भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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१५६ वाक्यपदीयम् उपदेशेन मन्त्रान् संप्रादुः उपदेशाय ग्लायन्तोऽवरे विल्मग्रहणायेमं ग्रन्थं समाम्ना- सिषुर्वेदं च वेदाङ्गानि च' इति ॥ १४५ ॥ श्रुतिस्मृतीनां स्वरूपमुक्त्वा व्याकरणस्मृतेरन्यस्मृतितुल्यतामाह— अन्य स्मृतियों के समान व्याकरण भी स्मृति है। कायवाग्बुद्धिविषया ये मलाः समवस्थिताः । चिकित्सालक्षणाध्यात्मशास्त्रैस्तेषां विशुद्धयः ॥ १४७ ॥ कायवाग्बुद्धिविषयाः कायाश्रितो रोगः वागाश्रितोऽपभ्रंशः बुद्ध्याश्रितो रागद्वेषादिः एते ये मलाः समवस्थिताः वर्तन्ते तेषां चिकित्सालक्षणाध्यात्म- शास्त्रैः चिकित्साशास्त्रं चरकादिः लक्षणशास्त्रं व्याकरणं अध्यात्मशास्त्रं वेदान्तः तैः विशुद्धयो भवन्ति यथा आयुर्वेदशास्त्रं रोगान् आध्यात्मशास्त्रं च रागद्वेषादीन् समूलघातमुपहन्तीति संप्रतिपन्नं तथा लक्षणशास्त्रमपि वाचो मलान् अपभ्रंशानुप- हन्तीति संप्रतिपत्तव्यमिति भावः ॥ १४७ ॥ ( एक प्राणी के ) काय, वाणी और बुद्धि के मल (रोग, अपभ्रंश, और राग द्वेष आदि) जो स्थित हैं। उनकी विशुद्धि क्रम से चिकित्सा, लक्षण, और अध्यात्म शास्त्र (वेदान्त विद्या) के द्वारा ही होती है। तात्पर्य यह है कि जैसे चिकित्सा से कायमल- (रोग) दूर होता है, अध्यात्म शास्त्र से बुद्धिमल (राग-द्वेष) दूर होता है। वैसे वाणी का मल (अपभ्रंश) व्याकरण के द्वारा दूर किया जाता है। अतः चिकित्साशास्त्र और वेदान्त शास्त्र की भाँति व्याकरण शास्त्र भी मनुष्य के जीवन का उपयोगी शास्त्र है ॥ १४७ ॥ कः पुनरपभ्रंशो नामेत्यत आह— संग्रहकार के मत से अपभ्रंश लक्षण— शब्दः संस्कारहीनो यो गौरिति प्रयुयुक्षिते । तमपभ्रंशमिच्छन्ति विशिष्टार्थनिवेशिनम् ॥ १४८ ॥ गौरिति प्रयुयुक्षिते गौरिति प्रयोक्तुमिष्टे यः संस्कारहीनः शब्दः गाव्या- दिर्निष्पद्यते विशिष्टार्थनिवेशिनम् विशिष्टे सास्त्रादिमत्त्वार्थे निविशमानं तमपभ्रंश- मिच्छन्ति । यथाह संग्रहकारः—'शब्दप्रकृतिरपभ्रंशः' इति ॥ १४८ ॥ गौ शब्द प्रयोग करने की इच्छा होने पर जो व्याकरण संस्कार से हीन शब्द (गोणी, गावी, गोत आदि) उसी सास्त्रा वाली गौ के लिए अथवा अपर के लिए प्रयुक्त होने लगते हैं उन्हें अपभ्रंश कहते हैं ॥ १४८ ॥ शब्दानां साधुत्वमर्थविशेषनिबन्धनमित्याह— शब्दों के साधुत्व और असाधुत्व की व्यवस्था भी अर्थ विशेष में ही है। अश्वागोण्यादयः शब्दाः साधवो विषयान्तरे । निमित्तभेदात् सर्वत्र साधुत्वं च व्यवस्थितम् ॥ १४९ ॥