भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

[ ३ ] इन सब स्थितियों के रहने हुए भी यह अत्यन्त खेद का विषय है कि इस युग के वैयाकरणों में इस ग्रन्थ के प्रति आकर्षण नहीं है। आज कम वैयाकरण हैं जिन्हें पूरा वाक्यपदीय ग्रन्थ देखने को प्राप्त हो। आश्चर्य होगा यह सुनकर भी कि कुछ कारिकायें शैवागम की हैं, जैसे 'स्वरूपज्योति- रेवान्तः परा वागनपायिनी' । इस कारिका को वाक्यपदीय की कारिका समझ कर इस युग के कुछ प्रकाण्ड वैयाकरणों ने पिताजी द्वारा लिखित वाक्यपदीय भावप्रदीप टीका की 'वैखर्या मध्यमायाश्च' इत्यादि कारिका की व्याख्या पर क्षोदक्षम करके परा वाक् सिद्ध करने का पूरा दुःसाहस भी कर डाला है। स्वयं तो नहीं किन्तु एक पण्डित ने पुत्र के नाम से एक लेख भी 'सारस्वती- सुषमा' में मुद्रित कराया है। इस प्रकार व्याकरणदर्शन का जीवनभूत यह ग्रन्थ लोगों की दृष्टि से परे रहा फिर भी पूज्य पिता श्रीसूर्यनारायण शुक्लजी ने चौखम्बा संस्कृत सीरीज के अध्यक्ष श्री बाबू जयकृष्णदासजी की प्रार्थना पर वाक्यपदीय ग्रन्थ पर भावप्रदीप नाम की टीका रच डाली। इस टीका के रचने में उन्होंने कितना परिश्रम किया है वह तो टीका देखने से ही पता चलेगा। किन्तु इतना बता देना अनुचित नहीं है कि व्याकरण के दर्शनरूप का प्रत्यक्ष होने में बाधा नहीं रहेगी। इस हिन्दीकरण के युग में छात्र हिन्दी टीका की विशेष माँग करने लगे, अतः मैंने इसकी संक्षिप्त हिन्दी व्याख्या लिख दी है जो पिताजी के वाक्यों का संक्षिप्त हिन्दी भाषान्तर मात्र है। 'वाक्यपदीय ग्रन्थ और ग्रन्थकार' के विषय में एक लेख भी प्रस्तुत है जिसे पढ़ने पर इस ग्रन्थ के मन्थन से निकले रत्नों का परिचय प्राप्त होगा। इस अवसर पर मैं श्री बाबू जयकृष्णदासजी ( अध्यक्ष चौखम्बा संस्कृत सीरीज, वाराणसी ) को विशेष शुभाशीर्वाद प्रदान करता हूँ जिन्होंने मुझे इस ग्रन्थ पर कुछ लिखने का अवसर प्रदान किया है।

[ ४ ] अन्त में भगवान् विश्वनाथ के करकमलों में इस ग्रन्थरत्न को अर्पण करता हुआ विज्ञजनों से अपनाने की प्रार्थना करता हूँ । यदि मेरे इस परिश्रम से किसी भी विद्वान् को कुछ सन्तोष होगा तो मै आनन्दित होऊँगा । पाठकों से निवेदन है कि प्रेस की असावधानी से अथवा मेरे ही नेत्रदोष या बुद्धिदोष से कहीं कुछ त्रुटियाँ रह गई हों तो सुधार कर मुझे सूचित करने की कृपा करेंगे । विजयादशमी } विद्वानों के स्नेह का पात्र २०१८ विक्रम } रामगोविन्द शुक्ल

भूमिका आचार्य भर्तृहरि और उनका वाक्यपदीय वैयाकरणों की परम्परा में पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि के बाद जिनका नाम बड़े आदर और सम्मान से लिया जाता है वे भर्तृहरि हैं। इन्होंने किस समय भारतभूमि को अलङ्कृत किया अथवा इनके द्वारा भारत भू और भारती ने कब अपना गौरव बढ़ाया यह कहना अत्यन्त कठिन है। इन्होंने अपने परिचय के लिये भी कुछ नहीं लिखा है। केवल इनके परवर्ती विद्वानों ने जहाँ कहीं इनका नाम ग्रहण किया है उसी से इनके पूर्ववर्ती होने का अनुमान किया जा सकता है। परिचय आचार्य भर्तृहरि ने अपने परिचय के लिये जो लिखा है वह वाक्यपदीय के द्वितीय काण्ड के अन्त में ही जुड़े हैं। जैसे— प्रायेण सङ्क्षेपरुचीनल्पविद्यापरिग्रहान् । संप्राप्य वैयाकरणान् संग्रहेऽस्तमुपागते ॥ कृतेऽथ पतञ्जलिना गुरुणा तीर्थदर्शिना । सर्वेषां न्यायबीजानां महाभाष्ये निबन्धने ॥ अलब्धगाधे गाम्भीर्यादुत्तान इव सौष्ठवात्। तस्मिन्नकृतबुद्धीनां नैवावस्थित निश्चयः ॥ वैजिसौभवहर्यक्षैः शुष्कतर्कानुसारिभिः । आर्षे विप्लावित ग्रन्थे संग्रहप्रतिकञ्चुके ॥ यः पतञ्जलिशिष्येभ्यो भ्रष्टो व्याकरणागमः। काले स दाक्षिणात्येषु ग्रन्थमात्रे व्यवस्थितः॥ पर्वतादागमं लब्ध्वा भाष्यबीजानुसारिभिः। स नीतो बहुशाखत्वं चन्द्राचार्यादिभिः पुनः॥ न्यायप्रस्थानमार्गांस्तानभ्यस्य स्वं च दर्शनम् । प्रणीतो गुरुणास्माकमयमागमसंग्रहः ॥ जब व्याकरण पढ़ने वाले विद्यार्थियों में आलस्य आ गया, वे संक्षिप्त अध्ययन और अल्प विद्या से ही सन्तुष्ट होने लग गए तब व्याडि रचित एक लक्ष श्लोक का संग्रह ग्रन्थ लुप्त हो गया। उस समय भगवान् पतञ्जलि को दया आई और तीर्थदर्शी इस विद्वान् ने समस्त न्याय बीजों का संग्रह करके व्याकरण शास्त्र पर महाभाष्य की रचना की, जो इतना गम्भीर है कि थाह लगाना कठिन है और इतना सरस और मनोरम है कि छिछला लगता है। अकुशल विद्वानों के लिये तो उसके स्वरूप का ठीक परिज्ञान ही नहीं हो सकता। बैजि, सौभव और हर्यक्ष आदि ने व्याकरणागम के रहस्य को न समझ कर केवल शुष्क तर्क द्वारा आर्ष ग्रन्थ की छींटालेदर कर डाली। इस प्रकार पतञ्जलि के शिष्यों से व्याकरणागम भ्रष्ट होकर दाक्षिणात्यों के घर में केवल ग्रन्थ के रूप में अलमारी की शोभा बढ़ाने लगा। फिर चन्द्राचार्य प्रभृति विद्वानों ने (त्रिकूट पर्वत पर स्थित त्रिलिंग देश से रावण रचित मूलभूत व्याकरणागम जिसे किसी मित्र राक्षस ने चन्द्राचार्य और वसुरात प्रभृति विद्वानों को दिया था प्राप्त करके) प्रचार किया तथा उसमें अनेक शाखायें बनीं। मेरे गुरुजी ने, जो वाक्यपदीय टीका के आधार पर वसुरात कहे जा सकते हैं, आगम संग्रह बनाया।'

