भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् १४६ नियम हैं। वैसे सब शब्दों में रहने वाला शब्दत्व एक है। चाहे वह साधु हो या असाधु। फिर भी कुछ शब्द साँप का विष दूर करने के लिए नियम दिये जाते हैं। (अर्थात् उन्हीं शब्दों को पढ़ने से विष उतरता है) ॥ १३९ ॥ दृष्टान्तितमाह— यथैषां तत्र सामर्थ्यं धर्मेऽप्येवं प्रतीयताम् । साधूनां साधुभिस्तस्माद्भाच्यमभ्युदयार्थिभिः ॥ १४० ॥ यथा येषां केषाञ्चित् शब्दानां तत्र विषापहरणादौ सामर्थ्यं वर्तते एवं धर्मेऽपि साधूनां शब्दानां प्रतीयताम् यत एवं तस्मात् अभ्युदयार्थिभिः अदृष्टार्थिभिः पुरुषैः साधुभिर्भाच्यं नामाधुभिरित्यर्थः ॥ १४० ॥ जैसे कुछ शब्दों की शक्ति विष दूर करने में देखी गई है। वैसे शब्दत्व के एक होने पर भी वाक्य ज्ञान में केवल अर्थ ही ग्राह्य माना जाता है । सब जलों में जलत्व एक है फिर भी मद्य पापजनक और तीर्थोदक पुण्यजनक है। इसी प्रकार धर्म के विषय में साधु शब्दों को ही मानना चाहिए क्योंकि कल्याण चाहने वाले साधु का प्रयोग करते हैं असाधु का नहीं ॥१४०॥ ननु शब्दविशेषाणां विषापहारकत्वं प्रत्यक्षसिद्धं साधूनां तु अदृष्टजनकत्वं न प्रत्यक्षसिद्धं तत्कथं स्वीक्रियतामत आह— जिन शब्दों का सामर्थ्य प्रत्यक्ष है उनके बारे में प्रमाणान्तर की आवश्यकता नहीं किन्तु— सर्वेऽदृष्टफलानर्थानागमात्प्रतिपद्यते । विपरीतं च सर्वत्र शक्यते वक्तुमागमे ॥ १४१ ॥ सर्वो जनः अदृष्टफलानर्थान् यागादीनागमात् यजेत स्वर्गकाम इत्येवंरूपात् प्रतिपद्यते यागः स्वर्गसाधनमिति मनुते एवम् 'एकः शब्दः सम्यग् ज्ञातः सुष्ठु प्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग्भवति' इत्येवंरूपात् आगमात् साधूनामपि अदृष्टजनकत्वं मन्यताम् । मन्त्रवत्त्वाविशेषात् साधूनामधर्मजननसामर्थ्यमेव किं न कल्प्यते इत्यत आह विपरीतमिति । एवं सति विपरीतम् आगमेव यस्य पुण्यजनकतोक्ता तस्य पापजनकत्वं यस्य पापजनकतोक्ता तस्य पुण्यजनकत्वमिति सर्वत्र आगमे वक्तुं शक्यते तथापि कंचिदागमं प्रमाणीकृत्य तदुपोद्वलकतया कांचिद्युक्तिमुदाहरन्तो दृश्यन्ते जना इत्यागमात् साधूनां पुण्यजनकत्वमसाधूनां च पापजनकत्वमिति मन्त- व्यम् नात्र विवदितव्यं तथा सति सर्वागमोच्छेद एव स्यादिति भावः ॥ १४१ ॥ जैसे जो शब्द अदृष्टजनक हैं उनका प्रामाण्य तो सब लोग 'यजेत स्वर्गकामः' इस प्रकार के आगम को ही मानते हैं। वैसे 'एक शब्दः सम्यग् ज्ञातः स्वर्गे लोके च कामधुग् भवति' इस प्रकार के आगम से साधु शब्दों को भी अदृष्टजनक मानते हैं। यदि कोई इसके विपरीत कल्पना करे कि जो पुण्यजनक हैं वे पापजनक और जो पापजनक वे पुण्यजनक तो सब आगमों के बारे में यह विपरीत कल्पना हो सकती है। अतः लोक व्यवहार को ध्यान में रखकर आगमों को प्रमाण मानना ही पड़ता है ॥ १४१ ॥