वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ६७ पूर्वोक्तं शब्दस्वरूपावधारणं स्पष्टयति— इसे ही स्पष्ट करते हैं— नादैराहितबीजायामन्त्येन ध्वनिना सह । आवृत्तपरिपाकायां बुद्धौ शब्दोऽवधार्यते ॥ ८४ ॥ नादैः पूर्वपूर्वध्वनिभिः आहितबीजायाम् आहितं समर्पितं बीजं भावना य- स्यां सा तस्याम् आवृत्तपरिपाकायाम् आवृत्तोऽभ्यस्तः परिपाको यस्याः सा तस्यां आवृत्तोऽवधारणविषयभूतस्य गवादिकवाक्यस्य परिपाकः परिपाचनं यस्यामिति वा प्रथमेन ध्वनिना किञ्चिद्भावनाबीजमाहितं तेन च कश्चित् परिपाकः कार्यजननशक्तिविशेषः आ- हितः पुनर्द्वितीयेन एवं तृतीयेन ध्वनिना ततः उद्बुद्धसंस्कारायां बुद्धौ अन्तःकरणे अन्त्येन ध्वनिना सह अन्त्यध्वन्यवधारणसमकालं शब्दोऽवधार्यते यदाऽन्त्यो- ध्वनिरवधार्यते तदा गौरित्येवं शब्दोऽप्यवधार्यत इत्यर्थः । उत्तरोत्तरवर्णोपलब्धिवेला- यामपि पूर्वपूर्ववर्णाः स्मृत्याऽनुसंधीयन्ते तेनाश्रुतदर्शनोपलक्षणेऽपि पूर्वे स्मर्यन्ते तेन चेयं सद्भूतावस्थवर्णविषये प्रत्यक्षा पूर्वेषु चातीतेषु स्मृतिरूपा इति प्रत्यक्षस्मरणात्मिकाचित्र- रूपा बुद्धिः सा च 'चित्ररूपां च तां बुद्धिमाश्रितानेकगोचराम्' इति श्लोकवार्त्तिके उक्ता तया बुद्ध्या गौरित्येवं गकारादिविलक्षणं शब्दाख्यं तत्त्वं प्रत्यक्षमवगम्यते इति भावः । इसी प्रकार नाद (पूर्व पूर्वध्वनि) से ध्वनि में एक प्रकार की भावना उत्पन्न होती है फिर आवृत्ति से उनमें कार्य उत्पन्न करने की शक्ति आती है इस प्रकार उद्बुद्ध संस्कार वाली बुद्धि में अन्त्यध्वनि के साथ शब्द का ज्ञान ठीक रूप से होता है ॥ तात्पर्य यह है कि किसी वाक्य के उच्चारण में जब तक अन्तिम वर्ण नहीं उच्चरित होता तब तक वाक्यार्थ बोध नहीं हो सकता किन्तु अन्तिम वर्ण तक पूर्वपूर्व ध्वनियों का अदर्शन हो जाता है। अतः शब्द का अवधारण करने के लिये मानना पड़ता है कि नाद (पूर्वपूर्व ध्वनि) से एक भावना बीज सन्नद्ध होता है इससे एक प्रकार का परिपाक (कार्यजनन शक्ति विशेष) उत्पन्न होता है इसी प्रकार द्वितीय और तृतीय ध्वनि से भी भावना बीज और परिपाक की उत्पत्ति होती है फिर संस्कार के उद्बुद्ध हो जाने पर अन्तःकरण में अन्तिम ध्वनि के अव- धारण के साथ साथ शब्द का भी अवधारण हो जाता है। इस प्रकार उत्तर उत्तर के वर्णों की अवधारण वेला में भी पूर्वपूर्व वर्णों की स्मृति का अनुसंधान बना रहता है इसलिये अन्तिम वर्ण के उपलब्धि काल में पूर्व पूर्व ध्वनियों स्मृति में बनी रहती है। जिससे यह अन्तिम वर्ण के विषय में प्रत्यक्ष और पूर्वपूर्व वर्णों के विषय में स्मृतिरूप है। अतः प्रत्यक्ष और स्मरणा- त्मक होने से चित्ररूपा बुद्धि से गौः इस प्रकार का गकार, औकार और विसर्ग से विलक्षण शब्दान्तर का प्रत्यक्ष हो जाता है ॥ ८४ ॥ यद्वा अन्त्येन ध्वनिना सह नादैः पूर्वपूर्वध्वनिभिः आहितबीजायां बुद्धौ पश्चिमव्यङ्ग्यनन्तरं शब्दः 'गौः इत्येकं पदम्' इति अवधार्यते इत्यर्थः । इदं चावधा- रणं समस्तवर्णविषयं स्मरणरूपम् । यदाहुः श्लोकवार्त्तिककारा — 'अन्त्यवर्णोऽपि विज्ञाते पूर्वसंस्कारकारितम् । स्मरणं यौगपद्येन सर्वेष्वप्येव प्रवृत्तते । गौरित्येवं-