वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
[ ३ ]
कारिका ८५-८७ ( वाक्य में पद और वाक्य की प्रतीति असत् ) वाक्य में पद और वर्ण की प्रतीति एक उपाय, पद और वाक्य के भेद की प्रतीति भी एक उपाय, उदाहरण । कारिका ८८-९२ ( क्रम से वर्ण, पद और वाक्य ग्रहण का कारण ) वाक्य में पदादि प्रतीति का कारण, उदाहरण, क्रम से वर्ण पद ग्रहण के द्वारा बुद्धि से वाक्य ग्रहण, बुद्धि क्रम नियत । कारिका ९३-९४ ( स्फोट पर अनेक वाद ) जातिस्फोट वाद, व्यक्तिस्फोटवाद, एक नित्य शब्द तत्त्ववाद । कारिका ९५-१०१ ( स्फोट में ध्वनिकृत काल भेद की प्रतीति ) ध्वनियों के अभिव्यंजकत्व पक्ष में स्फोट के अनित्यत्व आदि दूषणों का परिहार, ध्वनि और स्फोट के भिन्न-भिन्न देश में रहने पर भी व्यङ्ग्य व्यञ्जक भाव बनना, व्यङ्ग्य व्यञ्जक के लिए योग्यता भी नियत, व्यञ्जक की अनित्यता व्यंग्य में नहीं, उदाहरण, ध्वनिगत काल भेद का स्फोट के काल भेद में कारण कथन । कारिका १०२-१०६ ( स्फोट और ध्वनि का स्वरूप परिचय ) स्फोट और ध्वनि के स्वरूप, स्फोट काल की एकता, उदाहरण, नित्यपक्ष में समाधान । कारिका १०७-११२ ( शब्द के विषय में मतभेद ) शब्द के विषय में तीन भेद, शिक्षाकार का मत, जैनियों का मत, महाभा- ष्यकार का मत । कारिका ११३-११७ ( ज्ञान के शब्दभावापत्ति में तीन मत ) एक मत में ज्ञान के शब्द रूपता में परिणत होने का क्रम, दूसरा मत, तीसरा सिद्धान्त मत । कारिका ११८-१२४ (जगत् में सर्वत्र शब्द रूपता का अनुगम) शब्द को जगत्कारण मानना, सर्वत्र अर्थों का शब्द से जन्म, शब्द के विवर्त, जगत् की समस्त प्रवृत्ति के मूल में शब्द, शब्द के उच्चारण में होने वाले प्रयत्नों का कारण शब्द, समस्त ज्ञान में शब्द का अनुगम, वाणी के निकल जाने पर अवबोध का अभाव । कारिका १२५-१२७ ( सर्वत्र वाग्रूपता का अनुगम ) समस्त विचार और कलायें शब्द जन्य, प्राणियों में जब तक वाग्रूप का अनुगम तभी तक चेतना, वाणी ही प्रेरक ।
[ ७ ] कारिका १२८-१३१ ( शब्द ही सर्वत्र व्यापक परमात्मा ) स्वप्न में भी वाग्रूपता का अनुगम, सब जगत् वाणी का ही विकार इस पक्ष का समर्थन, शब्द ही पुराण प्रसिद्ध परमात्मा । कारिका १३२ ( ब्रह्म प्राप्ति का उपाय ) शब्द का सम्यक् ज्ञान ही ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय और शब्द के तत्त्व का ज्ञान ही मोक्ष प्राप्ति का साधन । कारिका १३३ ( वेद मूलक होने से व्याकरण प्रमाण ) मनुष्य निर्मित भी व्याकरण वेद मूलक होने से प्रमाण है । कारिका १३४-१३५ ( वेद ही धर्म, आचार और आगम का मूल ) स्मृतियों के अभाव में आचार भी धर्म का मूल, समस्त आगम वेद मूल होने से ही प्रमाण । कारिका १३६-१३८ ( वेदमूलक तर्कशास्त्र आवश्यक ) आगमों के वेदमूलक होने पर भी तर्कशास्त्र की अपेक्षा, शुष्कतर्क की हेयता । कारिका १३९-१४२ ( साधुशब्द ही पुण्यजनक ) साधु और असाधु शब्दों से अर्थबोधकता की भाँति धर्मजनकता का निषेध । कारिका १४३ ( वाणी के समस्त रूप व्याकरण के लक्ष्य ) वाणी के तीन भेद । व्याकरण द्वारा तीनों का प्रतिपादन । कारिका १४४-१४६ (जगत् के प्रलय और नित्यपक्ष में वेद का प्रामाण्य) शब्दों की साधु असाधु व्यवस्था भी ऋषि दृष्टित, मीमांसक के मत में वेद प्रामाण्य, प्रलयवादी के मत में वेद प्रामाण्य । कारिका १४७-१५६ ( अपभ्रंश के विभिन्न इतिहास ) व्याकरण भी एक स्मृति, अपभ्रंश के लक्षण, शब्द किसी नियत अर्थ में ही साधु, असाधु से परम्परया बोध, असाधु के लक्षण, अपभ्रंश की उत्पत्ति का इतिहास। ख
पि वागीशतामुपैति". In line 18, it's the same idea: by remembering him, mutes become masters of speech! "स्मरणाद् यस्य वागीन्द्रतां मूकाः प्रतिपेदिरे"? If it's: स्म-र-णाद् य-स्य वा-गीन्-द्र-तां मू-काः प्र-ति-पे-दि-रे Wait! That would be: स्म(1) र(2) णाद्(3) य(4) स्य(5) वा(6) गीन्(7) द्र(8) तां(9) मू(10) काः(11) प्र(12) ति(13) पे(14) दि(15) रे(16) = 16 syllables! A full half-verse (ardha-shloka) without division! Wait! 16 syllables total! 1 2 3 4 5 6 7 8 | 9 10 11 12 13 14 15 16: स्म(1) र(2) णाद्(3) य(4) स्य(5) वा(6) गीन्(7) द्र-(8) | तां(9) मू(10) काः(11) प्र(12) ति(13) पे(14) दि(15) रे(16
"? No, why would it be "अक्षरस्य"? Wait, what if it is: "अक्षरम्—अविभक्तककारादिवर्णरूपाया"? No, look: यद् अक्षरम्— Then: अ (a) क्ष (ksha) र (ra) Then: स्य (sya)?? Wait, could it be: "अक्षरम्—अक्षरं न क्षरतीति"? No. Let's look really closely at: यद् अक्षरम्—अक्षरस्य विभक्तककारादिवर्णरूपाया Wait, could it be "अक्षरस्य विभक्तककारादिवर्णरूपाया"? Wait, in Hindi translation (line 18): "जो (ककारादिरूप) वर्णोंका कारण होते हुए भी" "वर्णों का कारण" = ककारादिवर्णरूपाया वैखर्या वाचो निमित्तम्! And in Sanskrit: "यद् अक्षरम्—अक्षरस्य विभक्तककारादिवर्णरूपाया वैखर्या वाचो निमित्तं, सत्" Wait, why "अक्षरस्य"? Wait! Could it be: "अक्षरम्—अक्षरं, विभक्तककारादिवर्णरूपाया वैखर्या वाचो निमित्तं सत्"? Look at the letter after 'र': Wait! Is it 'स्य'? Look: अ - क्ष - र - म् - ? Wait, it has a halanta 'म्'?
ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्यायोपेतम् ३ विभक्ताकारादिवर्णरूपा वैखरी वागुच्यते । ततः सैव बाह्यार्थवासनया अविद्यारूपया क्रमेण घटपटाद्याकारैर्विवृत्ता चक्षुरादिना गृह्यते इति । अयमेवार्थः— इत्याहुस्ते परं ब्रह्म यदनादितथाऽव्ययम् । तदक्षरं शब्दरूपं सा पश्यन्ती परा हि वाक् ॥ स एवात्मा सर्वदेहव्यापकत्वेन वर्तते । अन्तः पश्यद्वपुस्तस्यैव चिद्रूपत्वमरूपकम् ॥ तावन्मात्रपरा काष्ठा यावत्पश्यन्त्यनन्तकम् । अक्षादिवृत्तिभिर्हीनं देशकालादिशून्यकम् ॥ सर्वतः क्रमसंहारमात्रमाकारवर्जितम् । ब्रह्मतत्त्वं परा काष्ठा परमार्थस्तदेव सः ॥ आस्ते विज्ञानरूपत्वे स शब्दोऽर्थविवक्षया । मध्यमा कथ्यते सैव बिन्दुनादमयक्रमात् ॥ संप्राप्ता वक्त्रकुहरं कण्ठादिस्थानभागशः । वैखरी कथ्यते सैव बहिर्वासनया क्रमात् ॥ घटादिरूपैर्व्यक्ता गृह्यते चक्षुरादिना ।
: "कस्थितिविशेषः इति तदर्थः ।" Wait: "व्यञ्जकस्थितिविशेषः" or "व्यङ्ग्यस्थितिविशेषः"? Look at line 31: व्य-ञ्ज- Line 32: क-स्थि-ति-वि-शे-षे-ण? Or क-स्थि-ति-वि-शे-षः? Let's look at line 32: क-स्थि-ति-वि-शे-षः (or कस्थितिविशेषेण? It ends with ः: 'विशेषः इति तदर्थः ।') Wait, let's look at line 32 start: Is it 'क'? Letter 1: looks like 'क' or 'कप्र'? No, line 31 ends with hyphen: "विभावादिभिर्व्यञ्ज-" Line 32 starts with: "कस्थितिविशेषः इति तदर्थः ।" Wait, why does it look a bit blurred/garbled? Wait, is it "कस्थिति-"? Let's look at the characters: क, then 'स्थि' (स with थ inside, i-matra), then 'ति' (त with i-matra), then 'वि' (व with i-matra), then 'शे' (श with e-matra), then 'षः' (ष with visarga). Yes! "कस्थित
ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ५
अत एव शान्तरक्षितेन अनादिनिधनमिति कारिकामर्थतोऽनुवदता विवर्त- पदमपहाय परिणामपदमेव प्रयुक्तम् । तथा हि— नाशोत्पादसमालीढं ब्रह्म शब्दमयं च यत् । यत्तस्य परिणामोऽयं भावग्रामः प्रतीयते ॥ इति । विवर्तपदेन परिणाम एवाभिप्रेतो वाक्यपदीयकारस्यापि 'शब्दस्य परिणामोऽय- मित्याम्नायविदो विदुः' इति अग्रिमकारिकादर्शनावदगम्यते । विवर्ततेऽर्थभावेन इत्यस्य 'एकस्य तत्त्वादप्रच्युतस्य भेदानुकारेणासत्याविभक्ता- न्यरूपोपग्राहिता विवर्त' इति टीकादर्शनात् शब्दस्य विवर्तोऽर्थो न परिणाम इत्य- वगम्यते । न्यायमञ्जर्यां शब्दविवर्तवादस्य शब्दपरिणामवादस्य च खण्डनदर्शना- दुभयमपि वैयाकरणानामभिमतमित्यवगम्यते इत्यलमतिजल्पनेन । विवर्तपरिणामयोर्लक्षणे तु—'अत
एकमेव यदाम्नातं भिन्नं शक्तिव्यपाश्रयात् । अपृथक्त्वेऽपि शक्तिभ्यः पृथक्त्वेनेव वर्तते ॥ २ ॥ यत्—शब्दब्रह्म 'एकमेवाद्वितीयम्' 'अद्वैत एक एवाभवत्' 'सलिल एवैको द्रष्टा' इत्यादिश्रुतिभिः एकमेवाम्नातं कथितं तत् शक्तिव्यपाश्रयात् शक्तीनां घटपटादिविचित्रकार्यजननयोग्यतारूपाणां व्यपाश्रयात् आश्रयणात् शक्तिगतभेदा- रोपादिति यावत् भिन्नं पृथग्रूपम् 'प्रणव पूर्वकस्त्रेधा व्यभवत्' इति श्रुतेः। सलिलशब्देन ब्रह्म। प्रणवोऽत्र अविभक्तं ब्रह्म त्रेधा त्रिप्रकारेण--ऋग्यजुःसामरूपेण व्यभवत विभक्तमभूदिति तदर्थः। तथा च ब्रह्मण एकत्वेऽपि तद्गतशक्तिवैचित्र्याद् भेदमारोप्य विचित्रकार्यजनकत्वमिति भावः। नन्वेकस्य विभिन्नरूपताऽनुपपन्नेत्यत आह—अपृथक्त्वेऽपीति। अपृथक्त्वेऽपि अभिन्नत्वेऽपि ब्रह्म शक्तिभ्यः पृथक्त्वेनेव वर्तते शक्तिभेदमाश्रित्य पृथगिव भिन्नमिवावभासते न तु वस्तुतो भिन्नमिति भावः। शक्तिभ्य इत्यत्र ल्यब्लोपे पञ्चमी तथा च शक्तीराश्रित्येति तदर्थः। ननु ब्रह्मणो नानाकारावग्रहे एकत्वानुपपत्तिरिति चेन्न, वृक्षा इति एकस्या- मुपलब्धौ नानावृक्षाकारावग्रहसत्त्वेऽपि यथा ज्ञानस्यैकत्वं नानुषपन्नं तद्वद् ब्रह्मणोऽ- पीत्यदोषात्। (वह एक और समस्त जगत् का कारण ब्रह्म (शब्द)) जो (एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म, आदि श्रुतियोंमें) एक ही कहा गया है वह उस नित्य शक्तिका आश्रय है (जिससे घट-पट आदि विचित्र प्रकारके भिन्न भिन्न कार्य और ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद रूपसे भिन्न भिन्न रूपमें प्रकट होते हैं।) यद्यपि उस ब्रह्ममें वास्तविक भेद नहीं है फिरभी शक्तिकी विचित्रतासे भेद दिखाई पडता है। एतदुक्तं भवति—आवर्तबुद्बुदतरङ्गादयो जलविकाराः परस्परं भिन्ना अपि जलमेव न ततो व्यतिरिक्ताः तथा घटपटादयो विकाराः परस्परं भिन्ना अपि पृथिव्येव न व्यतिरिक्ता इति घटपटादीनां भेदः पृथिव्या एकत्वमिव विलक्षणकार्योदयानूमीय- मान वैलक्षण्याः शक्तयो ब्रह्मण एकत्वं न विरुन्धन्ति इति घटादिरूपेण भिन्नत्वेऽपि पृथिव्याः स्वतोऽभिन्नत्ववत् शक्तिरूपेण ब्रह्मणो भिन्नत्वेऽपि स्वतोऽभिन्नत्वमिति ब्रह्मणि नानात्वं काल्पनिकमेकत्वं च वास्तवमिति न तयोर्विरोध इति भावः ॥ २ ॥ जैसे भँवरी, बुलबुले और तरङ्ग परस्परमें भिन्न हैं फिरभी सब जल हैं। घट पट आदि परस्पर भिन्न हैं फिर भी सब पृथिवी हैं। वैसे एक ही शब्द ब्रह्म शक्तिरूपसे भिन्न होते हुए भी स्वतः अभिन्न है अर्थात् शब्द ब्रह्म का एक होना स्वाभाविक और भेद काल्पनिक ही है ॥ २ ॥ शब्दब्रह्मनिष्ठशक्तीनां कार्यवैचित्र्योपादकत्वे नित्यानां तासां सर्वदा सत्त्वात् कुतो न सर्वदा सर्वकार्योत्पाद इत्यतो नियामकमाह— इस नित्य शब्द और शब्दकी विचित्र कार्योंको उत्पन्न कर सकनेवाली शक्तिके नित्य होने पर भी सदा सब कार्य नहीं होते। क्योंकि—
ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्यायुतम् । अध्याहितकलां यस्य कालशक्तिमुपाश्रिताः । जन्मादयो विकाराः षड् भावभेदस्य योनयः ॥ ३ ॥ यस्य ब्रह्मणः अध्याहित आरोपितः कला भेदः (निमेषादिक्रियोपहितानानात्वं यस्यास्ताम् अध्याहितकलां कालशक्तिं विधात्मा एक एव परं ब्रह्माभिधानं सत्यो भावः स एव नानाविधकार्यवशत्तियाऽनन्यशक्तित्वेन व्यवह्रियते तस्य स्वात- न्त्र्यशक्तिः कालस्ताम् उपाश्रिता जन्मादयः जायतेऽस्ति, विपरिणमते, वर्द्धते, हसति, नश्यति इत्येवंरूपाः षड् विकारा भावभेदस्य योनयः कारणानि भवन्ति । औपाधिकभेदमादायैकरस्यापि कालस्य क्रमरूपतया क्रमवत्कार्यजनकत्व- मिति भावः । जिस ब्रह्मकी काल्पनिक भेदों वाली शक्ति कालशक्ति स्वतन्त्रशक्ति है (जिसमें निमेष पल- घटी आदि की कल्पना की गई है और जिस शक्तिके कारण ब्रह्म अनन्यशक्तिमान् माना जाता है।) उसीके अनुसार जन्म (जायते, अस्ति, विपरिणमते, वर्द्धते, हसति, नश्यति) आदि छः प्रकारके विकार हैं जो भावों (पदार्थों) के भेदके (क्रमिक भेदके) कारण माने जाते हैं। अयं भाव —सर्वाः कारणशक्तयः कालेन अनुज्ञाताः सद्यो जनयन्ति कार्यम्, प्रतिबद्धाः सद्यो न जनयन्ति कार्यम्, हेमन्तादिकाले प्रतिबद्धाः वसन्तादिकाले अनु- ज्ञायन्ते इति कालः स्वातन्त्र्यशक्तिः अन्यासां च कालपारतन्त्र्यम्, यथा धीवराः पक्ष्य- न्तराणां ग्रहणाय सूत्रप्रतिबद्धान् पक्षिणश्चेष्टयन्ते तथा च ते सूत्रप्रतिबन्धादस्वतन्त्रा इव भवन्ति तथेच्छायां तन्तुनाऽऽकर्षणात्। एवं कालसूत्रप्रतिबन्धात् पदार्थाः संकोच- विकासलघुत्वगुरुत्वापत्तिवसावनवरतमनुभवन्ति। 'अतश्च कालसूत्रान्तर्गतं विश्वं ग्राहकालं प्रसूयते' इति जायते इत्यवसीयते, प्रसूतमनुतिष्ठते इति अस्ति इति व्यपदिश्यते, अवस्थितस्य विकारापत्तिरिति विपरिणमते, तच्च विपरिणमन्मुहूर्त्तमपि नावतिष्ठते इति वर्धते यावदनेन वर्धितव्यं, ततोऽपचीयते मुहूर्तमप्यनवस्थानादेव ततः अव- स्थितं कृतकरणीयं विनश्यति । तदुक्तं वाक्यपदीये—( का० ३ समु० ९ ) उत्पत्तौ च स्थितौ चापि विनाशे चापि तद्वताम् । निमित्तं कालमेवाहुरिभक्तेनात्मना स्थितम् ॥ तमस्य लोकयन्त्रस्य सूत्रधारं प्रचक्षते । प्रतिबन्धाभ्यनुज्ञाभ्यां तेन विश्वं विभज्यते ॥ यदि न प्रतिबध्नीयात् प्रतिबन्धं नोत्सृजेत् । अवस्था व्यतिकीर्येरन् पौर्वापर्यं विना कृताः॥ विशिष्टकालसम्बन्धो वृत्तिलाभाय कल्पते । शक्तीनां सम्प्रयोगस्य हेतुत्वेनावतिष्ठते ॥ स्थितिस्तस्यानुग्रहरूपैस्तैर्धर्मैः संसर्गिभिस्ततः। प्रतिबन्धस्तिरोभावः प्रहानमिति चात्मनः॥ प्रतिबद्धाश्च यास्तेन विश्वा विश्वस्य वृत्तयः। ताः स एवानुजानाति यथा तन्तुः शकुन्तिनः॥ विशिष्टकालसम्बन्धाल्लन्धपाकासु शक्तिषु । क्रियाभिव्यज्यते नित्या प्रयोगारूढेन कर्मणा ॥ इति ॥ ३ ॥
