भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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[ २ ] यद्यपि अपनी विशाल आकृति के कारण ही वह वैयाकरणों में बहुत दिन नहीं टिक सका तथा आज उसका नाम मात्र ही अवशिष्ट है फिर भी महर्षि पतञ्जलि ने उन सिद्धान्तों के बीज की अपने महाभाष्य में रक्षा की और उनके बाद के विद्वानों ने उन्हें विस्तृत किया । उन्हीं में महावैयाकरण भर्तृहरि भी हैं जिन्होंने वाक्यपदीय ग्रन्थ में पूरे 'व्याकरणदर्शन' का उत्तम रीति से चित्रण किया । यह ग्रन्थ समस्त उपलब्ध है या नहीं यह कहना भी कठिन है फिर भी ब्रह्मकाण्ड, वाक्यकाण्ड और पदकाण्ड में जो कारिकायें उपलब्ध हैं उनकी कुल संख्या दो सहस्र के मध्य में ही है । हमारी अपनी धारणा है कि वह ग्रन्थ दो हजार श्लोकों से अधिक न रहा होगा । आज जो १४० के लगभग कारिकायें कम हैं वे ही कहीं इधर-उधर नष्ट हो गई हैं । इस अनुमान की पुष्टि में हम इतना ही कहना चाहते हैं कि व्याकरण- दर्शन जो एक लक्ष श्लोकों में बिखरा था आचार्य भर्तृहरि ने उसे दो हजार श्लोकों में किया हो और व्याकरण के इस अगाध सागर को क्रीडा-पुष्करिणी बनाया हो, क्योंकि इनके परवर्ती विद्वान् आचार्य सायण ने 'जैमिनीय- न्यायमाला' का दो हजार श्लोको में संग्रह किया है और आरम्भ में ही लिख दिया है— 'सर्वथापि सहस्त्रे द्वे नातिक्रामति संग्रहः । मीमांसासागरस्तेन क्रीडापुष्करिणी भवेत् ॥' सम्भव है वाक्यपदीय के श्लोकों की संख्या दो सहस्र देख कर ही उनकी यह प्रवृत्ति हुई हो । कुछ भी हो, यह वाक्यपदीय व्याकरण के दर्शनस्रोत का आज उपलब्ध आधारभूत है । हम व्याकरण की अष्टाध्यायी से जैसे शब्दों के साधुत्व का ज्ञान करते हैं—काशिका अथवा सिद्धान्तकौमुदी व्याख्याओं के आधार पर, वैसे ही इस वाक्यपदीय के द्वारा ही हमें व्याकरण के दर्शनरूप का प्रत्यक्ष होता है । वैयाकरणभूषणसार, वैयाकरणलघुसिद्धान्तमंजूषा, वैयाकरणसिद्धान्त- सुधानिधि आदि किसी भी ग्रन्थ में व्याकरण के दर्शन रूप का हम जो प्रत्यक्ष करते हैं उसका आधार हमें वाक्यपदीय में ही मिलता है ।