भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 192 में से

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१२६ वाक्यपदीयम् मञ्जरीदर्शनात् 'इह तु अविसंवादात्प्रमाणं सदर्थतादात्म्यं शब्दस्य साधयत्येव' इति तात्पर्यटीकादर्शनाच्चावगम्यते ॥ विशेष—सत्ता तीन प्रकार की मानी जाती है। १. पारमार्थिक, २. व्यावहारिक, ३. प्रातिभासिक। जो कार्य उपादानकारण की सत्ता के समान सत्ता का उत्पन्न होता है उसे 'परिणाम' कहते हैं। जैसे दूध व्यवहारतः सत् है वैसे दूध का परिणाम दही भी व्यवहारतः सत् है। उपादान कारण की सत्ता से विषम सत्ता का कार्य जब उत्पन्न होता है तब उसे 'विवर्त' कहते हैं। जैसे शुक्तिका में रजत का भ्रम। क्योंकि शुक्तिका की सत्ता व्यावहारिक है और रजत की सत्ता प्रातिभासिक है। रजत का व्यवहार शुक्तिका में नहीं होता। इस प्रकार परिणाम और विवर्त शब्द के अर्थ में भी भेद प्रसिद्ध है। किन्तु इस कारिका में 'शब्दस्य परिणामोऽयम्' और 'विश्वं व्यवर्तत' इन उपक्रम और उपसंहार के वाक्यों से पता चलता है कि परिणाम और विवर्त शब्द पर्याय हैं। यह परिणाम और विवर्तशब्द का एक अर्थ में प्रयोग नया नहीं है। क्योंकि शान्तरक्षित ने 'तत्त्वसङ्ग्रह' में वाक्यपदीय की प्रथम कारिका का भावानुवाद करते हुए अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम्। विवर्ततेऽर्थ- भावेन प्रक्रिया जगतो यतः। के स्थान पर नाशोत्पादसमालीढं शब्दब्रह्माह्वयं च यत्। यत्तस्य परिणामोऽयं भावग्रामः प्रतीयते यह कारिका रचा है। इसमें विवर्त के पर्याय के रूप में परिणाम शब्द का प्रयोग किया है। 'भवभूति' ने भी 'उत्तररामचरित' में 'पृथक्पृथगिवाश्रयते विवर्तान् आवर्तबुद्बुदतरङ्गमयान् विकारान्' लिखते हुए परिणाम शब्द के पर्याय विकार शब्द का विवर्त के पर्याय के रूप में प्रयोग किया है। इस प्रकार 'वाक्यपदीय- कार'ने जगत् को शब्द का परिणाम कहा है अथवा विवर्त यह कहना कठिन है। फिर भी हेलाराज आदि टीकाकारों ने शब्द ब्रह्म का विवर्त ही जगत् को स्वीकार किया है। कुछ विद्वानों का मत है कि शब्दब्रह्म का विवर्त और वैखरी ध्वनि का परिणाम जगत् है। इस प्रकार 'विवर्तते' 'परिणामोऽयम्' दोनों की व्याख्या ठीक बैठती है। यह मत मण्डनमिश्र की 'स्फोटसिद्धि' की टीका 'गोपालिका' में स्पष्ट है। इदमत्रावधेयम्—सर्गाद्यकाले अनादिनिधनं सर्वग्राह्यग्राहकाकारवर्जितं पश्य- न्तीवाग्रूपं शब्दब्रह्म सृज्यमानप्रपञ्चवैचित्र्यहेतुप्राणिकर्मसहकृतम् अपरिमितनिरूपित- शक्तिविशेषविशिष्टमायासहितं सत् नामरूपात्मकनिखिलं प्रपञ्चं प्रथमं बुद्ध्यावाकलय्य इदं करिष्यामीति संकल्पयति ततो निजया कालाख्यया स्वातन्त्र्यशक्त्या समेतः आकाशादीनि अपञ्चीकृतानि तन्मात्रपदवाच्यान्युत्पादयति ततो भूतादय इति। यदाहुः— यः सर्वपरिकल्पनानामाभासेऽप्यनवस्थितः । तर्कागमानुमानेन बहुधा परिकल्पितः ॥ अन्तर्यामी स भूतानामाराद् दूरे च दृश्यते । सोऽत्यन्तमुक्तो मोक्षाय मुमुक्षुभिरुपास्यते ॥ प्रकृतित्वमपि प्राप्तान् विकारानकरोति सः । व्युध्रामेव ग्रीष्मान्ते महतो मेघमण्डलवान् ॥

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