भारतकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

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पञ्चमोऽध्यायः । (७१) हायनान्तयुवादिभ्योऽण् । ५।१।१३० ॥ युवन् स्थविर होतृ यजमान । पुरुषासे । भ्रातृ कुतुक श्रमण (श्रवण) कटुक कमण्डलु कुस्त्री सुस्त्री दुःस्त्री सुहृदय दुर्हृदय सुहृद् दुर्हृद् सुभ्रातृ दुर्भ्रातृ वृषल परिव्राजक सब्रह्मचारिन् अनृशंस । हृदयासे । कुशल चपल निपुण पिशुन कुतूहल क्षेत्रज्ञ । श्रोत्रियस्य यलोपश्च ॥ इति युवादिः ॥ २३ ॥ इन्द्रमनोजादिभ्यश्च । ५ । १ । १३३ ॥ मनोज्ञ प्रियरूप अभिरूप कल्याण मेधाविन् आढ्य कुलपुत्र छान्दस छात्र श्रोत्रिय चोर धूर्त विश्वदेव युवन् कुपुत्र ग्रामपुत्र ग्रामकुलाल ग्रामड (ग्रामषण्ड) ग्रामकुमार सुकुमार बहुल अवश्यपुत्र अमुष्यपुत्र आमुष्याकुल सारपुत्र शत- पुत्र ॥ इति मनोज्ञादिः ॥ २४ ॥ तस्य पाकमूले पील्वादि कर्णादिभ्यः कुणब्जाहचौ । ५ । २ । २४ ॥ १ पीलु कर्कन्धू (कर्कन्धु) शमी करीर बल (कुवल) बदर अश्वत्थ खदिर ॥ इति पील्वादिः ॥ २५ ॥ २ कर्ण अक्षि नख मुख केश पाद गुल्फ भ्रू शृङ्ग दन्त ओष्ठ पृष्ठ ॥ इति कर्णादिः॥२६॥ तदस्य संजातं तारकादिभ्य इतच् । ५ । २ । ३६ ॥ तारका पुष्प कर्णक मञ्जरी ऋजीष क्षण सूच सूत्र निष्क्रमण पुरीष उच्चार प्रचार विचार कुङ्मल कण्टक मुसल मुकुल कुसुम कुतूहल स्तबक (स्तवक) किसलय पल्लव खण्डवेग निद्रा मुद्रा बुभुक्षा धनुष्या पिपासा श्रद्धा अभ्र पुलक अङ्गारक वर्णक द्रोह दोह सुख दुःख उत्कण्ठा भर व्याधि वर्मन् व्रण गौरव शास्त्र तरङ्ग तिलक चन्द्रक अन्धकार गर्व कुमुर (मुकुर) हर्ष उत्कर्ष रण कवलय गर्भ क्षुध् सीमन्त ज्वर गर रोग रोमाञ्च पण्डा कजल तृष् कोरक कलोस स्थपुट फल कञ्चुक शृङ्गार अङ्कुर शैवल बकुल श्वभ्र अराल कलङ्क कर्दम कन्दल मूर्च्छा अङ्गार हस्तक प्रतिबिम्ब विग्रतन्त्र प्रत्यय दीक्षा गर्ज । गर्भादप्राणिनि ॥ इति तारकादिः ॥ आकृतिगणः ॥ २७ ॥ विमुक्तादिभ्योऽण् । ५ । २ । ६१ ॥ विमुक्त देवासुर रक्षोसुर उपसद् सुवर्ण परि- सारक सदसत् वसु मरुत् पत्नीवत् वसुमत् महीयत्त्व सत्त्वत् वर्हवत् दशार्ण दशार्ह वयस् हविर्धान पतत्रिन् महित्री अम्यहृत्य सोमापूषन् इडा अग्नावैष्णू उर्वशी वृत्रहन् ॥ इति विमुक्तादिः ॥ २८ ॥ गोषदादिभ्यो वुन् । ५।२।६२॥ गोषद इषेत्वा मातरिश्वन् देवस्यत्वा देवीरापः कृष्णो- स्याखरेष्ठः देवीधिया (देवीधियम्) क्षोहण युञ्जान अञ्जन प्रभूत प्रतूर्त कृशानु (कृशाकु) ॥ इति गोषदादिः ॥ २९ ॥ आकर्षादिभ्यः कन् । ५ । २ । ६४ ॥ आकर्ष (आकष) त्सरु पिशाच पिचण्ड अशनि अश्मन् निचय जय चय विजय आचय नय पाद दीप हृद हाद ह्राद गद्गद शकुनि ॥ इत्याकर्षादिः ॥ ३० ॥