वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)
Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary
भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा
( २२० ) उणादिसूत्रसूची। पृष्ठाङ्काः सूत्रा० | पृष्ठाङ्काः सूत्रा० | पृष्ठाङ्काः सूत्रा० ४६० तनोतेरनश्व वः | ४६४ दुतनिभ्यां दीर्घश्च | ४७३ नौ दीर्घश्च ४७४ तनोतेर्ड उः सन्बच्च | ४५८ दुरिणो लोपश्च | ४७१ नौ व्यो यलोपः पू० ४६४ तन्वृषिभ्यां क्सरन् | ४५६ दृणातेः पुग्घ्रस्वश्च | ४६९ नौ भञ्जेर्थिन् ४५६ तृमिविशिविदिभ्यां० | ४७२ दृगातेर्ह्रस्वश्च | ४६१ नौ सदेः ४६१ तमेर्वुकूत्रादेश्च | ४६६ दृदलिभ्यां भः | ४६३ नौ सदेर्डिक्च ४७५ तरतेर्डिः | ४५१ दृशिनिर्जनिचर्ति० | ४६३ नौ हः ४५६ तरत्यादिभ्यश्च | ४७३ देशे ह च | ४५४ पः किच्च ४५९ तल्पशल्पाभ्यां च | ४५९ द्यतेः | ४६७ पच एलिभच् ४५३ तवादिदा | ४६१ द्यतेरिसिनादेश्च जः | ४५९ पचिनशोर्णुकन्क० ४६१ ताडेणिलुकच | ४५९ द्रुदक्षिणभ्यामिनन् | ४७४ पचिमच्योरिच्वो० ४६२ तिजेर्दीर्घश्च | ४५१ धान्ये नित् | ४७३ पचिवचिभ्यां सुट् च ४५८ तिथपृष्ठयूथयूथ० | ४६२ धापूवस्यतिभ्यो० | ४६० पणेरिज्यादेश्च वः ४६६ तुषारादयश्च | ४७० धाप्योः संप्रसारणं च | ४६७ पतल्थ च ४६३ तृणाख्यायां चित् | ४६२ धेट इच्च | ४५४ पतिकठिकुठि० ४६० तृन्तृचौ शंसिक्षदा० | ४६० धूषेशिँष् च सं० | ४५६ पतिचण्डिभ्यामालञ् ४६२ तृषिसुषिरासे० | ४६३ धेट् इच्च | ४५६ पतेरङ्गव्यक्षिणि ४७६ तृंदेः क्नो हलोपश्च | ४५९ ध्मो धम च | ४६४ पतेरश्च लः ४६५ तृभूवहिवासिभासि० | ४६१ नजि च नग्देः | ४६८ पतेरचित् ४५६ त्यजितनियजिभ्यो० | ४५७ नजि जहातिः | ४७२ पदिप्रथिम्यां नित् ४५५ त्रो डुट् च | ४५५ नजि लभ्भ्रैर्नलोपश्च | ४७३ पयसि च ४५१ त्रो रश्च लः | ४५३ नजि व्यथेः | ४६७ परमे कित् ४६३ त्रो रश्च लो वा | ४७३ नजि इन एह च | ४५९ परौ व्रजेः पः पदान्ते ४७४ दधातेर्येनुट् च | ४६४ नड्याप इट् च | ४६४ पर्जन्यः ४७२ दमेरुनश्चिः | ४६० नप्तृनेष्टृत्वष्टृहोट्ट० | ४७२ पातेर्डुम्सुन् ४६० दमेर्डोसिः | ४६१ नयतेर्डिक्च | ४७३ पातेरतिः ४५५ दरिद्रातेर्यलोपश्च | ४७२ नहोर्दिवि मश्च | ४६८ पातेर्डितिः ४६८ दर्भः | ४७४ नहेर्हलोपश्च | ४७२ पातेर्बले जुट् च ४७३ दर्शेश्च | ४७० नहो मश्च | ४५८ पातुतुदिवांदरिचि० ४७३ दंसेष्टटनौ० | ४७१ नामन्सीमन्व्यो० | ४७० पांदं च ४७५ दहेर्गो लोपे० | ४५२ नावङ्गेः | ४६१ पानीविषिभ्यः पः ४७२ दादिभ्यश्छन्दसि | ४५८ निन्देर्नलोपश्च | ४५६ पारयतेरजिः ४६३ दाभाभ्यां नुः | | ४६७ पिनाकादयश्च ४६४ दिवेवाय्यः | | ४६१ दिवेन्द्रः | | ४६५ दिवः कित् | |
उणादिसूत्रसूची । ( २२१ )
| पृष्ठाङ्काः | सूत्रा० | पृष्ठाङ्काः | सूत्रा० | पृष्ठाङ्काः | सूत्रा० |
|---|---|---|---|---|---|
| ४६८ | पुरः कुषन् | ४६५ | भन्देर्नलोपश्च | ४७० | माच्छाशसिभ्यो यः |
| ४७३ | पुरसि च | ४५४ | भातेर्डवतुः | ४५४ | मिथिलादयश्च |
| ४७३ | पुरुखाः | ५५९ | भियःक्रुकन् | ४७१ | मिथुने मनिः |
| ४७२ | पुवो ह्रस्वश्च | ५५६ | भियः ष्णुच्चा | ४७२ | मिथुनेऽसि० |
| ४६७ | पुषः कित् | ४५६ | भियः पुग्रस्वश्च | ४६९ | मिपीड्यां वः |
| ४७४ | पूजो यण्लुक् ह्रस्वश्च | ४६२ | भुजिमृद्भ्यां० | ४५४ | मीनातेरूरन् |
| ४७३ | पूर्ववच्च सर्वम् | ४७१ | भुजेः किच्च | ५५३ | मुकुरदण्डौ |
| ४६५ | पृषिराञ्जभ्यां कित् | ४६३ | भुवो णिच्च | ४५६ | मुदिग्रोर्गणौ |
| ४६८ | पृनहिकलिभ्य० | ४६७ | भुवश्च | ४५९ | मुपेर्दीर्घश्च |
| ४५२ | पृभिदिव्योवृधि० | ४६१ | भुवः कित् | ४६१ | मुहेः किच्च |
| ४७० | प्र ईर शदोस्तुट् च | ४६८ | भुवः कित् | ४७४ | मुहेः खो मूर्व |
| ४५२ | प्रथिप्रदिभ्रस्जां० | ४७३ | भूराञ्जभ्यां कित् | ४५४ | मूलेरादयः |
| ४७५ | प्रथेरमच् | ४७२ | भूवादिग्गुभ्यो० | ४६९ | मूशक्यादिभ्यः कः |
| ४५६ | प्रथः कित्सं प्रसारणं च | ४६० | भूसूभ्रांस्जि० | ४६८ | मृकणिभ्यामौचिः |
| ४५६ | प्रथेः षिवन्सं० | ४६० | भृञ उच्च | ४५३ | मृगयवादयश्च |
| ४६४ | प्रदेपिँट् | ४५६ | भृञः किन्मुट् च | ४५५ | मृषो रतिः |
| ४५९ | प्राडि पणिकषः | ४६५ | भृञीश्वित् | ४५४ | मृजेर्गुणश्च |
| ४७५ | प्राततेररन् | ४६५ | भृमृदृशियजिपविप० | ४५५ | मृजेष्टिलोपश्च |
| ४६७ | प्रे स्थः | ४५१ | भृमृशीतृचरित्स० | ४६७ | मूडः कीकन्कैकणौ |
| ४७१ | प्रे हरतेः कृपे | ४६० | भ्रमेश्च डुः | ४६७ | मृकणिभ्यामूको० |
