भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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भावतत्त्वं वेदार्थसामर्थ्यं विज्ञाय Wait, look at line 16: "ऋषीणां बुद्धौ वेदज्ञानं न उपदेशापेक्षा ततः भावतत्त्वं वेदार्थसामर्थ्यं विज्ञाय" Wait, is it "उपदेशापेक्षा" or "उपदेशापेक्षम्"? Look at line 16: "न उपदेशापेक्षा ततः" - look at 'क्षा': it ends with aa matra: "उपदेशापेक्षा".

Line 17: लिङ्गेभ्यो वैदिकशब्देभ्यः स्मृतिर्विहिता ।

Line 18: एक और अविभक्त या निरवयव शब्द ब्रह्म के विवर्त्त (ऋषि रूप में व्यक्त) ऋषियों को Wait, "एक और": "एक और अविभक्त या निरवयव शब्द ब्रह्म के विवर्त्त (ऋषि रूप में व्यक्त) ऋषियों को" - wait, is it "शब्द ब्रह्म" or "शब्दब्रह्म"? Looks like "शब्द ब्रह्म".

Line 19: स्वप्न की भाँति वेदज्ञान स्वयं उत्पन्न हो जाता है। इसके बाद वे ऋषि पदार्थों का सामर्थ्य Wait, "भाँति" - "भाँति" or "भांति"? Has chandrabindu or dot? Looks like dot or chandrabindu.

Line 20: समझकर लिङ्गों (वैदिक शब्दों) से स्मृति की रचना करते हैं ॥ १४६ ॥

Line 21: