम्भव नहीं है । (प्र.) अन्तःकरण (मन) का संयोग उसका कारण होगा ? (उ.) सो भी सम्भव नहीं है; क्योंकि धर्म और अधर्म से प्रेरित मन ही अनुभव का सहायक है । जिसके सभी धर्म और अधर्म नष्ट हो चुके हैं, उसके मन से आत्मा को दुःख का अनुभव नहीं हो सकता । (प्र.) योगज धर्म के साहाय्य से वह मन आत्मा के अनुकूल होता है (अर्थात् आत्मा के सुखानुभव का उत्पादन करता है) । (उ.) किन्तु योगज धर्म भी तो उत्पत्तिशील ही है, अतः उसका भी अवश्य नाश होगा, फिर उसके नष्ट हो जाने पर मन का सहायक कौन होगा? यदि यह कहें कि (प्र.) मुक्त भी हो यदि उसमें चैतन्य न रहे, तो फिर पत्थर के समान ही होगा; क्योंकि पत्थर में भी सुख-दुःख की चेतनायें नहीं होतीं । यदि मुक्त पुरुष को भी सुख और दुःख की चेतनाओं से रहित मान लिया जाय, तो पत्थर और मुक्त आत्मा में क्या अन्तर रहेगा? अतः यह मानना पड़ेगा कि आत्मा में एक स्वाभाविक चैतन्य होता है । वह चैतन्य जब इन्द्रियों के द्वारा बाह्य विषयों की तरफ खींचा जाता है, तब वह चैतन्य बहिर्मुख होता है (अर्थात् बाह्यविषयक ज्ञान में परिणत होता है) । जब इन्द्रियाँ
भाषानुवादसहितम् ६९१ न्यायकन्दली अयं हि चितेरात्मा यदि यं कञ्चिदवभासयति, यदि पुनरियं मुक्तावस्थायामुदास्ते, तर्हि स्थितोऽप्यस्थित एव । वरमात्मा जड एव कल्प्यतामिति चेत्? अत्रोच्यते-किं चितेरानन्दात्मता स्वाभाविकी? कारणान्तरजन्या वा? न तावदवभासकारणं मुक्तावस्ति, कायकरणादीनां तत्कारणानां विलयादित्युक्तम् । स्वाभाविकी चेत्? संसारावस्था- यामप्यानन्दोऽनुभूयेत, चितिचैत्ययोरुभयोरपि सम्भवात् । अविद्याप्रतिबन्धान्नानुभव इति चेत् ? न, नित्यायाश्चितेरानन्दानुभवस्वभावायाः स्वरूपस्याप्रच्युतेः कः प्रतिबन्धार्थः? प्रच्युतौ वा स्वरूपस्य का नित्यता? तस्माश्रित्य आनन्दो नित्यया चित्या चेत्यमानो द्वयोरप्यवस्थयोरविशेषेण चेत्यते । न चैवमस्ति संसारावस्था- यामुत्पन्नापवर्गिणो विषयेन्द्रियाधीनज्ञानस्य सुखस्यानुभवात् । अतो नास्त्यात्मनो नित्यं अपने व्यापार से निवृत्त हो जाती हैं, उस समय वह (चैतन्य) अपने आनन्द स्वभाव में ही निमग्न रहता है । चित्स्वरूप इस आत्मा का यह स्वभाव है कि किसी को भासित करे । यदि मुक्तावस्था में वह इस काम से उदासीन हो जाता है, तो फिर उस समय चैतन्य का उसमें रहना और न रहना बराबर है । इससे अच्छा है कि आत्मा को जड़ ही मान लिया जाय । इस प्रसङ्ग में हम लोगों (सिद्धान्तियों) का कहना है कि आत्मा में जो आनन्द की अभिन्नता है वह स्वाभाविक है? या किसी दूसरे कारण से उत्पन्न होती है? (यदि कारणान्तरजन्य मानें तो) मुक्तावस्था में वे कारण नहीं हैं; क्योंकि कह चुके हैं कि अवभास के कारण शरीर इन्द्रियादि का उस समय विलय हो जाता है । यदि उसको स्वाभाविक मानें तो फिर संसारावस्था में भी उसका अवभास होना चाहिए; क्योंकि उस समय भी अवभास्य और अवभासक दोनों विद्यमान हैं । (प्र.) संसारावस्था में अविद्यारूप प्रतिबन्धक के कारण उस आनन्द का भान नहीं होता है । (उ.) यह कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि चिति नित्य है एवं आनन्द उसका स्वरूप है, अतः चिति अपने उस आनन्द स्वरूप से विच्युत हो ही नहीं सकती । फिर उक्त प्रतिबन्ध के लिए कोई अवसर ही नहीं रह जाता । यदि चिति कभी (संसारावस्था में) अपनी आनन्दस्वरूपता से प्रच्युत हो सकती है, तो फिर वह नित्य ही नहीं रह जाएगी । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि आनन्द भी नित्य है एवं नित्य चिति के द्वारा ही उसका अनुभव होता है । यदि ऐसी बात है, तो फिर संसार और अपवर्ग दोनों ही अवस्थाओं में समान रूप से नित्य आनन्द का अनुभव होना चाहिए; किन्तु सो नहीं होता; क्योंकि संसारावस्था में जब तक अपवर्ग की प्राप्ति नहीं होती, तब तक विषय एवं इन्द्रिय से उत्पन्न ज्ञान और सुख का ही अनुभव होता है । तस्मात् आत्मा का नित्य सुख नाम का कोई गुण ही अनुभव में नहीं आता । अतः आत्मा का नित्य सुख नाम का कोई गुण नहीं है । सुतरां नित्य सुख के अनुभव की अवस्था मुक्ति नहीं है । आत्मा के सभी विशेष
६९२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे शब्द- प्रशस्तपादभाष्यम् शब्दोऽम्बरगुणः श्रोत्रग्राह्यः, क्षणिकः, कार्यकारणोभय- विरोधी, संयोगविभागशब्दजः, प्रदेशवृत्तिः, समानासमानजातीय- आकाश का गुण ही शब्द है । उसका प्रत्यक्ष श्रोत्र से होता है । वह क्षणिक है एवं उसके कार्य और उसके कारण दोनों ही उसके विनाशक हैं । न्यायकन्दली सुखं तदभावान्न तदनुभयो मोक्षावस्था; किन्तु समस्तात्मविशेषगुणोच्छेदोपलक्षिता स्वरूपस्थितिरवे । यथा चायं पुरुषार्थस्तथोपादितम् । शब्दोऽम्बरगुणः आकाशगुणः । ननु संख्यादयोऽप्याकाशगुणाः सन्ति, कथमिदं शब्दस्य लक्षणं स्यादत आह-श्रोत्रग्राह्य इति । श्रोत्रग्राह्यत्वे सत्यम्बरगुणो यः स शब्द इत्यर्थः । परस्य विप्रतिपत्तिनिराकरणार्थमाह-क्षणिक इति । आशुतरविनाशी शब्दो न तु नित्यः, उच्चारणादूर्ध्वमनुपलम्भात् । सद्भावे प्रमाणाभावेन व्यञ्जकत्यकल्पनानव- काशात् । प्रत्यभिज्ञानस्य ज्वालादिवत् सामान्यविषयत्वेनोपपत्तेस्तीव्रमन्दतादिभेदस्य च व्यक्तिभेदप्रसाधकत्वात् । कार्यकारणोभयविरोधी आद्यः शब्दः स्वकार्येण विरुध्यते । अन्त्यः स्वकारणेनोपान्त्यशब्देन विरुध्यते, अन्त्यस्य विनाशकारणास्याभावात् । मध्य- गुणों के आत्यन्तिक विनाश से युक्त आत्मा की स्वरूपस्थिति ही 'मोक्ष' है । यह अवस्था पुरुष के लिए काम्य क्यों है? इसका उपपादन (मङ्गलश्लोक की व्याख्या में) कर चुके हैं। 'शब्दोऽम्बरगुणः' अर्थात् आकाश का गुण ही शब्द है । संख्यादि भी तो आकाश के गुण हैं, फिर आकाश का गुण होना शब्द का लक्षण कैसे हो सकता हैं? इसी आक्षेप के समाधान के लिए 'श्रोत्रग्राह्य' पद का उपादान किया गया है । अर्थात् जो श्रोत्र के द्वारा ग्रहण के योग्य हो और आकाश का गुण भी हो, वही 'शब्द' है । शब्द में नित्यत्व पक्ष के निराकरण के लिए ही 'क्षणिकः' यह पद प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् उत्पत्ति के बाद शब्द अतिशीघ्र विनष्ट हो जाता है, अतः वह नित्य नहीं है; क्योंकि उच्चारण के बाद फिर उसकी उपलब्धि नहीं होती है । (प्र.) उच्चारण के बाद शब्द की अभिव्यक्ति का कोई साधन नहीं रहता, अतः शब्द की उपलब्धि नहीं होती; किन्तु उस समय भी शब्द है ही । (उ.) उच्चारण के बाद शब्द की सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है, अतः शब्द के व्यञ्जक की कल्पना करने का कोई अवकाश नहीं है । 'सोऽयं गकारः' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा को सादृश्यमूलक मान लेने से भी काम चल सकता है । एवं शब्दों में एक-दूसरे में तीव्र और मन्द का व्यवहार होता है (वह भी नित्यत्व पक्ष में उपपन्न नहीं होता) । इससे अनेक शब्दों की कल्पना आवश्यक होती है । 'कार्यकारणो- भयविरोधी' अर्थात् प्रथम शब्द अपने द्वारा उत्पन्न द्वितीय शब्द से विनष्ट होता है,