| ४६६ | प्लाविकुपिशुषिभ्यः० | ४७० | भ्रमेः संप्रसारणं च | ४६२ | यजिमांनशुन्धि० |
| ४६३ | प्लुषेरच्चोपधायाः | ४७१ | भ्रैस्जगामिनमिहानि• | ४६१ | यतेर्वृद्धिश्च |
| ४६७ | फर्फरीकादयश्च | ४७५ | मङ्गेरलच् | ४६६ | यापोः किद्वे च |
| ४५२ | फलिपाटिनमिमनि० | ४५३ | मद्गुरादयश्च | ४५६ | युजिरुचितिजां० |
| ४७४ | फलेरितजादेश्च पः | ४७० | मनेरुच्च | ४६० | युधिवुधिदृशि |
| ४६३ | फलेर्गुक् च | ४६१ | मनेधिश्चान्दसि | ४५६ | युध्यसिभ्यां मदिँक् |
| ४६२ | फेनमीनौ | ४६४ | मनेर्दीर्घश्च | ४५२ | यो द्वे च |
| ४६२ | बन्धेस्त्रिविधुषी च | ४६७ | मन्थः | ४६० | रञ्जेः क्युन् |
| ४६७ | बलाकादयश्च | ४५३ | मन्दिवाशिमाथिच० | ४७२ | रपेरत एत्व |
| ४५८ | बहुलमन्यत्रापि० | ४७४ | मव्येतर्यलोपो० | ४५२ | रपेरिच्चोपधायाः |
| ४५९ | बहुलमन्यत्रापि | ४७३ | मसेरुरन् | ४५५ | रमेर्वीद्धिश्च |
| ४६० | बहुलमन्यत्रापि | ४५३ | मसेश्च | ४५९ | रमे रश्च लो वा |
| ४५९ | बहुलमन्यत्रापि | ४६८ | मस्जेर्नुञ्च | ४७३ | रमेश्र्च |
| ४६१ | बहुलमन्यत्रापि | ४५२ | महीत ह्रस्वश्च | ४६२ | रमेस्त च |
| ४६० | बहुलमन्यत्रापि | ४५९ | महेरिणण्व | ४६८ | रम्भीत् |
| ४७१ | बृंहेर्नोऽच्च | ४७४ | माङ उ |
( २२२ ) उणादिसूत्रसूची । पृष्ठाङ्काः सूत्रा० पृष्ठाङ्काः सूत्रा० पृष्ठाङ्काः सूत्रा० ४६५ रारिवल्लिभ्यां च ४७३ वसेर्णित् ४५५ वृषादिभ्यश्चित् ४६१ रास्नासास्नास्थुणा० ४६४ वसेञ्च ४६९ वृहोः षुगुटुकौ च ४७२ रिचेर्धने धिच्च ४७२ वसेस्तिः ४६३ वृतवदिहिनिकमि० ४७२ रुचिमृजिभ्यां ४५४ वसेस्तुन् ४६५ वेञ्स्तुट् च ४७२ रुचवचिकुचि० ४६१ वसी रुचेः संज्ञायाम् ४६८ वेञो डिच्च ४६५ रुदिविदिभ्यां ङित् ४६५ वहियुभ्यां णित् ४७१ वेञः सर्वत्र ४६९ रुशातिभ्यां क्रन् ४६८ वहिवस्यर्तिम्यश्चित् ४५९ वेपि तुह्योरिह्रस्वश्च ४६५ रुषोर्निलुक्च ४६८ वहिश्रिश्रुयुद्रुग्भ्यो० ४५८ वै क
or ये? Ah, 'इण्येतेः' or 'इयेतेः'.)
Row 26: Col 1: ४६६ सर्तेरपः षुकच्च Col 2: ४६८ सृवृपिम्यां कित् Col 3: ४६४ इसिमृग्रिणवामि० (Wait, हसिमृग्रिणवामि०! Under ह, it's हसिमृ..., look at the first letter, it's ह, हसिमृग्रिणवामि०!)