समस्त कारण शक्तियाँ कालकी आज्ञानुसार कार्य करती हैं और रोके जाने पर कार्य नहीं करतीं। हेमन्त कालमें जिन्हें रोका गया है वे वसन्त कालमें आज्ञा पा जाती हैं। इसलिए काल एक स्वतन्त्रशक्ति है। दूसरी शक्तियाँ कालके अधीन हैं। जैसे व्याध दूसरे पक्षियों को पकड़नेके लिए एक पक्षीको सूत्रमें बाँधकर प्रेरित करते हैं वे पक्षी सूत्रमें बँधे रहनेके कारण अस्वतन्त्र की तरह हैं। क्योंकि सूत्रके खींचने पर पुनः पकड़ लिए जाते हैं। वैसे कालरूपी सूत्रमें बँधे हुए पदार्थ सङ्कोच और विकास रूपी उत्पत्ति और ध्वंसका सदा अनुभव करते हैं। इसीलिए कालरूपी सूत्रमें बँधा हुआ विश्व काल आने पर जब प्रवृत्त होता है तब जायते कहा जाता है, जब प्रसूत स्थित होता है तब अस्ति कहते हैं, जब विकार होता है तब विपरिणमते कहते हैं, जब विपरिणमित रुक नहीं सकता तब वर्धते कहते हैं जब तक बढ़ता है जब हीण होने लगता है तब ह्रसति कहते हैं और जब वह नष्ट हो जाता है तब नश्यति कहते हैं। यह कालशक्ति एक होने पर भी काल्पनिक भेदों के कारण अनेक और क्रमवाली है। इसीलिए क्रमसे कार्य उत्पन्न होता है, एक कालमें सब कार्य नहीं उत्पन्न होते ॥ ३ ॥ अभिन्नस्यापि ब्रह्मणः सर्वकार्यजनकत्वमुपपाद्य सांप्रतं सर्वव्यवहारहेतुत्वमुपपादयति- एकस्य सर्वबीजस्य यस्य चेयमनेकधा । भोक्तृभोक्तव्यरूपेण भोगरूपेण च स्थितिः ॥ ४ ॥ सर्वबीजस्य यस्य एकस्य ब्रह्मणः इयं तत्त्वाभ्यात्वाभ्यामनिर्वोच्या ( ब्रह्म- त्वेन ब्रह्मभिन्नत्वेन च वक्तुमशक्या ) शक्तिरूपा स्थितिः अनेकधा भोक्तृभोक्त- व्यरूपेण भोगरूपेण च लोकव्यवहाराय प्रवर्तते । भोक्ता=पुरुषः, भोक्तव्याः= विषयाः, भोगः=विषयोपभोगजन्यसुखदुःखाद्यनुभव इति विवेकः । तदुच्यते- सर्वदाऽव्यभिचारम्भूतरूपमेकस्यैवेति निर्णयः । भावानामात्मभेदश्च कल्पना स्यादनर्थिका ॥ जो समस्त जगत्का कारण और एक है उसकी यह शक्तिरूपा स्थिति ( जो ब्रह्मरूप तथा [L2
ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ५ च वेदः एकोऽपि महर्षिभिः पृथक् पृथक् समाम्नातोऽभ्यस्तः अनेकवर्त्मनैव ऋग्यजुःसामाथर्ववेदभेदेन चतुर्विध इव भवतीत्यर्थः । समाम्नान इत्यनेन वेदस्य महर्षिप्रणीतत्वनिरासः । इस अद्वितीय ब्रह्मकी प्राप्तिका साधन और उसकी प्रतिमा वेद है। यद्यपि वेद भी एक ही है तथापि महर्षियोंने अलग अलग अभ्यास किया है अतः (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदके रूपमें) अनेक प्रकारका दिखाई पड़ता है। या अध्ययन करनेवाले ऋषियोंके नामसे अनेक वेद मालूम पड़ते हैं। जैसे शाकल शाखा, बाष्कल शाखा आदि । प्राप्युपाय इति । ब्रह्मणः प्राप्तिः-ममाहमित्यहङ्कारग्रन्थिसमतिक्रममात्रम् । अहङ्कारचिदात्मनोस्तादात्म्याध्यास एव ग्रन्थिः तन्निवृत्तिश्च ग्रन्थिसमतिक्रमः । इस कारिकामें प्राप्युपायमें दो पद हैं एक प्राप्ति और दूसरा उपाय । 'मेरा' और 'मैं
has a vertical stroke! But is that the stroke of प, or aa-matra? प has its own right vertical stroke!).
Then after प, there is ा? No, it's य with a vertical stroke (या)?
Wait, look at line 24:
शाखाध्याप then what?
In Shabara Bhashya: "एकशाखाध्यापिन्यां" or "एकशाखाध्यापिन्या"?
In line 24: शाखाध्यापन्त्यां or शाखाध्यापन्यां?
Look at line 24: शाखाध्याप then न् य ा ं = शाखाध्यापन्यां!
Wait, is there a त? It looks like त् + य = त्य or न् + य = न्य!