भाषानुवादसहितम् ६९३ प्रशस्तपादभाष्यम् कारणः । स द्विविधो वर्णलक्षणो ध्वनिलक्षणश्च । तत्र अका- रादिर्वर्णलक्षणः, शङ्खादिनिमित्तो ध्वनिलक्षणश्च । तत्र वर्ण- संयोग, विभाग और शब्द (इन तीनों में से किसी) से उसकी उत्पत्ति होती है । वह अपने आश्रयद्रव्य के किसी एकदेश में ही रहता है । वह अपने समानजातीय (शब्द) और विजातीय (संयोग और विभाग इन दोनों) से उत्पन्न होता है । यह १. वर्ण और २. ध्वनि भेद से दो प्रकार का है । उनमें अकारादि शब्द वर्णरूप हैं और शङ्खादि से उत्पन्न शब्द ध्वनिरूप हैं । न्यायकन्दली वर्तिनस्तूभयथा विरुध्यन्ते । संयोगविभागशब्दजः । आद्यः शब्दः संयोगाद् विभागाच्च जायते, तत्पूर्ववस्तु शब्दादिति विवेकः । प्रदेशवृत्तिः अव्याप्यवृत्तिरित्यर्थः । एतच्चोपपादितम् । समानासमानजातीयेति । शब्दजः शब्दः समानजातीयकारणः । संयोगजविभागजश्च असमानजातीयकारणः । स द्विविधो वर्णलक्षणः, ध्वनिलक्षणश्च । अकारादिर्वर्णलक्षणः, शङ्खादिनिमित्तो ध्वनि- लक्षणः । तत्र तयोर्मध्ये, वर्णलक्षणस्योत्पत्तिरुच्यते । आत्ममनसोः संयोगात् पूर्वानुभूत- वर्णस्मृत्यपेक्षात् तत्सदृशवर्णोच्चारणे कर्तव्ये इच्छा भवति । ततः प्रयत्नस्तं प्रयत्नं निमित्तकारणमपेक्षमाणादात्मवायुसंयोगादसमवायिकारणात् कोष्ठ्यवायौ कर्म जायते । स च वायुरूर्ध्वं गच्छन् कण्ठादीनभिहन्ति हृत्कण्ठताल्वादीन् प्रदेशानभिहन्ति । ततोऽ- एवं अन्तिम शब्द अपने कारणीभूत अपने से अव्यवहितपूर्व के शब्द से विनष्ट होता है; क्योंकि अन्तिम शब्द के विनाश का कोई और कारण नहीं हो सकता । बीच के जो शब्द हैं, कार्यशब्द और कारणीभूत शब्द दोनों ही उनके विरोधी हैं । 'संयोगविभागशब्दजः' अर्थात् प्रथम शब्द (कभी संयोग से और कभी) विभाग से उत्पन्न होता है, अतः उनके दोनों ही कारण हैं । मध्य के सभी शब्द शब्द से ही जन्म लेते हैं । 'प्रदेशवृत्तिः' अर्थात् शब्द अव्याप्यवृत्ति है (अपने आश्रय के सभी देशों में नहीं रहता) । 'शब्द किस प्रकार अव्याप्यवृत्ति है' इसका उपपादन (शब्द के साधर्म्यप्रकरण में) कर चुके हैं । 'समानासमानजातीयेति' शब्द से जिस शब्द की उत्पत्ति होती है, वह समानजातीयकारणक है । संयोग और विभाग से जिन शब्दों की उत्पत्ति होती है, उनके कारण शब्द के असमानजातीय हैं । 'स द्विविधो वर्णलक्षणो ध्वनिलक्षणश्च' अकारादि वर्णलक्षण शब्द हैं एवं शङ्ख प्रभृति से जो शब्द उत्पन्न होते हैं, वे ध्वनिलक्षण शब्द हैं । 'तत्र' अर्थात् उन दोनों प्रकार के शब्दों में वर्णलक्षण शब्द की उत्पत्ति (की रीति) कहते हैं । अनुभूत वर्ण की स्मृति के साहाय्य से आत्मा और मन के संयोग के द्वारा सर्वप्रथम उस वर्ण के
६९४ न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे शब्द- प्रशस्तपादभाष्यम् लक्षणस्योत्पत्तिरात्ममनसोः संयोगात् स्मृत्यपेक्षाद् वर्णोच्चारणेच्छा, तदनन्तरं प्रयत्नः, तमपेक्षमाणादात्मवायुसंयोगाद् वायौ कर्म जायते । वर्णात्मक शब्द की उत्पत्ति इस प्रकार होती है कि स्मृतिसहकृत आत्मा और मन के संयोग के द्वारा वर्ण के उच्चारण की इच्छा उत्पन्न होती है । इसके बाद तदनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । इस प्रयत्न के द्वारा आत्मा एवं वायु के संयोग से वायु में क्रिया उत्पन्न होती है । न्यायकन्दली भिघातानन्तरं स्थानस्य कण्ठादेः कौष्ठयवायुना सह यः संयोगस्तन्निमित्तकारण- भूतमपेक्षमाणात् स्थानाकाशसंयोगात् समवायिकारणाद् वर्णोत्पत्तिः । अवर्णलक्षणोऽपि भेरीदण्डसंयोगाद् दण्डगतं वेगमपेक्षमाणाद् भेर्याकाशसंयोगा- दुपजायते । भेर्याकाशसंयोगोऽसमवायिकारणम्, भेरीदण्डसंयोगो दण्डगतश्च वेगो निमित्तकारणम् । वेणुपर्वविभागाद् वेण्वाकाशविभागाच्च शब्दो जायते । शब्दाच्च शब्दनिष्पत्तिं कथयति-शब्दात् संयोगविभागनिष्पन्नाद् वीचीसंतानवच्छब्द- सन्तानः, यथा जलवीच्या तदव्यवहिते देशे वीच्यन्तरमुपजायते, ततोऽप्यन्यत्, ततोऽप्यन्यदित्यनेन क्रमेण वीचीसन्तानो भवति, तथा शब्दादुत्पन्नात् तदव्यवहिते देशे समान वर्ण के उच्चारण की इच्छा होती है । इसके बाद 'प्रयत्न' अर्थात् समान वर्ण के उच्चारण के अनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । उस प्रयत्नरूप निमित्तकारण के साहाय्य से आत्मा और वायु के संयोगरूप असमवायिकारण के द्वारा पुरुष के कोष्ठगत वायु में क्रिया उत्पन्न होती है । वह सक्रिय वायु ऊपर की तरफ आते हुए कण्ठादि स्थानों में आघात उत्पन्न करता है, अर्थात् हृदय, कण्ठ, तालु प्रभृति वर्णों के जो उच्चारणस्थान हैं, वहाँ आघात करता है । इस अभिघात के बाद कौष्ठ्य वायु के साथ कण्ठादि स्थानों का जो संयोग होता है, उस संयोग रूप निमित्तकारण के साहाय्य से कण्ठादि स्थान और आकाश इन दोनों के संयोग- रूप असमवायिकारण के द्वारा वर्णरूप शब्द की उत्पत्ति होती है । अवर्णरूप शब्द (ध्वनि) भी दण्ड में उत्पन्न वेग के साहाय्य से भेरी और आकाश के संयोग के द्वारा उत्पन्न होता है । (अर्थात् इस ध्वनिरूप शब्द के प्रति) भेरी और आकाश का संयोग असमवायिकारण है एवं भेरी और दण्ड का संयोग और दण्ड में रहनेवाला वेग, ये दोनों निमित्तकारण हैं । बाँस और उसके गाँठ इन दोनों के विभाग एवं बाँस और आकाश के विभाग, इन दोनों से भी शब्द की उत्पत्ति होती है । "शब्दात् संयोगविभागनिष्पन्नाद्वीचीसन्तानवच्छब्दसन्तानः' इस सन्दर्भ से शब्द- जनित शब्द का निरूपण करते हैं । अर्थात् जिस प्रकार जल के एक तरङ्ग से उसके अतिनिकट के जल प्रदेश में दूसरा तरङ्ग उत्पन्न होता है, उसी प्रकार (संयोग और
