भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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भूमिका आचार्य भर्तृहरि और उनका वाक्यपदीय वैयाकरणों की परम्परा में पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि के बाद जिनका नाम बड़े आदर और सम्मान से लिया जाता है वे भर्तृहरि हैं। इन्होंने किस समय भारतभूमि को अलङ्कृत किया अथवा इनके द्वारा भारत भू और भारती ने कब अपना गौरव बढ़ाया यह कहना अत्यन्त कठिन है। इन्होंने अपने परिचय के लिये भी कुछ नहीं लिखा है। केवल इनके परवर्ती विद्वानों ने जहाँ कहीं इनका नाम ग्रहण किया है उसी से इनके पूर्ववर्ती होने का अनुमान किया जा सकता है। परिचय आचार्य भर्तृहरि ने अपने परिचय के लिये जो लिखा है वह वाक्यपदीय के द्वितीय काण्ड के अन्त में ही जुड़े हैं। जैसे— प्रायेण सङ्क्षेपरुचीनल्पविद्यापरिग्रहान् । संप्राप्य वैयाकरणान् संग्रहेऽस्तमुपागते ॥ कृतेऽथ पतञ्जलिना गुरुणा तीर्थदर्शिना । सर्वेषां न्यायबीजानां महाभाष्ये निबन्धने ॥ अलब्धगाधे गाम्भीर्यादुत्तान इव सौष्ठवात्। तस्मिन्नकृतबुद्धीनां नैवावस्थित निश्चयः ॥ वैजिसौभवहर्यक्षैः शुष्कतर्कानुसारिभिः । आर्षे विप्लावित ग्रन्थे संग्रहप्रतिकञ्चुके ॥ यः पतञ्जलिशिष्येभ्यो भ्रष्टो व्याकरणागमः। काले स दाक्षिणात्येषु ग्रन्थमात्रे व्यवस्थितः॥ पर्वतादागमं लब्ध्वा भाष्यबीजानुसारिभिः। स नीतो बहुशाखत्वं चन्द्राचार्यादिभिः पुनः॥ न्यायप्रस्थानमार्गांस्तानभ्यस्य स्वं च दर्शनम् । प्रणीतो गुरुणास्माकमयमागमसंग्रहः ॥ जब व्याकरण पढ़ने वाले विद्यार्थियों में आलस्य आ गया, वे संक्षिप्त अध्ययन और अल्प विद्या से ही सन्तुष्ट होने लग गए तब व्याडि रचित एक लक्ष श्लोक का संग्रह ग्रन्थ लुप्त हो गया। उस समय भगवान् पतञ्जलि को दया आई और तीर्थदर्शी इस विद्वान् ने समस्त न्याय बीजों का संग्रह करके व्याकरण शास्त्र पर महाभाष्य की रचना की, जो इतना गम्भीर है कि थाह लगाना कठिन है और इतना सरस और मनोरम है कि छिछला लगता है। अकुशल विद्वानों के लिये तो उसके स्वरूप का ठीक परिज्ञान ही नहीं हो सकता। बैजि, सौभव और हर्यक्ष आदि ने व्याकरणागम के रहस्य को न समझ कर केवल शुष्क तर्क द्वारा आर्ष ग्रन्थ की छींटालेदर कर डाली। इस प्रकार पतञ्जलि के शिष्यों से व्याकरणागम भ्रष्ट होकर दाक्षिणात्यों के घर में केवल ग्रन्थ के रूप में अलमारी की शोभा बढ़ाने लगा। फिर चन्द्राचार्य प्रभृति विद्वानों ने (त्रिकूट पर्वत पर स्थित त्रिलिंग देश से रावण रचित मूलभूत व्याकरणागम जिसे किसी मित्र राक्षस ने चन्द्राचार्य और वसुरात प्रभृति विद्वानों को दिया था प्राप्त करके) प्रचार किया तथा उसमें अनेक शाखायें बनीं। मेरे गुरुजी ने, जो वाक्यपदीय टीका के आधार पर वसुरात कहे जा सकते हैं, आगम संग्रह बनाया।'