Wait, look at असाधारणमुपपद्यते:
अ - स - ा - ध - ा - र - ण - म - ु - प - प - द्य - त - े
In line 25:
कठशाखेति' इति आख्या प्रवचनादिति सूत्रे ॥ ५ ॥
Let's re-verify line 26: इदानीं ब्रह्मप्राप्युपायस्य वेदस्य स्वरूपकथनेन माहात्म्यमाह—
Line 27 (Karika line
ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् ११ पठितानामङ्गानां 'सर्वशाखाप्रत्यय'न्यायेनोपसंहारेण उपकारकत्वं चेत्यर्थः । ननु यदि सर्वशाखानामेककर्मबोधकत्वं तर्हि शाखाभेदः किंनिबन्धन इत्यत आह—शब्दा- नामिति । तस्य वेदस्य शाखासु शब्दानां यतशक्तित्वं यता नियता शक्तिः बोधजनकता अभ्युदयहेतुता वा येषां तेषां भावस्तत्त्वं दृश्यते । येन रूपेण स्वरेण च युक्तो यस्यां शाखायामुक्तो यः शब्दः स तथैवोच्चरितः तत्रैवार्थमभिधत्ते पुण्यजनकश्च नान्यथा न शाखान्तरेऽतोऽर्थक्रियानियमेन शक्तिनियमस्तत्प्रयुक्तश्च शाखाभेद इति भावः । यथा 'सिमस्याथर्वणेऽन्त उदात्तः' 'देवसुम्नयोर्यजुषि काटके' इत्यादिः । वस्तुतस्तु—तस्य वेदस्य भेदानां तत्तद्वेदगतशाखानां बहुमार्गत्त्वं बहवः पदक्रमजटामालादयो मार्गा अभ्यासोपाया येषा
े-" Wait, is it "विवक्षे-" or "विवक्षि-"? Look at L3 end: "वि" "व" "क्षे-" or "तं"? Wait! Look at L4 start: "ति स्वैः" So: "विवक्षितमिति"? Let's look at end of L3: "वि" "व" then what letter? It has 'क्षि'? Wait, the 'ि' mātrā is on the left of 'त'? Ah! "विवक्षि-" at end of L3, then "-तत्वात्" or "-ति"? Wait, L4 starts with: "ति स्वैः पितृपितामहादिभिरधीयते..." Wait! "विवक्षि-" at end of L3? Look at the top of the character at the end of L3: It has an 'े' mātrā! Wait, could it be "विवक्षे-" and then "ति" -> "विवक्षेति"? "स्वत्वस्यैकत्वस्य च विवक्षेति" -> "विवक्षा इति" = "विवक्षेति"! विवक्षा + इति = विवक्षेति! YES! "विवक्षा" (feminine) + "इति" = "विवक्षेति"! Just like in L1: "एकत्वविवक्षा"! Here: "स्वत्वस्यैकत्वस्य च विवक्षेति"! Brilliant!
Line 4: "ति स्वैः पितृपितामहादि
ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् १३ च श्रुतिमूलकस्मृतिकर्तृकत्वसामान्यात् असंप्रतिपन्नश्रुतिमूलकस्मृतीनां मूलं श्रुतिरनु- मेया, तदुक्तम्—'अपि वा कर्तृसामान्यात् प्रमाणमनुमानं स्यात्' इतिसूत्रेण जैमिनिना। स्मृतयो बहुरूपाश्चेति । स्मृतीनां पञ्चविधत्वमुक्तं भविष्यपुराणे— दृष्टार्था तु स्मृतिः काचिददृष्टार्था तथाऽपरा । दृष्टादृष्टार्थरूपाऽन्या न्यायमूला तथाऽपरा ॥ अनुवादस्मृतिश्चान्या शिष्टैर्दृष्टा तु पञ्चमा । एतासामुदाहरणानि तत्रैव— षड्गुणस्य प्रयोज्यस्य प्रयोगः कार्यगौरवात् । सामादीनामुपायानां योगो व्याससमासतः ॥ अध्यक्षाणां च निक्षेपः कण्टकानां निरूपणम् । दृष्टार्थेयं स्मृतिः प्रोक्ता ऋषिभिर्गरुडात्मज ॥ सन्ध्योपास्या सदा कार्या श्रुतौ मांसं न भक्षयेत् । अदृष्टार्था स्मृतिः प्रोक्ता ऋषिभिर्ज्ञानकोविदैः ॥ पलाशं धारयेद्दण्डमुभयार्था विदुर्बुधाः । न्यायमूला विकल्पः स्याज्जपहोमश्रुतौ यथा ॥ श्रुतौ दृष्टं यथा कार्यं स्मृतौ तत्तादृशं यदि । अनुक्तवादिनी सा तु परिव्रज्यं यथा गृहात् ॥ षड्गुणाः—सन्धिर्विग्रहो यानासनद्वैधीभावसमाश्रयाख्याः १। सामादीनां २ कार्य- गौरवाद्व्याससमासाभ्यां योगः प्रयोगः कर्तव्य इत्यर्थः । जपहोमश्रुताविति । सूर्यो- दयावधि सावित्रीजपोऽनुदितहोमविषयः । अनुक्तवादिनी = अनूदितवादिनी । यथा 'यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् गृहाद्वा वनाद्वा' इत्यनयाऽनूदितं 'ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात्' इति मनुस्मृतिर्वदति विधत्त इत्यर्थः ॥ इति । ननु 'वैसर्जनहोमीयं वासोऽध्वर्युर्गृह्णाति' इत्येवंभूताः स्मृतयो लोभमूलाः 'औदु- म्बरी सर्वा वेष्टयितव्या' 'अष्टाचत्वारिंशद्वर्षं वेदब्रह्मचर्यम्' इत्येवंभूताश्च स्मृतयः 'औदुम्बरीं स्पृष्ट्वोद्गायेत्' 'जातपुत्रः कृष्णकेशोऽग्नीनादधीत' इत्यादि श्रुतिविरुद्धाः, तासां कथं वेदमूलकत्वसम्भव इति चेद्रोच्यते, वैसर्जनहोमीयस्मृतेः—'स्मृतीनां श्रुतिमूलत्वे ऽपि पूर्वनिरूपिते । विरोधे सत्यपि ज्ञानं शक्यं मूलान्तरं कथम् ॥' इत्यनेन लोभ- मूलकत्वं निराकृत्य श्रुतिमूलकत्वस्य, औदुम्बरीवेष्टनस्मृतेः— १. अरिविजिगीष्वोर्मध्यस्थाकारकमैक्यं सन्धिः । विरोधो विग्रहः । विजिगीषोररिं प्रति यात्रा यानम् । तयोर्मिथः प्रतिबद्धावस्थयोः कालप्रतीक्षया तूष्णीमवस्थानमासनम् । दुर्बलशत्र्वोर्बलवच्छिक- मारम्भसंसर्गो द्वैधीभावः । अरिणा पीड्यमानस्य बलवदाश्रयणं संश्रयः । २. सामदानदण्डभेदाः । सामदाने दण्डभेदौ विदुषापयचतुष्टयमित्यमरान् । साम मान्त्वम् । दानं प्रसिद्धम् । दण्डो दमः । भेद उपजापः ।