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६९५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६९५ प्रशस्तपादभाष्यम् स चोर्ध्वं गच्छन् कण्ठादीनभिहन्ति, ततः स्थानवायुसंयोगापेक्षमाणात् स्थाना- काशसंयोगाद् वर्णोत्पत्तिः । अवर्णलक्षणोऽपि भेरीदण्डसंयोगापेक्षाद् भेर्याकाशसंयोगादुत्पद्यते । वेणुपर्वविभागाद् वेण्याकाशविभागाच्च शब्दाच्च संयोगविभागनिष्पन्नाद् वीचीसन्तानवच्छब्दसन्तान इत्येवं सन्तानेन श्रोत्रप्रदेशमागतस्य यह सक्रिय वायु ऊपर की तरफ जाते समय कण्ठ में अभिघात को उत्पन्न करता है । इसके बाद (कण्ठादि) स्थान और वायु का संयोग एवं (कण्ठादि) स्थान और आकाश के संयोग इन दोनों संयोगों से वर्णात्मक शब्द की उत्पत्ति होती है । भेरी (प्रभृति) और दण्ड (प्रभृति) का संयोग एवं भेरी (प्रभृति) और आकाश का संयोग, इन दोनों संयोगों से अवर्ण (ध्वनि) रूप शब्द की उत्पत्ति होती है । बाँस और उसकी सन्धि (गाँठ) के विभाग एवं बाँस और आकाश का विभाग इन दोनों विभागों से शब्द की उत्पत्ति होती है । संयोग और विभाग से निष्पन्न जलतरंगों के समूह की तरह शब्द से भी शब्द के तरंगों के समूहों की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार शब्द के न्यायकन्दली शब्दान्तरम्, ततोऽप्यनयोर्गमनागमनाभावात् प्राप्तस्यैवोपलब्धिरिति, ततोऽप्यन्यत्, ततोऽप्यन्यदित्यनेन क्रमेण शब्दसन्तानो भवति । एवं सन्तानेन श्रोत्रदेशे समागतस्यान्य- शब्दस्य ग्रहणम् । नन्वेषा कल्पना कुतः सिद्धयतीत्यत आह- श्रोत्रशब्दयोरिति । न श्रोत्रं शब्ददेशमुप- गच्छति, नापि शब्दः श्रोत्रदेशम्, तयोर्निष्क्रियत्वात् । अप्राप्तस्य ग्रहणं नास्ति, इन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वात् । प्रकारान्तरेण चोपलब्धिर्न घटते । दृष्टा च वीचीसन्ताने स्वोत्पत्तिदेशे विनश्यतामपि स्वप्रत्यासत्तिमपेक्ष्य तदव्यवहिते देशे सदृशकार्यारम्भपरम्परया देशान्तर- प्राप्तिः, तेन शब्दसन्तानः कल्प्यते । न चानवस्था, यावद्दूरं निमित्तकारणभूतः कौक्ष्य- वायुरनुवर्त्तते, तावद्दूरं शब्दसन्तानानुवृत्तिः । अत एव प्रतिवातं शब्दानुपलम्भः, कौक्ष्य- विभाग से उत्पन्न) शब्द के द्वारा उसके अतिसमीप के आकाश प्रदेश में दूसरे तत्सदृश शब्द की उत्पत्ति होती है । (यह इसलिए मानना पड़ता है कि) श्रोत्र और शब्द दोनों ही (यतः द्रव्य नहीं हैं अतः) अन्यत्र नहीं जा सकते एवं जब तक इन्द्रिय के साथ विषय का सम्बन्ध नहीं होगा, तब तक विषय का ग्रहण सम्भव नहीं है । अतः दूसरे शब्द से तीसरे शब्द की उत्पत्ति, तीसरे शब्द से चौथे शब्द की उत्पत्ति, इस प्रकार शब्दसन्तान (समूह) की उत्पत्ति होती है । इस सन्तान का अन्तिम शब्द श्रोत्र प्रदेश में जब उत्पन्न होता है, तब उस सन्तान के उसी अन्तिम शब्द का ग्रहण होता है । इस प्रकार के शब्दसन्तान की कल्पना क्यों आवश्यक होती है ? इसी प्रश्न का समाधान 'श्रोत्रशब्दयोः'
६१६ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे शब्द- प्रशस्तपादभाष्यम् ग्रहणम् । श्रोत्रशब्दयोर्गमनागमनाभावादप्राप्तस्य ग्रहणं नास्ति, परिशेषात् सन्तानसिद्धिरिति । ॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये गुणपदार्थः समाप्तः ॥ (उक्त समूहों के द्वारा) श्रोत्रप्रदेश में पहुँचने के बाद श्रोत्र के द्वारा उसका प्रत्यक्ष होता है । यतः श्रोत्रेन्द्रिय और शब्द इन दोनों में से कोई भी गतिशील नहीं है और श्रोत्र से असम्बद्ध शब्द का प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है, अतः परिशेषानुमान से (शब्दजनित) शब्दसन्तान (समूह) की सिद्धि होती है । ॥ प्रशस्तपादभाष्य में गुणों का निरूपण समाप्त हुआ ॥ न्यायकन्दली वायुप्रतिघातात् । अतीवायं मार्गस्तार्किकैः क्षुण्णस्तेनास्माभिरिह भाष्यतात्पर्यमात्रं व्याख्यातम्, नापरा युक्तिरुक्ता । गुणोपबद्धसिद्धान्तो युक्तिशुक्तिप्रभावितः । मुक्ताहार इव स्वच्छो हृदि धिन्यस्यतामयम् ॥ ॥ इति भट्टश्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां गुणपदार्थः समाप्तः ॥ इत्यादि से किया गया है । अर्थात् न शब्द ही श्रोत्र प्रदेश में जा सकता है और न श्रोत्र ही शब्द प्रदेश में आ सकता है; क्योंकि दोनों ही क्रिया से सर्वथा रहित हैं । यतः इन्द्रियाँ विषय के साथ सम्बद्ध होकर ही विषय को ग्रहण करती हैं (यही इन्द्रियों का प्राप्यकारित्व है) । अतः शब्दसन्तान की कल्पना के बिना शब्द की उपलब्धि उपपन्न नहीं हो सकती । जल के तरङ्ग अपनी उत्पत्ति के प्रदेश में विनाश- प्राप्त होने पर भी उससे अव्यवहित उत्तर प्रदेश में अपने सदृश ही दूसरे तरङ्ग व्यक्ति को उत्पन्न करते हुए देखे जाते हैं । इसी दृष्टान्त के बल से शब्दसन्तान की कल्पना करते हैं । इसमें अनवस्था दोष भी नहीं है; क्योंकि शब्द के निमित्तकारण कोष्ठ सम्बन्धी वायु की अनुवृत्ति जितनी दूर तक रहेगी, उतनी ही दूर तक शब्दसन्तान की अनुवृत्ति की कल्पना करेंगे । यही कारण है कि प्रतिकूल वायु के रहने पर शब्द की उपलब्धि नहीं होती है; क्योंकि कोष्ठ सम्बन्धी वायु उससे प्रतिहत हो जाता है । इस मार्ग को तार्किकों ने अनेक प्रकार से रौंद डाला है, अतः हम लोगों ने भाष्य का तात्पर्य मात्र ही लिखा, कोई दूसरी युक्ति नहीं दिखलायी । मोती के माला की तरह (गुणनिरूपण रूप) यह स्वच्छ हार विद्वान् लोग हृदय में धारण करें । यह हार युक्तिस्वरूप शुक्तिका में उत्पन्न मोतियों से बना है एवं सिद्धान्त सिद्धगुण (डोरी) में गुँथा हुआ है । ॥ भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रची गयी एवं पदार्थों को समझानेवाली न्यायकन्दली टीका का गुणपदार्थों का विवेचन समाप्त हुआ ॥
