वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्राक्कथन (द्वितीय संस्करण) व्याकरणशास्त्र के ज्ञाताओं को यह सदा स्मरण है कि जैसे व्याकरण एक वेदाङ्ग है वैसे वह एक दर्शन भी है। हमने व्याकरण के 'रक्षोहागमलघ्व- संदेहाः प्रयोजनम्' के द्वारा पाँच प्रयोजनों की जानकारी प्राप्त की। इन पाँचों प्रयोजनों की पूर्ति व्याकरण से होती है। प्रकृति-प्रत्यय, प्रकृत्यर्थ- प्रत्ययार्थ, और उनका सम्बन्ध जान लेने से वेदाङ्ग होने का कार्य पूरा हो जाता है। किन्तु इसका केवल प्रकृत्यर्थ-प्रत्ययार्थ आदि के ज्ञान द्वारा वेदार्थज्ञान मात्र प्रयोजन नहीं है, व्याकरणशास्त्र शब्दों के साधुत्वज्ञान द्वारा साक्षात् मोक्षप्रद भी है—'इयं सा मोक्षमाणानामजिह्मा राजपद्धतिः' यह व्याकरण विद्या ही मुक्ति चाहने वालों के लिए एक उत्तम मार्ग है। ऊपर हमने कहा कि व्याकरण वेदाङ्ग के अतिरिक्त एक दर्शन भी है। हम यहाँ उसके वेदाङ्ग होने के विषय में विशेष नहीं कहेंगे किन्तु दोनों धाराओं को स्पष्ट करने के विचार से सामान्य रूप में विचार करना आवश्यक है। व्याकरण के सूत्रों के रचयिता पाणिनि ने प्राचीन व्याकरणों की अपेक्षा यही एक विशेषता लाई कि व्याकरण किसी दार्शनिक आधार पर बना है। उसकी व्याख्या अनेक व्याख्याकारों ने की किन्तु कात्यायन के वार्तिकों में व्याकरणदर्शन की झलक रही जिसे व्याडि ने अपने एक लक्ष श्लोकों के संग्रह में बड़ी व्यवस्था से वर्णित किया। यही संग्रह वास्तव में व्याकरण का दर्शनस्रोत है।