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि महाभाष्यकार पतञ्जलि के बहुत दिनों के बाद आचार्य भर्तृहरि का जन्म माना जाना चाहिए तथा वसुरात के शिष्य भर्तृहरि ने यह ग्रन्थ रचा। काल आचार्य भर्तृहरि किस काल में हुए यह कहना भी अत्यन्त कठिन अथवा असम्भव है। आजकल के विद्वानों ने चीनी यात्री इत्सिंग के कथनानुसार भर्तृहरि का समय विक्रम के सप्तम शतक का अन्त अथवा अष्टम शतक का आरम्भ स्वीकार किया है। इत्सिंग ने लिखा है कि 'उस भर्तृहरि की मृत्यु हुए चालीस वर्ष बीत चुके थे।' किन्तु यह कथन असत्य सिद्ध हो जाता है जब काशिका के ४।३।८८ सूत्र के उदाहरण में वाक्यपदीय ग्रन्थ का उल्लेख मिलता है। यह संवत् ६८० से ७०१ के मध्य गिना गया है। कातन्त्र व्याकरण की दुर्गसिंह कृत वृत्ति काशिका से प्राचीन सिद्ध हो चुकी है क्योंकि सायण ने काशिका के ७।४।१३ सूत्र पर दुर्गसिंह की वृत्ति के खण्डन की बात लिखी है। दुर्गसिंह ने वाक्यपदीय की एक कारिका ३।१।४१ सूत्र पर उद्धृत की है जिससे भर्तृहरि की दुर्गसिंह से भी प्राचीनता सिद्ध होती है। शतपथ ब्राह्मण की टीका में हरि स्वामी ने वाक्यपदीय की प्रथम कारिका का उत्तरार्ध उद्धृत किया है। इनका समय इनके निम्नलिखित श्लोक से परिज्ञात होता है— श्रीमतोऽवन्तिनाथस्य विक्रमार्कस्य भूपतेः। धर्माध्यक्षो हरिस्वामी व्याख्याच्छातपथीं श्रुतिम्॥ यदाब्दानां कलेर्जग्मुः सप्तत्रिंशच्छतानि वै। चत्वारिंशत् समाश्चान्यास्तदा भाष्यमिदं कृतम्॥ इसके अनुसार हरिस्वामी का समय ३७४० कलिगताब्द अथवा वि० सं० ६९५ में पड़ता है। जैसा मीमांसकजी ने अपने इतिहास में लिखा है यह खींचातानी न भी की जाय तो कोई कठिनाई न होगी। तन्त्रवार्तिक के अ० १ पा० ३ अ० ८ में वाक्यपदीय की १।१३ कारिका को उद्धृत कर कुमारिल भट्ट ने भर्तृहरि को अपना पूर्ववर्ती सिद्ध किया है। अष्टाङ्ग संग्रह के टीकाकार वाग्भट्ट का शिष्य इन्दु उत्तर तन्त्र अ० ५० की टीका में लिखता है— तासु च तत्र भवतो हरेः श्लोको— संयोगो विप्रयोगश्च साहचर्यं विरोधिता। अर्थः प्रकरणं लिङ्गं शब्दस्यान्यस्य सन्निधिः॥ सामर्थ्यमौचितीदेशः कालो व्यक्तिः स्वरादयः। शब्दार्थस्यानवच्छेदे विशेषस्मृतिहेतवः॥ इत्यादि । यह कारिका वाक्यपदीय के २।३१७-३१८ में उपलब्ध है। काशी संस्करण में दूसरा भाग मुद्रित है जो अशुद्धि पत्र में मृषा है। वाग्भट्ट का काल ऐतिहासिकों ने चन्द्रगुप्त का काल माना है। पाश्चात्य ऐतिहासिक चन्द्रगुप्त द्वितीय का काल वि० सं० ४१३-४७० तक स्थिर करते हैं। इस प्रकार भर्तृहरि का समय वि० स० ४०० के पश्चात् मानना उचित नहीं प्रतीत होता।

[ ३ ] जनश्रुति विक्रमादित्य, जिन्हें उज्जैन मालवगण राज्य का राजा कहा जाता है, उनके भाई के रूप में भर्तृहरि का स्मरण लोग करते हैं । भर्तृहरि के योगी होने की बात प्रायः अधिक प्रसिद्ध है । उज्जैन के किले में भर्तृहरि की गुफा है जिसकी सरकार ने खुदाई की है। चुनार के किले में भी भर्तृहरि गुफा प्रसिद्ध है। यह किला भी विक्रमादित्य का बनवाया हुआ कहा जाता है । इससे यह तो सिद्ध होने लगता है कि भर्तृहरि और विक्रमादित्य में कोई सम्बन्ध अवश्य है । कुछ भी हो यह उच्चकोटि का वैदिक विद्वान् भर्तृहरि अवश्य बहुत प्राचीन विद्वान् है । इत्सिंग का मत चीनी यात्री इत्सिंग ने—जिसने सातमी शती ई० के अन्त में भारत यात्रा की थी, लिखा है कि 'हमारे भारत पहुँचने के ४० वर्ष पूर्व लगभग ६५१ ई० में भर्तृहरि नामक एक वैयाकरण की मृत्यु हो गई थी जो निश्चय ही भारतीय व्याकरणशास्त्र की अन्तिम मौलिक कृति वाक्यपदीय का लेखक था।' इनके सम्बन्ध में इत्सिंग कहता है कि 'उसका मन विरक्त तथा गृहस्थ जीवन में सदा दोलायमान रहता था और वह सात बार मठ और संसार के बीच में आता जाता रहा । जैसा कि बौद्धों के लिए अनुज्ञान है। एक अवसर पर जब वह बौद्ध विहार में प्रवेश कर रहा था उसने एक विद्यार्थी से अपने लिए बाहर रथ सज्जित रखने के लिए कहा जिससे कि उसके दुःसाध्य निश्चय पर यदि सांसारिक इच्छायें काबू पा जाँय तो वह उस पर चढ़ कर जा सके।' (संस्कृत साहित्य का इतिहास, कीथ) इत्सिंग को भले ही किसी ने भुलावा में डाल दिया हो अथवा किसी भर्तृहरि नाम के वैयाकरण की उस समय मृत्यु भी भले ही हो गई हो और वह बौद्ध तथा जैसा इत्सिंग ने समझा वैसा ही रहा हो । किन्तु वाक्यपदीयकार भर्तृहरि के विषय में इत्सिंग का कहना अत्यन्त असत्य है, क्योंकि जैसा मैं आगे भर्तृहरि को वैदिक सिद्ध करने चल रहा हूँ उन युक्तियों से भर्तृहरि को कथमपि बौद्ध नहीं सिद्ध किया जा सकता । किसी पाठक के लेख का हवाला देकर श्रीकीथ ने लिखा है कि 'बड़े ठोस साक्ष्य के आधार पर यह दिखाया जा चुका है कि इत्सिंग का कथन भ्रम पूर्ण नहीं है।' हमने बड़ा प्रयत्न किया कि पाठक का लेख मिले और उसमें देखा जाय कि किन तर्कों पर उन्होंने आचार्य भर्तृहरि को बौद्ध सिद्ध किया है किन्तु पत्रिका 'सरस्वतीभवन पुस्तकालय' में भी उपलब्ध न हो सकी । भर्तृहरि रचित ग्रन्थ आचार्य भर्तृहरि के रचित निम्नलिखित ग्रन्थ कहे जाते हैं— ( १ ) महाभाष्यदीपिका (महाभाष्यटीका) ( २ ) वाक्यपदीय ( ३ काण्ड ) ( ३ ) वाक्यपदीय-टीका ( १-२ काण्ड ) ( ४ ) भट्टिकाव्य ( ५ ) भागवृत्ति ( ६ ) सुभाषितत्रिशती

[ ४ ] इनके अतिरिक्त तीन ग्रन्थों के नाम और उपलब्ध हैं जो भर्तृहरि रचित कहे जाते हैं— ( १ ) मीमांसाभाष्य । ( २ ) वेदान्तसूत्रवृत्ति । ( ३ ) शब्दधातुसमीक्षा । इन ग्रन्थों के भर्तृहरि रचित होने के लिए कुछ कहना आवश्यक है जो हम आगे कह रहे हैं। युधिष्ठिर मीमांसक ने अपने 'संस्कृत व्याकरणशास्त्र का इतिहास' ग्रन्थ में प्रथम तीन तथा चार और द्वितीय तीन ग्रन्थों को भर्तृहरि रचित सिद्ध किया है। भट्टिकाव्य और भागवृत्ति किसी अन्य भर्तृहरि की रचित हैं कहा जा सकता है। मीमांसक जी ने अनेक उदाहरणों के द्वारा यह भी सिद्ध किया है कि भर्तृहरि और भागवृत्तिकार एक नहीं हो सकते। एक तो भाषा भिन्न है दूसरे सिद्धान्त भी भिन्न हैं। कहीं-कहीं भर्तृहरि का खण्डन भी है अतः दोनों का एक मानना अयुक्त है। यह भी सम्भावना हो सकती है कि आचार्य भर्तृहरि के नाम से कई विद्वान् प्रसिद्ध हुए हों। क्या भर्तृहरि बौद्ध थे ? चीनी यात्री इ

[ ५ ] ( ३ ) आचार्य भर्तृहरिने व्याकरण को स्मृति और ब्रह्मप्राप्ति का साधन स्वीकार किया है— यदेकं प्रक्रियाभेदैर्बहुधा प्रविभज्यते । तद् व्याकरणमागम्य परं ब्रह्माधिगम्यते ॥ १।२२ ॥ ( ४ ) स्मृतियों को वेद मूलक स्वीकार किया है— स्मृतयो बहुरूपाश्च दृष्टादृष्टप्रयोजनाः । तमेवाश्रित्य लिङ्गेभ्यो वेदविद्भिः प्रकल्पिताः ॥ १।७ ॥ ( ५ ) व्याकरण को वेद का मुख्य अंग स्वीकार किया गया है— आसन्नं ब्रह्मणस्तस्य तपसामुत्तमं तपः । प्रथमं छन्दसामङ्गं प्राहुर्व्याकरणं बुधाः ॥ १।११ ॥ ( ६ ) शब्द ब्रह्म को छन्दोमयी तनु कहा गया है— अप्रातीतविपर्यासः केवलमनुपश्यति । छन्दस्यश्छन्दसां योनिमात्मानञ्छन्दोमयीं तनुम् ॥ १।१७ ॥ ( ७ ) वेद शब्द से ही जगत् की उत्पत्ति है— शब्दस्य परिणामोऽयमित्याम्नायविदो विदुः । छन्दोभ्य एव प्रथममेतद्विश्वं व्यवर्तत ॥ १।१२० ॥ ( ८ ) प्राणियों में चेतना शक्ति भी शब्द ही है— सैषा संसारिणां संज्ञा बहिरन्तश्च वर्तते । तन्मात्रामनतिक्रान्तं चैतन्यं सर्वजन्तुषु ॥ १।१२६ ॥ ( ९ ) समस्त आगम कर्तृक हैं उनका विनाश भी ध्रुव है । किन्तु समस्त आगमों का मूल त्रिवेदी सदा व्यवस्थित और नित्य है— न जात्वकर्त्तृकं कश्चिदागमं प्रतिपद्यते । बीजं सर्वागमापाये त्रय्येवातो व्यवस्थिता ॥ १।१३३ ॥ ( १० ) वेद और शास्त्र मूलक तर्क ही नेय है— वेदशास्त्राविरोधी च तर्कश्चक्षुरपश्यताम् । रूपमात्राद्धि वाक्यार्थः केवलान्नावतिष्ठते ॥ १।१३६ ॥ ( ११ ) भर्तृहरि ने आत्मा को नित्य स्वीकार किया है— आत्मा वस्तु स्वभावश्च शरीरं तत्त्वमित्यपि । द्रव्यमित्यस्य पर्यायस्तच्च नित्यमिति स्मृतम् ॥ द्रव्यसमुद्देशः ॥ इन समस्त प्रमाणों को देखकर तथा वाक्यपदीय की दार्शनिक पृष्ठभूमि को देखकर कोई भी नहीं स्वीकार कर सकता कि आचार्य भर्तृहरि बौद्ध थे अथवा उनके हृदय में बौद्धधर्म के प्रति कोई आस्था या राग रहा हो । अतः आचार्य भर्तृहरि को बौद्धधर्मावलम्बी कहने में इत्सिंग ने भूल की है । सम्भवतः उसने किसी बौद्ध भर्तृहरि के विषय में कुछ सुना हो और वाक्यपदीय आदि ग्रन्थों का उसीसे सम्बन्ध जोड़ दिया हो, क्योंकि कोई भी विद्वान् वाक्य- पदीय ग्रंथ को देखकर अथवा शब्दरूप देखकर भर्तृहरि को बौद्ध कहने का साहस नहीं करेगा ।

