वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् ६५ तीसरे मत का तात्पर्य यह है कि अव्यक्त शब्दों की ध्वनि ही गृहीत होती है और व्यक्त की ध्वनि के साथ स्फोट भी गृहीत होता है ॥ ८१ ॥ ननु एको ध्वनिर्न स्फोटाभिव्यक्तिसमर्थः द्वितीयध्वन्युच्चारणानर्थक्यापातात् न ध्वनिसमुदायः ध्वनीनामुत्पन्नप्रध्वंसितया समुदायाभावात् किन्तु पूर्वपूर्वध्वनिजनि- ताभिः स्वजन्यसंस्कारद्वारा करणभूताभिर्बुद्धिभिः सहकृतेनान्त्यध्वनिना स्फोटः स्फुटं प्रकाशत इत्यत्र दृष्टान्तमाह— एक ही ध्वनि स्फोट को व्यक्त करने में समर्थ नहीं हो सकती क्यों कि दूसरी ध्वनियों व्यर्थ हो जायगी । ध्वनि समुदाय भी स्फोट को व्यक्त नहीं कर सकता क्यों कि ध्वनियाँ उत्पन्न और नष्ट होती हैं फिर समुदाय मिल नहीं सकता फिर भी ध्वनि से स्फोट का ग्रहण होता है ? यथाऽनुवाकः श्लोको वा सोढत्वमुपगच्छति । आवृत्त्या न तु स ग्रन्थः प्रत्यावृत्ति निरूप्यते ॥ ८२ ॥ यथा अनुवाकः मन्त्रसमूहः श्लोको वा आवृत्त्या चरमावृत्त्या पुनः पुनराव- र्त्तनेनेति वा अस्मिन्पक्षे आवृत्त्येति जातावेकवचनम् सोढत्वं सोढुं शक्यत्वं स्वीकार्य- त्वं गुरूच्चारणानुच्चारणमन्तरापि स्वेच्छया पठनयोग्यताम् उपगच्छति प्रत्यावृत्ति तु सः अनुवाकरूपः श्लोकरूपो वा ग्रन्थः न निरूप्यते न बुद्धिविषयो भवति न सोढत्वं यातीति यावत् प्रथमाद्यावर्त्तने श्लोकस्य स्फुटावभासाभावेऽपि अने- कावृत्तौ स्फुटावभासो भवति । एवं प्रत्येकं ध्वनिभिः स्फोटस्य स्फुटावभासाभावेऽपि चरमवर्णध्वनिना स्फुटावभासो भवतीति भावः ॥ ८२ ॥ जैसे मन्त्रों का समूह या एक श्लोक बार बार पढ़ने के बाद ( बिना किसी सहायता के ) पढ़ने योग्य हो जाता है । किन्तु प्रत्येक आवृत्ति में वह बुद्धि का विषय या पढ़ने योग्य नहीं बनता ॥ ८२ ॥ दार्ष्टान्तिकमाह— प्रत्ययैरनुपाख्येयैर्ग्रहणानुगुणैस्तथा । ध्वनिप्रकाशिते शब्दे स्वरूपमवधार्यते ॥ ८३ ॥ तथा अनुपाख्येयैः प्रत्येकं स्फुटं स्फोटाप्रकाशतया इदं तदित्यव्यपदेश्यैः तथापि ग्रहणानुगुणैः अन्त्यध्वनिजन्यव्यक्तस्फोटग्रहणोन्मुखैः प्रत्ययैः पूर्व- पूर्वध्वनिजनितबुद्धिभिः सह ध्वनिप्रकाशिते अन्त्यध्वनिना प्रकाशिते शब्दे स्वरूपं स्वाभाविकं रूपम् अक्रमस्फोटस्वरूपम् अवधार्यते स्फुटं निश्चीयते ॥ जैसे प्रत्येक ध्वनि स्पष्ट रूप से स्फोट की प्रकाशिका नहीं है किन्तु स्फोट के ग्रहण के लिए उन्मुख पूर्व पूर्व ध्वनियों से जन्य बुद्धि के साथ अन्त्य ध्वनि से प्रकाशित शब्द में जब स्फोट का स्पष्ट स्वरूप प्रकाशित होता है तब स्फोट का रूप हम समझ लेते हैं । एतदुक्तं भवति-यथा प्रत्येकमावृत्तिभिः श्लोकः स्फुटनवभास्यमानोऽपि चर-