भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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मानते हैं इनमें परस्पर मत भेद है किन्तु जो सत्य है उससे दोनोंसे कोई मतभेद नहीं है।
क्योंकि प्रधान या परमाणु ब्रह्मसे अन्य है ही नहीं। अतः ब्रह्मको कारण मानने वाले
अद्वैतियोंकी दृष्टिमें दोनोंमें कोई विरोध नहीं है। अतः ब्रह्म ही सत्य है। अथवा ब्रह्मकी प्रवृ-
त्ति करने वाले प्रणवसे ब्रह्ममें तादात्म्य है अतः ब्रह्म होनेके कारण प्रणव सत्य है उसके
विवर्त जो अन्य हैं वे असत्य (मिथ्या) हैं। मिथ्या द्वैतसे सत्य अद्वैतका कोई विरोध नहीं
है। यहाँ वास्तवितकता यह है कि बोधनीय शिष्यकी शक्तिके अनुसार ही विषयका ज्ञान कराना
चाहिए। बोद्धा परमाणुको ब्रह्म समझता है अतः उसे वही जगत्का कर्ता बताया गया है ॥५॥
किं बहुना सर्वेऽपि विद्याभेदा वेदादैवेत्याह—
विधातुस्तस्य लोकानामङ्गोपाङ्गनिवन्धनाः ।
विद्याभेदाः प्रतायन्ते ज्ञानसंस्कारहेतवः ॥ १०॥
लोकानां विधातुः—उपदेष्टृत्वेन सर्वव्यवस्थापकस्य सर्वशब्दार्थप्रकृतिरूपत्वेन
सर्वस्रष्टुश्च तस्य प्रणवरूपस्य वेदस्य अङ्गोपाङ्गनिवन्धना