भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 192 में से

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१४६ वाक्यपदीयम् जब धर्मशास्त्र विनष्ट हो जाते हैं और दूसरे धर्मशास्त्र जबतक नहीं उत्पन्न हो जाते इस अवधि के बीच में शिष्ट पुरुष श्रुति और स्मृति में वर्णित धर्मों का पालन परम्परा के आधार पर करते हैं तथा परम्पराओं का उल्लङ्घन नहीं करते ॥ १३४ ॥ ननु कपिलादीनां स्वभाविकमेव धर्माधर्मादिज्ञानं नागमान्तरमूलं न वा वेदमूल- मिति तदीयागमप्रामाण्यं स्वत एवेति न वेदमूलापेक्षेत्यत आह— जो लोग महर्षि कपिल आदि के ज्ञान को धर्मनिर्णय और अधर्मनिर्णय में स्वतः प्रमाण मानते हैं न कि वेदमूलक होने के कारण वे बड़ी भूल करते हैं। क्योंकि— ज्ञाने स्वाभाविके नार्थः शास्त्रैः कश्चन विद्यते । धर्मो ज्ञानस्य हेतुश्चेत्तस्याम्नायो निबन्धनम् ॥ १३५ ॥ कस्यचित् कपिलादेः स्वाभाविके प्रमाणान्तरानपेक्षे ज्ञाने धर्माधर्मविषयके इष्यमाणे शास्त्रैः कपिलादिदर्शनैः कश्चन अर्थः किमपि प्रयोजनं न विद्यते कपि- लादिवदन्येषामपि जीवानां स्वत एव धर्माधर्मविवोधसम्भवात् । अथ कपिलादीनां ज्ञानस्य धर्मो हेतुरिति तेषामेव धर्मानुग्रहवशादतीन्द्रियार्थविषयकं ज्ञानं भविष्यति न गृहीतकर्मणां मन्वाद्यवोधानामिति नागमप्रणयनवैयर्थ्यमिति चेत् तस्य अतीतार्थ- विषयकज्ञानहेतोर्धर्मस्य तदानीम् आम्नायो वेदो निबन्धनं मूलं नागमान्तरं तेषां विच्छिन्नत्वादिति भावः ॥ १३५ ॥ प्रमाणान्तर की अपेक्षा के बिना स्वाभाविक किसी भी व्यक्ति के धर्माधर्म विषयक ज्ञान में शास्त्रों का कोई प्रयोजन नहीं है क्योंकि सब लोगों के स्वाभाविक ज्ञान में कोई विशेष हेतु है तो वह वेद मूलक होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता ॥ १३५ ॥ ननु सर्वागमानां वेदमूलकत्वादेव प्रामाण्ये तर्काख्यं पूर्वोत्तरमीमांसाशास्त्रमनर्थकं तन्निर्णैतव्यार्थस्य अस्मदाद्युपलभ्यमानवेदादेवावगन्तुं शक्यत्वादत आह— यद्यपि जितने आगम हैं सब वेद मूलक हैं और वेद के ज्ञान हो जाने पर इन पूर्व- मीमांसा, उत्तरमीमांसा आदि दर्शनों की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि इन आगमों में वर्णित विषय वेद के द्वारा जाने जा सकते हैं तथाऽपि— वेदशास्त्राविरोधी च तर्कश्चक्षुरपश्यताम् । रूपमात्राद्धि वाक्यार्थः केवलान्नावतिष्ठते ॥ १३६ ॥ अपश्यताम् वेदार्थनिर्णयासामर्थ्यानां मन्दावबोधानां मादृशां वेदशास्त्राविरोधी वेदार्थव्यवस्थापकः तर्कः पूर्वोत्तरमीमांसालक्षणः चक्षुः हि यतः केवलात् तर्का- सहकृतात् रूपमात्रात् वेदशब्दस्वरूपमात्रात् वाक्यार्थः श्रुतितात्पर्यविषयीभूतोऽर्थः नावतिष्ठते न निश्चितो भवतीत्यर्थः । वेदार्थनिर्णयाय तर्काख्यं मीमांसाशास्त्रमा- वश्यकमत एवाहः 'यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मो वेद नेतरः' इति भावः ॥ १३६ ॥ जो लोग वेद के अर्थ का निर्णय नहीं कर सकते उनके लिए वेद के अर्थ का व्यवस्थापक मीमांसा और वेदान्त रूपी तर्क ही नेत्र है। क्योंकि केवल वेद के शब्दमात्र से वेद का तात्पर्यार्थरूपी वाक्यार्थ निश्चित नहीं हो सकता ॥ १३६ ॥

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