अथ कर्मपदार्थनिरूपणम् प्रशस्तपादभाष्यम् उत्क्षेपणादीनां पञ्चानामपि कर्मत्वसम्बन्धः । एकद्रव्यवत्त्वं क्षणिकत्वं मूर्तद्रव्यवृत्तित्वमगुणवत्त्वं गुरुत्व- द्रवत्वप्रयत्नसंयोगवत्त्वं स्वकार्यसंयोगविरोधिृत्वं संयोगविभागानिरपेक्ष- १. कर्मत्व जाति के साथ सम्बन्ध, २. एक समय एक ही द्रव्य में रहना, ३. क्षणिकत्व, ४. मूर्त द्रव्यों में ही रहना, ५. गुणरहितत्व, ६. गुरुत्व, द्रवत्व, प्रयत्न और संयोग इन चार गुणों से उत्पन्न होना, ७. अपने द्वारा उत्पन्न संयोग से नष्ट होना, ८. किसी और के साहाय्य के बिना संयोग और विभाग को उत्पन्न करना, ९. असमवायिकारणत्व, १०. अपने आश्रयरूप द्रव्य एवं उससे भिन्न द्रव्य इन दोनों में न्यायकन्दली जगदङ्कुरबीजाय संसारार्णवसेतवे । नमो ज्ञानामृतस्यन्दिचन्द्रायार्धेन्दुमौलये ॥ उत्क्षेपणादीनां च परस्परं साधर्म्यमितरपदार्थवैधर्म्यं च प्रतिपादयन्नाह- उत्क्षेपणादीनामिति । कर्मत्वं नाम सामान्यम्, तेन सह सम्बन्ध उत्क्षेपणा- दीनामेव । एकद्रव्यवत्त्वम् एकदा एकस्मिन् द्रव्ये एकमेव कर्म वर्तते, एकं कर्म एकत्रैव द्रव्ये वर्त्तत इत्येकद्रव्यवत्त्वम् । यद्येकस्मिन् द्रव्ये युगपद् विरुद्धोभयकर्म- समवायः स्यात्, तदा तयोः परस्परप्रतिबन्धाद् दिग्विशेषसंयोगविभागानुपपत्तौ संयोगविभागयोरनपेक्षं कारणं कर्मेति लक्षणहानिः स्यात् । अथाविरुद्धकर्मद्वयसमा- उन अर्द्धचन्द्रशेखर शिव जी को मैं नमस्कार करता हूँ, जो जगत् रूप अङ्कुर के बीज, संसार समुद्र से पार उतरने के सेतु एवं ऐसे चन्द्रमा के स्वरूप हैं जिनसे ज्ञानरूप अमृत अनवरत स्रवित होता रहता है । उत्क्षेपणादि कर्मों के परस्पर साधर्म्य और द्रव्यादि पदार्थों के वैधर्म्य का प्रतिपादन करते हुए 'उत्क्षेपणादीनाम्' यह वाक्य लिखा गया है । अर्थात् कर्मत्व नाम की जो जाति है, उसके साथ उत्क्षेपणादि सभी कर्मों का सम्बन्ध है । 'एकद्रव्यवत्त्व' शब्द से यह अभिप्रेत है कि एक समय तक द्रव्य में एक ही क्रिया रहती है एवं एक क्रिया एक ही द्रव्य में रहती है (इसलिए एकद्रव्यवत्त्व सभी कर्मों का साधर्म्य है) एक ही समय यदि विरुद्ध दो कर्मों की सत्ता एक द्रव्य में मानें, तो 'संयोग और विभाग का इतर निरपेक्ष कारण ही कर्म है' कर्म का यह लक्षण न हो सकेगा; क्योंकि (दो क्रियाओं के परस्पर प्रतिरोध के कारण) किसी विशेष दिशा के साथ उस क्रियाश्रय द्रव्य का संयोग नहीं हो सकता । यदि (विरुद्ध दो क्रियायें न मानकर) अविरुद्ध दो क्रियाओं की सत्ता एक ही समय एक द्रव्य में मानें, तो उनमें से एक ही क्रिया से अभिमत देश के साथ क्रियाश्रय द्रव्य का संयोग या विभाग उत्पन्न हो ही जाएगा,
६९८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् कारणत्वमसमवायिकारणत्वं स्वपराश्रयसमवेतकार्यारम्भकत्वं समानजातीया- नारम्भकत्वं द्रव्यानाम्भकत्वं च प्रतिनियतजातियोगित्वम् । दिग्विशिष्ट- कार्यारम्भकत्वं च विशेषः । समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले (संयोग और विभाग) वस्तुओं को उत्पन्न करना, ११. अपने समानजातीय वस्तु को उत्पन्न न करना, १२. (प्रत्येक क्रिया में) नियमित उत्क्षेपणत्वादि जातियों का सम्बन्ध एवं १३. दिग्विशिष्ट कार्य का कर्तृत्व ये तेरह उत्क्षेपणादि पाँचों कर्मों के असाधारण धर्म हैं । न्यायकन्दली वेशः, तदेकस्मादेव तद्देशद्रव्यसंयोगविभागयोरुपपत्तेः द्वितीयकल्पनावैयर्थ्यम् । एकमेकं कर्म नानेकत्र वर्तते, एकस्य चलने तस्मात् कर्मणोऽन्यस्य चलनानुपलम्भात् । क्षणिकत्व- माशुतरविनाशित्वम् । मूर्त्तद्रव्यवृत्तित्वम् अवच्छिन्नपरिमाणद्रव्यवृत्तित्वम् । अगुणवत्त्वं गुणवत्त्वरहितत्वम् । गुरुत्वद्रवत्वप्रयत्नसंयोगजत्वम् । स्वकार्येति । स्वकार्येण संयोगेन विनाशित्वं न विभागविनाश्यत्वम्, उत्तरसंयोगाभावप्रसङ्गात् । संयोगविभागेति । यथा वेगारम्भे नोदनाभिघातविशेषापेक्षत्वं नैवं संयोगविभारम्भे नोदनाद्यपेक्षत्वमित्यर्थः । असमवायिकारणत्वम् यथा गुणानां निमित्तकारणत्वमपि नैवं कर्मणाम्, किन्त्वसमवायिकारणत्वमेवेत्यर्थः । स्वपरा- श्रयेति । स्वाश्रये पराश्रये च व्यासज्य समवेतं यत् कार्यं संयोगविभागलक्षणं दूसरी क्रिया की कल्पना व्यर्थ होगी । एक ही कर्म अनेक आश्रयों में भी नहीं रहता है; क्योंकि जिस क्रिया से आश्रयीभूत एक द्रव्य का चालन होता है, उसी क्रिया से दूसरे द्रव्य का चालन कहीं नहीं देखा जाता । उत्पत्ति के बाद अतिशीघ्र विनष्ट होना ही 'क्षणिकत्व' है । किसी अल्पपरिमाणवाले द्रव्य में रहना ही 'मूर्त्तद्रव्यवृत्तित्व' है । गुणवत्त्व का अभाव (फलतः गुणों का न रहना ही) 'अगुणवत्त्व' है । यह गुरुत्व, द्रवत्व, प्रयत्न और संयोग इनमें से किसी से उत्पन्न होता है । 'स्वकार्येति' यह संयोगरूप अपने कार्य से ही विनष्ट होता है, विभाग- रूप अपने कार्य से नहीं । यदि ऐसा मानेंगे तो क्रियाश्रय द्रव्य का उत्तरदेश के साथ संयोग न हो सकेगा । 'संयोगविभागेति' अर्थात् क्रिया को वेग के उत्पादन में जिस प्रकार विशेष प्रकार के नोदनसंयोग या अभिघातसंयोग की अपेक्षा होती है, उसी प्रकार संयोग और विभाग के उत्पादन में उसे नोदनादि किसी और वस्तु की अपेक्षा नहीं होती है । 'असमवायिकारणत्वम्' अर्थात् गुण असमवायि- कारण होने के साथ-साथ निमित्तकारण भी हो सकता है, क्रिया में यह बात नहीं है, वह केवल असमवायिकारण ही होती है । 'स्वपराश्रयेति' क्रिया अपने आश्रयीभूत द्रव्य और उससे भिन्न द्रव्य में समवायसम्बन्ध से रहनेवाले एक ही
