भारतकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

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ण्यः is the sutra; by yogavibhāga of 'परिषदः', ण-प्रत्यय also happens (णोऽपि)"! Wait! "ण-प्रत्ययः अपि" -> "णोऽपि"! In some recensions, is the pratyaya अण् or ण? When ण is added to परिषद्, what do you get? परिषद् + ण = पारिषद! (Because ण has वृद्धि of अ to आ, giving पारिषद!) If it were अण्, परिषद् + अण् = पारिषद! (Both ण and अण् have the same effect!) So "णोऽपि" means: "णः अपि"!! AND by Sandhi: "योगविभागात् + णः + अपि" -> योगविभागात् + णः = योगविभागाण्णः! योगविभागाण्णः + अपि = योगविभागाण्णोऽपि! Aha! WOW! That makes TOTAL sense! योगविभागात् + णोऽपि = योगविभागाण्णोऽपि! Now, look at the text in line 18: Is there a 'गा'? Let's look: "यो-ग-वि-भा-गा-ण्णो-ऽ-पि" or "यो-ग-वि-भा-ण्णो-ऽ-पि"? Wait, look at the space: यो (1) ग (2) वि