वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ वाक्यपदीयम् जाता है वैसे पश्यन्ती से विलक्षण परा नाम का भेद स्वीकार करना व्याकरण सिद्धान्त का मूल रूप से अज्ञान ही है । अतः नागेश भट्ट ने अपने ग्रंथों में जो वाणी के चार भेद बताया है वह अत्यन्त अनुचित है । वाणी के चार भेद मानने वाले सिद्धान्त शैवों के मत से तो परा वाणी भी वहा नहीं है । फिर उनके सिद्धान्त के आधार पर व्याकरण सिद्धान्त की व्याख्या करना व्याकरण के मूल सिद्धान्त पर ही कुठाराघात हुआ है । क्योंकि आचार्य भर्तृहरि ने वाणी के तीन भेद ही स्वीकार किया है। यद्यपि 'चत्वारिवाक् परिमिता पदानि-' मन्त्र की व्याख्या करते हुए सायण और नागेश ने परा पश्यन्ती मध्यमा वैखरी आदि भेद से वाणी के चार भेद का प्रतिपादन किया है तथापि यह व्याख्या तन्त्र शास्त्र की भावना से की गई है । क्योंकि आचार्य कैयट ने 'चत्वारि' पद की व्याख्या में 'नामाख्यातं उपसर्ग और निपात' का नाम लिया है तथा वाणी में चार अंश माने हैं । जो 'पादोऽस्य विश्वाभूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि' मन्त्र के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्म के चतुरंगत्व की भाँति शब्दब्रह्म की चतुरंशता सिद्ध करते हैं । कुछ लोगों का मत है कि अवैयाकरण चतुर्थ भाग बोलते हैं और वैयाकरण शब्द के समस्त अंशों को जानते हैं ॥ १४३ ॥ शब्दसाधुत्वव्यवस्थाया आर्षज्ञानमूलकत्वमाह— तद्विभागाविभागाभ्यां क्रियमाणमवस्थितम् । स्वभावज्ञैश्च भावानां दृश्यन्ते शब्दशक्तयः ॥ १४४ ॥ विभागाविभागाभ्यां विभागः परप्रत्यायनाय कल्पितः प्रकृतिप्रत्ययादिभेदः यथा धातवस्तव्यदादयश्च अविभागः यत्र स्वरूपेणोच्चारणं यथा दाधर्त्ति दर्द्धर्त्ति इत्यादयः ताभ्यां क्रियमाणम् तत्—व्याकरणम् अवस्थितं व्यवस्थितम् भावानां पदार्थानां स्वभावज्ञैः सर्वज्ञेयेष्वप्रतिबद्धान्तःप्रकाशैर्ऋषिभिः शब्दशक्तयः शब्द- सामर्थ्यानि इदं धर्मजननयोग्यमिदमधर्मजननयोग्यमित्यादिरूपाणि दृश्यन्ते अती- न्द्रियार्थदर्शिभिः ऋषिभिः शब्दानां सामर्थ्यं दृष्ट्वा साध्वसाधुप्रविभागः कृतो व्यव- स्थितो द्रष्टव्यो न केनचिदन्यथा कर्तुं शक्य इति भावः ॥ १४३ ॥ यह व्याकरण शास्त्र दूसरों की भी समझ में आ जाय इसलिए विभाग (प्रकृति प्रत्यय भेद) और अविभाग ( स्वरूपोच्चारण जैसे द्वैधिय, औधिय, दाधर्ति दर्धर्ति इत्यादि ) के द्वारा रचा गया है और व्यवस्थित है । पदार्थों के स्वभाव को ठीक रीति से समझने वाले महर्षियों ने शब्दों की शक्तियों ( जैसे यह शब्द धर्मजनन योग्य है यह नहीं है ) देखीं । (इसलिए इन्हें कोई मिटा नहीं सकता है ) ॥ १४४ ॥ कालो न लोकशून्यः कालत्वादिदानीन्तनकालवत् इत्यनुमानेन सृष्टिप्रलयमन- ङ्गीकुर्वतां मीमांसकानां मतेन श्रुतिस्मृतिपरम्पराऽविच्छेदमाह— कालः न लोकशून्यः, कालत्वात्, इदानीन्तनकालवत् इस अनुमान से जो सृष्टि या प्रलय नहीं मानते उन मीमांसकों का मत है कि— अनादिमव्यवच्छिन्नां श्रुतिमाहुरकर्तृकाम् । शिष्टैर्निबध्यमाना तु न व्यवच्छिद्यते स्मृतिः ॥ १४५ ॥