भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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११८ वाक्यपदीयम् जैसे कारण (वायु को शब्द बनाने वाले प्रयत्न) के सामर्थ्य से वेग (एक संस्कार) और प्रचय (शिथिल संयोग) रूपी धर्म वाले वायु के संयोग बड़े बड़े पर्वतों को जब उखाड़ देते हैं तब कण्ठ तालु आदि का विभाग होना कठिन नहीं है ॥ १०९ ॥ जैनभिमतामणूनां शब्दभावापत्तिमाह— जैनों का मत है कि— अणवः सर्वशक्तित्वाद् भेदसंसर्गवृत्तयः । छायातपतमःशब्दभावेन परिणामिनः ॥ ११० ॥ सर्वशक्तित्वात् सर्वकार्यजननशक्तिमत्त्वात् भेदसंसर्गस्य शक्तिभेदमूलकारो- पितभेदसंसर्गस्य वृत्तिर्येषु ते, भेदो विभागः संसर्गः संयोगः तयोर्वृत्तिर्येषु ते वा भेद- संसर्गवृत्तयः अणवः परमाणवः छायातपतमः शब्दभावेन विभक्ताः छायातप- भावेन संयुक्ताश्च शब्दभावेन परिणामिनो भवन्तीति शेषः इति ॥ विभाग और संयोग जिनमें रहते हैं उन अणुओं में सब प्रकार के कार्यों को उत्पन्न कर सकने वाली एक शक्ति है जो विभक्त होने पर छाया, आतप और अन्धकार के रूप में तथा संयुक्त होने पर शब्द रूप में परिणत हो जाती है ॥ ११० ॥ एतदुक्तं भवति एकविधा एव परमाणवः छायारूपेण आतपरूपेण तमोरूपेण शब्दरूपेण च परिणमन्ते । नचैकविधस्य कथमनेकविधकार्यजनकत्वमिति वाच्य- म् । तेभ्यः सर्वविधकार्यजननदर्शनेन तेषु सर्वविध कार्यजननशक्तिमत्त्वानुमानेन तत्त- त्कार्यजननशक्तिभेदकृतभेदसमारोपेण भिन्नभिन्नपरमाणुभ्यो भिन्नभिन्नकार्यजननसंभ- वात् । अणूनां छायातपरूपविरुद्धपरिणामप्रतिपादनेन विरुद्धनानाशक्तियोगः एक- स्यैव वस्तुन इति सूचितम् ॥ ११० ॥ जैन मतानुयायियों का तात्पर्य यह है कि अणु में सब प्रकार के कार्य उत्पन्न करने की शक्ति होती है ये कभी छाया रूप से मेघ बनकर कभी आतपरूप से, कभी तम रूप से और कभी शब्द रूप से परिणत हुआ करते हैं । यहाँ यह शङ्का उत्पन्न होना अनुचित है कि एक ही परिमाणु में अनेक प्रकार के कार्य उत्पन्न करने की शक्ति कैसे होगी ? क्योंकि अणुओं में सब प्रकार की शक्ति है और शक्ति के भेद से कार्य में भेद हो जाना स्वाभाविक है । तात्पर्य यह है कि अणुओं के एक होने पर भी शक्ति का भेद उनमें मानना पड़ता है और इसी शक्ति के भेद के कारण भिन्न प्रकार की शक्तिवाले परमाणु से भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तु उत्पन्न होती है । अतः एक परमाणु का छाया, आतप, तम और शब्द रूप में परिणत हो जाना अनुचित नहीं है । नन्वणूनां नित्यतया सर्वदा सत्त्वात्कुतो न सर्वदा शब्दभावेन परिणाम इत्यत आह— यद्यपि अणु नित्य हैं अतः सर्वदा उनकी सत्ता तो स्वीकृत है फिर भी वे सर्वदा शब्द रूप में ही परिणत नहीं होते क्योंकि— स्वशक्तौ व्यज्यमानायां प्रयत्नेन समीरिताः । अभ्राणीव प्रचीयन्ते शब्दाख्याः परमाणवः ॥ १११ ॥