भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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प्रभाशास्त्रम् ] संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् [ १५३ सिद्धान्तशैवास्तु परापश्यन्त्याद्यश्चतस्रो वाचः ब्रह्म च ताभ्यो व्यतिरिक्त- मिति । पश्यन्त्यादयस्तिस्रोऽपि वाचः परावस्थायां परचिदात्मना परब्रह्मणा सङ्गतिं गतास्तदेकात्मतयाऽवतिष्ठन्ते । तदानीं सस्पतिः ( वाचस्पतिः ) परमेश्वरः स्वात्म- ज्योतिषा स्वाभिन्नं भावजातं बिम्बं भासयते तन्नासनद्रैय तत्रेच्छायाः समुद्रेको भवति यदधीनः विश्वसर्गादिकल्लोलप्रसरः इति वदन्ति । नागेशभट्टास्तु—सिद्धान्तशैवानां मतं, परा वाङ्मूलचक्रस्था पश्यन्ती नाभिसंस्थिता । हृदिस्था मध्यमा ज्ञेया वैखरी कण्ठदेशगा इति तन्त्रशास्त्रं चाश्रित्य- मूलाधारस्थपवनसंस्कारीभूता मूलाधारस्था शब्दब्रह्मरूपा स्पन्दशून्या बिन्दुरूपिणी परा वागुच्यते, नाभिपर्यन्तममागच्छता तेन वायुनाऽभिव्यक्ता मनोगोचरीभूता पश्यन्ती वागुच्यते, ततो हृदयपर्यन्तमागच्छता तेन वायुनाभिव्यक्ता तत्तदर्थवाचकशब्द- स्फोटरूपा श्रोत्रग्रहणायोग्यत्वेन सूक्ष्मा जपायै बुद्धिनिर्भासा मध्यमा वागुच्यते, तत आस्यपर्यन्तमागच्छता तेन वायुनोर्ध्वमाक्रामता च मूर्द्धानमाहत्य च तत्तत्स्था- नेष्वभिव्यक्ता परश्रोत्रेणापि ग्रहणयोग्या वैखरी वागुच्यते इति वाचश्चतुर्विधत्व- माहुः । तन्न व्याकरणसिद्धान्तानपयोधनिबन्धनम् । हर्यादिभिर्वाक्त्रित्वस्यैवो- क्तत्वात् । न च चत्वारि वाक् परिमिता इति भाष्योदाहृतश्रुतिमूलकं भट्टोजी- भट्टोक्तम् अत एव माधवेन ऋग्वेदभाष्ये चत्वारि वाक्परिमितापदानीत्यनेन वैखरीमध्यमापश्यन्तीपरारूपाणि दर्शितानि व्याख्यातं चैवमेवोद्योते इति वाच्यम् । कैयटेन उक्तश्रुतेः तत्र चतुर्णाम् ( नामाख्यातोपसर्गनिपाताख्यानां ) पदजाता- नामेकैकस्य चतुर्थभागं मनुष्या अवैयाकरणावदन्तीति व्याख्यातत्वेन माधवादि- व्याख्यानस्य तन्त्रशास्त्रासक्तवैलक्षण्याद् वैयाकरणैरनुपादेयत्वात् । चतुर्थांशत्वं च वाग्ब्राह्मणः 'पादोऽस्य विश्वाभूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि' इति श्रुतिसिद्धम् ॥ वाणी के तीन भेद—आचार्य भर्तृहरिने वाणी का तीन ही भेद स्वीकार किया है वैखरी मध्यमा और पश्यन्ती । वाणी के तीन होने पर ही दूसरी का नाम मध्यमा पड़ना युक्ति सङ्गत भी है । शिवदृष्टिकार ने वाणी का तीन भेद ही वैयाकरण सम्मत कहा है । यदाहुरस्ते परं ब्रह्म यन्नादि तथा कथन् । तदक्षर शब्दरूप सा पश्यन्ती परा हि वाक् ।' इस कारिका से यह भी पता चलता है कि शिवदृष्टिकार अच्छी तरह जानते हैं कि पश्यन्ती और परा एक ही वस्तु है । हाँ, वैयाकरणों के यहाँ तीनों के तीन तीन भेद मान्य है स्थूला सूक्ष्मा और परा । वर्गों के विभाग से रहित स्वरप्रधान सङ्गीत रूप वाणी स्थूला पश्यन्ती है । वही विवक्षा से युक्त होने पर सूक्ष्मा पश्यन्ती है और वही विवक्षा से रहित संविद् रूप में परा पश्यन्ती कही जाती है । इसी प्रकार मृदङ्ग में हाथ के आघात से उत्पन्न ध्वनिरूपी वाणी स्थूला मध्यमा, बजाने की इच्छारूप से स्थिर वही सूक्ष्मा मध्यमा और विवक्षादिवा से रहित निरुपाधिक वही परा मध्यमा कही जाती है इसी प्रकार विलक्षण रूप से प्रतीत होने वाले कार्य रूप वाणी स्थूल वैखरी विवक्षा रूप में वही सूक्ष्मा वैखरी और विवक्षा से रहित संविद रूप वही परा वैखरी कही जाती है । जैसे सगुण निर्गुण के भेद से ब्रह्म को पर और अपर ब्रह्म कहा