वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें, अपभ्रंशप्रयोगाभावाय अपे-" Wait, "स्वीक्रियते": "स्वी क्रि य ते" -> "स्वीक्रियते". Line 25: "क्ष्यते इति यावत् ॥ १४ ॥"
Line 26 (Hindi): "और वही व्याकरण अपवर्गका (मोक्षका) उपाय है, पापको उत्पन्न करने वाले अपशब्दरूपी" Line 27: "वाणीके मलोंकी चिकित्सा (औषध) करने वाला है, सब विद्याओंमें पवित्र और साधुशब्दोंकी" Line 28: "द्योतनिके कारण सब विद्याओंसे आदृत भी है ॥ १४ ॥" Wait, "द्योतनिके": Let's check: "द्योतनिके" or "द्योतनेके"? It has an 'ि' matra on 'न': "द्योतनिके".
Line 29: "ननु 'श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यश्चोपपत्तिभिः' इति स्मरणाच्छ्रुतिवाक्यश्र-" Line 30: "वणजन्यमेव शब्दब्रह्मज्ञानमपवर्गायलं१ न व्याकरणजन्यम्, न च शब्दशक्तिग्रहाय" (Note: '१' is the footnote callout).
Footnote divider. Line 31: "१. इदं च मतं 'वेदान्तमुद्दिश्याप्रवृत्तानामपीषदप्रवृत्ता