[ ६ ] वाक्यपदीय आचार्य भर्तृहरि रचित अनेक ग्रन्थों का नाम पीछे बतलाया जा चुका है। हम इस प्रकरण में उनके समस्त ग्रन्थों का न तो परिचय देंगे न उन पर कुछ विचार ही करेंगे किन्तु प्रस्तुत ग्रन्थ वाक्यपदीय के विषय में कुछ परिचयात्मक विचार व्यक्त करने चल रहे हैं। वाक्यपदीय नाम आचार्य भर्तृहरि ने इस ग्रंथ का नाम वाक्यपदीय रखा जिसका अर्थ है कि वाक्य और पद के विषय में विचार के लिए आरब्ध ग्रन्थ (वाक्यं च पदं च वाक्यपदे ते अधिकृत्य कृतो ग्रन्थो वाक्यपदीयम्) । इस वाक्यपदीय में तीन काण्ड हैं इसीलिए इसे त्रिकाण्डी भी कहा गया है । महामहोपाध्याय पण्डित श्री गङ्गाधर शास्त्री मानवर्ली ने काशी संस्करण की भूमिका में लिखा है कि 'वाक्य और पद विचारक ग्रन्थ होने के कारण दो काण्ड की ही 'वाक्यपदीय' संज्ञा है, यह बात द्वितीय काण्ड के अन्तिम श्लोकों से ही व्यक्त हो जाती है जो ग्रन्थ-समाप्ति में लिखे गये हैं। तृतीय काण्ड तो कारक आदि विचार परक है अतः आरम्भ के दो काण्डों को ही 'वाक्यपदीय' स्वीकार करना चाहिए।' इधर जो वाक्यपदीय पर स्वोपज्ञ टीका प्राप्त हुई है वह भी दो काण्डों पर ही है, यह भी सिद्ध करता है कि आचार्य भर्तृहरि ने प्रथम और द्वितीय काण्ड को ही 'वाक्यपदीय' के रूप में स्वीकार किया हो। द्वितीय काण्ड की— दर्शनमात्रम केषाञ्चित् परमुमात्रमुदाहृतम् । काण्डे तृतीये न्यायेन भविष्यति विचारणा ॥ २।४८४ ॥ कारिका में आचार्य भर्तृहरि ने स्वयं तृतीय काण्ड रचने की प्रतिज्ञा भी की है। इससे तृतीय काण्ड के भर्तृहरि रचित होने में कोई विवाद नहीं है। हाँ, यह अवश्य है कि वाक्यपदीय पूर्ण है किन्तु तृतीय काण्ड में उन्हीं सिद्धान्तों पर विशद विचार है। अतः यह कहना कि 'वाक्यपदीय' दो काण्डों में पूर्ण नहीं है असंगत है। तृतीय काण्ड के बिना दो काण्ड अधूरे हैं यह कहना संगत हो सकता है। इसीलिए प्राचीन विद्वानों ने (स्वयं हेलाराज तथा वाक्यपदीयकार ने) तृतीय काण्ड को 'वाक्यपदीय' का पूरक माना है और इसीलिए उसे प्रकीर्ण काण्ड भी कहा जाता है। अतः हम श्री चारुदत्त शास्त्री के इस कथन से सहमत नहीं हैं कि 'तृतीय काण्ड वाक्यपदीय का मुख्य अंग है, प्रकीर्ण नहीं।' वाक्यपदीय कारिकायें वाक्यपदीय की प्रत्येक कारिका भाष्य के किसी न किसी वाक्य को आधार मानकर रची गई है। जैसे भाष्य के त्रिपादी में 'यथाऽम्वाम्बेति शिक्षमाणो बालोऽन्यथोच्चारयति' इसको आधार मानकर— अम्बाम्बेति यथा बालः शिक्षमाणो प्रभाषते । अव्यक्तं तद्विदां तेन व्यक्ते भवति निश्चयः ॥ इत्यादि ॥ इस पर विशेष रूप से अनुसन्धान अपेक्षित है कि भाष्य के किन सिद्धान्तों के आधार पर किस कारिका का निर्माण हुआ है।

[ ७ ]

कुछ लोगों का कथन है कि 'वाक्यपदीय' की समस्त कारिकायें आचार्य भर्तृहरि रचित नहीं हैं किन्तु बहुत सी कारिकायें संग्रह ग्रन्थ से ले ली गई हैं। यह कोई असम्भव नहीं है। सम्भवतः व्याकरणागम की रक्षा को ध्यान में रखकर ग्रन्थ निर्माण प्रवृत्त ग्रन्थकार ने अपने पूर्ववर्ती संग्रह अथवा गुरु रचित आगम संग्रह के श्लोकों का संग्रह किया हो। कुछ भी हो वाक्यपदीय की कारिकायें व्याकरण शास्त्र की दर्शन धारा के लिए आधार स्तम्भ हैं। आज जो वाक्यपदीय कारिकायें उपलब्ध हैं उनकी तालिका इस प्रकार है। ब्रह्मकाण्ड १५६, वाक्यकाण्ड ४८६, पदकाण्ड १३१८, वाक्यपदीय के कई संस्करणों में कुछ कारिकायें अधिक उपलब्ध होती हैं किन्तु हमने जो अभी तक वाक्यपदीय कारिकाओं का संग्रह किया है वह कुल १८६० है। हमारी अपनी राय है कि वाक्यपदीय का लगभग १४० कारिकायें नष्ट हो गई हैं। यह ग्रन्थ दो सहस्र श्लोकों से अधिक का न रहा होगा। हम यह भी सोच सकते हैं कि जैसे व्याकरणसागर को आचार्य भर्तृहरि ने दो सहस्र श्लोकों में सङ्गृहीत किया वैसे ही आचार्य सायण ने 'जैमिनीयन्याय माला' संग्रह किया हो और सायण को वाक्यपदीय से प्रेरणा मिली हो। वाक्यपदीय के द्वितीय काण्ड की कारिका ७९ में पुण्यराज ने लिखा है कि 'एतेषां विततस्य सोपपत्तिकं सनिदर्शनं स्वरूपं पदकाण्डे लक्षणसमुद्देशे विनिर्दिष्टमिति ग्रन्थकृतेव स्ववृत्तौ प्रतिपादितम्। आगमभ्रंशाल्लेखकप्रमादादिना वा लक्षणसमुद्देशश्च पदकाण्डमध्ये न प्रसिद्धः।' इस उद्धरण से पता चलता है कि लक्षणसमुद्देश नाम का कोई प्रकरण वाक्य- पदीय का अभी अनुपलब्ध है। इसी कारिका की व्याख्या में पुण्यराज लिखते हैं कि 'यस्मादुक्तम्। सेयमपरिमाणविक- कल्पा वाचा विस्तरेण बाधासमुद्देशे समर्थयिष्यते' यह बाधा समुद्देश भी अभी तक अनुपलब्ध है। इसी प्रकार— 'अपाये यदुदासीनं चलं वा यदि वाचलम्। ध्रुवमेवातदावेशात्तदपादानमुच्यते ॥ पततो ध्रुव एवाश्वो यस्मादश्वात्पतत्यसौ। तस्याप्यश्वस्य पतने कुड्यादि ध्रुवमिष्यते ॥ इत्यादि कारिकाओं को भर्तृहरि के नाम से आचार्य भट्टोजी दीक्षित प्रभृति ने स्मरण किया है किन्तु ये ग्रन्थ में उपलब्ध नहीं हैं। इससे यह तो सिद्ध ही हो जाता है कि वाक्यपदीय ग्रन्थ की खोज अभी बन्द नहीं होनी चाहिये। वाक्यपदीय टीकायें आचार्य भर्तृहरि की वृत्ति वाक्यपदीय ग्रन्थ में व्याकरणागम का यथार्थ रूप प्रकट है। यह शुद्ध कारिका के रूप में रचा गया है। कारिकायें कण्ठ करने में सरल तो पड़ती हैं किन्तु पूर्ण विषय का विवेचन उनमें नहीं हो पाता इसलिए सर्वप्रथम वाक्यपदीयकार भर्तृहरि ने ही आरम्भ के दो काण्डों पर विवरण लिखा है। आचार्य मम्मट, न्यायमञ्जरीकार जयन्त आदि ने वृत्ति सहित कारिकाओं को वाक्यपदीय स्वीकारा है। मम्मट ने 'नहि गौः स्वरूपेण गौः नाप्यगौः गोत्वा- भिसम्बन्धात्तु गौरिति' इस वाक्यपदीय पंक्ति का उल्लेख अपने काव्य प्रकाश में किया है। इससे यह सिद्ध होता है कि वाक्यपदीय पर सर्वप्रथम स्वयं ग्रन्थकार ने ही विवरण लिखा है। यह वृत्ति अभी तक अनुदित थी किन्तु कुछ विद्वानों के प्रयास से ब्रह्मकाण्ड तथा

