वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३ ] जनश्रुति विक्रमादित्य, जिन्हें उज्जैन मालवगण राज्य का राजा कहा जाता है, उनके भाई के रूप में भर्तृहरि का स्मरण लोग करते हैं । भर्तृहरि के योगी होने की बात प्रायः अधिक प्रसिद्ध है । उज्जैन के किले में भर्तृहरि की गुफा है जिसकी सरकार ने खुदाई की है। चुनार के किले में भी भर्तृहरि गुफा प्रसिद्ध है। यह किला भी विक्रमादित्य का बनवाया हुआ कहा जाता है । इससे यह तो सिद्ध होने लगता है कि भर्तृहरि और विक्रमादित्य में कोई सम्बन्ध अवश्य है । कुछ भी हो यह उच्चकोटि का वैदिक विद्वान् भर्तृहरि अवश्य बहुत प्राचीन विद्वान् है । इत्सिंग का मत चीनी यात्री इत्सिंग ने—जिसने सातमी शती ई० के अन्त में भारत यात्रा की थी, लिखा है कि 'हमारे भारत पहुँचने के ४० वर्ष पूर्व लगभग ६५१ ई० में भर्तृहरि नामक एक वैयाकरण की मृत्यु हो गई थी जो निश्चय ही भारतीय व्याकरणशास्त्र की अन्तिम मौलिक कृति वाक्यपदीय का लेखक था।' इनके सम्बन्ध में इत्सिंग कहता है कि 'उसका मन विरक्त तथा गृहस्थ जीवन में सदा दोलायमान रहता था और वह सात बार मठ और संसार के बीच में आता जाता रहा । जैसा कि बौद्धों के लिए अनुज्ञान है। एक अवसर पर जब वह बौद्ध विहार में प्रवेश कर रहा था उसने एक विद्यार्थी से अपने लिए बाहर रथ सज्जित रखने के लिए कहा जिससे कि उसके दुःसाध्य निश्चय पर यदि सांसारिक इच्छायें काबू पा जाँय तो वह उस पर चढ़ कर जा सके।' (संस्कृत साहित्य का इतिहास, कीथ) इत्सिंग को भले ही किसी ने भुलावा में डाल दिया हो अथवा किसी भर्तृहरि नाम के वैयाकरण की उस समय मृत्यु भी भले ही हो गई हो और वह बौद्ध तथा जैसा इत्सिंग ने समझा वैसा ही रहा हो । किन्तु वाक्यपदीयकार भर्तृहरि के विषय में इत्सिंग का कहना अत्यन्त असत्य है, क्योंकि जैसा मैं आगे भर्तृहरि को वैदिक सिद्ध करने चल रहा हूँ उन युक्तियों से भर्तृहरि को कथमपि बौद्ध नहीं सिद्ध किया जा सकता । किसी पाठक के लेख का हवाला देकर श्रीकीथ ने लिखा है कि 'बड़े ठोस साक्ष्य के आधार पर यह दिखाया जा चुका है कि इत्सिंग का कथन भ्रम पूर्ण नहीं है।' हमने बड़ा प्रयत्न किया कि पाठक का लेख मिले और उसमें देखा जाय कि किन तर्कों पर उन्होंने आचार्य भर्तृहरि को बौद्ध सिद्ध किया है किन्तु पत्रिका 'सरस्वतीभवन पुस्तकालय' में भी उपलब्ध न हो सकी । भर्तृहरि रचित ग्रन्थ आचार्य भर्तृहरि के रचित निम्नलिखित ग्रन्थ कहे जाते हैं— ( १ ) महाभाष्यदीपिका (महाभाष्यटीका) ( २ ) वाक्यपदीय ( ३ काण्ड ) ( ३ ) वाक्यपदीय-टीका ( १-२ काण्ड ) ( ४ ) भट्टिकाव्य ( ५ ) भागवृत्ति ( ६ ) सुभाषितत्रिशती