१४ वाक्यपदीयम्
ततश्च श्रुतिमूलत्वाद्भाष्योदाहरणं न तत् । विरुद्धत्वे च बाधः स्यान्न चेहास्ति विरुद्धता ॥ न हि वेष्टनमात्रं हि स्पर्शश्रुत्या विरुध्यते । यदि द्वित्राङ्गुलं मध्ये विमुच्योत्तरभागतः ॥ वेष्टयेतौदुम्बरीं तत्र किं नाम न कृतं भवेत् । सर्वां वेष्टयितव्येति न ह्येषं सूत्रकृद्वचः ॥ प्राक् च लोभादिह स्पर्शः कुशैरेवान्तरीयने । वेष्टितैषा कुशैः पूर्वं वाससा परिवेष्ट्यते ॥ इति ग्रन्थेन श्रुतिविरुद्धार्थं निराकृत्य शाब्यानिमांसागतश्रुतिमूलकत्वस्य तन्त्र- वार्तिके स्थापनात् । 'अष्टाचत्वारिंशद्वर्षम्' इति स्मृतिरपि अन्धपङ्ग्वादिविषया नैष्ठिकब्रह्मचारिविषया वेति न जातपुत्रश्रुतिविरुद्धा । तदुक्तं तन्त्रवार्तिके— तत्रैवं शक्यते वक्तुं येऽन्धपङ्ग्वादयो नराः । गृहस्थत्वं न दाक्ष्यन्ति कर्तुं तेषामयं विधिः ॥ नैष्ठिकब्रह्मचर्यं वा परिव्राजकताऽपि वा । तैरवश्यं ग्रहीतव्या तेनादोषैतदुच्यते ॥ इति । ननु सर्वासाम् वेदविकल्पितस्मृतीनां श्रुतिमूलकत्वात्प्रामाण्याङ्गीकारे 'विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम्' 'हेतुदर्शनाच्च' इति सूत्राभ्यां कस्याः स्मृतेरप्रामाण्य- मुच्यते इति चेत् वेदबाह्यबौद्धादिकल्पितायाः स्मृतेरिति गृहाणेत्यलम् ॥ ७ ॥ जैसे 'गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनयनम्' यह स्मृति 'अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत' इस प्रत्यक्ष श्रुतिसे बनाई गई है। कुछ 'अन्वष्टका कर्तव्या' यह स्मृति शिष्टाचारसे ही बनाई गई है और इनका मूल 'अष्टकासु राधसे स्वाहा' मन्त्र है। इसी तरह 'गुरुरनुगन्तव्यः' यह स्मृति 'तस्मात् श्रेयासं यन्तं पापीयान् पश्चादन्वेति' इस श्रुतिको देखकर रची गई है। इनमें 'अष्टका' स्मृतिका प्रयोजन केवल अदृष्ट है और 'गुरुरनुगन्तव्यः' स्मृतिका प्रयोजन गुरुजीको प्रसन्न रखना दृष्ट प्रयोजन भी है ॥ ७ ॥ दर्शनभेदा अपि वेदादेवेत्याह— इसी तरह दर्शन भी वेदमूलक होनेके कारण ही प्रमाण है। जो दर्शन वेद-मूलक नहीं वे प्रमाण नहीं और उनसे मङ्गलकी प्राप्ति भी नहीं हो सकती है। दर्शनोंमें भी जो भेद दिखाई पड़ते हैं वे भी वेदसे ही हैं। भेद कहीं बीचमें नहीं बन गया है। भेद होनेमें कारण यह है कि— तस्यार्थवादरूपाणि निश्चित्य स्वविकल्पजाः । एकत्विनां द्वैतिनां च प्रवादा बहुधा मताः ॥ ८ ॥ तस्य वेदस्य अर्थवादरूपाणि अर्थवादानर्थवादरूपाणि वाक्यानि निश्चित्य आश्रित्य स्वविकल्पजाः स्वस्वबुद्धिप्रभवाः, विकल्पो बुद्धिभेदः तदुक्तं 'रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्' इति, एकत्विनां द्वैतिनां च बहुधा भिन्नभिन्न-
रूपेण, ममैव दर्शनं सत्यमित्येवंरूपः प्रकृष्टो वादो येषु ते प्रवादाः अनल्पाश्चा दर्शनभेदाः, मता अभिमता इत्यर्थः। वेदके ही मन्त्रोंमें जहाँ अर्थ परस्पर विरुद्ध दिखाई पडते हैं वहाँ (भिन्न भिन्न दर्शनाचार्योने) उनमें एकको अर्थवाद (प्रशंसा करनेवाला) और दूसरेको सिद्धान्त मानकर अपनी अपनी रुचिके अनुसार एकत्ववाद या द्वैतवाद मान लिया है और अपने अपने आग्रह पर अपने-अपने पक्षका समर्थन करते हैं। अर्थवादाश्चानर्थवादाश्चार्थादानर्थवादौ रूपं येषां तानि अर्थवादरूपाणि शाकपार्थिवा- दित्वादुत्तरपदलोपः। अर्थवादाश्चानर्थवादरूपाणि च अर्थवादरूपाणीति यद् च यल्लुक् च यल्लुकोरित्येकशेषो वा। केषाञ्चिद्वादाः अर्थवादमूलाः, केषाञ्चिच्च श्रुतितात्पर्यविषया इति तद्भावः। एकत्विनः—अद्वैतिनः 'एकमेवाद्वितीयम्' 'आत्मैवेदं सर्वम्' 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्' 'तत्त्वमसि' 'नेह नानास्ति किञ्चन' 'वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिके- त्येव सत्यम्' 'तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः' इत्यादिश्रुतिबलेन जीव- ब्रह्मणोरैक्यं ब्रह्मव्यतिरेकेण जगतोऽभावं चातिष्ठमानाः 'द्वा सुपर्णा' 'य आत्मनि तिष्ठन्' 'अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः' इत्यादिद्वैत- बोधकश्श्रुतीनां