[ ८ ] वाक्यकाण्ड का कुछ भाग मुद्रित हुआ है। इस वृत्ति के प्राप्त हो जाने से 'वाक्यपदीय' की कारिकाओं का आशय लगाना सरल तो हो ही गया साथ में अगले पण्डितों की व्याख्या में प्रामाण्य भी आ गया है। प्रथम काण्डवृत्ति यह एक विवाद का विषय बन गया है कि भर्तृहरि ने वाक्यपदीय पर जो वृत्तियाँ रची थीं। एक लघुविवरण दूसरी बृहतीवृत्ति। दोनों वृत्तियाँ अब मुद्रित हैं। प्रथम वृत्ति चौखम्बा सीरीज में मुद्रित है, जिसके अन्त में लिखा है कि 'इति महावैयाकरणहरिवृषभशिरचित- वाक्यपदीयप्रकाशे आगमसमुच्चयो नाम ब्रह्मकाण्डं प्रथमं समाप्तम्।' दूसरी वृत्ति लाहौर से मुद्रित है जिसके अन्त में लिखा है कि 'इति श्रीहरिवृषभमहावैयाकरणविरचिते वाक्यपदीये आगमसमुच्चयो नाम ब्रह्मकाण्डं समाप्तम्।' इस प्रकार हरिवृषभकृत दो वृत्तियाँ ब्रह्मकाण्ड पर मुद्रित हैं। दोनों में यत्र तत्र अवतरण आदि में भेद भी है। लाहौर मुद्रित वृत्ति विशुद्ध है तथा उस पर एक वृषभदेव की टीका भी मुद्रित है, जिससे लाहौर संस्करण की अत्यधिक उपयोगिता सिद्ध हो जाती है। पुण्यराज वाक्यपदीय के द्वितीय काण्ड पर पुण्यराज की टीका भी चौखम्बा वाराणसी और लाहौर से मुद्रित है। यह टीका भर्तृहरि की वृत्ति के आधार पर रची गई है तथा वृत्ति से कुछ विशद है, वाक्यपदीय के तात्पर्य मात्र का निर्देश करती है। फिर भी टीका अत्यन्त उत्तम है। इनका जन्मकाल क्या होगा यह कहना कठिन है क्योंकि इन्होंने अपने जन्म के विषय में कुछ भी नहीं लिखा है। केवल किसी काश्मीर के राजा राजानकशूरवर्म के समय में शशाङ्क के शिष्य से इन्होंने व्याकरण का अध्ययन किया तथा यह टीका लिखी, यह इन्हीं की टीका के अन्तिम श्लोक से पता चलता है— सत उपसृत्य विरचिता राजानकशूरवर्मनाम्ना वै। शशाङ्कशिष्याच्छ्रुतैतद्वाक्यकाण्डं समाप्ततः॥ वामन रचित अलङ्कार सूत्रवृत्ति के प्राचीनतम टीकाकार सहदेव ने अपने विषय में लिखा है कि— चतुर्दशानामपि यः प्रसिद्धो विद्यास्थितीनां परपारदृश्वा। शशाङ्कपूर्वंधर इत्युदारं यन्नामलोके नितरां प्रसिद्धम्॥ तदीयशिष्यः सहदेवनामा कुले प्रसूतः खलु तोमराणाम्। व्याख्यामिमां काव्यविचारशास्त्रे व्यधत्त लक्ष्मीमिह वामनीये॥ काश्मीरदेशादपसर्पतो मे शब्दानुशुद्धिं त्रिमुनि निशम्य। इससे पता चलता है कि कश्मीर के शशाङ्कधर के शिष्य सहदेव से ही पुण्यराज ने व्याकरण शास्त्र सीखा हो। हेलाराज वाक्यपदीय के तृतीय काण्ड पर जो अभी तक मुद्रित है एक ही टीका हेलाराज की है। हेलाराज ही इस भाग पर प्रथम टीकाकार हैं यह नहीं कहना चाहिए क्योंकि स्वयं हेलाराज

[ ६ ]

ने ही अपने पूर्ववर्ती टीकाकारों का अनेक स्थानों पर उल्लेख किया है। इनके भी समय का ठीक परिज्ञान नहीं हो सका है फिर भी इन्होंने जो कुछ अपने विषय में लिखा है उसीसे पर्याप्त प्रकाश मिलता है । हेलाराज ने तृतीय काण्ड के अन्त में लिखा है कि— मुक्तापीड इति प्रसिद्धिमगमत्काश्मीरदेशे नृपः श्रीमान् ख्यातयशा बभूव नृपतेस्तस्य प्रभावानुगः । मन्त्री लक्ष्मण इत्युदारचरितस्तस्यान्ववाये भवो हेलाराज इमं प्रकाशमकरोच्छ्रीभूतिराजात्मजः ॥ इससे पता चलता है कि काश्मीर देश के राजा मुक्तापीड के प्रधान मन्त्री लक्ष्मण के वंश में भूतिराज के पुत्र के रूप में हेलाराज ने जन्म लिया था । इससे लक्ष्मण के कितनी पीढ़ी के बाद हेलाराज ने जन्म लिया यह सन्दिग्ध ही रह जाता है। फिर भी बूह्लर महोदय ( जो अनेक प्राचीन पुस्तकों की खोज ही किया करते थे ) ने अभिनव गुप्त रचित गीताभाष्य पुस्तक प्राप्त की, जिसमें अभिनव गुप्त ने भूतिराज के पुत्र भट्टेन्दूराज को अपना गुरु स्वीकार किया है । भूतिराज के पुत्र होने के कारण यह स्वीकार करना पड़ता है कि भट्टेन्दूराज और हेलाराज सोदर भाई थे । अभिनव गुप्त के काल के आधार पर हेलाराज का काल ख्रीस्तीय दशम शतक का उत्तरार्ध स्वीकार किया जा सकता है । राजतरंगिणीकार महाकवि कल्हण ने हेलाराज की एक श्लोक में चर्चा की है— बद्धा द्वादशभिर्ग्रन्थसहस्रैः पार्थिवावलिः । प्राक्छातमतिना येन हेलाराजद्विजन्मना ॥ डा० त्रोय ने कल्हण का समय ई० की ११वीं शताब्दी स्वीकार किया है इससे भी स्पष्ट है कि हेलाराज उनसे पूर्ववर्ती रहे हैं । हेलाराज ने सम्पूर्ण वाक्यपदीय पर टीका रची है । इन्होंने स्वयं लिखा है कि 'काण्डद्वये यथावृत्ति सिद्धान्तार्थसतत्त्वतः' । प्रथम काण्ड की टीका का नाम इन्होंने 'शब्दप्रभा' रक्खा था जैसा कि इन्होंने लिखा है कि 'विस्तरेणागमप्रामाण्ये वाक्यपदीयेऽस्माभिः प्रथम- काण्डे शब्दप्रभायां निर्णीतम् ।' हेलाराज ने वाक्यपदीय टीका रचने के पूर्व 'क्रियाविवेक' और 'वार्तिकोन्मेष' नाम के दो ग्रन्थों का भी निर्माण कर लिया था । जैसा कि उन्होंने तृतीय काण्ड की कई कारिकाओं की व्याख्या में निर्देश किया है । १. तृतीय काण्ड जाति समुद्देश ५० कारिका की व्याख्या में लिखा है कि 'क्रियाविवेके विस्तरेणास्माभिरभिहितमिति तत एवावधार्यताम् ।' २. क्रियासमुद्देश की १ कारिका की टीका के अन्त में 'फलतस्तु सामर्थ्याद्भवति क्रिया- विवेके क्रियैव प्रधानभूता वाक्यार्थ इति निर्णीतं तत एवावधार्यम् ।' इन अंशों तथा इसी प्रकार अनेक स्थानों पर अपनी कृति का क्रियाविवेक के नाम से स्मरण किया है । ३. वार्त्तिकोन्मेष की चर्चा तो लिङ्गसमुद्देश के अन्त में 'सिद्धान्तस्तु यथाभाष्यं गुणा- वस्थारूपं लिङ्गमित्यस्माभिः वार्त्तिकोन्मेषे यथागमं व्याख्यातं तत एवावधार्यम् ।' ४. द्रव्यसमुद्देश की १५वीं कारिका की टीका में इन्होंने अपने 'अद्वयसिद्धि' नाम के ग्रन्थ की सूचना दी है। जैसे—'कारणान्तरव्युदासश्चाद्वयसिद्धावभिहित इति सत्यर्थित्वे सत एवावगन्तव्यः ।' २ वा० भू०

