भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि महाभाष्यकार पतञ्जलि के बहुत दिनों के बाद आचार्य भर्तृहरि का जन्म माना जाना चाहिए तथा वसुरात के शिष्य भर्तृहरि ने यह ग्रन्थ रचा। काल आचार्य भर्तृहरि किस काल में हुए यह कहना भी अत्यन्त कठिन अथवा असम्भव है। आजकल के विद्वानों ने चीनी यात्री इत्सिंग के कथनानुसार भर्तृहरि का समय विक्रम के सप्तम शतक का अन्त अथवा अष्टम शतक का आरम्भ स्वीकार किया है। इत्सिंग ने लिखा है कि 'उस भर्तृहरि की मृत्यु हुए चालीस वर्ष बीत चुके थे।' किन्तु यह कथन असत्य सिद्ध हो जाता है जब काशिका के ४।३।८८ सूत्र के उदाहरण में वाक्यपदीय ग्रन्थ का उल्लेख मिलता है। यह संवत् ६८० से ७०१ के मध्य गिना गया है। कातन्त्र व्याकरण की दुर्गसिंह कृत वृत्ति काशिका से प्राचीन सिद्ध हो चुकी है क्योंकि सायण ने काशिका के ७।४।१३ सूत्र पर दुर्गसिंह की वृत्ति के खण्डन की बात लिखी है। दुर्गसिंह ने वाक्यपदीय की एक कारिका ३।१।४१ सूत्र पर उद्धृत की है जिससे भर्तृहरि की दुर्गसिंह से भी प्राचीनता सिद्ध होती है। शतपथ ब्राह्मण की टीका में हरि स्वामी ने वाक्यपदीय की प्रथम कारिका का उत्तरार्ध उद्धृत किया है। इनका समय इनके निम्नलिखित श्लोक से परिज्ञात होता है— श्रीमतोऽवन्तिनाथस्य विक्रमार्कस्य भूपतेः। धर्माध्यक्षो हरिस्वामी व्याख्याच्छातपथीं श्रुतिम्॥ यदाब्दानां कलेर्जग्मुः सप्तत्रिंशच्छतानि वै। चत्वारिंशत् समाश्चान्यास्तदा भाष्यमिदं कृतम्॥ इसके अनुसार हरिस्वामी का समय ३७४० कलिगताब्द अथवा वि० सं० ६९५ में पड़ता है। जैसा मीमांसकजी ने अपने इतिहास में लिखा है यह खींचातानी न भी की जाय तो कोई कठिनाई न होगी। तन्त्रवार्तिक के अ० १ पा० ३ अ० ८ में वाक्यपदीय की १।१३ कारिका को उद्धृत कर कुमारिल भट्ट ने भर्तृहरि को अपना पूर्ववर्ती सिद्ध किया है। अष्टाङ्ग संग्रह के टीकाकार वाग्भट्ट का शिष्य इन्दु उत्तर तन्त्र अ० ५० की टीका में लिखता है— तासु च तत्र भवतो हरेः श्लोको— संयोगो विप्रयोगश्च साहचर्यं विरोधिता। अर्थः प्रकरणं लिङ्गं शब्दस्यान्यस्य सन्निधिः॥ सामर्थ्यमौचितीदेशः कालो व्यक्तिः स्वरादयः। शब्दार्थस्यानवच्छेदे विशेषस्मृतिहेतवः॥ इत्यादि । यह कारिका वाक्यपदीय के २।३१७-३१८ में उपलब्ध है। काशी संस्करण में दूसरा भाग मुद्रित है जो अशुद्धि पत्र में मृषा है। वाग्भट्ट का काल ऐतिहासिकों ने चन्द्रगुप्त का काल माना है। पाश्चात्य ऐतिहासिक चन्द्रगुप्त द्वितीय का काल वि० सं० ४१३-४७० तक स्थिर करते हैं। इस प्रकार भर्तृहरि का समय वि० स० ४०० के पश्चात् मानना उचित नहीं प्रतीत होता।