भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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१२४ वाक्यपदीयम् इस संसार को उत्पन्न करने वाली वाच्यवाचक भाव रूप शक्ति शब्द में ही आश्रित है और इसी शब्द से प्रतीत होने वाला प्रतिभा रूपी यह भेद रूप ( घट-पट आदि ) व्यवहार प्रति व्यक्तियों को प्रतीत होने लगता है । अत्रेदं बोध्यम्—बाह्यस्य वस्तुनोऽभावात् प्रतिभैव वाक्यार्थः । तथाहि—यथा- वस्थिते वनितात्मनि बाह्योऽर्थे वासनानुसारेण कुणप इति कामिनीति भक्ष्यमिति प्रतिभा भवन्ति तथा असत्यपि व्याघ्रागमने व्याघ्र आगत इत्युक्ते शूराणामुत्साहः कातराणां भयं भवतीत्यिति शब्दादर्थप्रतिभा भवति इति प्रतिभामात्रं जगत् । अत एव असत्यपि बाह्येऽर्थे एष वन्ध्यासुतो याति, राहोःशिर इत्यादिवाक्यतोऽर्थप्रतिभा इति शब्द एव तत्तदाकारेण विवर्तत इति ॥ ११८ ॥ तात्पर्य यह है कि—शब्द से अतिरिक्त बाह्य वस्तु जब नहीं है तब वाक्यार्थ बोध केवल प्रतिभा ही मानना पड़ता है । जैसे किसी सुन्दरी स्त्री को देखकर कोई कुणप, कोई कामिनी, और कोई ( व्याघ्रादि ) भक्ष्य रूप में मानता है यह मानना भी एक प्रतिभा है । जैसे सिंह नहीं रहता फिर भी कोई कह दे कि 'सिंह आ गया' इस वाक्य के सुनने के मात्र ही शूरों में उत्साह और कातरों में भय उत्पन्न हो जाता है । इसे भी प्रतिभा ही कहते हैं । इससे यह सिद्ध हो जाता है कि जगत् प्रतिभा मात्र है । इसीलिए 'बन्ध्याका पुत्र जा रहा है' यह 'राहु का शिर है' इत्यादि वाक्यों से भी अर्थ प्रतिभा होती है और यह स्वीकार करना पड़ता है कि शब्द ही उन उन रूपों में भासित होता है ॥ ११८ ॥ षड्जादिभेदः शब्देन व्याख्यातो रूप्यते यतः । तस्मादर्थविधाः सर्वाः शब्दमात्रासु निश्रिताः ॥ ११९ ॥ षड्जादिभेदः षड्जर्षभगान्धारमध्यमपञ्चमधैवतनिषादादिः । शब्देन व्याख्यातः प्रतिपादितः सन् यतः रूप्यते उल्लिख्यते परिच्छिद्यते तस्मात् यतः तन्निबन्धनं षड्जादिभेदनिरूपणं तस्मात् शब्दमात्रासु शब्देषु सर्वा अर्थविधाः निश्रिताः आश्रिता शब्दतादात्म्यापन्ना इत्यर्थः । इदमेव वाचस्पतिमिश्रैस्ता- त्पर्यटीकायां—'षड्जादिषु शब्दापकर्षे अर्थप्रत्ययापकर्षात् तदुत्कर्षे त्वर्थप्रत्ययो- त्कर्षात् प्रत्ययस्य च प्रत्येयव्योरुपार्धीनोत्कर्षात् नामधेयोत्कर्षेणार्थोत्कर्षः अर्थस्य तादात्म्यं कथयति' इत्युक्तम् ॥ यह ही शब्द—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद स्वरों के भेद शब्द से प्रतिपादित हैं । इससे यह निश्चय हो जाता है कि समस्त अर्थ या उनके भेद शब्द से ही उत्पन्न हुए हैं । इदमत्रावधेयम्—अन्वाख्येया षड्जादयः समाख्येया गवाद्यश्च सर्व एवार्थाः शब्देनाव्यारूढाः शब्दतादात्म्यापन्ना शब्दानुविद्धधिया प्रकाश्यन्ते गोपालाविपालाद- योऽपि गवामवीनां च संज्ञापदानि प्रकृत्यैव गवादीन् आकारयन्ति तस्मात्सर्वा अर्थ- विधाः समाख्येया अन्वाख्येया वा शब्दमात्रासु निश्रिता आरूढा इति ॥ ११९ ॥ अर्थ दो प्रकार के हैं एक अन्वाख्येय और दूसरा समाख्येय । ये दोनों प्रकार के अर्थ