[ ८ ] · हेलाराज की टीका जो केवल तृतीय काण्ड की उपलब्ध है वह भी पूर्ण नहीं है। काशी से मुद्रित संस्करण में कई स्थलों पर लिखा है 'इतो ग्रन्थपातसन्धानाय फुल्लराज- कृतिर्लिख्यते' । फुल्लराज फुल्लराज ने वाक्यपदीय के कितने भाग पर टीका की यह अभी तक गवेषणा का विषय है। हाँ, टीका के कुछ भागों के देखने से पता चलता है कि वह टीका भी 'वाक्यपदीय' को सुबोध बनाने में अवश्य सहायक है। इनका क्या समय रहा होगा यह तो कहना असम्भव है तबतक जबतक उनके विषय में विशेष गवेषणा न हो। सूर्यनारायण शुक्ल वाक्यपदीय जैसा दार्शनिक ग्रन्थ है और उस पर जिस प्रकार की विवेचनापूर्ण टीका की आवश्यकता है उस प्रकार की एक भी टीका अभी तक नहीं रची गई है। जो टीकायें अभी तक बनी थीं वे किसी समय के लिए भले ही मार्गदर्शक रही हों किन्तु इस युग में जब 'वाक्यपदीय' का पठन पाठन बन्द है और विद्वानों में 'बहुश्रुत' होने की प्रवृत्ति कम हो गई है वाक्यपदीय पर विशद टीका की आवश्यकता थी। आचार्य भर्तृहरि ने ही कहा है— प्रज्ञा विवेकं लभते भिन्नैरागमदर्शनैः । कियद्वा शक्यमुन्नेतुं स्वतर्कमनुधावता ॥ इन्हीं स्थितियों को ध्यान में रख कर मेरे पूज्य पिता श्री शुक्ल जी ने 'भावप्रदीप' नाम की टीका रचनी आरम्भ की जो अनेक कारणवश ब्रह्मकाण्ड के आगे नहीं छप सकी। श्रीशुक्लजी का जन्म १९५२ विक्रम में फैजाबाद जिले की अकबरपुर तहसील के निमदीपुर ग्राम में श्री पं० रामेश्वरदत्त शुक्ल के घर में हुआ था। इनके पिता अवध की रियासत दिवरा के राजा रुद्रप्रतापसाहि के राजपण्डित थे। इन्होंने आरम्भिक शिक्षा अपने पिता से प्राप्त की और तदनन्तर राजगोपाल पाठशाला अयोध्या में श्री पं० नन्दधर पाण्डेय से व्याकरण- साहित्य, श्रीरामानुजाचार्य से शांकर, रामानुज वेदान्त तथा मीमांसा और श्रीश्रीदत्तजी पाण्डेय से नव्यन्याय का अध्ययन किया था। आपने काशी के गो० म० गोयनका संस्कृत महाविद्यालय में ४ वर्ष तक व्याकरण पढ़ाया और उसके बाद गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज वाराणसी में १४ वर्ष न्यायशास्त्र का अध्यापन किया तदनन्तर १९७४ के चैत्र (मार्च) में इस जगत् को छोड़ दिया। आपके रचित ग्रन्थ— १ वादरत्न (न्याय भाग) व्याकरण २. वादरत्न (परिष्कार भाग) " ३. माध्वभ्रान्तिनिरास वेदान्त ४. माध्वमुखभङ्ग " ५. निखिलेश्वरवाद निबन्ध ६ आशौचमकरन्दव्यवस्था धर्मशास्त्र

[ ११ ] आपकी रचित टीकायें १. मुक्तावलीमयूख न्याय २. तत्त्वचिन्तामणि ( मंगळवाद ) " ३. तर्कसंग्रहदीपिकामयूख " ४. वाक्यपदीय भावप्रदीप व्याकरण ५. लघुमंजूषा ( आकांक्षानोग्यता प्रकरण ) " ६. भाट्टचिन्तामणिमयूख मीमांसा ७. खण्डनरत्नमालिका ( खण्डनखाद्य टीका ) वेदान्त इनके अतिरिक्त प्रायः १५ ग्रन्थों का आपने सम्पादन किया जो चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय अथवा सरस्वतीभवन पुस्तकालय में मुद्रित हैं। ऊपर लिखे हुए ग्रन्थों में प्रायः समस्त चौखम्बा संस्कृत सीरीज में मुद्रित हैं। वाक्यपदीय पर अन्य टीकायें वाक्यपदीय पर कुछ लोगों ने केवल छात्रों के लिए कुछ टीकायें रखी हैं जो इतनी संक्षिप्त हैं कि इन्हें महत्त्व देना आवश्यक नहीं है। इनमें श्रीदू देश झा तथा श्रीनारायणदत्त शास्त्री ( नृसिंह ) जी की टीका अवश्य उल्लेखनीय हैं। इधर श्री पं० रघुनाथ शास्त्री जी ने समस्त वाक्यपदीय पर टीका लिखना आरम्भ किया है जो भर्तृहरि की वृत्ति के आधार पर रची जा रही है तथा भावबोध के लिए बड़ी सरल भी है। यदि इस महाविद्वान् को संस्कृत विश्वविद्यालय ने इस कार्य में रत रखने की व्यवस्था की तथा इस ग्रन्थरत्न का मुद्रण किया तो वाक्यपदीय का सचमुच उद्धार हो जायगा। अब हम आगे वाक्यपदीय ग्रन्थ का कुछ संक्षिप्त परिचय देना चाहते हैं जिसमें प्रकृत काण्ड का विशेष तथा शेष काण्डों का सामान्य परिचय होगा। वाक्यपदीय वाक्यपदीय के तीन काण्ड में से प्रथम काण्ड अथवा ब्रह्मकाण्ड आगमसमुच्चय काण्ड है। इस काण्ड में आचार्य भर्तृहरि ने वाक्यपदीय के दार्शनिक आधार का चित्रण किया है। प्रथम काण्ड का प्रतिपाद्य विषय प्रथम काण्ड मुख्यतः आगमकाण्ड कहा जाता है। इस काण्ड में शब्द को ब्रह्म के रूप में स्वीकार किया है। आचार्य भर्तृहरि ने शब्द को अनादिनिधन, अक्षर, जगत्कारण, नित्य और चेतन स्वीकार किया है। शब्द ब्रह्म अपनी स्वतन्त्र शक्ति 'कालशक्ति' के द्वारा समस्त जगत् की उत्पत्ति अथवा अभिव्यक्ति को नियन्त्रित मानता है। इसीलिए इनके यहाँ एक ही शब्द से एक काल में अनेक कार्य नहीं उत्पन्न होते। उस ब्रह्म का स्वरूप और प्राप्ति का मुख्य उपाय 'वेद' है, जो एक है, किन्तु महर्षियों के द्वारा विभिन्न रूप में अभ्यस्त होने के कारण अनेक रूप का हो गया है। वह वेद अनेक अङ्गों और उपाङ्गों से युक्त है, जिसमें व्याकरण वेद का प्रधान अंग है और व्याकरण के द्वारा प्रत्यगात्म स्वरूप शब्द ब्रह्म का साक्षात्कार होता है जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है। शब्द, अर्थ और उनका सम्बन्ध भी नित्य है, जिनमें प्रकृति प्रत्यय आदि की कल्पना उनके साधुस्वरूप के साक्षात्कार के लिए

१. कारिका १-५०: अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् एवं स्फोट-तत्त्व

