भारतकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

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पृष्ठ 668

( ६२ ) गणपाठे- वाकिनादीनां कुक्च । ४ । १ । १५८ ॥ वाकिन गौधेर कर्कश काकलङ्का । चर्मिन् वर्मिणोर्नलोपश्च ॥ इति वाकिनादिः ॥ २३ ॥ कम्बोजाल्लुक् । ४ । १ । १७५ ॥ कम्बोज चोल केरल शक यवन ॥ इति कम्बोजादिः ॥ २४ ॥ न प्राच्यभर्गादियौधेयादिभ्यः । ४ । १ । १७८ ॥ १ भर्ग करूश केकय कश्मीर साल्व सुस्थाल उरस् कौरव्य ॥ इति भर्गादिः ॥ २५ ॥ २ यौधेय शौक्रेय शौभ्रेय ज्यावाणेय धौर्तेय धार्तेय त्रिगर्त भरत उशीनर ॥ इति यौधेयादिः ॥ २६ ॥ भिक्षादिभ्योऽण् । ४ । २ । ३८ ॥ भिक्षा गर्भिणी क्षेत्र करीष अङ्गार चर्मिन् धर्मिन् सहस्र युवति पदाति पद्धति अथर्वन् दक्षिणा भरत विषय श्रोत्र ॥ इति भिक्षादिः ॥ २७ ॥ खण्डिकादिभ्यश्च । ४ । २ । ४५ ॥ खण्डिका वडवा क्षुद्रकमालवात् सेनासंज्ञायाम् । भिक्षुक शुक उल्लुक श्वन् अहन् युगवरत्रा हलवन्वा ॥ इति खण्डिकादिः ॥ २८ ॥ पाशादिभ्यो यः ॥ ४ । २ । ४९ ॥ पाश तृण धूम वात अङ्गार पाटल पोत गल पिटक पिटाक शकट हल नट वन ॥ इति पाशादिः ॥ २९ ॥

  • खलादिभ्य इनिर्वक्तव्यः * ४ । २ । ५१ ॥ खल डाक कुटुम्ब शाक कुण्ड- लिनी ॥ इति खलादिराकृतिगणः ॥ ३० ॥ राजन्यादिभ्यो वुञ् । ४ । २ । ५३ ॥ राजन्य आनत वाभ्रव्य शालंका यन दैवयातव ( देवयात् ) [ अत्रीड वरत्रा ] जालंघरायण [ राजायन ] तेलु आत्मकामेय अम्बरीषपुत्र वसाति बैलवन शैलूष उदुम्बर तीव्र बैल्वल आर्जुनायन संप्रिय दाक्षि ऊर्णनाभ ॥ इति राजन्यादिः ॥ आकृतिगणः ॥ ३१ ॥ भौरिक्यैधुष्कीर्यादिभ्यो विधलभक्तौ । ४ । २ । ५४ ॥ १ भौरिकि मौलिकि चौपयत चौतयत ( चैतयत ) काणेय वाणिजक वाणिकाज्य ( वालिकाज्य ) सैकयत वैकयत ॥ इति भौरिक्यादिः ॥ ३२ ॥ २ ऐषुकारि सारस्यायन ( सारसायन ) चान्द्रायण द्व्याक्षायण त्र्याक्षायण औडायन नौला- यन खाडायन दासमित्रि दासमित्रायण शौद्रायण दाक्षायण शापण्डायन ( शायण्डायन ) ताक्षार्याण शौआयण सौवीर [ सौवीरायण ] शपण्ड ( शयण्द ) शौण्ड शयाण्डि ( शयाण्ड) वैश्वमानव वैश्वध्येनव ( वैश्वधेनव ) नड तुण्डदेव विश्वदेव [ सापिण्डि ] ॥ इति ऐषुकार्यादिः ॥ ३३ ॥ क्रतूक्थादिसूत्रान्ताट्ठक् । ४। २ । ६० ॥ उक्थ लोकायत न्याय न्यास पुनरुक्त निरुक्त निमित्त द्विपदा ज्योतिष अनुपद अनुकल्प यज्ञ धर्म चर्चा क्रमेतर श्लक्ष