वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ५ च वेदः एकोऽपि महर्षिभिः पृथक् पृथक् समाम्नातोऽभ्यस्तः अनेकवर्त्मनैव ऋग्यजुःसामाथर्ववेदभेदेन चतुर्विध इव भवतीत्यर्थः । समाम्नान इत्यनेन वेदस्य महर्षिप्रणीतत्वनिरासः । इस अद्वितीय ब्रह्मकी प्राप्तिका साधन और उसकी प्रतिमा वेद है। यद्यपि वेद भी एक ही है तथापि महर्षियोंने अलग अलग अभ्यास किया है अतः (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदके रूपमें) अनेक प्रकारका दिखाई पड़ता है। या अध्ययन करनेवाले ऋषियोंके नामसे अनेक वेद मालूम पड़ते हैं। जैसे शाकल शाखा, बाष्कल शाखा आदि । प्राप्युपाय इति । ब्रह्मणः प्राप्तिः-ममाहमित्यहङ्कारग्रन्थिसमतिक्रममात्रम् । अहङ्कारचिदात्मनोस्तादात्म्याध्यास एव ग्रन्थिः तन्निवृत्तिश्च ग्रन्थिसमतिक्रमः । इस कारिकामें प्राप्युपायमें दो पद हैं एक प्राप्ति और दूसरा उपाय । 'मेरा' और 'मैं