की गई है। शब्दों के नित्य होने के ही कारण व्याकरण शास्त्र बनाना सार्थक है अन्यथा शब्दों की अनित्यता से सुस्थिर व्याकरण का बनाना सम्भव न होता। अतः साधु शब्दों के परिज्ञान के लिए व्याकरणागम की रचना वेद के आधार पर की गई। आगम प्रामाण्य आगम समस्त प्रमाणों में श्रेष्ठ है। अनुमान प्रमाण में आगम का अन्तर्भाव नहीं हो सकता क्योंकि आषाढ़ में बोया गेहूँ और कार्तिक में बोये हुए धान से फल उत्पन्न होना सम्भव नहीं है। अतः शक्ति के भेद से वस्तुस्थिति में भेद हो जाता है। धर्माधर्म निर्णय के लिए भी आगम ही प्रमाण है। शंख की पवित्रता की भाँति मनुष्य के शिर का कपाल अनुमान द्वारा पवित्र सिद्ध नहीं किया जा सकता। अनुमान में सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह किसी वस्तु को एक तर्क से सिद्ध करता है फिर विपरीत तर्क से खण्डित हो जाता है। अभ्यास—भी अनुमान में अन्तर्हित नहीं हो सकता। मणि के मूल्य में तारतम्य का ज्ञान अनुमान से नहीं हो सकता। अदृष्ट भी प्रत्यक्ष और अनुमान से परे ही है। पितरों, राक्षसों और पिशाचों की सिद्धियाँ प्रत्यक्ष अथवा अनुमान नहीं हैं। वाक्यपदीयकार के मत में प्रमाण इन विवेचनों से प्रतीत होता है कि वाक्यपदीयकार प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, अभ्यास और अदृष्ट इस प्रकार ५ प्रमाण मानते हैं। प्रत्यक्ष वाक्यपदीयकार के मत में प्रत्यक्ष दो प्रकार का है एक लौकिक और दूसरा अलौकिक। लौकिक प्रत्यक्ष तो हम लोगों का है किन्तु अलौकिक प्रत्यक्ष ऋषियों का है जो बिना इन्द्रिय की सहायता के ही होता है और लोक उसे अपने प्रत्यक्ष से कम महत्त्व नहीं देता। वा० १। ३७-४० ।। अनुमान प्रत्यक्ष के अतिरिक्त अनुमान प्रमाण की विशेष सिद्धि के उपाय तो नहीं वर्णित हैं किन्तु उसका खण्डन भी नहीं किया है अतः 'अप्रतिषिद्धं ह्यनुमतं भवति' न्याय के आधार पर स्वीकार किया जाता है कि वाक्यपदीयकार अनुमान प्रमाण स्वीकार करते हैं। शब्द ( आगम ) शब्द को प्रमाण स्वीकार करने के लिए वाक्यपदीयकार ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी है। ऊपर कहे गए समस्त तर्क आगम को प्रमाण ही सिद्ध कर रहे हैं। अभ्यास वाक्यपदीयकार ने अपनी ३५वीं कारिका के आधार पर अभ्यास नाम के प्रमाण की चर्चा की तथा कहा कि 'जो मणि आदि के मूल्यों के तारतम्य का ज्ञान है वह दूसरों को बताया नहीं जा सकता किन्तु अभ्यास से ही होता है, इससे पता चलता है कि इनको अभ्यास नाम का प्रमाण भी स्वीकृत रहा होगा। दूसरे दार्शनिकों का कहना है—'कल मेरा भाई आएगा

[ १२ ]

'यह मेरा हृदय कहता है' इस ज्ञान की भाँति अभ्यास भी प्रत्यक्ष ही है जैसे आर्ष ज्ञान । अदृष्ट वाक्यपदीय की ३६ वीं कारिका के आधार पर अदृष्ट प्रमाण की भी चर्चा की गई है । प्रेत अथवा पितर भीत से बिना छिद्र बनाये हाथ बाहर निकाल देते हैं ये सिद्धियाँ अदृष्टजन्य ही हैं । दूसरे दार्शनिक इसे भी आर्ष ज्ञान की भाँति प्रत्यक्ष ही मानते हैं । जैसे तपःसाध्य आर्षज्ञान है वैसे ही पितरों की सिद्धियाँ भी हैं। वाक्यपदीयकार ने उपमान, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि, सम्भव और ऐतिह्य नाम के प्रमाणों की कोई चर्चा भी नहीं की है । सम्भवतः उन्होंने इन प्रमाणों को नगण्य माना हो । श्री म० म० तात्याशास्त्रि प्रभृति वैयाकरणों ने व्याकरण सिद्धान्त में सांख्य सिद्ध प्रमाण मान्य कहे हैं । अत एव यह भी एक पक्ष प्रामाणिक प्रतीत होता है कि व्याकरण सिद्धान्त में प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द तीन ही प्रमाण मान्य रहे हैं । इस प्रकार नित्य चेतन शब्द ब्रह्म की प्राप्ति के लिए उसकी प्राप्ति के साधन वेद के प्रधान अङ्ग व्याकरण का अध्ययन आवश्यक, प्रामाणिक और आभ्युदयिक सिद्ध है । फिर भी सर्वदा शब्द का प्रतिभास न होने में कोई कारण अवश्य होगा । इत्यादि अनेक शंकाओं के समाधान के लिए शब्द के वास्तविक स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है । शब्द के दो रूप वैयाकरणों ने शब्द के दो रूप स्वीकार किये हैं । एक निमित्त और दूसरा अर्थबोधक । स्फोट और वैखरी रूप से दो प्रकार के शब्दों में कार्यकारणभाव माना गया है । स्फोट स्फोट वह शब्द है जहाँ अन्य शब्द छिपकर बैठे रहते हैं और जिसके अनुग्रह से शब्द सुनाई पड़ते हैं तथा अर्थ का बोध होता है । स्फोट निमित्त और अर्थ बोधक भी है । श्रोता के लिए वैखरी निमित्त है और स्फोट अर्थबोधक है क्योंकि पूर्वपूर्ववर्णों के नाश हो जाने से उत्तर- उत्तर वर्ण के एक साथ न रहने से अर्थबोध नहीं हो सकता था । अतः स्फोट ही अर्थबोधक माना गया है । वक्ता के तात्पर्य से स्फोट वैखरी का निमित्त है और वैखरी ही अर्थबोध (स्फोट प्रकाशन) के लिए उच्चारित होती है । इन दोनों पक्षों में स्फोट ही अर्थबोधक स्वीकृत है । यद्यपि ध्वनियों के क्रम से जन्म लेने के कारण स्फोट सक्रम प्रतीत होता है तथापि वह सक्रम नहीं है किन्तु जैसे मयूर के अण्डे के रस में मयूर के अंग प्रत्यंग अक्रम रहते हैं किन्तु क्रम से ही विकसित होते हैं वैसे स्फोट भी अक्रम है किन्तु ध्वनि के क्रम से उच्चरित होने से स्फोट में सक्रमता प्रतीत होती है। इसी प्रकार शब्द में वर्ण, पद, वर्णावयव, पदावयव, जाति, व्यक्ति, खण्ड आदि प्रतीतियाँ भ्रम हैं। वस्तुतः एक तथा सत्य वाक्य ही स्फोट है । जगत् शब्द का विवर्त है वाक्यपदीयकार ने जगत् को शब्द का विवर्त और परिणाम दोनों माना है यह 'शब्दस्य परिणामोऽयम्'-'एतद्विश्वं व्यवर्त्तत' इस कारिका से सिद्ध होता है । कुछ ऐसे वचन मिले हैं जिनसे परिणाम और विवर्त शब्द में पर्यायता प्रतीत होती है जैसे भवभूति ने

[ १४ ]

'आवर्तबुद्बुदतरङ्गमयान् विकारान्' कहा है। विकार और परिणाम पर्याय शब्द हैं। बुद्बुद पानी का विवर्त है विकार नहीं। फिर भी दोनों शब्दों के व्यवहार में साङ्कर्य कहा है। स्फोट सिद्धि के प्रारम्भ में गोपालिका टीकाकार ने शब्द को जगत् का विवर्त और विकार दोनों माना है। उनका कहना है कि स्फोट का विवर्त जगत् है किन्तु ध्वनि अथवा वैखरी का परिणाम है। यह उचित भी प्रतीत होता है। अब 'वागेव विश्वाभुवनानि जज्ञे' 'सभूरिति व्याहरद् भुवनमसृजद्' श्रुतियाँ भूर्व्याहार को जगत् सृष्टि में कारण मानती हैं तब वैखरीका परिणाम जगत् मान लेने में कोई हानि नहीं प्रतीत होगी।

शब्द से सृष्टि प्रक्रिया

वैयाकरणों के मत से सृष्टि का क्रम इस प्रकार मान्य है। सृष्टि के आरम्भ में पश्यन्ती वाग्रूपी शब्द ब्रह्म ने अपनी अपरिमित शक्ति वाली माया के साथ होकर विभिन्न प्रकार के प्राणियों के कर्मों की सहायता से समस्त नाम रूपात्मक जगत् को बुद्धिस्थ करके 'यह मैं करूँगा' संकल्प करता है और तब अपनी स्वतन्त्र शक्ति 'कालशक्ति' के साथ आकाशादिकों की, उसके बाद भूतों की सृष्टि करता है। कहा भी है कि— 'यः सर्वपरिकल्पनानामाभासेऽप्यनवस्थितः। तर्कांगमानुमानेन बहुधा परिकल्पितः ॥ अन्तर्यामी स भूतानामाराद् दूरे च दृश्यते । सोऽत्यन्तमुक्तो मोक्षाय मुमुक्षुभिरुपास्यते ॥ तस्यैकमपि चैतन्यं बहुधा प्रविभज्यते । अंगाराङ्कितमुत्पाते वारिराशेरिवोदकम् ॥ त्रयीरूपेण तज्ज्योतिः प्रथमं परिवर्तते । ब्रह्मेदं शब्दनिर्माणं शब्दशक्तिनिबन्धनम् ॥ विवृत्तं शब्दमात्राभ्यस्ततश्चैव प्रविलीयते ।' 'जो प्रलय के बाद भी स्थिर है, जिसकी तर्क, आगम और अनुमान द्वारा अनेक प्रकार से कल्पना की गई है, जो समस्त प्राणियों के दूर और अन्तर विद्यमान है, जो मुक्त है और मोक्षार्थी जिसकी उपासना करते हैं उसीका एक चैतन्य अनेक रूप में विभक्त है। जिसकी प्रथम ज्योति त्रयी (वेद) रूप में परिणत होती है वह शब्द है और उसी की मात्रा से जगत् का विवर्त हुआ है और उसी में यह विलीन होता है।' नागेशभट्ट ने सृष्टि का क्रम कुछ दूसरा ही स्वीकार किया है। जैसे 'प्रलय काल में समस्त प्राणियों के भोग्य कर्मों का जब प्रक्षय हो जाता है तब जगत् माया में और माया ईश्वर में लीन हो जाती है। यह लीनता नाश नहीं है किन्तु सुप्त होना है। उसके बाद जो कर्म फल देने योग्य नहीं थे काल वश फल देने के लिए उन्मुख हुए तब भगवान् का माया और पुरुष के रूप में अबुद्धिपूर्वक सृष्टि होती है फिर परमेश्वर में सृष्टि चलाने की इच्छा रूपा माया वृत्ति का उदय होता है और अव्यक्त, त्रिगुण बिन्दु उत्पन्न होता है। इसे ही 'शक्तितत्त्व' कहते हैं। इस बिन्दु में तीन अंश हैं। चिदंश (बीज) चिदचिन्मिश्र अंश नाद (परावाक्) चिदंश बिन्दु। इस प्रकार उत्पन्न नाद ही परावाक् है जिसे वाक्य- पदीयकार ने धात्वर्थसृष्टिस्थिति अथवा प्रवाहनित्यता के आधारपर अनादिनिधन शब्द से कहा है। वस्तुतः शब्द अनादि और अनन्त नहीं है।'

