वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् १४७ ननु को वेदतात्पर्यविषयीभूतोऽर्थः यदर्थं तर्कापेक्षेत्यत आह— वेद के वे तात्पर्यभूत अर्थ जिनके लिए तर्कशास्त्र की अपेक्षा की जाती हैं— सतोऽविवक्षा पारार्थ्यं व्यक्तिरर्थस्य लैङ्गिकी । इति न्यायो बहुविधस्तर्केण प्रविभज्यते ॥ १३७ ॥ ग्रहं संमार्ष्टि इत्यादौ ग्रहपदोत्तरैकवचनार्थस्यैकत्वस्य सतोऽविवक्षा¹ ततो बहूनां पात्राणां संमार्गः सिध्यति पारार्थ्यं परोद्देशप्रवृत्तकृतिक्याप्यत्वरूपमङ्गत्वं² ‘बर्हिर्देव³ सदनं दामि’ इत्यादिमन्त्राणां बर्हिर्लवनाङ्गत्वम् अर्थस्य ‘अक्ताः⁴ शर्करा उपदधाति’ इत्यादौ घृतसाधनकाञ्जनरूपस्य लैङ्गिकी अक्ता इति वाक्यसन्निधौ ‘तेजो वै घृतम्’ इति घृतस्तुतिरूपलिङ्गजन्या व्यक्तिः प्रतिपत्तिः इति इत्येवं रूपो बहुविधो न्यायः तात्पर्यनिर्णयः तर्केण मीमांसया प्रविभज्यते क्रियते ॥ १३७ ॥ वेद के तात्पर्य जानने के लिए अनेक तर्कों का प्रयोग होता है जैसे—सत् (वर्तमान) की अविवक्षा, पारार्थ्य और अर्थ की लिङ्ग द्वारा प्रतीति इस प्रकार के अनेक न्याय (तात्पर्य निर्णय) तर्कों (मीमांसा) के द्वारा किये जाते हैं। सतः अविवक्षा—‘ग्रहं संमार्ष्टि’ इस वाक्य में ग्रहपद के सामने द्वितीया का एक वचन अम् विभक्ति है। एक वचन के कारण एकत्व विवक्षापन्न है। यदि उक्त वाक्य में यह एकत्व भी वक्ता के तात्पर्य का विषय हो तो एक ग्रह का सम्मार्जन हो सकता है। दूसरे ग्रह (पात्र) बिना माँजे ही रह जायेंगे। अतः एकत्व की अविवक्षा कर दी जाती है। जिससे सब पात्र माँजे जा सकें। पारार्थ्य—पर (स्वर्ग और अग्निहोत्र) के उद्देश्य से प्रवृत्त पुरुष की, कृति का विषय अग्निहोत्र और दधी दोनों हैं। इसलिए स्वर्ग के प्रति अग्निहोत्र और अग्निहोत्र के प्रति दधी अङ्ग है। जैसे ‘बर्हिर्देव सदनं दामि’ इस मन्त्र में ‘दामि’ इस पद से छेदन की प्रतीति होने के कारण यह मन्त्र लवन (छेदन) में अङ्ग हो जाता है। ‘अक्ताः शर्करा उपदधाति’ इस वाक्य को सुनकर शर्करा को अक्त बनाने के लिए घृत और तैल या डाल्डा के सदृश हानिकारक पदार्थ उपयोग में लाया जा सकता है किन्तु उसी वाक्य के आगे ‘तेजो वै घृतम्’ इस वाक्य के रहने से प्रकरणवश घी की स्तुति शर्करा को १. ग्रहमिति। ग्रह इति पात्रविशेषस्य संज्ञा। ग्रहपदोत्तरद्वितीयार्थैकत्वस्य विवक्षणे ग्रहं- संमृज्यात् यं संमृज्यात् स चैक इत्येवं ग्रहोद्देशेन एकत्वसंमार्गोभयविधौ वाक्यभेदः स्यादिति एकत्वमविवक्षितम्। पशुना यजेतेत्यादौ तृतीयार्थैकत्वस्य विवक्षायामपि यागोद्देशेन एकत्ववि- शिष्टपशोर्विधानेन न वाक्यभेद इति न तत्रैकत्वाविवक्षा। २. परेति। परं स्वर्गादि अग्निहोत्रादि च तदुद्देशेन प्रवृत्तो यः पुरुषः तत्कृतिव्याप्यता अग्निहोत्रादौ दध्यादौ च इति स्वर्गं प्रति आग्निहोत्रः अग्निहोत्रं प्रति च दध्याद्यङ्गम्। ३. बर्हिरिति। दामीत्यस्य लवनप्रकाशकत्वात् अर्थप्रकाशनं लिङ्गमिति लिङ्गेन अस्य मन्त्रस्य लवनाङ्गत्वम्। ४. अक्ताः शर्करा इति। अक्ता इति पदेन सामान्यतः सर्वाञ्जनद्रव्यप्रसक्तौ घृतद्रव्यमेवाञ्जन- साधनत्वेन गृह्यते तत्सन्निधौ तेजो वै घृतमिति घृतस्तुतिरूपाल्लिङ्गात्।