भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 192 में से

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े-" Wait, is it "विवक्षे-" or "विवक्षि-"? Look at L3 end: "वि" "व" "क्षे-" or "तं"? Wait! Look at L4 start: "ति स्वैः" So: "विवक्षितमिति"? Let's look at end of L3: "वि" "व" then what letter? It has 'क्षि'? Wait, the 'ि' mātrā is on the left of 'त'? Ah! "विवक्षि-" at end of L3, then "-तत्वात्" or "-ति"? Wait, L4 starts with: "ति स्वैः पितृपितामहादिभिरधीयते..." Wait! "विवक्षि-" at end of L3? Look at the top of the character at the end of L3: It has an 'े' mātrā! Wait, could it be "विवक्षे-" and then "ति" -> "विवक्षेति"? "स्वत्वस्यैकत्वस्य च विवक्षेति" -> "विवक्षा इति" = "विवक्षेति"! विवक्षा + इति = विवक्षेति! YES! "विवक्षा" (feminine) + "इति" = "विवक्षेति"! Just like in L1: "एकत्वविवक्षा"! Here: "स्वत्वस्यैकत्वस्य च विवक्षेति"! Brilliant!

Line 4: "ति स्वैः पितृपितामहादि