भारतकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 835 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 228

Dikshita say "अन्त्यलोपः"? Or does the footnote explain: "२ अन्त्य इति ॥ 'ऋतो लोपे कृते सस्य श्रवणं यथा स्यात् तथा' "? Wait, let's look at the letters in: " '... श्रवणं यथा स्यात् तथा' " Look at the first word: It is: 'ऋ' 'त' 'स्य' -> 'ऋतस्य'? No, 'ऋतोः'? Wait, let's look at the letters: Letter 1: 'ऋ' Letter 2: 'त' Letter 3: 'स्य' ? Wait, is it 'ऋतस्य'? In Sanskrit, genitive of ऋ is 'ऋतः' or 'ऋकारस्य', but sometimes people write 'ऋतस्य' or 'ऋत्वस्य'? Wait! Could it be 'रुत्वस्य'? If 'ऋ' is elided, does पितृष्वस् remain? Yes, पितृष्वस् + ढेय्. Then सकारस्य रुत्वं स्यात्! Wait! "सस्य रुत्वं यथा स्यात् तथा"? Wait, if स is at the end of the pada, it would become रुत्व/विसर्ग. But here ढ follows, so if स remains, we get पितृष्वसेयः! Wait, in "पितृष्वसेयः", there is a 'स्'! If "पितृष्वसुः" were taken as a whole, the whole