[ १५ ] यह ही मत 'प्रपञ्चसार' में (जो तन्त्रशास्त्र का ग्रन्थ है) प्रतिपादित है जैसे— प्रकृतिः पुरुषश्चैव नित्यौ कालश्च सत्तम। अणोरणीयसी स्थूलात्स्थूला व्याप्तचराचरा ॥ स जानाति विपाकांश्च तस्यां सम्यग्ववस्थितान् । सा तत्त्वसंज्ञा चिन्मात्रा ज्योतिषः सन्निधेस्तदा ॥ विचिकीपुर्घनीभूतः सा चिदभ्येति विन्दुताम् । काले न भिद्यमानस्तु स विन्दुर्भवेति त्रिधा ॥ स्थूलसूक्ष्मपरत्वेन तस्य त्रैविध्यमिष्यते । स बिन्दुनादबीजत्वभेदेन च निगद्यते ॥ विन्दोस्तस्माद्भिद्यमानाद्रवोऽव्यक्तात्मकोऽभवत् । स रवः श्रुतिसम्पन्नैः शब्दब्रह्मेति कथ्यते ॥ इत्यादि। तात्पर्य यह कि घनीभूत ब्रह्म, उसकी विचिकीर्षा, अव्यक्त (कारणबिन्दु), अव्यक्तरव (परावार्), पश्यन्ती (कर्मबिन्दु रूप सामान्यस्पन्दवती), मध्यमा (नादरूप स्पन्दविशेषवती), वैखरी (बीजरूपा अकारादिवर्णरूपा) । इस प्रकार नागेश का मत तन्त्रशास्त्र की वासना के आधार पर वाक्यपदीय कारिकाओं का अर्थ अन्यथा करने वाला है। जहाँ वाक्यपदीयकार शब्द ब्रह्म को नित्य मानते हैं तथा जगत् को शब्द ब्रह्म का विवर्त मानते हैं वहाँ नागेश शब्द ब्रह्म को अनित्य मानते हैं तथा प्रवाहनित्यता को ध्यान में रखकर वाक्यपदीय की 'अनादिनिधनं ब्रह्म' कारिका का अन्यथा अर्थ करते हैं। इनका यह मत शैवागम के 'शिवदृष्टि' ग्रन्थ तथा बौद्धदर्शन के तत्त्वसंग्रह ग्रन्थ में वैयाकरणमत के रूप में उद्धृत तथा स्वीकृत सिद्धान्त से भिन्न होने के कारण तथा वाक्यपदीय के सर्वथा विपरीत होने के कारण असङ्गत है। यह अन्य ग्रन्थकार (जैसे न्यायमञ्जरीकार जयन्त और शारदातिलक) के द्वारा ज्ञात वैयाकरण मत से भी विरुद्ध है।

सिद्धान्तशैव, शांकर और वैयाकरण मत में भेद

सिद्धान्तशैव का मत है कि 'शिव और शक्ति (ज्ञानरूपा) एक तत्त्व, शिव की परिग्रह शक्ति 'विन्दु' जो 'क्रियाशक्ति' भी कही जाती है द्वितीय तत्त्व, आत्मा तृतीय तत्त्व, इस प्रकार तीन 'रत्न' हुए। विन्दु के दो भेद एक शुद्ध (महामाया) दूसरा अशुद्ध (माया)। विन्दु को शक्ति का नाम मिलता है। उसे ही आश्रय बनाकर शिव शुद्धबिन्दु को क्षुब्ध करते हैं। उससे शब्द और अर्थ सृष्टि की धारा उत्पन्न होती है। वह शब्दधारा क्रम से परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी के रूप में है फिर अशुद्ध विन्दु क्षुब्ध होकर अशुद्ध शब्द धारा उत्पन्न करता है। वह भी क्रम से परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी रूप है। इस प्रकार दोनों प्रकार के बिन्दुओं से उत्पन्न धाराएँ जड हैं। उनका परिणाम वाणी भी जड है। उनका अतिक्रम ही मोक्ष है। वाक् तादात्म्य मोक्ष नहीं है।' यह मत शैव सिद्धान्त के अष्टप्रकरण में प्रतिपादित है। विशेष वहीं देखना चाहिए। अभिनव गुप्त का मत है कि प्रकाश और विमर्श दो ही वस्तु हैं। प्रकाश ही शिव है और विमर्श ही उसकी स्वातन्त्र्यशक्ति उमा कही जाती है। शिव भी प्रकाश के बिना विमर्श और विमर्श के बिना प्रकाश नहीं रह सकता अतः दोनों एक ही हैं। इसलिए इन्हें

[ १६ ] 'अद्वैती' कहा जाता है। विमर्श को परावाक् और प्रकाश को अर्थ माना है। यही सिद्धान्त कालिदास ने 'वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।' में वर्णित किया है। जब सर्वस्वतन्त्र शिव अपनी स्वतन्त्र शक्ति का संकोच करते हैं तब 'मैं यह जानता हूँ' भेद बुद्धि होती है। इस प्रकार स्वातन्त्र्य शक्ति रहित अंश जडवर्ग है और शक्ति सहित अंश चेतन वर्ग है। शांकरमत में विशेषता यह है कि 'प्रकाश को स्वप्रकाश मान लेने से कार्य चल जाता है प्रकाशक के रूप में विमर्श मानना आवश्यक नहीं है। प्रकाश ही ब्रह्म है जो अनिर्वचनीय अविद्या के द्वारा अनेक रूप में प्रतीत होता है।' शब्द ब्रह्मावादियों का मत है कि विमर्श (पश्यन्ती) ही ब्रह्म है। वह अविद्या के द्वारा अनेक रूप में भासित होता है। इस प्रकार वैयाकरण के मत में पश्यन्ती वाक् ही शब्द ब्रह्म है और शब्द ब्रह्म में तादात्म्य ही जीव का मोक्ष है। मुक्ति में भी शुद्धात्मना जीव की स्थिति रहती है। सिद्धान्तशैव के मत में मोक्षदशा में अशुद्ध वाक् रूप बन्धन का अतिक्रम हो जाता है और शुद्ध वाग् रूप का अनुगम रहता है इसलिए वह 'चित्' रूप में भासित होता है और वाणी 'चिद्' रूप में प्रतीत होती है। वस्तुतः जीव का वाक् तादात्म्य नहीं होता। वाणी के तीन भेद वाणी के तीन भेद माने गए हैं पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी। इन तीनों के भी तीन-तीन भेद हैं, स्थूला, सूक्ष्मा और परा। इस प्रकार वाणी के नव भेद हुए। वर्ण विभाग रहित स्वर प्रधान संगीत रूपा वाक् स्थूला पश्यन्ती, यही जिज्ञासा सहित सूक्ष्मा पश्यन्ती, यही जिज्ञासा हीन संविद्रूपा परा पश्यन्ती। चर्म से जटिल मृदंग पर उत्पन्न ध्वनि रूप स्थूला मध्यमा, यही बजाने की इच्छारूपा सूक्ष्मा मध्यमा, यही बजाने की इच्छा रहिता और निरुपाधिक परा मध्यमा। पृथक्-पृथक विलक्षणता के कारण स्पष्ट व्यक्त वर्ण रूपा वाक् स्थूला वैखरी। यही विवक्षा रूपा सूक्ष्मा वैखरी। यही विवक्षा रहित होने परसंविद्रूपा परा वैखरी। इस प्रकार पश्यन्ती ही सूक्ष्मतर अवस्था में 'परा' वाक् भी कही जाती है। तात्पर्य यह है कि एक बिन्दु में तीन रेखा डाल देने से भी मूलभूत बिन्दु एक ही है। उस एक बिन्दु में पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी तीन रेखावें हैं और इन एक एक रेखाओं में भी स्थूला, सूक्ष्मा और परा तीन रेखाएँ हैं। इस प्रकार नव वाणी बनती है जिनमें एक वह अलग ही है जिनमें तीन तीन भेद के साथ तीनों वाणियाँ हैं अतः वह रूप दशम भेद है। पूर्वोक्त नव और उनकी शरण तीन वाणियाँ इस प्रकार द्वादश भेद हुए। इन्हें द्वादशादित्यों कहा जाता है और सूर्य भी कहा जाता है। अत एव कहा है कि— सर्वभूतान्तरचरः शब्दब्रह्मात्मको रविः। भित्त्वा यं बोधखड्गेन निर्गच्छन्त्यविशङ्किताः॥ 'समस्त प्राणियों के हृदय में विचरने वाला शब्दब्रह्म रूप सूर्य बोधरूप खड्ग से जिसका भेदन कर निडर लोग निकल जाते हैं।' द्वादशादित्यों ही चिन्मरीचियाँ अथवा सूर्य रश्मियाँ हैं। सूर्य ही समस्त अर्थों का प्रकाशक होने से शब्द ब्रह्मात्मक अथवा वेदात्मक है। षोडशकला वाले पुरुष में १५ कलायें परिणामशालिनी हैं फिर भी सोलहवीं कला