प्रत्यक्षसिद्धभेदानुवादकत्वेन हीनबलत्वाद्बाध्यत्वमाचक्षते। द्वैतिनस्तु—प्रत्यक्षविरोधेनाद्वैतश्रुतय उपचारितार्था जगदास्थाविवृत्तये वैरा- ग्योपष्टम्भार्थाः। द्वैतश्रुतयस्तु प्रत्यक्षसंवादेन सत्यार्था इति मन्यन्ते। एवं चार्वाकादयोऽपि 'अहं गौरः' 'अहं स्थूलः' इति प्रत्यक्षाभासमाश्रित्य 'स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः' इति वाक्यं 'आत्मैव देहमयः' इति वैरोचनसिद्धान्तप्रति- पादवाक्यं च स्वमतोपष्टम्भाय स्वीकृत्य स्वमतमपि श्रौतीकर्तुं प्रतिपेदिरे। तदुक्तं विद्यारण्यस्वामिभिः— कूटस्थादिशरीरान्तसंघातस्यात्मतां जगुः। लोकायताः पामराश्च प्रत्यक्षाभासमाश्रिताः॥ श्रौतीकर्तुं स्वपक्षं ते कोशमन्नमयं तथा। वैरोचनस्य सिद्धान्तं प्रमाणं प्रतिजज्ञिरे॥ इत्यादिना— एवमन्ये स्वस्वपक्षाभिमानेनान्यथान्यथा। मन्त्रार्थवादकृत्स्नादीनाश्रित्य प्रतिपेदिरे॥ इत्यन्तेन ग्रन्थजातेन। उदयनाचार्या-अपि आत्मतत्त्वविवेकशेषे—'प्रथमं बहिरर्थ एव भासते यमाश्रित्य धर्ममीमांसोपसंहारः चार्वाकसमुत्थानं च तत्प्रतिपादनार्थं 'पराञ्चि खानि' इत्यादिः 'तद्धानार्थं परं कर्मभ्य' इत्यादि। अथार्थाकारः यमाश्रित्य वैदण्डिकमतोप- संहारः योगाचारसमुत्थानं च तत्प्रतिपादनार्थम् 'आत्मैवेदं सर्वम्' इत्यादि, तद्धा- नार्थम् 'अगन्धमरसम्' इत्यादि। अथार्थाभावः यमाश्रित्य वेदान्तद्वारमात्रोपसंहारः शून्यत्वनैरात्म्यसमुत्थानं च तत्प्रतिपादनार्थम् 'असदेवेदमग्र आसीत्' इत्यादि,
०१६ वाक्यपदीयम् तद्धानाय 'अन्धं तमः प्रविशन्ति ये के चात्महनो जनाः' इत्यादि। ततो विवेक- यमाश्रित्य सांख्यमतोपसंहारः शक्तिसत्त्वसमुद्भवं च। तत्प्रतिपादनार्थं च, 'प्रकृतेः परस्तात्' इत्यादि, तद्धानाय 'नान्यत् सत्' इत्यादि। ततः केवल आत्मा प्रकाशते यमाश्रित्याद्वैतमतोपसंहारः तत्प्रतिपादनार्थं 'न पश्यन्तीत्याहुरेकीभवती'त्यादि, तद्धानाथं 'नाद्वैतं नापि च द्वैतम्' इत्यादि। ततः समस्तसंस्काराभिभवात् केवल्योऽपि न विकल्पते यमाश्रित्य चरमवेदान्तोपसंहारः तत्प्रतिपादनार्थं 'यतो वाचो निव- र्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' इत्यादि। सा चावस्था न हेया मोक्षनगरगोपुरायमाण- त्वात्। निर्वाणं तु तस्याः स्वयमेव यदाश्रित्य न्यायदर्शनोपसंहारः तत्प्रतिपादनार्थम् 'अथ यो निष्काम आत्मकाम आप्तकामः स ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति तत्रैव समवलीयन्ते' इति प्राहुः ॥ इति ॥ ८ ॥ एकत्ववादी—(अद्वैतवादी) 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म, आत्मैवेदं सर्वम्, ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्, तत्त्वमसि, नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि श्रुतियोंके आधारपर जीव-ब्रह्मकी एकता और ब्रह्मसे अलग जगत्की सत्ताका अभाव मानते हैं तथा 'द्वा सुपर्णा, य आत्मनि तिष्ठति, अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते इत्यादि द्वैतको बतानेवाली श्रुतियोंको प्रत्यक्ष वस्तु कहनेके कारण हीनबल मानकर एकत्ववादिनी श्रुतियोंसे इनका बाध कर देते हैं और अपने एकत्ववादका समर्थन करते हैं। द्वैतवादी—प्रत्यक्ष वस्तुके विरुद्ध होनेके कारण अद्वैत श्रुतियाँ केवल संसारमें विश्वास हटानेके लिए हैं और द्वैत श्रुतियाँ प्रत्यक्ष सिद्ध सत्य अर्थका बोध कराती हैं अतः द्वैतको ही उचित मानते हैं। चार्वाक भी—'आत्मैव देहमयः' इस श्रुतिको प्रमाण मानकर अपने पक्षको वेदसम्मत बतानेका साहस कर सकता है। अतः जितने पक्ष हो सकते हैं, सबके मूलमें वेद ही है ॥ ८ ॥ ननु यदि एते दर्शनभेदाः आप्तैकशरणपुरुषबुद्धिप्रभवा अन्यथा योज्यमानश्रुति- मूलाः परस्परविरुद्धाश्च तर्हि असत्या एव वस्तुनि विकल्पासम्भवात् अतः सत्यं किं तत्त्वमत आह— अब शङ्का यह उठती है कि दर्शनोंके वेदमूलक होनेपर भी सबमें आग्रह के कारण एकता न होनेसे यह कैसे जाना जा सकता है कि ब्रह्मप्राप्तिका सच्चा मार्ग कौन है ? सत्या विशुद्धिस्तत्रोक्ता विद्यैवैकपदागमा । युक्ता प्रणवरूपेण सर्ववादाविरोधिनी ॥ ९ ॥ य एते दर्शनविकल्पा भिन्नरूपानुगताः ( भेदमाश्रिताः ) ते भ्रमकारणरागद्वेष- मूलत्वादसत्या इति न वेदतात्पर्यविषयाः किन्तु अभिन्नरूपत्वाद् विशुद्धिः विशिष्टा शुद्धिः रागद्वेपादिरहित्यं यस्यां सा, एकपदागमा एकं पदं प्रणवरूपमागमो बोधकं यस्याः सा, तथा च श्रुतिः—ओमित्येकाक्षरमुद्गीथमुपासीतेति, एकस्मिन्पदे विषये आगमः समन्वयो यस्याः सा वा, विद्या ब्रह्मरूपा एकत्वबोधकश्रुतिर्वा एव न द्वैतं द्वैतश्रुतियाँ सत्या अतः तत्र वेदे उक्ता—वेदतात्पर्यविषयः, सत्यार्थप्रति-
ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् १७ पाठरूपेण पठिता वा। अद्वैतवादे कुतो न रागद्वेषायत आह—प्रणवेति । यतः सा विद्या प्रणवरूपेण सर्ववादाविरोधिनी अतो युक्ता परमार्थो नान्येत्यर्थः ॥ (जो रागद्वेष आदि दोषोंसे रहित) विशिष्ट बुद्धिशाली है और एक प्रणव (ॐकार) ही जिसे व्यक्त कर सकता है वह ब्रह्मरूपा एकत्वबोधिका विद्या ही सत्य है। यह ही विद्या सत्य अर्थ प्रकाशित करनेके कारण वेदमें वर्णित है। क्योंकि जितने (परमाणुकारणवाद, प्रधानकारणवाद आदि) वाद हैं इन सबसे कोई विरोध भी नहीं है। अतः वही वेदका परम सिद्धान्त है। परमाणुकारणवादो हि प्रधानकारणवादिविरुद्धो नाद्वैतवादः कल्पनयाऽद्वितीय- ब्रह्मण एव प्रधानपरमाणुरूपत्वात् यद्रूपं दर्शनभेदा ब्रह्मणः कल्पयन्ति तत्प्रणव एतत्तस्य रूपमित्यभ्यनुजानाति । तद्यथा तार्किकेन परमाणुर्जगत्कारणं, सांख्येन प्रकृतिर्जगत्कारणमित्युक्तेऽद्वैतिना ओमिति वक्तुं शक्यते परमाणुप्रकृत्यादीनां ब्रह्मा- नन्यत्वादिति सर्ववादाविरुद्धत्वं ब्रह्मणः । यद्वा प्रकर्षेण नौति स्तौतीति प्रणवः, प्रणवो हि ब्रह्म स्तौति इति प्रणवेन ब्रह्मणस्तादात्म्यात् प्रणव एव ब्रह्म तदेव सत्यं तद्विवर्त्तांश्चान्ये मिथ्या इति न मिथ्याभूतेन द्वैतेन सत्यस्याद्वैतस्य विरोध इति भावः । एतदेवाभिप्रेत्य गौडपादाचार्यैरुक्तम्— स्वसिद्धान्तव्यवस्थासु द्वैतिनो निश्चिता दृढम् । परस्परं विरुध्यन्ते तैरयं न विरुध्यते ॥ अद्वैतं परमार्थो हि द्वैतं तद्भेद उच्यते । तेषामुभयथा द्वैतं तेनायं न विरुध्यते ॥ कपिलकणादबुद्धार्हतादिदृष्ट्यनुसारिणो द्वैतिनो रागद्वेषोपेताः स्वसिद्धान्तदर्शन- निमित्तं परस्परं द्विषन्ति अद्वैतिनो हि सर्वात्म्यत्वात् यथा कदाचित् हस्तपदा- दिभिराहतोऽपि कश्चिन्न विरुध्यते तथा तैनं विरुध्यन्त इति तदर्थः । यतः अद्वैतं परमार्थः द्वैतं च तद्भेदः-तत्कार्यम् तद्विवर्तं इति यावत्, एकमेवाद्वितीयं तत्तेजो- ऽसृजत इति श्रुतेः । अतो न मिथ्याभूतेन द्वैतेन विरोधः। यथा मत्तगजस्थः उन्मत्तं भूमिष्ठं प्रति वाहय मां प्रतीति ब्रुवाणमपि तं प्रति न वाहयत्यविरोधबुद्ध्या तद्वत् द्वैतिनां तु उभयथा परमार्थतोऽपरमार्थतश्च द्वैतमेवातो विरोध इति । अत एव परमार्थसारे पतञ्जलिः— यद्यत्सिद्धान्तगमतर्कादिषु भ्रमन्ति रागाम्धाः । अनुमोदामस्तत्तत्तेषां सर्वात्मवाद्धिया ॥ इति । इदमत्र तत्त्वम्—कणादादयो हि मायिकत्वेन मिथ्याभूतत्वेन ब्रह्मरूपत्वेन च ज्ञातमपि प्रपञ्चं बोधनीयशिष्याधिकारानुसारेण तदीयमायिकस्याध्यवलम्ब्य ब्रह्मरूपत्वेन ज्ञातपरमाण्वादिभ्यः सृष्टिमाहुः । यदाहुः—'न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्' इति अतो न ऋषीणां परस्परं मतभेद इति ॥ ९ ॥ तात्पर्य यह है कि वे दर्शन जो परस्पर भिन्न हैं और एक पक्षपर आग्रह किए हैं। जैसे परमाणुकारणवाद और प्रधानकारणवाद । परमाणुकारणवादी कणाद जगत्की सृष्टि परमाणुसे मानते हैं। वहीं प्रधानकारणवादी कपिल जगत्का कारण प्रधानको (प्रकृतिको) ३-
मानते हैं इनमें परस्पर मत भेद है किन्तु जो सत्य है उससे दोनोंसे कोई मतभेद नहीं है।
क्योंकि प्रधान या परमाणु ब्रह्मसे अन्य है ही नहीं। अतः ब्रह्मको कारण मानने वाले
अद्वैतियोंकी दृष्टिमें दोनोंमें कोई विरोध नहीं है। अतः ब्रह्म ही सत्य है। अथवा ब्रह्मकी प्रवृ-
त्ति करने वाले प्रणवसे ब्रह्ममें तादात्म्य है अतः ब्रह्म होनेके कारण प्रणव सत्य है उसके
विवर्त जो अन्य हैं वे असत्य (मिथ्या) हैं। मिथ्या द्वैतसे सत्य अद्वैतका कोई विरोध नहीं
है। यहाँ वास्तवितकता यह है कि बोधनीय शिष्यकी शक्तिके अनुसार ही विषयका ज्ञान कराना
चाहिए। बोद्धा परमाणुको ब्रह्म समझता है अतः उसे वही जगत्का कर्ता बताया गया है ॥५॥
किं बहुना सर्वेऽपि विद्याभेदा वेदादैवेत्याह—
विधातुस्तस्य लोकानामङ्गोपाङ्गनिवन्धनाः ।
विद्याभेदाः प्रतायन्ते ज्ञानसंस्कारहेतवः ॥ १०॥
लोकानां विधातुः—उपदेष्टृत्वेन सर्वव्यवस्थापकस्य सर्वशब्दार्थप्रकृतिरूपत्वेन
सर्वस्रष्टुश्च तस्य प्रणवरूपस्य वेदस्य अङ्गोपाङ्गनिवन्धना