भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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समस्त कारण शक्तियाँ कालकी आज्ञानुसार कार्य करती हैं और रोके जाने पर कार्य नहीं करतीं। हेमन्त कालमें जिन्हें रोका गया है वे वसन्त कालमें आज्ञा पा जाती हैं। इसलिए काल एक स्वतन्त्रशक्ति है। दूसरी शक्तियाँ कालके अधीन हैं। जैसे व्याध दूसरे पक्षियों को पकड़नेके लिए एक पक्षीको सूत्रमें बाँधकर प्रेरित करते हैं वे पक्षी सूत्रमें बँधे रहनेके कारण अस्वतन्त्र की तरह हैं। क्योंकि सूत्रके खींचने पर पुनः पकड़ लिए जाते हैं। वैसे कालरूपी सूत्रमें बँधे हुए पदार्थ सङ्कोच और विकास रूपी उत्पत्ति और ध्वंसका सदा अनुभव करते हैं। इसीलिए कालरूपी सूत्रमें बँधा हुआ विश्व काल आने पर जब प्रवृत्त होता है तब जायते कहा जाता है, जब प्रसूत स्थित होता है तब अस्ति कहते हैं, जब विकार होता है तब विपरिणमते कहते हैं, जब विपरिणमित रुक नहीं सकता तब वर्धते कहते हैं जब तक बढ़ता है जब हीण होने लगता है तब ह्रसति कहते हैं और जब वह नष्ट हो जाता है तब नश्यति कहते हैं। यह कालशक्ति एक होने पर भी काल्पनिक भेदों के कारण अनेक और क्रमवाली है। इसीलिए क्रमसे कार्य उत्पन्न होता है, एक कालमें सब कार्य नहीं उत्पन्न होते ॥ ३ ॥ अभिन्नस्यापि ब्रह्मणः सर्वकार्यजनकत्वमुपपाद्य सांप्रतं सर्वव्यवहारहेतुत्वमुपपादयति- एकस्य सर्वबीजस्य यस्य चेयमनेकधा । भोक्तृभोक्तव्यरूपेण भोगरूपेण च स्थितिः ॥ ४ ॥ सर्वबीजस्य यस्य एकस्य ब्रह्मणः इयं तत्त्वाभ्यात्वाभ्यामनिर्वोच्या ( ब्रह्म- त्वेन ब्रह्मभिन्नत्वेन च वक्तुमशक्या ) शक्तिरूपा स्थितिः अनेकधा भोक्तृभोक्त- व्यरूपेण भोगरूपेण च लोकव्यवहाराय प्रवर्तते । भोक्ता=पुरुषः, भोक्तव्याः= विषयाः, भोगः=विषयोपभोगजन्यसुखदुःखाद्यनुभव इति विवेकः । तदुच्यते- सर्वदाऽव्यभिचारम्भूतरूपमेकस्यैवेति निर्णयः । भावानामात्मभेदश्च कल्पना स्यादनर्थिका ॥ जो समस्त जगत्का कारण और एक है उसकी यह शक्तिरूपा स्थिति ( जो ब्रह्मरूप तथा [L2