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६१९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६१९ प्रशस्तपादभाष्यम् तत्रोत्क्षेपणं शरीरावयवेषु तत्सम्बद्धेषु च यदूर्ध्वभागिभिः प्रदेशैः संयोग- कारणमधोभागिभिश्च प्रदेशैर्विभागकारणं कर्मोत्पद्यते गुरुत्वप्रयत्नसंयोगेभ्यस्त- दुत्क्षेपणम् । इनमें उत्क्षेपण (कहते हैं, जो कर्म) शरीर के अवयव एवं उनसे संयुक्त और द्रव्यों का ऊपर के देश के साथ संयोग का कारण हो एवं नीचे के प्रदेशों के साथ उन्हीं के विभाग का भी कारण हो एवं गुरुत्व, प्रयत्न और संयोग से उत्पन्न हो, उसी कर्म को 'उत्क्षेपण' कहते हैं । न्यायकन्दली तदारम्भकत्वम् । समानेति । कर्मणः कर्मान्तरारम्भे गच्छतो गतिविनाशो न स्यात् । इच्छाप्रयत्नादिविरामादन्ते गतिविराम इति चेत् ? तर्हीच्छाप्रयत्नादिकमेवोत्तरोत्तरकर्मणामपि कारणम्, न तु कर्म । विवादाध्यासितं कर्म कर्मकारणं न भवति, कर्मत्वाद् अन्त्यकर्म- वत् । अथवा विवादाध्यासितं कर्म कर्मसाध्यं न भवति, कर्मत्वादाद्यकर्मवत् । द्रव्येति । उत्तरसंयोगानिवृत्ते कर्मणि द्रव्यस्योत्पादनम् । प्रतिनियतेति । उत्क्षेपणादिषु प्रत्येक- मुत्क्षेपणत्वाद्योग इत्यर्थः । एतत् सर्वमपि पञ्चानां साधर्म्यम् । दिग्विशिष्टकार्यकर्तृत्वमेव कथयति-तत्रेति । कार्य अर्थात् व्यासज्यवृत्ति संयोग और विभागरूप कार्य का कारण है । 'समानेति' अर्थात् क्रिया यदि दूसरी क्रिया को उत्पन्न करे, तो फिर एक बार जो चल पड़ेगा वह बराबर चलता ही जाएगा, उसकी क्रिया कभी रुकेगी ही नहीं; क्योंकि उसकी गति का कभी विनाश नहीं होगा । (प्र.) चलने की इच्छा या तदनुकूल प्रयत्न इन सबों के विराम से गति का विराम होगा ? (उ.) तो फिर वह इच्छा या प्रयत्न ही उस दूसरी क्रिया का भी कारण होगा, कर्म नहीं । तदनुकूल यह अनुमान भी है कि जैसे अन्तिम क्रिया किसी भी क्रिया का कारण नहीं होती है, उसी प्रकार कोई भी क्रिया केवल क्रिया होने के नाते ही दूसरी क्रिया को उत्पन्न नहीं करती । अथवा यह भी अनुमान किया जा सकता है कि जैसे क्रिया से पहले क्रिया की उत्पत्ति नहीं होती है, वैसे ही कोई क्रिया केवल क्रिया होने से ही किसी क्रिया को उत्पन्न नहीं कर सकती है । 'द्रव्येति' उत्तरदेश के साथ संयोग के उत्पन्न होने पर जब क्रिया का नाश हो जाता है, तभी द्रव्य की उत्पत्ति होती है । 'प्रतिनियतेति' उत्क्षेपणादि प्रत्येक क्रिया में उत्क्षेपणत्वादि जाति का सम्बन्ध (भी) कर्म का साधर्म्य है । ये सभी पाँचों कर्मों के साधर्म्य हैं । 'दिग्विशिष्टेति' । 'तत्रोत्क्षेपणम्' इत्यादि से दिग्विशिष्ट कार्यों के कर्त्तव्य का विवरण देते
१०० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् तद्विपरीतसंयोगविभागकारणं कर्मापक्षेपणम् । ऋजुनो द्रव्यस्याग्रावयवानां तद्देशैर्विभागः संयोगश्च, मूलप्रदेशैर्येन कर्मणा- वयवी कुटिलः सञ्जायते तदाकुञ्चनम् । तद्विपर्ययेण संयोगविभागोत्पत्तौ येन कर्मणावयवी ऋजुः सम्पद्यते तत् प्रसारणम् । यदनियतदिक्प्रदेशसंयोगविभागकारणं तद् गमनमिति । संयोग और विभाग के (अन्यानपेक्ष) कारणीभूत (एवं उत्क्षेपण के) विपरीत क्रिया को ही 'अपक्षेपण' कहते हैं । कोमल द्रव्य के आगे के अवयवों का उनके आश्रय प्रदेश के साथ विभाग और मूल प्रदेशों के साथ संयोग जिस क्रिया से हो (अर्थात्) जिस क्रिया से अवयवी टेढ़ा हो जाय, उसी को 'आकुञ्चन' कहते हैं । जिस क्रिया से उक्त संयोग के विपरीत संयोग और उक्त विभाग के विपरीत विभाग की उत्पत्ति होने पर (कुटिल) अवयवी सीधा हो जाय, उसी क्रिया को 'प्रसारण' कहते हैं । जो क्रिया अनियमित रूप से जिस किसी दिक् प्रदेश के साथ संयोग और विभाग को उत्पन्न करे, उस क्रिया को गमन कहते हैं । न्यायकन्दली शरीरावयवेषु हस्तादिषु तत्सम्बद्धेषु मुसलादिषु च यदूर्ध्वभागिभिः प्रदेशैः संयोग- कारणम्, अधोभागिश्च विभागकारणं गुरुत्वसंयोगप्रयत्नेभ्यो जायते तदुत्क्षेपणम् । तद्विपरीतेति । अधोदेशसंयोगकारणमूर्ध्वदेशविभागकारणं कर्मापक्षेपणमित्यर्थः । ऋजुन इति । तद्देशैरग्रावयवसम्बद्धैराकाशादिदेशैः सञ्जायत इति, येन कर्मणेति सम्बन्धः । अग्रावयवानां मूलप्रदेशविभागादुत्तरदेशसंयोगोत्पत्तौ सत्यामित्यर्थः । हैं । उत्क्षेपण उसे कहते हैं जिससे शरीर के हाथ प्रभृति अवयवों में एवं हाथ से युक्त मुसल प्रभृति द्रव्यों में ऊपर के देशों के साथ संयोग की उत्पत्ति हो और वह स्वयं गुरुत्व, संयोग और प्रयत्न से उत्पन्न हो । 'तद्विपरीतेति' अर्थात् नीचे के देशों के साथ संयोग का कारण और ऊपर के देशों से विभाग का कारण कर्म ही 'अपक्षेपण' है । 'ऋजुन इति' इस वाक्य में प्रयुक्त 'तद्देशैः' इस शब्द के द्वारा "आगे के अवयवों से सम्बद्ध आकाशादि देशों के साथ संयोग उत्पन्न होता है जिस क्रिया से" ऐसा अन्वय
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७०१
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७०१ प्रशस्तपादभाष्यम् एतत् पञ्चविधमपि कर्म शरीरावयवेषु तत्सम्बद्धेषु च सत्प्रत्ययमप्रत्ययं च । यदन्यत् तदप्रत्ययमेव तेष्वन्येषु च, तद् गमनमिति । कर्मणां जातिपञ्च- कत्वमयुक्तम्, गमनाविशेषात् । सर्वं हि क्षणिकं कर्म गमनमात्रमुत्पन्नं स्वाश्रयस्यो- र्ध्वमधस्तिर्यग्गव्याप्यणुमात्रैः प्रदेशैः संयोगविभागान् करोति, सर्वत्र गमनप्रत्ययोऽ- ये पाँचों ही प्रकार के कर्म शरीर के अवयवों में एवं उनसे सम्बद्ध दूसरे द्रव्यों में भी प्रयत्न (सत्प्रत्यय) से और बिना प्रयत्न (अप्रत्यय) के भी उत्पन्न होते हैं । इन दोनों से भिन्न सभी प्रकार के कर्म 'अप्रत्यय' कर्म हैं । (अर्थात्) शरीर के अवयवों या उनसे भिन्न द्रव्यों में रहनेवाले ये सभी अप्रत्यय-कर्म गमनरूप ही हैं । (प्र.) यतः सभी क्रियाओं में गमनत्व की प्रतीति समान रूप से होती है, अतः क्रियाओं में उत्क्षेपणत्वादि पाँच जातियों का सम्बन्ध मानना अयुक्त है । (अर्थात्) क्रियायें सभी क्षणिक हैं, वे प्रथमतः गमनरूप ही उत्पन्न होती हैं । उत्पन्न होने के बाद अपने आश्रयद्रव्यों के ऊपर के प्रदेश, नीचे के प्रदेश या पार्श्वप्रदेश के साथ संयोगों और विभागों को उत्पन्न करती हैं; किन्तु सभी कर्मों में 'यह गमन है' इस प्रकार की प्रतीति समान रूप से होती है । अतः सभी क्रियायें गमनरूप ही हैं । न्यायकन्दली सप्रत्ययमिति । प्रयत्नपूर्वकमप्रयत्नपूर्वकं च भवतीत्यर्थः । यदन्यदिति । एतेषु शरीरा- वयवेषु मुसलादिष्वन्येषु वा द्रव्येषु यत् तदप्रत्ययजं कर्म जायते सत्प्रत्ययादन्यत् तद् गमनमेव । चोदयति-कर्मणामिति । उत्क्षेपणादीनां कर्मणां जातिपञ्चकत्वमयुक्तम्, गमनात् सर्वेषामविशे- षादभेदादिति चोदनार्थः । सर्वेषां गमनादविशेषमेव कथयति-सर्वं हीत्यादिना । उत्क्षेपणादि- समझना चाहिए । अर्थात् आगे के अवयवों का मूल प्रदेश के साथ विभाग से जिस स्थिति में उत्तर देश संयोग की उत्पत्ति होती है उस स्थिति में । 'सत्प्रत्ययमिति' अर्थात् (कर्म दो प्रकार से उत्पन्न होते हैं) एक तो प्रयत्न से उत्पन्न होता है, दूसरा बिना प्रयत्न के ही उत्पन्न होता है । 'यदन्यत्' अर्थात् शरीर के अवयवों में एवं मूसल प्रभृति द्रव्यों में अथवा अन्य ही द्रव्यों में प्रयत्नजनित क्रिया से भिन्न जिस क्रिया की उत्पत्ति होती है, वह क्रिया गमनरूप ही है । 'कर्मणाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा आक्षेप करते हैं । आक्षेप ग्रन्थ का यह आशय है कि उत्क्षेपणादि में रहनेवाली उत्क्षेपणत्वादि पाँच जातियों का जो उल्लेख
