वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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कारिका ८५-८७ ( वाक्य में पद और वाक्य की प्रतीति असत् ) वाक्य में पद और वर्ण की प्रतीति एक उपाय, पद और वाक्य के भेद की प्रतीति भी एक उपाय, उदाहरण । कारिका ८८-९२ ( क्रम से वर्ण, पद और वाक्य ग्रहण का कारण ) वाक्य में पदादि प्रतीति का कारण, उदाहरण, क्रम से वर्ण पद ग्रहण के द्वारा बुद्धि से वाक्य ग्रहण, बुद्धि क्रम नियत । कारिका ९३-९४ ( स्फोट पर अनेक वाद ) जातिस्फोट वाद, व्यक्तिस्फोटवाद, एक नित्य शब्द तत्त्ववाद । कारिका ९५-१०१ ( स्फोट में ध्वनिकृत काल भेद की प्रतीति ) ध्वनियों के अभिव्यंजकत्व पक्ष में स्फोट के अनित्यत्व आदि दूषणों का परिहार, ध्वनि और स्फोट के भिन्न-भिन्न देश में रहने पर भी व्यङ्ग्य व्यञ्जक भाव बनना, व्यङ्ग्य व्यञ्जक के लिए योग्यता भी नियत, व्यञ्जक की अनित्यता व्यंग्य में नहीं, उदाहरण, ध्वनिगत काल भेद का स्फोट के काल भेद में कारण कथन । कारिका १०२-१०६ ( स्फोट और ध्वनि का स्वरूप परिचय ) स्फोट और ध्वनि के स्वरूप, स्फोट काल की एकता, उदाहरण, नित्यपक्ष में समाधान । कारिका १०७-११२ ( शब्द के विषय में मतभेद ) शब्द के विषय में तीन भेद, शिक्षाकार का मत, जैनियों का मत, महाभा- ष्यकार का मत । कारिका ११३-११७ ( ज्ञान के शब्दभावापत्ति में तीन मत ) एक मत में ज्ञान के शब्द रूपता में परिणत होने का क्रम, दूसरा मत, तीसरा सिद्धान्त मत । कारिका ११८-१२४ (जगत् में सर्वत्र शब्द रूपता का अनुगम) शब्द को जगत्कारण मानना, सर्वत्र अर्थों का शब्द से जन्म, शब्द के विवर्त, जगत् की समस्त प्रवृत्ति के मूल में शब्द, शब्द के उच्चारण में होने वाले प्रयत्नों का कारण शब्द, समस्त ज्ञान में शब्द का अनुगम, वाणी के निकल जाने पर अवबोध का अभाव । कारिका १२५-१२७ ( सर्वत्र वाग्रूपता का अनुगम ) समस्त विचार और कलायें शब्द जन्य, प्राणियों में जब तक वाग्रूप का अनुगम तभी तक चेतना, वाणी ही प्रेरक ।