वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७ ] कारिका १२८-१३१ ( शब्द ही सर्वत्र व्यापक परमात्मा ) स्वप्न में भी वाग्रूपता का अनुगम, सब जगत् वाणी का ही विकार इस पक्ष का समर्थन, शब्द ही पुराण प्रसिद्ध परमात्मा । कारिका १३२ ( ब्रह्म प्राप्ति का उपाय ) शब्द का सम्यक् ज्ञान ही ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय और शब्द के तत्त्व का ज्ञान ही मोक्ष प्राप्ति का साधन । कारिका १३३ ( वेद मूलक होने से व्याकरण प्रमाण ) मनुष्य निर्मित भी व्याकरण वेद मूलक होने से प्रमाण है । कारिका १३४-१३५ ( वेद ही धर्म, आचार और आगम का मूल ) स्मृतियों के अभाव में आचार भी धर्म का मूल, समस्त आगम वेद मूल होने से ही प्रमाण । कारिका १३६-१३८ ( वेदमूलक तर्कशास्त्र आवश्यक ) आगमों के वेदमूलक होने पर भी तर्कशास्त्र की अपेक्षा, शुष्कतर्क की हेयता । कारिका १३९-१४२ ( साधुशब्द ही पुण्यजनक ) साधु और असाधु शब्दों से अर्थबोधकता की भाँति धर्मजनकता का निषेध । कारिका १४३ ( वाणी के समस्त रूप व्याकरण के लक्ष्य ) वाणी के तीन भेद । व्याकरण द्वारा तीनों का प्रतिपादन । कारिका १४४-१४६ (जगत् के प्रलय और नित्यपक्ष में वेद का प्रामाण्य) शब्दों की साधु असाधु व्यवस्था भी ऋषि दृष्टित, मीमांसक के मत में वेद प्रामाण्य, प्रलयवादी के मत में वेद प्रामाण्य । कारिका १४७-१५६ ( अपभ्रंश के विभिन्न इतिहास ) व्याकरण भी एक स्मृति, अपभ्रंश के लक्षण, शब्द किसी नियत अर्थ में ही साधु, असाधु से परम्परया बोध, असाधु के लक्षण, अपभ्रंश की उत्पत्ति का इतिहास। ख