वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् १४२ ननु यदिव्याकरणस्मृतेः प्रामाण्ये शब्दसाधुत्वज्ञानपूर्वकधर्माधिगमद्वारकः शब्द- ब्रह्मतादात्म्यलक्षणो मोक्ष उपपद्येत तदेव कुतः शब्दसाधुत्वबोधकव्याकरणस्मृतेः पौरुषेयतया स्वतः प्रामाण्यायोगादिति शङ्कां वेदमूलकत्वेन तत्प्रामाण्यबोधनेनापा- स्यन् पौरुषेयाणां सर्वागमानां वेदमूलकत्वात् प्रामाण्यमाह— यद्यपि शब्दसाधुत्वज्ञान से उत्पन्न धर्म द्वारा शब्द ब्रह्म में तादात्म्यरूप मोक्ष मिलता है, शब्दों का साधुत्व व्याकरण शास्त्र बतलाता है, व्याकरण शास्त्र मनुष्य निर्मित है वह भ्रमप्रमादादि मानव दोषों से दूषित होने के कारण स्वतः प्रमाण माना नहीं जा सकता। तथापि पौरुषेय आगम वेदमूलक होने के कारण प्रमाण माने जाते हैं क्योंकि— न जात्वकर्तृकं कश्चिदागमं प्रतिपद्यते । बीजं सर्वागमापाये त्रय्येवातो व्यवस्थिता ॥ १३३ ॥ जातु कदाचिदपि क