७०२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् विशिष्टस्तस्माद् गमनमेव सर्वमिति । न, वर्गशः प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्ति- दर्शनात् । इहोत्क्षेपणं परत्रापक्षेपणमित्येवमादि सर्वत्र वर्गशः प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्ती दृष्टे, तद्धेतुः सामान्यविशेषभेदोऽवगम्यते । तेषामुदाद्युपसर्गविशेषात् प्रतिनियतदिग्विशिष्टकार्यारम्भत्वादुपलक्षण- (उ) ऐसी बात नहीं है; क्योंकि उत्क्षेपणादि सभी क्रिया के समूहों में विभिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीतियाँ (समानजातीय प्रतीति) एवं व्यावृत्ति- प्रतीतियाँ होती हैं । (विशदार्थ यह है कि) 'यहाँ उत्क्षेपण क्रिया है' और 'दूसरी जगह अपक्षेपण क्रिया है' इस प्रकार प्रत्येक क्रिया में भिन्न-भिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीति और व्यावृत्तिप्रतीति उपलब्ध होती है । इससे यह सिद्ध होता है कि उन विभिन्न प्रतीतियों के सामान्य और विशेष के भेद ही कारण हैं, अर्थात् गमनत्वरूप सामान्य जातियों और उत्क्षेपणत्वादि- रूप विशेष जातियों की विभिन्नता ही कारण है । उत्क्षेपणादि शब्दों के 'उद्' न्यायकन्दली यूर्ध्वं गच्छति, अधो गच्छतीति प्रत्ययदर्शनात् सर्वमेवेदमुत्क्षेपणादिकं गमनमेव । समाधत्ते- नेति । यत् त्वयोक्तं तन्न, उत्क्षेपणादिषु वर्गशः प्रतिवर्गं प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्त्योर्दर्शनात् । गोवर्गे अश्वादिवर्गव्यावृत्त्या प्रत्ययानुगमदर्शनाद् गोत्वं कल्प्यते यथा, तथोत्क्षेपणादिषु प्रतिवर्गमितरवर्गव्यावृत्त्या प्रत्ययानुगमदर्शनादुत्क्षेपणादिसामान्यकल्पनेत्यभिप्रायः । अस्य विवरणं सुगमम् । तेषामिति । उपलक्षणभेदोऽपीत्यपिशब्दः कार्यारम्भादित्यस्मात् परो द्रष्टव्यः । उपलक्ष्यतेऽन्यविलक्षणतया प्रतिपाद्यते व्यक्तिरनयेत्युपलक्षणं किया गया है, वह अयुक्त है; क्योंकि 'गमन' रूप क्रिया से उत्क्षेपणादि शेष चार क्रियाओं में कोई अन्तर नहीं है । 'सर्वं हि' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा उत्क्षेपणादि क्रियाओं में गमन का जो अभेद कहा गया है, उसका समर्थन करते हैं । अर्थात् 'ऊपर की तरफ जाता है, नीचे की तरफ आता है' इसी प्रकार की ही प्रतीतियाँ उत्क्षेपणादि की भी होती हैं, इससे समझते हैं कि उत्क्षेपणादि सभी क्रियायें वस्तुतः गमनरूप ही हैं । 'न' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उसका समाधान करते हैं । अर्थात् तुमने जो उत्क्षेपणादि क्रियाओं को गमनरूप क्रिया से अभिन्न कहा है, वह ठीक नहीं है; क्योंकि 'वर्गशः' अर्थात् उत्क्षेपणादि प्रत्येक वर्ग की क्रियाओं में समान आकार की प्रतीतियाँ (अनुवृत्तिप्रत्यय) होती हैं । एवं उक्त वर्ग की उत्क्षेपणादि प्रत्येक व्यक्ति में अपक्षेपणादि अपर वर्ग की क्रिया से भिन्नत्व की प्रतीति- रूप व्यावृत्तिबुद्धि भी होती है । जैसे कि गो वर्ग की प्रत्येक व्यक्ति में 'अयं गौः' इस आकार की समानाकारक प्रतीति होती है एवं अश्वादि वर्ग के प्रत्येक
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७०३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७०३ प्रशस्तपादभाष्यम् भेदोऽपि सिद्धः । एवमपि पञ्चैवेत्यवधारणानुपपत्तिः । निष्क्रमणप्रवे- शनादिष्वपि वर्गशः प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिदर्शनात् । यद्युत्क्षेपणादिषु एवं 'अप' प्रभृति उपसर्ग एवं उन क्रियाओं के द्वारा किसी विशेष प्रदेश में ही नियम से किसी विशेष प्रकार के कार्यों का उत्पादन करना भी 'उपलक्षणभेद' अर्थात् उत्क्षेपणादि विभिन्न जातियों के साधक हैं। (प्र.) तब फिर 'कर्म पाँच ही हैं' यह नियम भी ठीक नहीं होगा; क्योंकि निष्क्रमण एवं प्रवेश प्रभृति क्रियाओं में भी विभिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीतियाँ और व्यावृत्तिप्रतीतियाँ होती हैं । यदि उत्क्षेपणादि प्रत्येक क्रियासमूह में विभिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीति और व्यावृत्ति- प्रतीति से उत्क्षेपणादि विभिन्न जातियों की कल्पना करते हैं, तो फिर न्यायकन्दली जातिः । तदयमत्रार्थः-न केवलमनुवृत्तिव्यावृत्तिप्रत्ययदर्शनादुत्क्षेपणादीनां जातिभेदः सिद्धः, उदाद्युपसर्गभेदात् प्रतिनियतदिग्विशिष्टकार्यारम्भादपि सिद्धः । अपरे तु तेषामुत्क्षेपणादीना- मुदाद्युपसर्गविशेषाद् दिग्विशिष्टकार्यारम्भा दुपलक्षणभेदोऽपि प्रतिपत्तिभेदोऽपि सिद्ध इति । अभेदे हि यथोत्क्षेपणमूर्ध्वसंयोगविभागेहेतुरेवमपक्षेपणादिकमपि स्यात् । पुनश्चोदयति-एवम- पीति । यदि प्रतिवर्गं प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिदर्शनादुत्क्षेपणादिषु सामान्यमभ्युपेयते, तदा निष्क्रमणादिष्वपि प्रतिवर्गं प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिदर्शनान्निष्क्रमणत्वादिकमभ्युपेयम्, ततश्च व्यक्ति से भिन्नत्व की प्रतीति भी होती है, इन्हीं दोनों प्रतीतियों से 'गोत्व' जाति की कल्पना करते हैं, उसी प्रकार उत्क्षेपणादि जातियों की भी कल्पना करते हैं । इस भाष्य ग्रन्थ की व्याख्या सुबोध है । 'तेषाम्' इत्यादि सन्दर्भ के 'उपलक्षणभेदोऽपि' इस वाक्य में जो 'अपि' शब्द है, उसका पाठ 'कार्यारम्भात्' इस वाक्य के बाद ही समझना चाहिए (अर्थात् कार्यारम्भादप्युपलक्षणभेदः-वाक्य का ऐसा स्वरूप समझना चाहिए) । 'उपलक्ष्यते अन्यविलक्षणतया प्रतिपाद्यते व्यक्तिरनया' (अर्थात् 'उपलक्षित हो' अर्थात् व्यक्ति दूसरों से भिन्न रूप में समझी जाय जिससे') इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'उपलक्षण' शब्द से यहाँ 'जाति' ही विवक्षित है । केवल अनुवृत्तिप्रत्यय (अर्थात् सभी उत्क्षेपण क्रियाओं में 'यह उत्क्षेपण है' इत्यादि एक आकार की प्रतीति) एवं व्यावृत्तिप्रत्यय (अर्थात् उत्क्षेपणादि प्रत्येक व्यक्ति में उससे भिन्न अपक्षेपणादि क्रियाओं से भिन्नत्व की बुद्धि) ही उत्क्षेपणादि विभिन्न जातियों के साधक नहीं हैं । उद्, अप प्रभृति उपसर्ग के भेद एवं विभिन्न नियत देशों में ही कार्यों को उत्पन्न करना भी उत्क्षेपणात्यादि विभिन्न जातियों के साधक हैं । किसी सम्प्रदाय के लोग 'तेषामुदा- द्युपसर्गविशेषात्' इत्यादि सन्दर्भ की व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि 'तेषाम्' अर्थात्
