वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३ ] इन सब स्थितियों के रहने हुए भी यह अत्यन्त खेद का विषय है कि इस युग के वैयाकरणों में इस ग्रन्थ के प्रति आकर्षण नहीं है। आज कम वैयाकरण हैं जिन्हें पूरा वाक्यपदीय ग्रन्थ देखने को प्राप्त हो। आश्चर्य होगा यह सुनकर भी कि कुछ कारिकायें शैवागम की हैं, जैसे 'स्वरूपज्योति- रेवान्तः परा वागनपायिनी' । इस कारिका को वाक्यपदीय की कारिका समझ कर इस युग के कुछ प्रकाण्ड वैयाकरणों ने पिताजी द्वारा लिखित वाक्यपदीय भावप्रदीप टीका की 'वैखर्या मध्यमायाश्च' इत्यादि कारिका की व्याख्या पर क्षोदक्षम करके परा वाक् सिद्ध करने का पूरा दुःसाहस भी कर डाला है। स्वयं तो नहीं किन्तु एक पण्डित ने पुत्र के नाम से एक लेख भी 'सारस्वती- सुषमा' में मुद्रित कराया है। इस प्रकार व्याकरणदर्शन का जीवनभूत यह ग्रन्थ लोगों की दृष्टि से परे रहा फिर भी पूज्य पिता श्रीसूर्यनारायण शुक्लजी ने चौखम्बा संस्कृत सीरीज के अध्यक्ष श्री बाबू जयकृष्णदासजी की प्रार्थना पर वाक्यपदीय ग्रन्थ पर भावप्रदीप नाम की टीका रच डाली। इस टीका के रचने में उन्होंने कितना परिश्रम किया है वह तो टीका देखने से ही पता चलेगा। किन्तु इतना बता देना अनुचित नहीं है कि व्याकरण के दर्शनरूप का प्रत्यक्ष होने में बाधा नहीं रहेगी। इस हिन्दीकरण के युग में छात्र हिन्दी टीका की विशेष माँग करने लगे, अतः मैंने इसकी संक्षिप्त हिन्दी व्याख्या लिख दी है जो पिताजी के वाक्यों का संक्षिप्त हिन्दी भाषान्तर मात्र है। 'वाक्यपदीय ग्रन्थ और ग्रन्थकार' के विषय में एक लेख भी प्रस्तुत है जिसे पढ़ने पर इस ग्रन्थ के मन्थन से निकले रत्नों का परिचय प्राप्त होगा। इस अवसर पर मैं श्री बाबू जयकृष्णदासजी ( अध्यक्ष चौखम्बा संस्कृत सीरीज, वाराणसी ) को विशेष शुभाशीर्वाद प्रदान करता हूँ जिन्होंने मुझे इस ग्रन्थ पर कुछ लिखने का अवसर प्रदान किया है।