चिकला और परिणाम की साक्षीभूता और परम अमृत रूप है। इसलिए इसका निरोध भी सम्भव नहीं विनाश तो दूर की बात है। सिद्धान्तशैवों का मत है कि परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी नाम की चार वाणियाँ हैं और ब्रह्म उनसे अलग है। पश्यन्ती आदि तीनों वाणियाँ परारूपा में परब्रह्म से संगत होकर एक रूप में स्थिर हैं। फिर वाचस्पति परमेश्वर अपनी ज्योति से अपने से अभिन्न वस्तु समुदाय को नित्य भासित करता है जिससे इच्छा उठती है और यही सृष्टिक्रम का कारण बनता है। नागेशभट्ट ने सिद्धान्तशैव के इसी मत और 'ए । वाङ्मूलचक्रस्था पश्यन्ती नाभि- संस्थिता। हृदिस्था मध्यमा ज्ञेया वैखरी कण्ठदेशगा' इस तन्त्रशास्त्र के मत के आधार पर वाणी के चार भेद परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी मान लिया जो वास्तव में व्याकरण सिद्धान्त के विरुद्ध है। क्योंकि आचार्य भर्तृहरि ने 'वैखर्या मध्यमायाश्च पश्यन्त्याश्चैतदद्भु- तम्। अनेकतीर्थभेदायास्त्रय्या वाचः परं पदम्' कारिका में वाणी के तीन ही भेद स्वीकार किए हैं। 'सारस्वती सुषमा' के लेख में जिस विद्वान् ने 'स्वरूपज्योतिरेवान्तः परावागनपायिनी' कारिका को वाक्यपदीय की मानकर प्रमाण के रूप में उपस्थित कर परा वाणी को भर्तृहरि सम्मत कहने का दुःसाहस किया है उसने वाक्यपदीय को न देखकर ही ऐसा किया है अतः हम इस विषय में कुछ नहीं कहेंगे। जिन लोगों ने 'चत्वारि वाक् परिमिता पदानि' महाभाष्यस्थ मन्त्र की नागेश की टीका के आधार पर वाणी के चार भेदों की कल्पना का समर्थन किया है उन्हें इसी मन्त्र का प्रदीप देखना चाहिए, जहाँ कैय्यट ने लिखा है कि— 'चतुर्णां ( नामाख्यातोपसर्गनिपातानाम् ) पदजातानामेकैकस्य चतुर्थभागं मनुष्या अवैयाकरणा वदन्ति।' यद्यपि 'चतुर्णाम्' की व्याख्या 'नामाख्यानोपसर्गनिपातानाम्' इस मन्त्र की व्याख्या में कैय्यट ने नहीं लिखा है तथापि 'चत्वारि शृङ्गा' मन्त्र की व्याख्या में भाष्यकार ने स्वयं कण्ठतः 'नामाख्यात' आदि की गणना की है, इस प्रकार नागेश की वाणी के चार भेद स्वीकार करने वाला सिद्धान्त व्याकरण सिद्धान्त के सर्वथा विरुद्ध है। हाँ, एक बात यह रह जाती है कि वे वाणी के चार भाग कौन हैं जिनमें अवैयाकरण केवल चतुर्थ भाग बोलते हैं। इसका उत्तर दो अत्यन्त स्पष्ट हैं। एक तो यह कि अवैयाकरण वाणी के उस रूप को जानते हैं जिसमें लोक व्यवहार होता है, शेष साधुत्वादि रूप नहीं जानते। दूसरा उत्तर यह हो सकता है कि— 'त्रिपादूर्ध्व उदैत् पुरुषः पादोऽस्येहा भवत् पुनः। पादोऽस्य विश्वाभूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥' इस मन्त्र में वर्णित ब्रह्म के चार अंश का जो विवेचन है वही शब्द ब्रह्मवादियों के मत में सुस्थिर है। यह वाक् संस्कृतरूप वाक् है जिसके ज्ञान से पुण्य होता है जिसका फल है 'एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग् भवति।' द्वितीय-काण्ड का प्रतिपाद्य विषय हम यहाँ द्वितीय काण्ड के प्रतिपाद्य समस्त विषयों की चर्चा न करके केवल उसकी मुख्य विचारधारा का निर्देश मात्र देना उपयुक्त समझते हैं।

[ २८ ] प्रथम काण्ड में वाक्यस्फोट को ही मुख्य सिद्ध किया गया है किन्तु वाक्य का स्वरूप क्या है इसका विवेचन द्वितीय काण्ड का मुख्यतया प्रतिपाद्य विषय है। वाक्यपदीय के द्वितीय काण्ड के आरम्भ में वाक्य के विषय में विभिन्न दृष्टिकोणों की चर्चा की गई है जिनमें मुख्य ये हैं। वाक्य विचार वाक्य दो प्रकार के हैं एक अखण्ड और दूसरा सखण्ड। अखण्ड पक्ष में वाक्य के तीन भेद हैं। ( १ ) संघातवर्तिनीजाति, ( २ ) एक अनवयव शब्द और ( ३ ) बुद्ध्द्यनुसंहति। सखण्ड पक्ष में पाँच भेद हैं ( १ ) केवल आख्यातशब्द, ( २ ) क्रम, ( ३ ) संघात, ( ४ ) आद्यपद, ( ५ ) पृथक् सर्वपद साकांक्ष। सखण्डपक्ष के पाँच भेदों में संघात और क्रम अभिहितान्वयवाद पक्ष में और आख्यातशब्द, आद्यपद, पृथक् सर्वपद साकांक्ष तीन लक्षण अन्विताभिधानवादपक्ष में हैं। इस प्रकार विभिन्न दर्शनों के आधार पर आठ प्रकार के वाक्यों के लक्षण किए गए हैं। इसके बाद वार्तिककार और मीमांसकों के मत से वाक्य के लक्षण कहे गए हैं। वाक्यार्थ विचार वाक्यार्थ का विचार अनेक पक्षों में किया गया है। जिनमें अभिहितान्वयवाद, अन्विता- भिधानवाद और प्रतिभावाद मुख्य हैं। उपर्युक्त प्रथम दो वादों में अनेक प्रकार के दोषों का उद्भावन करके प्रतिभा को ही वाक्यार्थ रूप में स्थिर किया गया है। प्रतिभा का स्वरूप वैयाकरणों के मत में प्रतिभा ही वाक्यार्थ है। नागेश ने भी मंजूषा में स्वीकार किया है' कि 'प्रतिभा वाक्यार्थः' । वाक्यपदीयकार ने कहा है कि संघातवाचक शब्दों में नियत अंशों की ही प्रतीति होती है। अतः कल्पित पदार्थों से सिद्ध प्रतिभा को ही वाक्यार्थ कहा गया है— विच्छेदग्रहणेऽर्थानां प्रतिभान्यैव जायते । वाक्यार्थ इति तामाहुः पदार्थैरुपपादिताम् ॥ यह प्रतिभा प्रत्येक आत्मा के लिए भिन्न भिन्न सिद्ध है तथा 'वह उसका स्वरूप है' यह ज्ञानकार भी दूसरे को नहीं समझाया जा सकता। इदं तदिति सान्येषामनाख्येया कथञ्चन । प्रत्यात्मवृत्तिसिद्धा सा कर्त्रापि न निरूप्यते ॥ उसका यह स्वभाव है बिना विचार का अवसर दिये ही समस्त अर्थों का मेल कर देती है इसलिये विषय में सर्वरूपता प्राप्त कर गई है। उपश्लेषमिवार्थानां सा करोत्यविचारिता । सार्वरूप्यमिवापन्ना विषयत्वेन वर्तते ॥ चाहे किसी की भावना से अथवा शब्द द्वारा उत्पन्न हुई इस प्रतिभा का कोई भी व्यक्ति कार्य के प्रकार निर्णय करने में अतिक्रमण नहीं करता । साक्षाच्छब्देन जनितां भावनानुगमेन वा । इतिकर्तव्यतायां तां न कश्चिदतिवर्तते ॥ समस्त प्राणी इसी ( प्रतिभा ) को प्रमाण मानते हैं और मनुष्यों की भाँति पशु और पक्षियों के भी समस्त कार्यों का आरम्भ प्रतिभा ही करती है । प्रमाणत्वेन तां लोकः सर्वः समनुपश्यति । समारम्भाः प्रतीयन्ते तिरश्चामपि तद्वशात् ॥ यह सर्व प्राणियों की सिद्धि है जैसे किन्हीं द्रव्यों के परिपाक के साथ ही बिना किसी-