Row 27: Col 1: ४७३ सर्तेरपूर्वादसिः Col 2: सृवृश्रिकृत्य० (no page number) Col 3: ४७४ हिंसेरीरक्षीरचौ
Row 28: Col 1: ४६२ सर्तेरयुः Col 2: ४७३ सौ रमेः क्तो दमे Col 3: ४७२ हुयामाश्रुभ्यिन्व० (Wait, हुयामाश्रुभ्यिन् व० or हुयामाश्रुभ्यिन्व०? 'हुयामाश्रुभ्यिन्वन्' -> Unadi 1.140 is हुयामाश्रुभ्य इन्वन् or हुयामाश्रुभ्यिन्वन्)
Row 29: Col 1: ४५७ सर्तेर्णित् Col 2: ४७२ स्कन्देन्न स्वाङ्गे Col 3
फिट्सूत्रपाठसूची। पृष्ठाङ्काः सूत्रा० | पृष्ठाङ्काः सूत्रा० | पृष्ठाङ्काः सूत्रा० ५२१ अक्षाद्वादेवन० | ५२२ त्र्यचां प्राङ्म० | ५२२ मकरवरुढ० ५२० अङ्गुष्ठोदकवक० | ५२३ त्वन्वसमसिमे० | ५२२ मादीनां च ५२२ अथ द्वितीयं० | ५२२ थान्तस्य च० | ५२३ यथेति पादान्ते ५२१ अथादिः प्राक्श० | ५२० दक्षिणस्य साद्यौ | ५१२ यान्तस्यान्त्या० ५२० अर्जुनस्य तृ० | ५२२ धान्यानां च० | ५२२ युतान्तण्यन्ता० ५२१ अर्धस्यासम० | ५२३ धूम्रजानु० | ५११ राजविशेषस्य० ५२० आर्यस्य स्वा० | ५२० द्व्यपूर्वस्य स्त्री० | ५२१ लत्रावन्ते द्व० ५२० आशाया आदि० | ५२१ न कूपूर्वस्य० | ५२१ लुवन्तस्योपमे० ५२२ इगन्तानां च | ५२० नक्षत्राणामादिर्न० | ५२१ वर्णानां तणति० ५२२ ईषान्तस्य ह० | ५२२ नपः फलान्तानाम् | ५२३ वाचादीनामु० ५२१ उनर्वन्नन्तानाम् | ५२१ नविषयस्यो० | ५२० वा नामधेयस्य० ५२३ उपसर्गाश्चा० | ५२१ नर्तुप्राण्याख्या० | ५२२ शकटिशकट्यो० ५२२ उशीरदाशेर० | ५२१ न वृक्षपर्वत० | ५२१ शकुनीनां च० ५२२ एवादीनामन्तः | ५१३ निपाता आद्युदा० | ५२२ शादीनां शा० ५२३ कपिकंथहरि० | ५१३ न्यङ्क्वादी स्व० | ५२२ शिशुमारीहु० ५२२ कर्दमादीनां च | ५२३ न्युर्बुद्वन्यल्क० | ५२० शुक्लगौरयोरादि ५२० कृष्णस्यामृगाख्या चेत् | ५२१ न्र संख्यायाः | ५२३ शेषं सर्वमनुदात्त ५२१ खण्डुवर्ण कञ्जि० | ५१९ पाटलापालङ्का० | ५२२ सांकीयकाम्पि ५२० खान्तस्याइमोदः | ५२२ पान्तानां गुर्वा | ५२३ सिमस्याथर्वणे० ५१९ गुदस्य च | ५२३ पारावतस्योधो० | ५२२ सुगन्धिते ज० ५१९ गेहार्थानामस्त्रि० | ५२१ पीतद्रूथीनाम् | ५२१ स्त्रीविषयवर्णी० ५२२ गोष्ठजस्य त्रा० | ५२० पृष्ठस्य च | ५२१ स्वाङ्गशिताम० ५२१ ग्रामादीनां च | ५२१ प्रकारादिद्विरुक्तौ | ५२० स्वाङ्गाख्याया० ५११ तृतादीनां च | ५२१ प्राणिनां कूपूर्वम् | ५२२ स्वाङ्गानामकु० ५२३ चादयोऽनुदात्ताः | ५१९ फिषोऽन्त उदात्तः | ५२२ ह्वादीनामसंयु ५२२ छन्दसि च | ५२० बर्हिष्वत्स | ५२० हेष्वत्स० ५२० छन्दसि च | ५२१ बिल्वातिष्ययोः | ५२१ ह्रस्वान्तस्य रु ५१९ जनपदशब्दा० | ५२३ बिल्वभक्ष्ययो० | ५२१ ह्रस्वान्तस्य ह ५२१ ज्येष्ठकनिष्ठ० | ५२२ महिष्याषाढयो० | ५२३ तिल्याशिक्यका० | इति फिट्सूत्रसूची। | ५२१ तृणधान्यानां० | | पुस्तक मिलनेका पता--खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस-मुंबई
The provided image appears to be completely blank (white), containing no text or visible content to transcribe.
Please re-upload or provide a clear image of the page you would like transcribed.