७०४ न्यायकिन्दलीसहितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् सर्वत्र वर्गशः प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिदर्शनाज् जातिभेद इष्यते, एवं च निष्क्रमणप्रवेशनादिष्वपि कार्यभेदात् तेषु प्रत्ययानुवृत्ति- व्यावृत्ती इति चेत् ? न, उत्क्षेपणादिष्वपि कार्यभेदादेव प्रत्ययानुवृत्तिव्या- वृत्तिप्रसङ्गः । अथ समाने वर्गशः प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिसद्भावे उत्क्षेपणादीनामेव जातिभेदो न निष्क्रमणादीनामित्यत्र विशेषहेतु- उसी युक्ति से निष्क्रमण और प्रवेशनादि क्रियाओं में भी विभिन्न जातियों की कल्पना करनी होगी । यदि (ऊपर के देश के साथ संयोगादिरूप) कार्य की विभिन्नता से (उनमें विभिन्न) अनुवृत्तिप्रतीतियाँ और व्यावृत्तिप्रतीतियाँ होती हैं, तो फिर कार्य की विभिन्नता ही उन प्रतीतियों का कारण होगी (जाति की विभिन्नता नहीं) । उत्क्षेपणादि समान क्रियाओं के समूहों में अनुवृत्ति और व्यावृत्ति के कारण उत्क्षेपणत्वादि विभिन्न जातियों की कल्पना की जाय और निष्क्रमण, प्रवेशनादि क्रियाओं में ठीक वही युक्ति रहने पर भी विभिन्न जातियों की कल्पना न की जाय, इसमें कोई विशेष युक्ति नहीं है । (उ.) ऐसी बात नहीं है (अर्थात् उत्क्षेपणादि जातियाँ मानी जायें और निष्क्रमणत्वादि जातियाँ नहीं, इसमें विशष युक्ति है), यदि न्यायकन्दली पञ्चैवेत्यवधारणानुपपत्तिः । अथ निष्क्रमणादिषु कार्यभेदात् प्रत्ययभेदो न जातिभेदात्, तदोत्क्षेपणादिष्वपि तथा स्यादित्याह-कार्यभेदात् तेष्विति । समाधत्ते- नेति । यदि निष्क्रमणत्वादिजातय इष्यन्ते, तदा जातिसङ्करप्रसङ्गः । उत्क्षेपणादि का 'उद्' 'अप' प्रभृति विभिन्न उपसर्गों के कारण एवं विशेष दिशाओं में कार्योत्पादक होने के कारण 'उपलक्षणभेदोऽपि' अर्थात् प्रतिपत्ति (प्रतीति) का भेद भी सिद्ध होता है (एवं प्रतिपत्ति के भेद से वस्तुओं का भेद सुतरां सिद्ध है) । उत्क्षेपणादि सभी कर्म यदि अभिन्न हों तो फिर जिस प्रकार उत्क्षेपण क्रिया ऊर्ध्वदेश में ही संयोग और विभाग को उत्पन्न करती है, वैसे ही अपक्षेपणादि क्रियायें भी ऊर्ध्वदेश में ही संयोगादि को उत्पन्न करतीं । 'एवमपि' इत्यादि से पुनः आक्षेप करते हैं । आक्षेप करनेवालों का यह अभिप्राय है कि यदि उत्क्षेपणादि प्रत्येक वर्ग में अलग-अलग अनुवृत्तिप्रत्यय और व्यावृत्तिप्रत्यय के कारण उत्क्षेपणादि अलग-अलग जातियों की कल्पना करें, तो फिर निष्क्रमण (जाना) और प्रवेशन (आना) प्रभृति प्रत्येक वर्ग के भी उक्त अनुवृत्तिप्रत्यय और व्यावृत्तिप्रत्यय विभिन्न प्रकार के हैं ही । अतः उनमें भी अलग-अलग जाति का मानना आवश्यक होगा । जिससे 'पञ्चैव कर्माणि' यह अवधारण असङ्गत हो जाएगा । 'कार्यभेदात् तेषु' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग में उपपत्ति देते हैं कि यदि निष्क्रमण, प्रवेश्न प्रभृति की प्रतीतियों की विभिन्नता जातिभेदमूलक न
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७०५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७०५ प्रशस्तपादभाष्यम् रस्तीति । न, जातिसङ्करप्रसङ्गात् । निष्क्रमणादीनां जातिभेदात् प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तौ जातिसङ्करः प्रसज्यते । कथम् ? द्वयोर्द्रष्ट्रो- रेकस्मादपवरकादपवरकान्तरं गच्छतो युगपन्निष्क्रमणप्रवेशनप्रत्ययौ उत्क्षेपणत्वादि की तरह निष्क्रमणत्वादि जातियाँ मानी जायें तो इसमें साङ्कर्य दोष होगा । (विशदार्थ यह है कि) निष्क्रमणादि क्रियाओं में यदि विभिन्न जातियों के कारण अनुवृत्ति की प्रतीति और व्यावृत्ति की प्रतीति मानें तो इसमें साङ्कर्य दोष होगा । (प्र.) किस प्रकार ? (साङ्कर्य दोष होगा ?) (उ.) दो द्वारों को पार करते हुए किसी एक व्यक्ति के एक ही गमन कर्म को देखनेवाले दो पुरुषों में से एक को एक ही समय उसी गमन कर्म में निष्क्रमण की प्रतीति और दूसरे को प्रवेशन की प्रतीति होती है । जैसे कि एक ही द्वार में जाते न्यायाकन्दली एकस्यां व्यक्तौ विरुद्धानेकजातिसमवायः प्रसज्यत इत्यर्थः । कथमिति पृष्टः सत्राह-द्वयोर्द्रष्ट्रोरिति । द्वयोर्द्रष्ट्रोरेकस्मादपवरकादपवर- कान्तरं गच्छतः पुरुषस्य यौ द्रष्टारौ तयोरेकस्यां व्यक्तौ निष्क्रमणप्रवेशनप्रत्ययौ दृष्टौ । यतोऽपवरकात् पुरुषो निर्गच्छति तत्र स्थितस्य निर्गच्छतीति प्रत्ययः, मानकर कार्यभेदमूलक मानें, तो फिर विभिन्न उत्क्षेपणादिविषयक प्रतीतियों की उपपत्ति भी उन प्रतीतियों को कार्यभेदमूलक मानकर की जा सकती है । 'न' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उक्त आक्षेप का समाधान करते हैं । अभिप्राय यह है कि (उत्क्षेपणत्वादि की तरह यदि) निष्क्रमणत्वादि जातियाँ भी मानी जायें तो 'जातिसङ्करप्रसङ्ग' होगा, अर्थात् एक ही व्यक्ति में विरुद्ध अनेक जातियों का समवाय मानना पड़ेगा । 'कथम्' इस पद के द्वारा पूछे जाने पर (अर्थात् यह साङ्कर्य क्यों कर होगा ?) 'द्वयोर्द्रष्ट्रोः' इस सन्दर्भ के द्वारा उक्त साङ्कर्य दोष को उपपादन करते हैं । 'द्वयोर्द्रष्ट्रोः' अर्थात् एक प्रकोष्ठ से दूसरे प्रकोष्ठ में जाते हुए पुरुष को जो दो देखनेवाले पुरुष हैं, उन दोनों में से एक पुरुष को उक्त गमनरूप क्रिया में 'निष्क्रमणत्व' की और दूसरे पुरुष को 'प्रवेशनत्व' की प्रतीति होती है । इस प्रकार एक ही क्रिया में दोनों की प्रतीति होती है, अर्थात् जिस प्रकोष्ठ से वह पुरुष जाता है, उस प्रकोष्ठ में रहनेवाले पुरुष को उससे जानेवाले पुरुष में 'निष्क्रामति' इस आकार की प्रतीति होती है एवं जिस प्रकोष्ठ में वह पुरुष जाता है, उस प्रकोष्ठ में रहनेवाले को
