भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 192 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 152

संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् १२३ प्राण में और बुद्धि में रहने वाली अर्थ रखने वाली शब्द की एक शक्ति है जो उसमें व्यवस्थित रूप से रहती है। वह ही कण्ठ तालु आदि स्थानों से अकारादि रूप में व्यक्त होती हुई क, ख, आदि भिन्न भिन्न रूपों में परिणत होती है। इस प्रकार शब्द की प्राण और बुद्धि में रहने वाली शक्ति ही कण्ठ आदि स्थानों से व्यक्त होकर क, ख, आदि भेदों का कारण बनती है ॥ ११७ ॥ द्विविधो हि शब्दः प्राणाधिष्ठानः बुद्ध्यधिष्ठानश्च । स प्राणबुद्धिशक्तिभ्यां प्रतिल- ब्धाभिव्यक्तिरर्थं बोधयति । तत्र प्राणो बुद्धिकरणेनान्तराविष्टः ऊर्ध्वमभिप्रवृत्तः तत्त- त्स्थानेषु विवर्तमानः अकारादिरूपेण भिन्नतया भासमानः अक्रमे शब्दात्मनि भेदानु- रागमात्रं सन्निवेशयति ॥ शब्दविषये मतभेदो भट्टपादैः श्लोकवार्तिके उक्तः— त्रिगुणः पौद्गलो वाप्याकाशस्याथवा गुणः । वर्