वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० वाक्यपदीयम् दादेशः' भी कहते हैं। वस्तुतः विचारा जाय तो शिर ही राहु है और चैतन्य ही पुरुष है। किन्तु व्यवहार अभेद में भेद मानकर होता है इसी प्रकार स्थानी और आदेश के भिन्न होने परभी स्वनिकट सूत्र भेद में अभेद सिद्ध करता है और वह उसी प्रकार भेद में अभेद, अथवा अभेद भी भेदरूप से प्रसिद्ध (रूढ) हो जाता ॥ १२९ ॥ एतदेव स्पष्टयति— उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हैं। अत्यन्तमत्तथाभूते निमित्ते श्रुत्युपाश्रयात् । दृश्यते ऽलातचक्रादौ वस्तवाकारनिरूपणा ॥ १३० ॥ निमित्ते बाह्ये अलातचक्रादौ अलातचक्रशशविषाणखपुष्पादिरूपेऽर्थे अत्यन्तमत्तथाभूते असत्येऽपि श्रुत्युपाश्रयात् शब्दबलात् यस्त्वाकारनिरू- पणा खपुष्पं भवत्सिद्धान्त इत्येवं शब्दप्रयोगो दृश्यते इति अत्यन्तासत्तमप्यर्थं शब्द एव जनयतीति सन्तमपि स एव जनयतीति शब्दमूलिकैव सृष्टिः अत