७०६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् दृष्टौ, तथा द्वारप्रदेशे प्रविशति निष्क्रामतीति च । यदा तु प्रतिसीराद्य- पनीतं भवति, तदा न प्रवेशनप्रत्ययो नापि निष्क्रमणप्रत्ययः; किन्तु गमनप्रत्यय एव भवति । तथा नालिकायां वंशपत्रादौ पतति बहूनां द्रष्टॄणां युगपद् भ्रमणपतनप्रवेशनप्रत्यया दृष्टा इति जातिसङ्कर- हुए एक ही व्यक्ति में (विरुद्ध दिशाओं में खड़े हुए दो व्यक्तियों को) क्रमशः 'यह प्रवेश करता है' एवं 'यह निकलता है' इन दोनों प्रकार की प्रतीतियाँ होती हैं, (जब जाते हुए व्यक्ति के बीच की) प्रतिसीरा (पर्दा) उठा दी जाती है, तब उन्हीं दोनों व्यक्तियों को न निष्क्रमण की प्रतीति होती है और न प्रवेशन की प्रतीति, केवल गमन की ही प्रतीति होती है । इसी प्रकार बहती हुई नाली में जब बाँस प्रभृति के पत्ते गिरते हैं, तब उन पत्तों में एक ही समय बहुत से देखनेवालों में से किसी को भ्रमण की प्रतीति होती है और किसी को प्रवेशन की प्रतीति होती है। अतः निष्क्रमणत्वादि जातियों के मानने पर जातिसङ्कर दोष होगा । उत्क्षेपणादि क्रियाओं में इस प्रकार का साङ्कर्य नहीं देखा जाता । अतः उत्क्षेपणादि क्रियाओं में अनुवृत्ति की प्रतीति और व्यावृत्ति की प्रतीति उत्क्षेपणात्वादि जातियों के भेद से होती है; किन्तु निष्क्रमणादि क्रियाओं में उक्त दोनों प्रतीतियाँ कार्यों की विभिन्नता न्यायकन्दली यत्र प्रविशति तत्र स्थितस्य प्रविशतीति प्रत्ययः । यदि जातिकृताविमौ प्रत्ययौ दृष्टौ तदैकस्यां व्यक्तौ परस्परविरुद्धनिष्क्रमणत्वप्रवेशनत्वजातिद्वयसमावेशो दूषणं स्यात् । तथा द्वारप्रदेशे प्रविशति निष्क्रामतीति यथैकस्मिन्नेव बहुप्रकोष्ठके गृहे प्रकोष्ठात् प्रकोष्ठान्तरं गच्छति पुरुषे पूर्व्वापरप्रकोष्ठस्थितयोर्द्रष्ट्रोर्द्वारप्रदेशे निर्गच्छति प्रविशतीति प्रत्ययौ भवतः। यदा तु प्रतिसीराद्य- पनीतं मध्यस्थितं जवनिकापनीतं भवति तदा न प्रवेशनप्रत्ययो नापि निष्क्रमणप्रत्ययः, उसी पुरुष में 'प्रविशति' यह प्रतीति होती है । यदि निष्क्रमण और प्रवेशन क्रियाओं की प्रतीतियाँ निष्क्रमणत्वादि जातिमूलक हों, तो फिर एक ही व्यक्ति में परस्पर विरुद्ध निष्क्रमणत्व और प्रवेशनत्वादि जातियों के समावेशरूप साङ्कर्य दोष की आपत्ति होगी । 'तथा द्वारदेशे प्रविशति निष्क्रामतीति' उक्त भाष्य सन्दर्भ का यह अभिप्राय है कि जैसे बहुत-सी कोठरियों वाले भवन में यदि एक पुरुष एक कोठरी में जाता है, तो जिस कोठरी से वह जाता है उस कोठरी में रहनेवाले दूसरे पुरुष को उस जानेवाले पुरुष में 'यह निकलता है' इस प्रकार की प्रतीति होती है और जिस कोठरी में वह जाता है, उस कोठरी में रहनेवाले दूसरे पुरुष को उसी पुरुष में 'यह आता है' इस प्रकार की प्रतीति होती है । 'यदा तु प्रतिसीराद्यपनीतम्' अर्थात् जब बीच का पर्दा (या दीवाल जिससे कोठरियाँ बनती हैं) हटा दिया जाता है, उस समय उसी पुरुष में न 'निकलने' की और न 'आने' की प्रतीति होती है, केवल 'चलने' की ही प्रतीति होती है । अतः वह 'गमन' रूप क्रिया ही है, उसी में उपाधि भेद से
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७०७
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७०७ प्रशस्तपादभाष्यम् प्रसङ्गः । न चैवमुत्क्षेपणादिषु प्रत्ययसङ्करो दृष्टः । तस्मादुत्क्षेप- णादीनामेव जातिभेदात् प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्ती, निष्क्रमणादीनां तु कार्यभेदादिति। कथं युगपत् प्रत्ययभेद इति चेत्? अथ मतं यथा जातिसङ्करो नास्ति, एवमनेककर्मसमावेशोऽपि नास्तीत्येकस्मिन् कर्मणि युगपद् द्रष्टॄणां भ्रमणपतनप्रवेशनप्रत्ययाः कथं भवन्तीति ? अत्र ब्रूमः - न, अवयवावयविनोर्दिग्विदिष्टसंयोगविभागानां भेदात् । यो से होती हैं । (प्र.) एक ही समय (एक ही क्रिया में) उक्त विभिन्न प्रतीतियाँ कैसे होती हैं ? (विशदार्थ यह है कि) जिस प्रकार (उत्क्षेपणात्यादि जातियों के मानने में) जातिसङ्कररूप दोष सम्भव नहीं है, (उसी प्रकार) एक ही समय एक ही वस्तु में (निष्क्रमण, प्रवेशनादि) अनेक कर्मों का रहना भी सम्भव नहीं है, फिर एक ही समय एक ही द्रव्य में अनेक देखनेवाले को (भी) भ्रमण, पतन और प्रवेशन विषयक प्रतीतियाँ कैसे हो सकती हैं ? (उ.) इस प्रश्न के समाधान में हम लोगों का कहना है कि नहीं (अर्थात् उक्त प्रतीतियाँ असम्भव नहीं हैं); क्योंकि एक ही वस्तु में एक ही समय भ्रमणादि की उक्त प्रतीतियाँ नाली में गिरे पत्ते प्रभृति अवयवी और उनके अवयवों की विभिन्न दिशाओं में उत्पन्न हुए संयोग-विभागादि कार्यों की विभिन्नता से होती हैं । देखनेवालों में से जो व्यक्ति पार्श्व से क्रमशः प्रदेश के अवयवों के दिक्प्रदेशों के साथ संयोगों और विभागों को न्यायकन्दली किन्तु गमनप्रत्यय एव भवति । तस्माद् गमनमेव, तत्रोपाधिकृतश्च प्रत्ययभेद इत्यभि- प्रायः । उदाहरणान्तरमाह-तथा नालिकायामिति । नालिकेति गर्त्तस्या- भिधानम् । स्वपक्षे विशेषमाह-न चैवमिति । उपसंहरति-तस्मादिति । एकदेकस्मिन् द्रव्ये तावदेकमेव कर्म भवति, तत्र कथं युगपदनेककर्मप्रत्यय 'निष्क्रमण' प्रत्यय और 'प्रवेशन' प्रत्यय प्रभृति विभिन्न प्रत्यय होते हैं । 'तथा नालिकायाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी प्रसङ्ग में दूसरा दृष्टान्त दिखलाया गया है । 'नालिका' गड्ढे को कहते हैं । 'न चैवम्' इत्यादि से पूर्वपक्ष की अपेक्षा अपने सिद्धान्तपक्ष में अन्तर दिखलाते हैं । 'तस्मात्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । 'कथम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा यह आक्षेप करते हैं कि यदि एक समय एक द्रव्य में एक ही क्रिया हो सकती है, तो फिर एक ही समय अनेक कर्मों की प्रतीति कैसे होगी ? 'अथ मतम्'