भारतकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

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स्याम्॥ ५३ ॥ द्विगोष्ठंश्च ॥ ५४ ॥ कुलिजालुक्खौ च ॥ ५५ ॥ सोऽस्यांशवस्नभृतयः॥ ॥ ५६॥ तदस्य परिमाणम् ॥ ५७॥ संख्यायाः संज्ञासङ्घसूत्राध्ययनेषु ॥५८॥ पंक्तिविंशति- त्रिंशच्चत्वारिंशत्पञ्चाशत्षष्टिसप्तत्यशीतिनवतिशतम् ॥ ५९ ॥ पञ्चद्दशतौ वर्गे वा ॥६०॥३॥ सत्तनोऽञ्छन्दसि ॥ ६१ ॥ त्रिंशच्चत्वारिंशतोर्ब्राह्मणे संज्ञायां डण् ॥ ६२ ॥ तदर्हति ॥६३॥ छेदादिभ्यो नित्यम् ॥६४॥ शीर्षच्छेदाद्यच्च ॥६५॥ दण्डादिभ्यो यः ॥६६॥ छन्दसि च ॥६७॥ पात्राद्द्वंश्च ॥ ६८ ॥ कडंकरदक्षिणाच्च च ॥ ६९ ॥ स्थालीबिलात् ॥ ७० ॥ यज्ञर्त्विग्भ्यां घखञौ ॥ ७१ ॥ पारायणतुरायणचान्द्रायणं वर्तयति ॥ ७२ ॥ संशयमापन्नः ॥ ७३ ॥ योजनं गच्छति ॥ ७४ ॥ पथः ष्कन् ॥ ७५ ॥ पंथो ण नित्यम् ॥ ७६ ॥ उत्तरपथेनाहृतं च ॥ ॥७७ ॥ कालात् ॥ ७८ ॥ तेन निर्वृत्तम् ॥ ७९॥ तमधीष्टो भृतो भूतो भावी ॥ ८० ॥ ४ ॥ मासाद्वयसि यत्खञौ ॥ ८१ ॥ द्विगोर्यप् ॥ ८२ ॥ षण्मासाण्ण्यच्च ॥ ८३ ॥ अवयसि ठंश्च ८४॥ समायाः खः ॥८५॥ द्विगोर्वा ॥८६॥ रात्र्यहः संवत्सराच्च ॥८७॥ वर्षालुक् च॥८८॥ चित्तवति नित्यम् ॥८९॥ षष्टिकाः षष्टिरात्रेण पच्यन्ते ॥९०॥ वत्सरान्ताच्छश्छन्दसि ॥ ९१ ॥ संपरिपूूर्वात्ख च ॥ ९२ ॥ तेन परिजय्यलभ्यकार्यसुकरम् ॥९३ ॥ तदस्य ब्रह्मचर्यम् ॥ ९४ ॥ तस्य दक्षिणा यज्ञाख्येभ्यः ॥ ९५ ॥ तत्र च दीयते कार्यं भववत् ॥ ९६ ॥ व्युष्टादिभ्योऽण् ॥ ॥ ९७ ॥ तेन यथाकथाचहस्ताभ्यां णयतौ ॥ ९८ ॥ संपादिनि ॥ ९९ ॥ कर्मवेषाद्यत् ॥ ॥ १०० ॥ ५ ॥ तस्मै प्रभवति संतापादिभ्यः ॥ १०१ ॥ योगाद्यच्च ॥ १०२ ॥ कर्मण उकञ् ॥ १०३ ॥ समयस्तदस्य प्राप्तम् ॥ १०४ ॥ ऋतोरण् ॥ १०५ ॥ छन्दसि घस् ॥ ॥ १०६ ॥ कालाद्यत् ॥ १०७ ॥ प्रकृष्टे ठञ् ॥ १०८ ॥ प्रयोजनम् ॥ १०९ ॥ विशाखा- षाढादण्मन्थदण्डयोः ॥११०॥ अनुप्रवचनादिभ्यश्छः ॥१११॥ समापनात्पूर्वपदात् ॥११२॥ ऐकागारिकट्चौरे ॥ ११३ ॥ आकालिकडाचन्तवचने ॥ ११४ ॥ तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः ॥ ॥ ११५ ॥ तत्र तस्येव ॥ ११६ ॥ तदर्हम् ॥ ११७ ॥ उपसर्गाच्छन्दसि धात्वर्थे ॥ ११८ ॥ तस्य भावस्त्वतलौ ॥ ११९ ॥ आ च त्वात् ॥ १२० ॥ ६ ॥ न नञ्पूर्वात्तत्पुरुषादचतुरसंगत- लवणवट्युधकतरसलसेभ्यः ॥ १२१ ॥ पृथादिभ्यः इमनिज्वा ॥ १२२ ॥ वर्णदृढादिभ्यः ष्यञ् च ॥ १२३ ॥ गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च ॥ १२४ ॥ स्तेनाद्यन्नलोपश्च ॥ १२५ ॥ सख्युर्यः ॥ १२६ ॥ कपिज्ञात्योर्ढक् ॥ १२७ ॥ पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक्॥१२८॥ प्राण- भृज्जातिवयोवचनोद्गात्रादिभ्योऽञ् ॥ १२९ ॥ हायनान्तयुवादिभ्योऽण् ॥ १३० ॥ इगन्ताच्च लघूपूर्वात् ॥ १३१ ॥ योपधाद्गुरूपोत्तमाद्वुञ् ॥ १३२ ॥ द्वन्द्वमनोज्ञादिभ्यश्च ॥ १३३ ॥ गोत्रचरणाच्छ्लाघात्याकारतदवेतेषु ॥ १३४ ॥ होत्राभ्यश्छः ॥ १३५ ॥ ब्रह्मणस्त्वः ॥१३६॥ ॥ १६ ॥ ( प्राक्क्रीताच्छताच्च सर्वभूमिसत्तनोऽञ्मासात्तस्मै प्रभवति ननञ्पूर्वात् षोडश ) ॥ इति पञ्चमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ १ ॥